ज्ञान:सब कुछ है महाभारत में,जो महाभारत में नहीं,वह कहीं नही
महाभारत किसकी कहानी है ?
“लार्ड ऑफ़ द रिंग्स” एक अंग्रेजी फिल्म की सीरीज है, स्पेशल इफेक्ट्स के लिए कई लोगों ने देखी भी होगी। इसमें कई अलग-अलग जातियां होती हैं, या वंश कहिये। एक एल्फ हैं जो लम्बे, खूबसूरत और अजीब से नुकीले कान वाले होते हैं। उनकी आबादी कम है, इंसानों से दूर रहते हैं, लेकिन उनके पास बेहतरीन हथियार होते हैं। काफी जादू भी जानते हैं, पर्यावरण और पेड़ों से अच्छे सम्बन्ध रखते हैं। उनकी तुलना में इंसान बड़े निकम्मे लगते हैं, लालची, मक्कार और किसी काम के नहीं होते।
एक जनजाति इस फिल्म में ड्वार्फ, यानि बौनों की है। ये जरा घमंडी, अकड़ू और छल-कपट की कम समझ वाले हैं। थोड़े से सीधे होने के कारण बौने, पिछड़े हुए हैं और पहाड़ों के नीचे कहीं गुफाओं में छुपे रहते हैं। ये बड़े उन्नत किस्म के शिल्पी हैं और बेवक़ूफ़ होने की लिमिट तक के बेवक़ूफ़ भी होते हैं। फिल्म में कुछ लम्बी उम्र वाले इंसान भी हैं, वो भी अच्छे योद्धा है। इन सबके मुक़ाबले में ओर्क, एक किस्म की राक्षस जनजाति और कुछ दुष्ट जादूगर होते हैं। पृथ्वी पर कब्जे के लिए, इन सब के आपसी संघर्ष की कहानी, फिल्म की कहानी है। इसी नाम के एक उपन्यास पर आधारित है।
जब आप पूरी सीरीज देख चुके होते हैं तो समझ आता है कि ये इन बड़े बड़े शक्तिशाली योद्धाओं की कहानी नहीं थी। ये बौने से थोड़े से ही लम्बे, करीब करीब अहिंसक, डरपोक होब्बिट नाम की जनजाति के दो चार लोगों की कहानी है। कहानी में ओर्क, एल्फ, बौने, मनुष्य सब बड़े योद्धा हैं, उनकी दिग्विजय की यात्रायें हैं लेकिन असली कहानी सिर्फ चार होब्बिट्स की है। वो चारो एक अंगूठी को लेकर उसे नष्ट करने निकले होते हैं। इसी रिंग के सफ़र के रास्ते में बस उनकी मुलाक़ात जादूगरों से, एल्फ़, ओर्क, मनुष्यों और बौनों से होती है। सारे साइड करैक्टर हैं, असली हीरो होब्बिट होते हैं।
आज की तारिख में जब आप महाभारत को देखेंगे तो अलग अलग लेखकों के इसपर अपने अपने व्याख्यान होते हैं। इरावती कर्वे के “युगांत” में छोटे छोटे लेख हैं। एस.एल.भ्यरप्पा की “पर्व” कुछ चरित्रों को लेकर, उनके नजरिये से लिखी गई है, सारे मिथकीय घटनाक्रम हटा दिए गए हैं। आनंद नीलकंठ की किताबों में हारने वालों की तरफ से कहानी सुनाई गई है। “रश्मिरथी” या फिर “मृत्युंजय” कर्ण की कहानी होती है। द्रौपदी की ओर से कहानी सुनाने वाली नारीवादी विचारधारा के झंडाबरदार भी कम नहीं हैं। युधिष्ठिर का दृष्टिकोण महाभारत की कथा में बुद्धदेव बासु लिख गए हैं तो भीम के नजरिये से एम.टी.वासुदेवन नैयर ने लिखा है। कन्हैयालाल माखन मुंशी की किताबें हैं, कृष्ण की तरफ से लिखने वाले भी कम नहीं है।
कभी ये सोचा है कि इतने अलग अलग चरित्रों की कहानी इस एक महाभारत में सिमटती कैसे है ? दरअसल महाभारत भी किन्हीं कौरवों, पांडवों, यक्ष, गंधर्व, किन्नरों, देवों, दानवों की कहानी है ही नहीं। ये एक सफ़र पर निकले कुछ ऋषियों की कहानी है। महाभारत की बिलकुल शुरुआत में एक भार्गव, भृगुवंश के ऋषि अपने शिष्यों को सिखा रहे होते हैं। महाभारत की शुरुआत आरुणी जैसे शिष्यों के आज्ञापालन की मिसालों से शुरू होती है। ऐसे ही शिष्यों की कड़ी में उत्तांक भी होता है। वो शिक्षा समाप्त होने पर अपने गुरु को कुछ गुरुदक्षिणा देना चाहता है। लेकिन सारे गुरु उस काल में शायद एक ही जैसे होते थे।
