एमीनेंट डिस्टोरियन्स
“मैं हमारे देश की हिस्ट्री के बारे में पढ़ रहा था, स्पेसिफिकली उत्पल कुमार की किताब ‘एमीनेंट डिस्टोरियन्स’ (Eminent Distortians) और उसे पढ़ते वक्त मुझे कांग्रेस को लेकर एक अजीब सा ब्रेनवाशिंग पैटर्न नजर आया।
एस. एल. भैरप्पा, जिनका कुछ ही महीनों पहले देहांत हुआ, उनको 1970s में एक NCERT पैनल का पार्ट बनाया गया था जिसका काम था पूरे देश का सिलेबस बदलना। इस पैनल के चेयरमैन थे इंदिरा गांधी के पॉलिसी एडवाइजर जी. पार्थसारथी।
इस पैनल की पहली मीटिंग में जी. पार्थसारथी कहते हैं कि ‘टेक्स्ट बुक्स में लिखा हुआ है औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ा, ज्ञानवापी मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई, वी हैव टू चेंज इट (हमें इसे बदलना होगा)!’
यह सुनकर एस. एल. भैरप्पा ने सिंपली सिर्फ यह पूछा— ‘इज इट ए फैक्ट और नॉट?’ (क्या यह सच है या नहीं?)।
फिर बाद में पार्थसारथी उनको साइड में ले जाकर बोलते हैं कि ‘भाई तुम कन्नडिगा हो और मैं तमिलियन हूं, भाइयों की तरह मिलकर काम करते हैं।’ लेकिन एस. एल. भैरप्पा ने फिर से पैनल में सेम सवाल पूछा— ‘इज इट ए फैक्ट और नॉट?’।
फिर होना क्या था? 10-15 दिन बाद एक नया सर्कुलर आया जिसमें उस पैनल में से एस. एल. भैरप्पा को ड्रॉप कर दिया गया और उन्हें एक लेफ्ट-लीनिंग (वामपंथी) हिस्टोरियन से रिप्लेस कर दिया गया।
और यह हिस्ट्री डिस्टॉर्शन यहीं नहीं रुकता है। 1973 में रेड फोर्ट (लाल किला) के पास इंदिरा गांधी जी 32 फीट गड्ढे में एक टाइम कैप्सूल दबा देती हैं, यह कहकर कि यह तो 1000 साल बाद खुलेगा। लेकिन फिर जनता पार्टी पावर में आती है और सिर्फ चार साल बाद उस टाइम कैप्सूल को निकाल लेती है।
उस टाइम के पॉलिटिकल डिस्कशन्स बताते हैं कि यह टाइम कैप्सूल कोई न्यूट्रल हिस्टोरिकल अकाउंट नहीं था, यह टाइम कैप्सूल पॉलिटिकल था नेचर में, यानी कि मोस्ट लाइकली कांग्रेस के ही गुणगान।
और आज जब देश में हिस्ट्री को दोबारा एग्जामिन (Examine) किया जा रहा है, तो उसे सिर्फ ‘सैफ्रनाइजेशन’ (Saffronization) का टैग देकर डाउनग्रेड किया जा रहा है।
अब आप महाराणा प्रताप के बारे में पढ़ना चाहते हो जिन्होंने पूरा जीवन महिलाओं का सम्मान किया, या फिर उस अकबर के बारे में जिसने रानी दुर्गावती को हराने के बाद उनकी भाभी को अपने हरम में डाल दिया?
