जातिवाद: अंग्रेजों ने कैसे तोड़ा हिंदू समाज?

आज एक high court के एक वकील साहब #राजभर साहब ऑपरेशन के बाद दिखाने आए थे / बातों बातों मे उनसे बात हुयी कि साहब राजभर लोग आज से हजार वर्ष पूर्व #क्षत्रिय हुआ करते थे / उनकी आँखों मे चमक आ गई , बोले – कि डॉ साहब आप तों मेरे मन की बात कर रहे हैं / https://en.wikipedia.org/wiki/Rajbhar
मैंने कहा कि अब आप लोग किस caste मे आते है ? उन्होने कहा कि #विमुक्त_जाति / मैंने पूंछा कि ये किसमे आते हैं ? genral SC ST या OBC मे ?
उन्होने कहा कि साहब किसी मे नहीं / मैंने कहा ऐसे कैसे ?
तों उन्होने बताया कि Denotified Caste /

मैंने थोड़ा इस विषय पर अदध्ययन किया / अंग्रेजों ने जब भारत मे शासन शुरू किया तों पता चला कि उनके लूट के विरोध और भारत के उद्योगों को नष्ट करने के कारण जो लोग बेरोजगार हुये उनमे से कुछ लोग उनका #हिंसक विरोध करते थे / उनको चिन्हित करने के लिए अंग्रेज़ William Sleeman को ज़िम्मेदारी दी , जिसको कालांतर मे कमिश्नर कि पदवी दी गई / उसने सबसे पहले एक खास समुदाय को जो इनका हिंसक विरोध करता था उसको #ठग के नाम से नामांकित किया और 1839 मे इस समुदाय के 3000 लोगों को पकड़ा , जिनमे से 466 को फांसी पर लटका दिया, 1564 को देशनिकाला या कालापानी , और 933 लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी / 1850 तक लगभग सभी ठगों को खत्म कर दिया गया / और इस कार्यप्रणाली से प्रोत्साहित होकर अंग्रेजों ने भारत के अन्य हिंसक विरोध करने वाले समुदायों के लिए एक कानून बनाने की योजना बनाई जिसको 1871मे James Fitzjames Stephen) जिसने एक साल बाद Indian Evidence Act 1872 बनाया था) उसने Criminal Tribe Act का गठन किया / उसकी दलील थी कि – जिस तरह यहाँ बुनकर लोहार आदि पुश्तैनी पेशा है , उसी तरह अपराध करना भी एक पुश्तैनी पेशा है जो कि इनको अपने पूर्वजों से वंशानुगत रूप से प्राप्त होता है / अर्थात इन समुदायों के लोग पैदायशी अपराधी होते है , और इसलिए इनको भी ठगों की तरह खत्म नहीं किया जाए/ https://en.wikipedia.org/wiki/Criminal_Tribes_Act
कालांतर मे इस कानून को पूरे देश मे लागू किया गया , जिसमे चिन्हित लोगों को #बिना किसी अपराध के और सबूत के , तथा बिना किसी कानूनी कार्यवाही के कत्ल किया जाना एक आम बात बन गयी।

इतिहासकर #रांनारायन रावत के अनुसार शुरू मे इसमे सिर्फ जाटों ( ये भी भारत मे शासक / क्षत्रिय रह चुके थे ) को सम्मिलित किया गया परंतु बाद मे इसका विस्तार कर #अधिकतर_शूद्रों जैसे #चमार, सन्यासियों और पहाड़ी लोगों को शामिल कर लिया गया / बाद मे इस कानून के अंतर्गत इन पैदायशी अपराधियों मे Bowreahs, Sonareahs, #Binds, Budducks, #Bedyas, #Domes, Dormas, Bembodyahs, Keechuks, Dasads, Koneriahs, Moosaheers, Rajwars, Gahsees, Banjors, Boayas, Dharees, Sowakhyas को भी शामिल कर एक तरह से इनके सामाजिक वहिष्कार को प्रोत्साहित किया गया / शासन के अपराधी तों थे ही /
नोट : MA Sherring के अनुसार बिन्द और मुशहर नमक के निर्माता थे जिस व्यापार पर अंग्रेजों ने 1780 मे ही एकाधिकार जमा कर उनको बेरोजगार कर दिया था / बेड़िया वस्तुओं के लोकल ट्रांसपोरटेर हुआ करते थे /
कालांतर में Criminal Tribes Act 1931में सैकड़ों हिंदुओं को इस कानून के घेरे में लाया गया / अकेले मद्रास में 237 अपराधी जातियों को शामिल किया गया था /