तो गुरु को यहाँ भी दीन-दुनियां से कुछ ख़ास लेना देना नहीं होता और उन्हें समझ ही नहीं आता कि गुरुदक्षिणा में क्या माँगा जाए। थोड़ा सोचने के बाद वो उत्तांक को अपनी पत्नी से पूछ लेने कहते हैं। अब जब उत्तांक, गुरु-माता के पास पहुँचते हैं तो वो खाना खिलाने के बाद पूछती हैं की उत्तांक किसी काम से उनके पास आकर बैठा है क्या ? उत्तांक बताता है कि गुरुदक्षिणा का पता नहीं चल रहा, शिक्षा तो उसने ले ली है। गुरु माता उन्हें एक राजा के पास उनकी पत्नी से कुंडल मांग लाने भेज देती हैं। उत्तंक लम्बे सफ़र के बाद राजा के पास पहुँचता है और दिव्य कुंडल मांग लेता है।
राजा और रानी कुंडल देने को राजी हो जाते हैं, पूरी प्रक्रिया में उत्तांक और भी काफी कुछ सीख जाता है। वो जब कुंडल लेकर लौट रहा होता है, तो रानी उसे बताती हैं कि इन कुण्डलों पर कई दिन से नाग तक्षक नजर जमाये बैठा है। वो जरूर इसे रास्ते में चुरा ले जाने की कोशिश करेगा और उत्तांक को सावधान रहना चाहिए। सावधानी के वाबजूद चोरी होती है और यहीं से तक्षक की उत्तांक नाम के भार्गव से दुश्मनी की कहानी शुरू होती है। महाभारत की कहानी जहाँ ख़त्म हो रही होती है वहां, परीक्षित यानि अर्जुन के पोते को इसी तक्षक ने डसा होता है। परीक्षित के पुत्र जन्मजेय के लिए जो नाग यज्ञ कर रहे होते हैं, और सारे नागों की आहूति देते जाते हैं वो भी भृगुवंश के ऋषि ही होते हैं।
पहले एक बार “लार्ड ऑफ़ द रिंग्स” देखिये और फिर से पूरी महाभारत पढ़िए। महाभारत की पूरी कहानी भृगु ऋषियों की परंपरा के अलग अलग सफ़र की, सीखने की, उस सीखे हुए के इस्तेमाल की, और साथ में इस यात्रा में मिले लोगों की, देव-दानव, यक्ष-गंधर्व-किन्नर-मनुष्यों से मुलाक़ात की कहानी है। कभी फ़्लैश बैक में तो कभी उसी समय के दौर में आती है, कभी भविष्य में क्या नतीजे किस हरकत के हो सकते हैं, उसपर भी चेतावनी दी जाती है। सीखने का एक तरीका सफ़र करना भी होता है, आज के मैक्ले मॉडल में नहीं सिखाया जाता, उसपे भी ध्यान जायेगा। बाकी सिर्फ एक आदमी के नजरिये से पूरी कहानी को देखने वाला पक्षपाती हो जाता है, वो तो याद रखना ही चाहिए।
महाभारत की कहानी की शुरुआत में च्यवन ऋषि के जन्म की कहानी आती है। ये वो ऋषि थे जिनके नाम पर बना च्यवनप्राश दुनिया का सबसे पुराना बिकने वाला कृत्रिम उत्पाद है। यहाँ उत्पाद से मेरा मतलब है ऐसी चीज़ जिसे बनाकर बेचा जाता हो। सीधा गेहूं या धान बेच देना नहीं, गेहूं से आटा बनाया और आटे से रोटी, फिर रोटी को बेचा तो वो कृत्रिम उत्पाद होगा। च्यवन, भृगु ऋषि के पुत्र थे। दुर्वासा, अगस्त्यमुनि, या विश्वामित्र जैसे ऋषियों की तुलना में भृगु कम सुने जाने वाले ऋषि हैं। ऐसा तब है जब भगवद्गीता के दसवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं कि ऋषियों में वो भृगु हैं।
भृगु की ख्याति शायद सबसे ज्यादा विष्णु की छाती पर लात मार देने के लिए ही है। उसका किस्सा कुछ यूँ है कि भृगु अत्यंत अहंकारी थे। एक बार जब कई ऋषि सरस्वती नदी के किनारे यज्ञ के लिए जुटे तो ये तय करना मुश्किल हुआ कि त्रिदेव में से किसे अधिष्ठाता देवता माना जाए। भृगु ऋषि को ये तय करने की जिम्मेदारी दी गयी। वो एक एक करके शिव और ब्रह्मा के पास गए और उन्हें किसी न किसी तरीके से गुस्सा दिलाने की कोशिश की। जैसे ही शिव और ब्रह्मा क्रुद्ध होकर इन्हें मारने उठे, ये भाग खड़े हुए। अंत में ये विष्णु के पास पहुंचे और आँख बंद कर के लेटे विष्णु के सीने पर लात जड़ दी!
