जज स्थानांतरित: बदायूं की शम्सी जामा मस्जिद में नीलकंठ महादेव मंदिर पर सुनवाई अब 21 को
uttar pradeshbadaunHearing In Neelkanth Mahadev Vs Shamsi Jama Masjid Case
नीलकंठ महादेव बनाम शम्सी जामा मस्जिद मामला फिर टला, अब 21 अप्रैल को होगी सुनवाई,न्यायाधीश का हो गया स्थानांतरण
Neelkanth Mahadev Temple Shamsi Jama Masjid Case Hearing: बदायूं में नीलकंठ महादेव मंदिर बनाम शम्सी जामा मस्जिद मामले की सुनवाई सिविल जज सीनियर डिवीजन, फास्टट्रेक कोर्ट के न्यायाधीश के स्थानांतरण के चलते 21 अप्रैल तक को टल गई है। पिछले सुनवाई में मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता के अनुपस्थित रहने से मामला स्थगित हुआ था।
सुनील मिश्रा, बदायूं 02 अप्रैल2025। : उत्तर प्रदेश के जिला बदायूं में सिविल जज सीनियर डिवीजन,फास्टट्रेक कोर्ट की अदालत में चल रहे नीलकंठ महादेव मंदिर बनाम शम्सी जामा मस्जिद के मामले में फास्टट्रेक कोर्ट के न्यायाधीश अमित कुमार का जनपद भदोही स्थानांतरण हो जाने के चलते व और किसी नए न्यायाधीश के कार्यभार ग्रहण न होने से कोर्ट रिक्त होने की वजह से आज सुनवाई टल गई है। अब सुनवाई के लिए अगली तारीख 21 अप्रेल निर्धारित की गई है।
Neelkanth Mahadev Temple Vs Shamsi Jama Masjid Case
पिछली कई तारीखों में अदालत के बार बार बुलाए जाने के बावजूद भी इंतजामिया कमेटी पक्ष के अधिवक्ता के पेश ना होने की वजह से फास्टट्रेक अदालत के न्यायाधीश अमित कुमार ने मुस्लिम पक्ष को अंतिम अवसर देते हुए 11 फरवरी की तारीख निर्धारित की थी। लेकिन अधिवक्ताओं की हड़ताल के चलते मामले की सुनवाई टल गई थी। न्यायाधीश अमित कुमार ने दस मार्च की तारीख दी गई थी वहीं 10 मार्च को न्यायाधीश अमित कुमार के अवकाश पर होने के कारण 20 मार्च की तारीख निर्धारित की थी।
हिंदू पक्ष के अधिवक्ता वेदप्रकाश साहू ने बताया कि शम्सी जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के अधिवक्ता अनवर आलम ने 20 मार्च को कोर्ट में उपस्थित होकर प्रर्थना पत्र दिया था जिसमें उल्लेख किया गया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में निचली अदालत इस तरह के मामलों में कोई निर्णय नहीं ले सकती हैं। इसके चलते अपर सिविल जज सीनियर डिवीजन अमित कुमार ने आज 2 अप्रैल की तारीख निर्धारित की थी। वहीं इस दौरान सिविल जज सीनियर डिवीजन,फास्टट्रेक कोर्ट के न्यायाधीश अमित कुमार का स्थानांतरण जिला भदोही के लिए हो जाने के कारण कोर्ट रिक्त हो गया और अब इस मामले में अगली तारीख सुनवाई के लिए 21 अप्रैल लगा दी गई है।
अभी तक नए न्यायाधीश ने कोर्ट में कार्य भार ग्रहण नहीं किया है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता वेदप्रकाश साहू का कहना है कि अब नए न्यायाधीश कार्य भार ग्रहण करेंगे। ऐसे में यदि कोर्ट उक्त मामले को चलाए जाने की परमीशन देता है तो पूरे मामले में दोनों पक्षों की बहस नए सिरे से होगी।
बदायूं में जामा मस्जिद या नीलकंठ मंदिर?:हिंदुओं का दावा- अल्तमश ने मंदिर ढहाकर बनाई, मुस्लिमों के पास मालिकाना हक के सबूत
उत्तर प्रदेश में ज्ञानवापी, मथुरा जन्मभूमि और संभल जामा मस्जिद के बाद अब बदायूं की जामा मस्जिद चर्चा में है। हिंदू पक्ष ने इसे नीलकंठ महादेव मंदिर बताते हुए कोर्ट में दावा किया है। 10 दिसंबर को कोर्ट में सुनवाई है।