आजादी बाद यह कानून 1949 में खत्म कर 23 लाख लोगों को गैर अपराधी बनाया गया ( 2,300,000 tribals being decriminalised) / 1952 में नेहरू सरकार ने इस कानून को बदल कर –The Habitual Offenders Act (HOA) (1952) बनाया / और जो पहले से #अपराधी_ समुदाय का बदनुमा #दाग लेकर जीने को बाध्य थे, उनको denotified tribes नाम देकर, एक और सामाजिक धब्बा उनकी पीठ पर छाप दिया — अर्थात #विमुक्त_जाति / इस आजाद भारत में भी ढेर सारे विमुक्त जाति के लोग PASA ( Prevention of Anti – social Activity Act ) में चिन्हित होते रहे / इन समुदायों के ज़्यादातर लोगो को BPL की स्थिति में होने के बावजूद इनको SC , ST या OBC के ग्रुप से अभी भी बाहर रखा गया है /

नेशनल ह्यूमन राइट कमिशन ने और UN ने इस कानून को केएचटीएम करने की सिफारिश की थी , क्योंकि इसमे ज़्यादातर नियम कानून Criminal Tribes Act से ही लिए गए हैं / अभी इस कानून की वैधानिक स्थिति क्या है , ये तों मुझे नहीं पता लेकिन इस #विमुक्त_जाति में  6 करोड़ भारतीय लोग शामिल है ,राजभर भी उनमे से एक हैं / ये मॉडर्न caste System की एक और पोल खोलता है कि इसका भारत से कोई संबंध नहीं है ,ये ईसाई अंग्रेजों का भारत को एक उपहार है /

विडम्बना ये है कि Annihilation of Caste की कसमें खाने वाले डॉक्टर अंबेडकर को भी भारत के एक बड़े वर्ग पर ये क्रूर अन्याय  न दिखा क्योंकि वे बौद्ध तों 1956 मे बने थे , और स्वतंत्र भारत में ब्रिटिश कानून की नकल जवाहर लाल ने 1952 मे कर इन्हे #पैदायशी_अपराध से 1952 में #विमुक्त किया  /

भारत में कुछ समुदाय मालवाहन कार्य करते थे जिनको #बंजारा कहते थे। 375 साल पहले इसाईं समुद्री डकैत नहीं आये थे , तो ये पूरे भारत में विश्व की 25 % जीडीपी का ट्रांसपोर्ट करते थे। ट्वेर्निर ने इन बंजारों का वर्णन किया कि बंजारों के चार समुदाय  अलग अलग चावल, दाल, millet ( बाजरा जोनहारी मक्का) और नमक परिवहन करते थे ।

ट्वेर्निर ने लिखा कि ये लोग अक्सर 10,000 से 12,000 बैलों की बैलगाड़ियों लेकर चलते थे । और कभी कभी , मैं पहले निकलूँ या तुम पहले निकलो, के चक्कर में हत्या को उतारू हो जाते थे । जैसे आज का #रोड_रेज। इन बंजारों का लीडर अपने गले में मोतियों की माला पहनता था। जब ये रोडरेज में परस्पर हत्या को उतारू होते थे , तो लोकल राजा इनको बुलाकर समझौता कराता था , और एक मोती का माला और एक लाख रूपये दोनों को देकर विदा करता था ताकि सामानों की आपूर्ति निर्बाध चलती रहे।

जब ईसाई लुटेरों ने भारत को आधुनिक बनाने हेतु रेलगाडी और रेल रोड का निर्माण किया तो ये हिन्दू बेरोजगार हो गए। इन्होंने उनका हिंसक प्रतिरोध किया, तो उन्होंने इनको #Criminal _Tribes_Act बनाकर जन्मजात अपराधी घोषित किया।

1952 में UNO के दबाव में नेहरू ने यह कानून निरस्त कर उनको भी #Habbitual_Offendres_Act में डालकर उनको #denotified_Caste में बदला।
अब आते हैं #जगन्नाथ_पुरी के मंदिर पर जो आदिशंकर द्वारा स्थापित पीठ है ।