चॉइस इज योर्स (चुनाव आपका है)।”
उत्पल कुमार की ‘Eminent Distortians’ भारतीय इतिहास-लेखन (Historiography) के विवादों पर एक तीखी प्रतिक्रिया है।
यह पुस्तक मुख्य रूप से उन इतिहासकारों पर सवाल उठाती है जिन्हें लेखक “दरबारी इतिहासकार” या “मार्क्सवादी इतिहासकार” कहते हैं। यहाँ इस पुस्तक के मुख्य बिंदुओं का विवरण दिया गया है:
पुस्तक का मुख्य विषय
लेखक का तर्क है कि स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारत के इतिहास को एक विशेष विचारधारा के चश्मे से लिखा गया, जिससे वास्तविक भारतीय पहचान और गौरवशाली अतीत के कई पहलुओं को “विकृत” (distort) कर दिया गया।
प्रमुख चर्चाएँ:
आक्रमणकारियों का महिमामंडन: लेखक का आरोप है कि स्थापित इतिहासकारों ने मध्यकालीन विदेशी आक्रमणकारियों के क्रूर कृत्यों को छिपाया या उन्हें “धर्मनिरपेक्ष” दिखाने की कोशिश की।
भारतीय नायकों की अनदेखी: पुस्तक में तर्क दिया गया है कि महान हिंदू साम्राज्यों (जैसे विजयनगर, चोल या मराठा) और स्थानीय प्रतिरोध के नायकों को मुख्यधारा के इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
NCERT और पाठ्यक्रम: उत्पल कुमार उन संस्थानों और शिक्षा प्रणालियों की आलोचना करते हैं जिन्होंने दशकों तक एक ही प्रकार के ऐतिहासिक विमर्श को बढ़ावा दिया।
अरुण शौरी की विरासत: इस पुस्तक का शीर्षक स्पष्ट रूप से अरुण शौरी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘Eminent Historians’ से प्रेरित लगता है, जो इसी तरह के वैचारिक संघर्ष पर आधारित थी।
लेखक का दृष्टिकोण
उत्पल कुमार एक पत्रकार और लेखक हैं जो अक्सर सभ्यतागत और ऐतिहासिक विषयों पर लिखते हैं। उनकी शैली सीधी और आक्रामक है, जहाँ वे ऐतिहासिक डेटा और समकालीन राजनीति को आपस में जोड़ते हैं।
एक विचार: यह पुस्तक उन लोगों के लिए काफी आकर्षक हो सकती है जो इतिहास के “अनसुने” पहलुओं या दक्षिणपंथी (Right-wing) ऐतिहासिक विमर्श को गहराई से समझना चाहते हैं।
तो चलिए, इस पुस्तक के सबसे चर्चित और विवादास्पद हिस्से पर बात करते हैं: मध्यकालीन भारत और औरंगज़ेब का चित्रण।
उत्पल कुमार अपनी किताब में इस बात पर गहरा प्रहार करते हैं कि कैसे आधुनिक इतिहासकारों ने औरंगज़ेब जैसे शासकों को “न्यायप्रिय” या “मजबूर” दिखाने की कोशिश की। उनके अनुसार, यह इतिहास का सबसे बड़ा ‘डिस्ट्रोशन’ (विकृति) है।
यहाँ कुछ मुख्य बिंदु हैं जिन पर वे विस्तार से चर्चा करते हैं:
1. मंदिरों का विनाश बनाम ‘राजनीतिक कारण’
लेखक उन इतिहासकारों की आलोचना करते हैं जो कहते हैं कि औरंगज़ेब ने मंदिर धार्मिक कट्टरता के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक विद्रोह को दबाने के लिए तोड़े थे। कुमार का तर्क है कि यह तर्क उन हज़ारों मंदिरों की तबाही और समकालीन साक्ष्यों को नज़रअंदाज़ करता है जो स्पष्ट रूप से धार्मिक उद्देश्यों की ओर इशारा करते हैं।
2. महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज का कद