दावा है- साल 1175 में मुस्लिम शासक शमसुद्दीन अल्तमश (इल्तुतमिश) ने मंदिर को जामा मस्जिद का रूप दिया था। हिंदू पक्ष ने ब्रिटिशकाल में लिखे गए गजेटियर और 144 साल पुरानी ASI की रिपोर्ट कोर्ट में जमा की है।
वहीं, मुस्लिम पक्ष का दावा है कि उन्होंने कोर्ट में चकबंदी का वो दस्तावेज पेश किया है, जिसमें इस जमीन का मालिकाना हक जामा मस्जिद के नाम पर दर्ज है।
कोर्ट 2 साल से इस बात पर सुनवाई कर रही है कि मामला आगे सुना जाना चाहिए या नहीं? दैनिक भास्कर ने ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर इस पूरे विवाद को समझा। दोनों पक्षों से बात की। उन दस्तावेजों की स्टडी की, जिनके आधार पर मंदिर-मस्जिद के दावे किए जा रहे हैं।
2 सितंबर, 2022 को बदायूं सिविल कोर्ट में भगवान श्री नीलकंठ महादेव महाकाल (ईशान शिव मंदिर), मोहल्ला कोट/मौलवी टोला की तरफ से एक याचिका दायर हुई। इसमें जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी,यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड,ASI,केंद्र सरकार, यूपी सरकार,बदायूं कलेक्टर और प्रदेश के मुख्य सचिव को पार्टी बनाया गया। याचिका में दावा किया गया कि मौजूदा वक्त में बदायूं की जामा मस्जिद की जगह पर नीलकंठ महादेव का मंदिर था।
दावा किया जा रहा है कि मंदिर में यही शिवलिंग स्थापित था, जिसे मस्जिद बनाते समय हटा दिया गया। बाद में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजश्री चौधरी ने इस केस को लड़ने के लिए 5 प्रतिनिधि (याचिकाकर्ता) नियुक्त किए। इनमें महासभा के प्रदेश संयोजक मुकेश पटेल,अरविंद परमान एडवोकेट, ज्ञानेंद्र प्रकाश,डॉक्टर अनुराग शर्मा और उमेश चंद्र शर्मा शामिल हैं।
कोर्ट ने 5 लोगों के याचिकाकर्ता बनने की एप्लिकेशन स्वीकार कर ली। अब यही पांचों लोग हिंदू पक्ष की तरफ से कोर्ट में उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दो साल से कोर्ट में तारीख पर तारीख लग रही हैं। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों को सुना जा रहा है। माना जा रहा है, अगले 3 महीने में कोर्ट तय कर देगा कि ये केस आगे सुनने लायक है या नहीं.
हिंदू पक्ष ने अपनी याचिका में 3 दस्तावेजों का हवाला दिया है, पढ़िए…
1- ASI सर्वेक्षण रिपोर्ट में लिखा- राजा महिपाल ने मंदिर बनवाया, जिसे मुसलमानों ने नष्ट किया ASI ने 1875 से 1877 तक बदायूं से बिहार तक हुए सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट तैयार की। ये सर्वे ASI के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल ए.कनिंघम ने किया था। कलकत्ता सरकारी मुद्रण अधीक्षक कार्यालय ने ये रिपोर्ट 1880 में प्रकाशित की।
इस रिपोर्ट में लिखा है- कुतुबुद्दीन ऐबक ने बदायूं को अपना मुख्यालय बनाया। बदायूं का पहला गवर्नर शमसुद्दीन अल्तमश था, जो बाद में दिल्ली का राजा बना। लेकिन, बदायूं में उसकी दिलचस्पी दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद भी बनी रही। 5 साल बाद उसने अपने बड़े बेटे रुकनुद्दीन फिरोज को बदायूं का गर्वनर बनाया।
रिपोर्ट में आगे लिखा है, ब्राह्मणों के अनुसार- बदायूं का पहला नाम बेदामऊ या बदामैया था। तब तोमर वंश के राजा महिपाल ने यहां एक बड़ा किला बनवाया, जिस पर अब शहर का एक हिस्सा खड़ा है। कई मीनारें अभी भी बनी हैं।
यह भी कहा जाता है कि महिपाल ने हरमंदर नाम का एक मंदिर बनवाया था, जिसे मुसलमानों ने नष्ट कर दिया था। इसके स्थान पर वर्तमान जामा मस्जिद बनवाई थी। लोग इस बात पर एकमत हैं कि मंदिर की सभी मूर्तियां, मस्जिद के नीचे दबी थीं।