#Regulation_iv_1809 में कानून बनाकर उस मंदिर में आने जाने वालों पर एक्ट बनाकर टैक्स वसूला और मंदिर की संपत्ति का अपहरण किया।

और वही से निकला है कि शूद्रों को मंदिरों के अंदर घुसने की मनाही है , जिसको डॉ ऍमबेडकर ने बात में उन्ही ईसाईयों के चक्कर फंसकर लंबी पुस्तक लिखी।

स्वतंत्र भारत में इसी लुटेरे कानून को आधार बनाकर भारतीय सरकारें अभी भी कानून बनाकर हिंदुओं के आराध्य के ऊपर अपना कब्जा जमाए हुए है ।

या तो ये मान लो कि गोरे समुद्री डकैतों ने आपके देश के उद्धार हेतु नियम कानून बनाये थे , या फिर इन कानूनों को ख़ारिज करो।

अब ये पोस्ट इसलिए लगा रहा हूँ कि Criminal Tribes Act में चिन्हित लोगों को भारत ने UNO के दबाव में denotified Caste में डाला, लेकिन जगन्नाथ पुरी के मंदिर में स्वतह् कब्जा किया ईसाइयो ने उसको लूटनेके लिए , और स्वतंत्र भारत में आज भी उन मंदिरों को सरकारी सिस्टम ही नियंत्रित कर रहा है , तो आवाज कब उठाओगे ?

सरकारें 68 सालो से चोरी डकैती और स्कैन से तो खुद को विरत नहीं कर पा रहीं हैं , इनको मंदिरों में दान किए गए पैसे को कब्जाने की क्या जरूरत है ?

ORISSA ACT NO .11 OF 1955
SHRI JAGANNATH TEMPLE ACT, 1955
AN ACT TO PROVIDE FOR BETTER ADMINISTRATION AND
GOVERNANCE OF SHRI JAGANNATH TEMPLE AT PURI AND ITS
ENDOWMENTSORISSA ACT NO .11 OF 1955
SHRI JAGANNATH TEMPLE ACT, 1955
AN ACT TO PROVIDE FOR BETTER ADMINISTRATION AND
GOVERNANCE OF SHRI JAGANNATH TEMPLE AT PURI AND ITS
ENDOWMENTS

✍🏻डॉ त्रिभुवन सिंह

 

राम भरोसे हिन्दू होटल”
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सन 1857 के विद्रोह को जब फिरंगी हुक्मरानों ने कुचल दिया था तो भारत में राष्ट्रवाद का उदय ही न हो इसके लिए उन्होंने कई इन्तेज़ामत किये | भारत की शिक्षा व्यवस्था का विदेशीकरण कर डाला गया था | रोजगार से जुड़ी चीज़ें सिखाई ही नहीं जाती थी | मैकले मॉडल का मुख्य उद्देश्य ही यही था कि शिक्षा व्यवस्था से ऐसे भारतीय पैदा किये जाएँ जो दिखने में, रहन सहन के तरीकों में तो भले ही भारतीय हों मगर मानसिक तौर पर वो फिरंगी गुलाम ही रहें | मैकले ने खुद अपनी चिट्ठियों में ऐसी ही शिक्षा व्यवस्था के विकास की बातें की हैं |

हथियारों पर लाइसेंस की प्रक्रिया भी उसी दौर में आई थी | अखाड़ों पर पाबंदियां लगाई गई थी, हथियार रखने और चलाना सीखने की मनाही थी | इस से जातिवाद और छुआ-छूत को बढ़ावा देने में भी मदद मिलती थी | इस समय जब ऐसा प्रचार शुरू किया गया कि भाई युद्ध कला तो सिर्फ राजपूतों को सिखाई जाती थी, तो दो सौ सालों में लोगों को इस झूठ पर भरोसा भी होने लगा | वैसे जो लोग बनारस के मणिकर्णिका घाट तक गए हैं, उन्होंने शायद डोम राजा का अखाड़ा भी देखा होगा | मैकले के मानस पुत्रों को ये भी बताना चाहिए कि अगर युद्ध कला सिर्फ राजपूत / क्षत्रिय जाति के लोग सीखते थे तो ये ज्यादातर अखाड़े उन जाति के लोगों के क्यों हैं जिन्हें अछूत माना जाता है ? फिर सवाल ये भी है कि अगर इन लोगों को छूने पर पाबन्दी थी, तो भला इन जगहों पर बिना छुए कुश्ती सीखते कैसे होंगे “सवर्ण” ?