किताब में यह मुद्दा उठाया गया है कि जहाँ मुगलों के दरबार, उनके खान-पान और उनकी भव्यता पर पन्ने-के-पन्ने लिखे गए, वहीं छत्रपति शिवाजी महाराज या महाराणा प्रताप जैसे नायकों को केवल ‘क्षेत्रीय विद्रोही’ या ‘पहाड़ी चूहा’ (मुगलों के शब्दों में) के तौर पर सीमित करने की कोशिश की गई।
3. ‘साझा संस्कृति’ (Ganga-Jamuni Tehzeeb) का मिथक
उत्पल कुमार तर्क देते हैं कि “गंगा-जमुनी तहजीब” का विचार एक आधुनिक राजनीतिक निर्माण है जिसे इतिहास पर थोपा गया है। उनका मानना है कि संघर्षों को छिपाकर एक बनावटी भाईचारे का इतिहास लिखने से समाज को वास्तविकता का पता नहीं चला।
4. नालंदा और बख्तियार खिलजी
लेखक इस बात पर भी रोष प्रकट करते हैं कि कैसे कुछ इतिहासकारों ने नालंदा विश्वविद्यालय को जलाने वाले बख्तियार खिलजी का बचाव करने या उस घटना को कम महत्व देने की कोशिश की, जबकि वह भारतीय ज्ञान परंपरा पर एक घातक प्रहार था।
निष्कर्ष:
उत्पल कुमार की किताब मूलतः यह संदेश देती है कि “इतिहास विजेताओं द्वारा नहीं, बल्कि उनके द्वारा लिखा गया जो अपनी जड़ों से कटे हुए थे।” वे पाठकों से आग्रह करते हैं कि वे प्राथमिक स्रोतों (Primary Sources) को खुद पढ़ें, न कि केवल विचारधारा से प्रेरित व्याख्याओं पर भरोसा करें।
उत्पल कुमार की पुस्तक का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा ‘आर्यन आक्रमण सिद्धांत’ (Aryan Invasion Theory – AIT) को चुनौती देना है। लेखक इसे भारतीय इतिहास के सबसे बड़े झूठों में से एक मानते हैं जिसे औपनिवेशिक और बाद में मार्क्सवादी इतिहासकारों ने बढ़ावा दिया।
इस विषय पर उनके मुख्य तर्क इस प्रकार हैं:
1. “बाँटो और राज करो” की रणनीति:
लेखक का मानना है कि अंग्रेजों ने ‘आर्यन आक्रमण’ का सिद्धांत इसलिए गढ़ा ताकि वे भारतीयों को यह बता सकें कि वे भी ‘बाहरी’ हैं। इससे उनके शासन को वैधता मिली क्योंकि वे तर्क दे सकते थे कि भारत हमेशा से विदेशी आक्रमणकारियों का देश रहा है।
2. उत्तर बनाम दक्षिण का विभाजन:
किताब में बताया गया है कि कैसे इस सिद्धांत का इस्तेमाल उत्तर भारतीयों (आर्य) और दक्षिण भारतीयों (द्रविड़) के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी करने के लिए किया गया, जिससे भारत की सांस्कृतिक एकता को नुकसान पहुँचा।
3. सरस्वती नदी और पुरातत्व:
उत्पल कुमार उन पुरातात्विक साक्ष्यों का उल्लेख करते हैं जो बताते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता वास्तव में ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ थी। वे तर्क देते हैं कि ऋग्वेद में सरस्वती नदी का वर्णन है, जो हजारों साल पहले सूख गई थी। यदि आर्य बाहर से आए होते, तो वे एक सूखी हुई नदी के बारे में इतना विस्तार से नहीं लिखते।
4. नस्ल के बजाय भाषाई पहचान:
लेखक का तर्क है कि ‘आर्य’ शब्द कभी भी किसी ‘नस्ल’ (Race) का सूचक नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और भाषाई विशेषण था जिसका अर्थ ‘श्रेष्ठ’ या ‘सभ्य’ होता है।
5. प्राचीनता का गला घोंटना:
लेखक का आरोप है कि ‘एमिनेंट हिस्टोरियंस’ ने जानबूझकर भारतीय सभ्यता की प्राचीनता को कम करके दिखाया ताकि इसे मेसोपोटामिया या मिस्र की सभ्यताओं से छोटा साबित किया जा सके।
संक्षेप में:
उत्पल कुमार इस खंड में यह स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि भारतीय लोग यहीं के मूल निवासी हैं और हमारी सभ्यता की जड़ें लाखों वर्षों की निरंतरता में हैं, न कि किसी विदेशी हमले का परिणाम।
उत्पल कुमार अपनी पुस्तक ‘Eminent Distortians’ में इन दोनों विषयों—प्राचीन भारतीय विज्ञान और भारतीय दर्शन—को बहुत ही गौरवशाली तरीके से प्रस्तुत करते हैं। उनका मुख्य तर्क यह है कि आधुनिक इतिहासकारों ने भारत को केवल “अध्यात्म और सपेरों का देश” साबित करने की कोशिश की, जबकि भारत विज्ञान और तार्किक दर्शन का वैश्विक केंद्र था।
यहाँ इन दोनों विषयों पर लेखक के विचारों का विस्तार दिया गया है:
1. प्राचीन भारतीय विज्ञान (Science in Ancient India)
लेखक का मानना है कि औपनिवेशिक शिक्षा पद्धति ने हमें यह विश्वास दिलाया कि सारा विज्ञान पश्चिम से आया है। वे पुस्तक में निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर देते हैं:
गणित और खगोल विज्ञान: कुमार आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कर जैसे वैज्ञानिकों का उल्लेख करते हैं जिन्होंने यूरोप से सदियों पहले ‘शून्य’ (Zero), दशमलव प्रणाली और पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने के सिद्धांत प्रतिपादित किए थे। वे इस बात पर क्षोभ जताते हैं कि इन उपलब्धियों को इतिहास की किताबों में केवल एक ‘फुटनोट’ बनाकर छोड़ दिया गया।
आयुर्वेद और चिकित्सा: पुस्तक में सुश्रुत (प्लास्टिक सर्जरी के जनक) और चरक के योगदान की चर्चा है। लेखक तर्क देते हैं कि जहाँ यूरोप मध्यकाल में चिकित्सा के नाम पर अंधविश्वासों में फंसा था, भारत में जटिल शल्य चिकित्सा (Surgeries) हो रही थीं।
धातुकर्म (Metallurgy): लेखक दिल्ली के ‘लौह स्तंभ’ (Iron Pillar) जैसे उदाहरणों के माध्यम से यह बताते हैं कि प्राचीन भारतीयों को लोहे और धातुओं के ऐसे मिश्रण का ज्ञान था जो जंग-रोधी थे—एक ऐसी तकनीक जिसे आधुनिक विज्ञान भी आज देखकर चकित है।
2. भारतीय दर्शन (Indian Philosophy)
दर्शन के क्षेत्र में उत्पल कुमार का दृष्टिकोण अधिक गहरा है। वे इसे केवल ‘धर्म’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘तर्क’ और ‘जीवन पद्धति’ के रूप में देखते हैं:
तर्क और जिज्ञासा की परंपरा: वे कहते हैं कि भारतीय दर्शन (जैसे न्याय और सांख्य दर्शन) केवल अंधविश्वास पर आधारित नहीं था, बल्कि उसमें प्रश्न पूछने और तर्क करने की पूरी आजादी थी। यहाँ ‘शास्त्रार्थ’ (Debate) की एक महान परंपरा थी, जिसे इतिहासकारों ने “धार्मिक कट्टरता” के झूठे नैरेटिव के नीचे दबा दिया।
विज्ञान और अध्यात्म का मिलन: लेखक के अनुसार, भारत में विज्ञान और धर्म कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। यहाँ भौतिक जगत की खोज (विज्ञान) और आंतरिक जगत की खोज (दर्शन) एक साथ चलती थी।