चौंककर उठे विष्णु ने उल्टा ऋषि से ही क्षमा मांगी कि अवश्य मेरी कठोर छाती पर मारने से आपके पैर में चोट आई होगी! ऋषि भृगु अपनी हरकत पर काफी शर्मिंदा हुए, उनका अहंकार भी जाता रहा और लौटकर उन्होंने क्रोध को जीतने वाले विष्णु को ही यज्ञ का अधिष्ठाता मानने की घोषणा भी की। वो विष्णु को शापित करने के लिए भी जाने जाते हैं। उसके पीछे की कहानी कुछ यूँ है कि देवासुर संग्राम में असुर देवताओं से हार रहे थे। उन्हें बचाने के लिए असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने भगवान शिव से मृत-संजीवनी विद्या सीखने की ठानी। जाते समय शुक्राचार्य असुरों को भृगु ऋषि के आश्रम में छोड़ गए।
जब इन्द्र को ये पता चला कि शुक्राचार्य भी नहीं हैं और असुर हथियारों के बिना भृगु ऋषि के आश्रम में ऋषियों की तरह रह रहे हैं तो वो उन्हें मारने भृगु-आश्रम जा पहुंचे। भृगु उस समय आश्रम में नहीं थे इसलिए असुर जान बचाने के लिए ऋषि-पत्नी के पास भागे। ऋषि पत्नी ने जब निहत्थों को मारने के लिए उद्दत्त इन्द्र को देखा तो उसे स्तंभित कर दिया। ऋषि-पत्नी के डर से बाकी के देवता अपनी जान बचाकर विष्णु के पास भागे। विष्णु ने देवताओं को अपने शरीर में छुपा लिया और जब ऋषि-पत्नी नहीं मानी तो उसका सर अपने चक्र से काट लिया! जब भृगु को इसका पता चला तो उन्होंने विष्णु को भी मृत्युलोक में जन्म लेने और जन्म-मृत्यु का सामना करने का शाप दे डाला।
भृगु ऋषि के शाप से जन्म लेने के कारण ही शायद भगवद्गीता के दसवें अध्याय के पच्चीसवें श्लोक में श्री कृष्ण स्वयं को ऋषियों में भृगु बताते हैं। सोचने लायक ये है कि भृगु का ये शाप कितना शाप था और कितना वरदान? विष्णु भगवान हैं तो उनपर जन्म-मृत्यु से कितना असर पड़ा होगा? भगवान के लिए ये शाप, संभवतः शाप भी नहीं, ठिठोली होगा। हाँ ये शाप नहीं होता तो त्रेता के रावण-कुम्भकर्ण और उनके सहयोगी अनगिनत राक्षसों से मुक्ति नहीं मिलती। द्वापर के दन्तवक्र और शिशुपाल जैसे कई अन्यायी भी मनुष्यों को लम्बे समय तक झेलने पड़ते। मनुष्यों के लिए ये शाप वरदान जैसा ही था।
ये कुछ-कुछ जन्मदिन जैसा ही सवाल है। हर साल की तरह इस बार भी सोमवार को जब मेरे अट्ठारहवें जन्मदिन की बधाईयाँ आनी शुरू हुईं तो हमने सोचा उम्र में एक साल कम होने का अफ़सोस किया जाए या तोहफे आने का मज़ा लिया जाए? हर साल छः महीने में हम अपनी ही बात से नहीं पलटते इसलिए हर बार की तरह इस बार भी हम अट्ठारह के ही हैं। बाकी के वर्ष अनुभव में जोड़े जायेंगे। फ़िलहाल ढेर सारी बधाइयों और उपहारों पर खुश होने का ही सोच रखा है। हर साल की तरह इस बार भी फेसबुक पर आये सभी संदेशों का अलग अलग जवाब देने की कोशिश की मगर हो नहीं पाया। आप सभी मित्रों ने बधाई दी, आप सभी का धन्यवाद!