नीलकंठ महादेव मंदिर से जुड़ा नक्शा दिखाते हिंदू पक्ष के लोग।
2- 1857 के गजेटियर में लिखा- मस्जिद की निर्माण सामग्री नष्ट हुए मंदिर की लगती है ब्रिटिश काल (1857) में गजेटियर तैयार हुआ। इसमें बदायूं तहसील के इतिहास का भी जिक्र है। पेज नंबर 249 पर लिखा है- यहां सबसे पुरानी मुस्लिम इमारत शायद शम्स-उद-दीन अल्तमश की ईदगाह है, जो 1202 से 1209 ईसवी तक बदायूं का पहला गर्वनर था। इसके अवशेष पुराने शहर के पश्चिमी बाहरी इलाके से करीब 2 किलोमीटर दूरी पर हैं। इसमें 91.4 मीटर लंबी ईंट की दीवार है।
गजेटियर में जिक्र है कि निर्माण पुराना मंदिर है।
ऐसा लगता है कि केंद्रीय मेहराब के ऊपर एक लंबा शिलालेख था। हालांकि, अब यह सीमेंट के प्लास्टर से ढक दिया गया है। इस पर केवल कुछ ही अक्षर दिखाई देते हैं। दाईं ओर एक पंक्ति के शिलालेख का टुकड़ा है, जो स्पष्ट रूप से कुरान का एक उदाहरण है।
गजेटियर में लिखा है- इल्तुतमिश ने बदायूं पर अपनी छाप विशिष्ट तरीके से छोड़ी। उसने प्रसिद्ध जामा मस्जिद बनाई, जो शहर के ऊंचे भाग मौलवी टोला मोहल्ला में है। ऐसा कहा जाता है कि इसे एक पुराने पत्थर के मंदिर के स्थान पर बनाया गया था। क्योंकि, इसके निर्माण के लिए इस्तेमाल सामग्री किसी नष्ट हुए मंदिर की प्रतीत होती है।
इसकी दीवारें साढ़े तीन मीटर चौड़े मेहराबदार छिद्रों से छेदी गई हैं। पश्चिम में एक गहरा मेहराब है, जिसके दोनों तरफ दो छोटे नक्काशीदार खंभे हैं। ये जाहिर तौर पर पुराने हिंदू मंदिर से लिए गए थे।
3- जिला प्रशासन ने कहा- ईशान नाम के मठाधीश ने मंदिर बनवाया, कुतुबुद्दीन के दामाद ने ध्वस्त किया बदायूं के इतिहास पर यहां के जिला सूचना एवं जनसंपर्क कार्यालय ने अनेक बार पुस्तिका भी छपवाई। इसमें पेज नंबर-12 से 14 तक लिखा है- गुप्त काल में यह नगर वेदामऊ नाम से जाना जाने लगा। उस समय लखपाल यहां का राजा था।
इसी समय में ईशान शिव नामक मठाधीश ने विशाल शिव मंदिर की स्थापना कराई, जो नीलकंठ महादेव और बाद में इशान महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता रहा। साल 1175 में राजा अजयपाल ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
ये बदायूं जिला प्रशासन ने अपनी एक पत्रिका में लिखा है।
1202 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने बदायूं पर अधिकार कर मुसलमान गुलामवंश राज्य की स्थापना की। बदायूं को पश्चिमी क्षेत्र के सूबेदार की राजधानी बनाया। कुतुबुद्दीन के दामाद अल्तमश बाद में बदायूं के सूबेदार बने। उन्होंने नीलकंठ महादेव के मंदिर को ध्वस्त कर जामा मस्जिद शम्सी की तामीर (स्थापना) कराई। यह आज भी मौजूद है।
बाद में अल्तमश ने ही जामा मस्जिद के नजदीक दीनी तालीम के लिए मदरसा की स्थापना कराई, जो आज भी मदरसा आलिया कादरी नाम से मौजूद है। उसने ही ईदगाह तामीर कराई, जो आज भी है।
हिंदू पक्ष के याची बोले- सुरंग, पिलर, कुआं अभी भी मौजूद हिंदू पक्ष की तरफ से याची नंबर-एक मुकेश पटेल हैं, जो अखिल भारतीय हिंदू महासभा के प्रदेश संयोजक भी हैं। मुकेश बताते हैं- ये भगवान नीलकंठ महादेव का मंदिर है। राजा महिपाल का किला है। किले में ही ये मंदिर था। दिल्ली फतह करने के बाद मोहम्मद गौरी का सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली पहुंचा। वहां कब्जा करके उसने कन्नौज पर आक्रमण किया।
ये दरीबा मंदिर है, जहां पर शिवलिंग स्थापित है।