वैश्विक प्रभाव: कुमार इस बात को रेखांकित करते हैं कि कैसे उपनिषदों और बौद्ध दर्शन ने पूरी दुनिया (विशेषकर यूनान और बाद में आधुनिक यूरोपीय दार्शनिकों) को प्रभावित किया, लेकिन भारतीय पाठ्यक्रमों में इसे वह सम्मान नहीं मिला।
लेखक का मुख्य प्रहार:
उत्पल कुमार का सबसे बड़ा आरोप यह है कि “एमिनेंट हिस्टोरियंस” ने जानबूझकर इन उपलब्धियों को ‘मिथक’ या ‘अतिशयोक्ति’ कहकर खारिज कर दिया ताकि भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति हीनभावना (Inferiority Complex) बनी रहे। वे इस किताब के जरिए पाठकों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि भारत कभी ‘विश्वगुरु’ केवल कहने के लिए नहीं, बल्कि अपने ठोस वैज्ञानिक और दार्शनिक आधार के कारण था।
जाति व्यवस्था (Caste System) पर उत्पल कुमार के विचार काफी चुनौतीपूर्ण और लीक से हटकर हैं। वे इस विषय पर प्रचलित ‘मार्क्सवादी नैरेटिव’ को पूरी तरह से नकारते हैं। उनका तर्क है कि जिसे आज हम ‘कास्ट’ कहते हैं, वह प्राचीन भारत की ‘वर्ण’ और ‘जाति’ व्यवस्था का एक विकृत और औपनिवेशिक रूप है।
इस विषय पर उनके विश्लेषण के मुख्य बिंदु यहाँ दिए गए हैं:
1. ‘जाति’ बनाम ‘कास्ट’ (Caste)
कुमार का तर्क है कि ‘Caste’ एक पुर्तगाली शब्द (Casta) है। अंग्रेजों ने भारत की जटिल सामाजिक संरचना को समझने के बजाय उसे अपनी यूरोपीय श्रेणियों में फिट करने की कोशिश की। उनके अनुसार, भारत में हज़ारों ‘जातियाँ’ (गिल्ड्स या व्यावसायिक समूह) थीं, जो आपस में जुड़ी हुई थीं, न कि केवल चार सख्त खाने।
2. सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)
लेखक उन इतिहासकारों को चुनौती देते हैं जो कहते हैं कि प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था पूरी तरह से जड़ (Rigid) थी। वे उदाहरण देते हैं कि:
कई महान ऋषि और लेखक “कथित” निचली जातियों से आए थे।
कई राजवंश (जैसे मौर्य या नंद) उन वर्गों से उभरे जिन्हें आज ‘पिछड़ा’ माना जा सकता है।
वे तर्क देते हैं कि यह व्यवस्था जन्म आधारित होने के बजाय कर्म और योग्यता पर आधारित थी, जिसे बाद के समय में और विशेषकर औपनिवेशिक काल में पत्थर की लकीर बना दिया गया।
3. अंग्रेजों की जनगणना (1901 Census)
उत्पल कुमार हर्बर्ट रिस्ले (Herbert Risley) और 1901 की जनगणना पर कड़ा प्रहार करते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा के लिए और “बाँटो और राज करो” की नीति के तहत जातियों को एक सख्त पदानुक्रम (Hierarchy) में दर्ज किया। इससे पहले, जातियों के बीच की सीमाएँ धुंधली और लचीली थीं।
4. आर्थिक सुरक्षा का आधार
लेखक का एक दिलचस्प तर्क यह है कि ‘जाति’ प्राचीन भारत में एक ‘सोशल सिक्योरिटी नेट’ की तरह काम करती थी। हर जाति का अपना कौशल (Skill) था और वह अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करती थी। इसने भारतीय समाज को बाहरी आक्रमणों के दौरान भी बिखरने नहीं दिया।
5. ब्राह्मणवाद का नैरेटिव