सन 57 का विद्रोह कुचल दिया गया था और भारत 50 साल में युद्ध के लायक भी नहीं रह गया | लेकिन फिर भी करीब 50 साल में राष्ट्रीयता की भावना फिर से जागने लगी | 1915-1920 के दौर में जब गाँधी जी भारत आ गए थे और कांग्रेस के झंडे तले होम रूल का आन्दोलन जोर पकड़ने लगा था, तो लोग फिर से सड़कों पर उतरने लगे थे | उस समय के कई तथाकथित बुद्धिजीवी मानते थे कि “हिन्दुओं की कौम” तो मिट चुकी है, इनका लड़ने भिड़ने का दम नहीं रह गया | ऐसे ही दौर में एक प्रमुख क्रन्तिकारी पार्टी के सरगना अपने फिरंगी आकाओं को चिट्ठी लिख कर, रिपोर्ट भेजकर ये बताते थे कि कैसे वो इस आन्दोलन को कुचलने में मदद करके अपने फिरंगी हुक्मरानों की मदद कर रहे हैं !

ये वो दौर था जब हिन्दुओं से कुछ नहीं हो पायेगा ये बताने के लिए एक विशेष राजनैतिक विचारधारा के बुद्धिपिशाचों ने “राम भरोसे हिन्दू होटल” का जुमला उछालना शुरु किया | अगर आप सोचते हैं कि ये अजीब सा जुमला आया कहाँ से ? तो जनाब ये तस्वीर 6 अप्रैल 1919 की है जिसमें फिरंगी शासन के विरोध में लोग बिना किसी स्थापित नेतृत्व के ही सड़कों पर उतरना शुरू हो चुके थे | इनसे कुछ नहीं हो पायेगा ये कहने के लिए इस तस्वीर में पीछे दिख रहे होटल का नाम जुमले की तरह उछाला गया था |

क्या होगा ये पता नहीं, या कुछ भी नहीं हो पायेगा, सब फर्जी शोर है ये साबित करने के लिए एक आयातित विदेशी विचारधारा के बुद्धि-पिशाचों ने इस तरह “राम भरोसे हिन्दू होटल” का जुमला शुरू किया |

मदन गड़रिया धन्ना गूलर आगे बढ़े वीर सुलखान,
रूपन बारी खुनखुन तेली इनके आगे बचे न प्रान।
लला तमोली धनुवां तेली रन में कबहुं न मानी हार,
भगे सिपाही गढ़ माडौ के अपनी छोड़-छोड़ तरवार।

अगर आपने ये चार लाइन पढ़ ली हैं तो शायद अंदाजा भी हो गया होगा कि ये विख्यात लोककाव्य “आल्हा-उदल” की हैं | ये किस दौर की थी ये अंदाजा करना भी मुश्किल नहीं है | लोक काव्य में उस दौर के जिन राजाओं का जिक्र आता है उसमें से एक पृथ्वीराज चौहान भी हैं | दिल्ली पर इस्लामिक आक्रमणों के शुरू होने के दौर के इस लोक काव्य की पंक्तियाँ आश्चर्यजनक हैं | नहीं अतिशयोक्ति अलंकार के कारण नहीं, इसमें मौजूद नामों के कारण |

ये युद्ध का जिक्र करते करते जिन योद्धाओं की बात करती है उनके नाम उनका दूसरा पेशा भी बता रहे हैं | गरड़िया, बारी, तेली, तमोली ! आयातित मान्यताएं तो ये स्थापित करने में जुटी होती हैं कि क्षत्रिय के अलावा बाकी सब को हथियार रखने-चलाने नहीं दिया जाता था | वो युद्ध में लड़ भी रहे हैं और उन्हें प्रबल योद्धा भी बताया जा रहा है ? इतिहास तो राजाओं की कहानी कहता है, ये राजा भी नहीं लग रहे आम लोगों के नाम क्यों हैं यहाँ ?