महाभारत में बच्चों के लिए क्या है?
महाभारत पर आयातित विचारधारा का आम आरोप रहा है कि ये तो सत्ता के लिए हुए संघर्ष कि कहानी है। ये पढ़ने कि मेहनत करने के बदले शोर्ट कट में टीवी देखकर महाभारत सीखने की कोशिश से होता है। अक्सर टेलीविजन पर प्रसारण के लिए, या फिल्म कि कहानी जैसा बनाने के लिए महाभारत के जो हिस्से काट दिए जाते हैं, वहीँ महाभारत की सबसे शिक्षाप्रद कहानियां हैं। महाभारत के मुख्य माने जाने वाले चरित्रों का जिक्र शुरू होने से पहले और युद्ध के ख़त्म होने के बाद ही सबसे कम सुनी जाने वाली कहानियां होती हैं। कई बार ऐसा भी होगा कि कहानी तो आपने सुनी होगी, लेकिन आप ये नहीं जानते होंगे कि ये महाभारत की ही कोई कहानी है।
जैसे युद्ध के बाद शांति पर्व में जब भीष्म के पास जाकर युधिष्ठिर राज्य व्यवस्था के बारे में सीख रहे होते हैं तो भीष्म सतयुग कि एक कहानी सुनाते हैं। ये कहानी एक ऊंट कि थी जो अपने पूर्व जन्म में किये पुण्यों के कारण इस जन्म में भी धर्मात्मा था। जंगल में रहने वाले इस ऊंट के पास एक दिन ब्रह्मा पहुंचे और उसे वर देना चाहा। ऊंट ने कहा कि भगवान मेरी गर्दन इतनी लम्बी कर दीजिये कि मैं सौ योजन दूर भी चर सकूँ। खाने कि तलाश में भटकना ना पड़े तो मैं साधना पर और ध्यान दूं। ब्रह्मा ने कहा तथास्तु और ऊंट कि गर्दन लम्बी हो गई। गर्दन लम्बी होने से ऊंट को कहीं इधर उधर जाने कि जरूरत नहीं रही, जब चाहता गर्दन लम्बी करता और कुछ खा लेता।
इधर उधर भटकने कि जरूरत ख़त्म होने से ऊंट आलसी हो गया और एक ही जगह पड़ा रहने लगा। एक दिन वो गर्दन लम्बी कर के इधर उधर खा ही रहा था कि इतने में आंधी आ गई। लम्बी गर्दन सिकोड़ने में समय लगता इसलिए बचने के लिए उसने गर्दन एक गुफा में घुसा ली। जब वो आंधी रुकने का इन्तजार कर रहा था तो एक सियार और सियारनी ने भी उसी गुफा में आंधी से बचकर शरण ली। उन्होंने अपने सामने ही ऊंट कि गर्दन देखी तो फ़ौरन उसपर टूट पड़े! काटे जाने से बचने के लिए ऊंट ने गर्दन समेटने कि कोशिश की, लेकिन जबतक वो पूरी गर्दन समेट पाता उतनी देर में तो सियार सियारनी ने मिलकर उसकी गर्दन ही काट ली !