कुमार का आरोप है कि ‘एमिनेंट हिस्टोरियंस’ ने “ब्राह्मणवाद” शब्द का इस्तेमाल एक गाली की तरह किया ताकि भारतीय समाज को आपस में लड़ाया जा सके। वे कहते हैं कि ब्राह्मणों का काम ज्ञान का संरक्षण करना था, न कि केवल शोषण, और उनमें से अधिकांश अत्यंत निर्धनता में रहते थे।
लेखक का सारांश: उत्पल कुमार के अनुसार, जाति व्यवस्था में कुरीतियाँ समय के साथ आईं, लेकिन इतिहासकारों ने जानबूझकर इसे भारतीय धर्म का अभिन्न अंग बताया ताकि हिंदू समाज को अनैतिक और पिछड़ा सिद्ध किया जा सके।
उत्पल कुमार अपनी पुस्तक ‘Eminent Distortians’ का अंत किसी हताशा के साथ नहीं, बल्कि एक ‘कॉल टू एक्शन’ (कार्यवाही के आह्वान) के साथ करते हैं। उनका मानना है कि अब समय आ गया है कि भारत अपने इतिहास को ‘औपनिवेशिक और मार्क्सवादी चश्मे’ को उतारकर अपनी दृष्टि से देखे।
इतिहास के पुनर्लेखन (Rewriting of History) के लिए वे निम्नलिखित सुझाव देते हैं:
1. ‘भारत-केंद्रित’ (India-centric) दृष्टिकोण
लेखक का तर्क है कि भारत का इतिहास दिल्ली की सल्तनतों या मुगल दरबारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पुनर्लेखन में अहोम साम्राज्य (असम), चोल नौसेना, विजयनगर साम्राज्य और सिखों के संघर्ष को उतनी ही प्रमुखता मिलनी चाहिए जितनी मुगलों को मिली है। इतिहास केवल हार का नहीं, बल्कि प्रतिरोध (Resistance) का होना चाहिए।
2. प्राथमिक स्रोतों की ओर वापसी
कुमार का कहना है कि हमें उन इतिहासकारों की ‘इंटरप्रिटेशन’ (व्याख्या) पर निर्भर रहने के बजाय मूल संस्कृत, तमिल और क्षेत्रीय भाषाओं के ग्रंथों, शिलालेखों और विदेशी यात्रियों के निष्पक्ष विवरणों को आधार बनाना चाहिए। वे कहते हैं कि “इतिहास को विचारधारा के अधीन नहीं, बल्कि तथ्यों के अधीन होना चाहिए।”
3. औपनिवेशिक मानसिकता का अंत
लेखक के अनुसार, इतिहास का पुनर्लेखन केवल तथ्यों को बदलना नहीं है, बल्कि उस हीनभावना (Inferiority Complex) को मिटाना है जो वर्तमान शिक्षा पद्धति ने भारतीयों के मन में भर दी है। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी को यह पता हो कि उनके पूर्वज केवल गुलाम नहीं थे, बल्कि वे महान दार्शनिक, वैज्ञानिक और योद्धा थे।
4. लोककथाओं और मौखिक इतिहास को मान्यता
उनका एक सुझाव यह भी है कि भारत के ग्रामीण अंचलों में प्रचलित लोकगाथाओं (Oral Traditions) को भी इतिहास में स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि अक्सर मुख्यधारा के इतिहासकारों ने उन स्थानीय नायकों को भुला दिया जिन्होंने अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान दिया था।
निष्कर्ष (The Core Message)
उत्पल कुमार अपनी किताब को इस संदेश के साथ समाप्त करते हैं कि:
”इतिहास कोई जड़ वस्तु नहीं है। यह एक राष्ट्र की आत्मा है। यदि आत्मा की पहचान गलत होगी, तो राष्ट्र का भविष्य कभी उज्ज्वल नहीं हो सकता।”
वे पाठकों को प्रेरित करते हैं कि वे एक ‘बौद्धिक योद्धा’ बनें और उस नैरेटिव को चुनौती दें जो उन्हें अपनी ही जड़ों से अलग करता है।
एक अंतिम जिज्ञासा: उत्पल कुमार की यह किताब आज के दौर में चल रहे ‘इतिहास बनाम विवाद’ (History vs Controversy) के केंद्र में है।