कहीं और से आई आयातित परम्पराओं की ही तरह भारत का इतिहास क्या सिर्फ राजाओं का इतिहास नहीं होता था ? क्या जिस ज़ात के होने की बात बार बार हिन्दुओं पर थोपी जाती है, उसमें ज के नीचे लगे नुक्ते के कारण उसका कहीं बाहर का रिवाज़ होने पर भी सोचना चाहिए ? आल्हा-उदल बुंदेलखंड के माने जाते हैं, लेकिन ये जाने माने लोक-काव्य तो आज उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश के कई इलाकों में सुना जाता है | जिसे बुंदेलखंड कहते हैं वो सीमाएं तो बदल चुकी |

फिर क्या वजह होती है कि किसी ने इन्हें किताबों की तरह छापा नहीं ? लिखा हुआ कहीं लोगों को दिखने ना लगे, लोग पढ़ कर सवाल ना करने लगें, ये वजह थी क्या ?

महाभारत में दर्जनों पात्र हैं, उनके माध्यम से सैकड़ों शिक्षाप्रद कहानियां सुनाई गई हैं। इनका पता न होने के कारण कई बार छुआछुत की बात भी इनके ही बहाने से थोपने की कोशिश की जाती है। क्या सही था और क्या गलत वो महाभारत के पात्रों की हरकत देखने भर से पता चल जाता है। जैसे एक पात्र है दुर्योधन। आम तौर पर इसे दुष्ट, बलशाली, घमंडी, और गदा युद्ध का अच्छा जानकार बता कर छोड़ दिया जाता है। इसके चरित्र में और चीज़ें भी थी, जो अच्छी थीं, लेकिन नाम के “दुः” को खराब के रूप में दर्शाकर उसे खलनायक बनाया जाता है। दुः सिर्फ मुश्किल या कठिन दर्शाता है, कोई काम मुश्किल हो तो उसे दुष्कर कहा जाता है, वैसे ही जिसे युद्ध में मुश्किल से हराया जा सके, उसे दुर्योधन कहा जाता है। ये किसी और भाषा के “बे” जैसा नहीं कि जहाँ लगा दिया वो चीज़ खराब हो गई।

उसके चरित्र का एक पहलु केरल में मालानाद की पहाड़ी पर दिखेगा। पोरुवज्ही गाँव कुन्नाथूर तालुक में है। ये कोल्लम जिले का उत्तरी छोर है, NH 47 से यहाँ पहुंच सकते है। यहाँ एक मंदिर की अनोखी चीज़ ये है कि मंदिर में कोई मूर्ति ही नहीं है ! अगर आप पूछेंगे की ऐसा क्यों है तो आपको महाभारत काल की कथा सुनाई जाएगी। कथा के अनुसार एक बार घोड़े पर बैठे कुछ लोग किसी को ढूंढते हुए इस इलाके में आये। ये दुर्योधन थे, पांडवों के अज्ञातवास के समय उन्हीं को ढूंढ रहे थे। प्यासे राजकुमार को मालानंद अप्पोप्पन (प्रमुख / पुजारी) का घर दिखा। पानी मांगने पर वहां के रिवाज के अनुसार उन्हें ताड़ का रस दिया गया। इतनी देर में महिला का ध्यान गया कि प्यासा व्यक्ति क्षत्रिय है और राजकुमार का भी ध्यान गया कि पानी देने वाली ने कुर्थलिया पहना है  जो शूद्र पहनते हैं।

महिला को लगा कि उसने क्षत्रिय को खाने-पीने की वस्तु देकर भूल कर दी है। वो दुर्योधन से माफ़ी मांगने लगी तो दुर्योधन ने कहा कि भूखे को खाना या प्यासे को पानी देने में वर्ण कैसा ? दुर्योधन ने उनकी पूजा पद्धतियों  और सिद्धियों का ज्ञान लिया। वहीँ पहाड़ी पर दुर्योधन ने प्रजा कल्याण को शिव उपासना की और जाते-जाते कई एकड़ ज़मीन वहां मंदिर बनाने को दान कर गए। दुर्योधन के दान की ज़मीन पर बना मंदिर अभी भी है। इसके मुख्य देवता भी दुर्योधन है। दुर्योधन के अलावा यहाँ उनकी माता गांधारी,  बहन दुस्सला, मित्र कर्ण, और गुरु द्रोण की भी उपासना होती है। मंदिर के पुजारी कुरवा जाति के होते हैं (दुनिया के हर मंदिर का पुजारी ब्राह्मण नहीं होता)। मंदिर प्रबंधन को सात सदस्यीय कमिटी चयन होता है। मंदिर की ज़मीन का टैक्स आज भी दुर्योधन के नाम से जमा होता है। हर साल यहाँ एक बड़ा सा मेला भी लगता है जो काफी प्रसिद्ध है । उसके लिए प्रशासन को लाख- दो लाख लोगों के लिए प्रबंध करना पड़ता है।  मेला 16 मार्च, 2016 को लगा और 10 फ़रवरी से 24 मार्च के बीच 2017 के उत्सव हुए ।