कन्नौज फतह कर वह बदायूं आया। उस समय बदायूं, कन्नौज सल्तनत के अधीन थी। कुतुबुद्दीन ने राजा महिपाल को मारा और अपने दामाद को बदायूं का सूबेदार बनाया। उसने सबसे पहले भगवान नीलकंठ के मंदिर को क्षति पहुंचाई। वो पूरा मंदिर क्षतिग्रस्त नहीं कर पाया। यहां सुरंग, पिलर सहित तमाम सबूत मौजूद हैं।
पूजा-पाठ करने वाला कुआं भी मौजूद है,जहां पहले भंडारा होता था। जब कोर्ट कमिश्नर यहां सर्वे करेगा,तो स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी। हम चाहते हैं,भगवान नीलकंठ महादेव फिर से आजाद हो और पूजा-पाठ को मंदिर हिंदू समाज को सौंपा जाए। हमारे पास सारे रिकॉर्ड मौजूद हैं,जो इस जगह को मंदिर बताते हैं।
हिंदू पक्ष के वकील ने कहा- पुरातत्व की इमारत पर यहां वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता
हिंदू पक्ष के वकील वेद प्रकाश साहू ने बताया- इस केस में अगली सुनवाई 3 दिसंबर को है। अभी मुस्लिम पक्ष की बहस चल रही है। इसके बाद इंतजामिया कमेटी का पक्ष सुना जाएगा। अभी इस बात पर बहस चल रही है कि कोर्ट में ये केस सुनवाई योग्य है या नहीं।
ये ऐतिहासिक और पुरातत्व सर्वे की इमारत है,इसलिए इस पर वर्शिप एक्ट अप्लाई नहीं होता। 1493 खसरा नंबर में पूरा किला आता है। किले के बीच में नीलकंठ महादेव का मंदिर है,जिसमें तथाकथित जामा मस्जिद बनाई गई है।
मस्जिद कमेटी के वकील बोले- 1272 के कागजात में जामा मस्जिद के नाम है जमीन हमने इस पूरे केस में जामा मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के सदस्य और मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ता असरार अहमद से फोन पर बात की। उन्होंने बताया- हमारा 1272 बंदोबस्त होता है। इसमें इंदराज (मालिकाना हक) लिखा होता है, वो हमने दाखिल किया है। ये सरकारी दस्तावेज है,जिसमें मालिकाना हक जामा मस्जिद लिखा हुआ है। सबसे ज्यादा ऑथेंसिटी इसी कागज की होती है। दूसरे पक्ष के पास कोई सबूत नहीं है।
गजेटियर में ये कहा है कि पत्थरों से मस्जिद बनी है। उस जमाने में पत्थर चलते थे। गजेटियर में कहीं ये नहीं लिखा है कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनी है। गजेटियर कोई प्रूफ नहीं है। दूसरे पक्ष पर कोई ऐसा प्रूफ नहीं है,जिसमें ये जगह मंदिर के नाम पर दर्ज हो।
असरार अहमद ने आरोप लगाया कि ये सीधे तौर पर माहौल खराब करने को याचिका डाली गई है। कुछ लोग लाइमलाइट में आना चाहते हैं। नफरती माहौल पैदा करना चाहते हैं। इससे पहले आज तक कहीं कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ।
दरीबा मंदिर के पुजारी का दावा- मंदिर ढहाने पर यहीं लाया गया था शिवलिंग हिंदू और मुस्लिम पक्ष से बातचीत करने के बाद हम जामा मस्जिद से डेढ़ किलोमीटर दूर मोहल्ला पटियाली सराय के दरीबा मंदिर पहुंचे। मंदिर में एक काफी पुराना शिवलिंग स्थापित है। मंदिर की मान्यताओं को लेकर हमने यहां के पुजारी सतपाल शर्मा से बात की।
उन्होंने बताया- इस मंदिर में जो शिवलिंग स्थापित हैं, वो कभी जामा मस्जिद में था। उस वक्त जामा मस्जिद की जगह नीलकंठ महादेव मंदिर हुआ करता था। जब मंदिर का विध्वंस हुआ, तो आक्रांताओं ने शिवलिंग को निकालकर बाहर कर दिया।
खबर पाकर नागा साधु वहां पहुंचे और शिवलिंग को उठाकर इस दरीबा मंदिर में ले आए। तब से शिवलिंग यहीं स्थापित है। दिन में तीन बार इस शिवलिंग का रंग बदलता है। सुबह गुलाबी, दोपहर में पीला और शाम के वक्त सफेद रंग का हो जाता है।