अगर पूछेंगे कि हस्तिनापुर का राजा इतने साल पहले यहाँ तक आया था? तो लोगों के पास बड़ा रोचक जवाब मिलेगा। वो कहते हैं कि शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु में शरीर त्यागने से पहले पैदल ही पूरा भारत कई बार घूम चुके थे वो भी पैदल, शास्त्रार्थ करते करते। तो सिर्फ ढूँढने निकला दुर्योधन, अपने घोड़ों और रथों से यहाँ तक नहीं पहुँच पाया होगा, आपको ऐसा क्यों लगता है ?

दुर्योधन का एक दूसरा किस्सा स्त्री पर्व के राजधर्मानुशासन पर्व में मिलता है। अलग-अलग पाठों से हर महाभारत पाठ में राजकुमारी का नाम नहीं आता, उसे गजाधारित नाम वाली और भानुमती भी बताया जाता है। ये कल्लिंग के इलाके की राजकुमारी थी और दुर्योधन इसे कर्ण की मदद से उसके स्वयंवर से ले भागा था। जब दुर्योधन और कुछ साथी पूरे देश में भ्रमण कर रहे होते हैं तो एक दिन भानुमती और कर्ण (शायद दुःशासन भी) मिलकर पचीसी खेल रहे होते हैं। आज के लूडो के इस पुराने रूप का जिक्र महाभारत में भी आता है। थोड़ी देर में ही बाजी पर लगे दांव बढ़ने लगे खिलाड़ी जोश में आ गए और जैसा की लूडो में होता है, वैसे ही हारती भानुमती कर्ण पर बेईमानी  का संदेह भी करने लगी। लेकिन कर्ण जीतता रहा और भानुमती आरोप लगाती मैं और नहीं खेलूंगी कहने लगी। इतने में दुर्योधन वापस आया और उसे देख भानुमती उठकर खड़ी होने लगी।

कर्ण की पीठ दरवाजे की तरफ थी तो उसने देखा नहीं कि राजा दुर्योधन के आने पर वो खड़ी हो रही है, उसे लगा, हार डर से भानुमती बीच में ही खेल छोड़कर भाग रही है। उसने फ़ौरन भानुमती को वापस बिठा लेने को हाथ बढ़ाया। भानुमती की मोतियों की माला उसके हाथ से टूट कर बिखर गई, और भानुमती जड़ हो गई। जब कर्ण ने मुड़कर देखा कि क्या हुआ है तो पीछे ही दुर्योधन को खड़ा देखकर वो भी दुविधाग्रस्त हो गया ! भानुमती और कर्ण दोनों ही दुर्योधन के क्रोधी स्वभाव जानते थे, फिर राजा के सामने उसकी पत्नी से अभद्र व्यवहार ! लेकिन दुर्योधन हंसा और भानुमती की तरफ देखता हुआ बोला, अब मुझे सिर्फ मोती चुनने होंगे, या उन्हें गूंथ कर आपकी माला भी पिरोनी है ? दोनों को असहज देख कर उसने आगे जोड़ा था कि उसे अपनी पत्नी और अपने मित्रों पर पूरा भरोसा है, वो इतना भी शक्की नहीं कि बैठा उल-जलूल सोचने लगे।

महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष में पांडवों से ज्यादा सेना जुटने के पीछे भी शायद यही कारण रहा था। अपने मित्रों-सामंतों, अपने पक्ष में आये लोगों के साथ दुर्योधन का व्यवहार निश्चित रूप से अच्छा रहा होगा। वरना इतने लोग उसकी तरफ से जान गंवाने की शर्त पर भी आ जुटें,संभव नहीं होता। खलनायकों से भी ऐसा ही होता है, आपके लिए चाहे वो जितना भी बुरा हो, अपने पक्ष के कुछ लोगों के लिए वो फिर भी अच्छा था।
✍🏻आनन्द कुमार की पोस्टों से संग्रहित

 

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