आलसी ऊंट के मारे जाने की इस कहानी से भीष्म सिखाते हैं कि आलस्य उचित नहीं। अपने कर्मों का निर्वाह करते हुए ही, इन्द्रियों के निग्रह से, मन को इधर उधर भटकने से रोककर, सही दिशा में काम करने पर लगाना चाहिए। अपने कर्तव्यों में से कुछ कम कर के किसी और चीज़ (जो पसंद हो, या करने की इच्छा हो), उसके लिए समय नहीं बचाया जा सकता। ये करीब करीब आत्मघाती तरीका है इस कहानी में भीष्म ने यही सिखाया था। ये इकलौता ऐसा किस्सा हो जो बच्चों को नैतिक शिक्षा देने में काम आ जाए ऐसा भी नहीं है। जैसे पंचतंत्र में मैत्री और नीति की कहानियां हैं वैसी भी कई कहानियां महाभारत के शांति पर्व में मिल जायेंगी।
बच्चों के लायक एक कहानी एक चूहे और बिल्ली कि भी है। कहानी ज्यादा रोचक इसलिए है क्योंकि कहानी में जो पांच पात्र हैं, सभी का नाम भी है। चूहे ने एक बरगद की जड़ में अपना घर बना रखा था और वहीँ डालियों में एक बिल्ली भी रहती थी। पेड़ पर आने वाले पक्षियों के शिकार से बिल्ली का गुजारा होता। वहीँ पास में एक शिकारी भी रहता था जो रोज रात जाल लगा जाता और सुबह फंसे जीवों को बेचने-खाने से अपना गुजारा चलाता। एक रोज शिकारी जब जाल लगाकर गया तो रात में बिल्ली बेचारी उस जाल में फंस गई। बिल्ली को फंसा देखकर चूहा आराम से निकला और बिल्ली को चिढ़ाता, जाल में जो चारा शिकारी ने लगाया था उसे खाने लगा।
बिल्ली के फंस जाने से इलाके पर कब्ज़ा जमाने दूसरे शिकारी जीव आने लगे। मौके पर एक नेवला और एक उल्लू साथ ही पहुंचे और सामने उनके चूहा ही शिकार के रूप में दिखा। ऊपर उल्लू और नीचे नेवले को जब चूहे ने घात लगाए देखा तो वो फंसी हुई बिल्ली के सामने गिड़गिड़ाने लगा। अभी तक वो जिस बिल्ली को चिढ़ा रहा था, फंसा जानकार छेड़ रहा था, उसी से मदद कि गुहार लगाईं। चूहे ने कहा कि अगर अभी वो उसे अपने नीचे छुपा ले तो वो जाल काटकर बिल्ली की बचने में मदद करेगा। बिल्ली तो पहले ही फंसी हुई थी तो शर्त मानने के अलावा कोई विकल्प तो उसके पास था ही नहीं। चुनांचे बिल्ली ने अपने नीचे चूहे को छिपा लिया और चूहा भी जाल कुतरने लगा।
थोड़ी ही देर में जब चूहे का शिकार कर पाने में असमर्थ होकर जब उल्लू और नेवला इधर उधर हुए तो बिल्ली का भी ध्यान गया कि चूहा तो बहुत धीमे धीमे जाल कुतर रहा है। वो चूहे से बोली लगता है अब जान बच जाने पर तुम अपना वादा भूल गए हो! चूहा बोला भाई मैं तेज काम नहीं करने वाला, कोई भी काम समय पर ना किया जाए तो सही फल नहीं देता। अगर मैंने तुम्हें अभी छुड़ा दिया तो तुम फ़ौरन मेरा ही शिकार करोगे इसलिए मैं सवेरे शिकारी के नजर आने पर तुम्हें मुक्त करूँगा। उस समय तुम्हें जब अपनी जान बचा के भागना होगा, तभी मुझे भी बचने का मौका मिल जाएगा। बिल्ली ने इमानदारी और नैतिकता कि दुहाई दी, कहा दोस्त तो ऐसे तरीके से वादा पूरा नहीं करते! चूहा बोला भय जहाँ हो वहां मैत्री नहीं होती, जहाँ कोई डर हो वहां तो संपेरे जैसा हाथ बचा कर ही सांप को नचाया जाता है।
ऐसे ही तर्क-वितर्क चलता रहा, चूहा धीमी गति से जाल काटता रहा और जैसे ही शिकारी नजर आने लगा उसने अपनी रफ़्तार बढ़ा कर पक्का शिकारी के नजदीक आने पर जाल काटा। शिकारी जाल में फंसी बिल्ली को पकड़ने झपटा लेकिन जाल कट चुका था तो बिल्ली बचकर भागने में कामयाब ह गई। चूहा छोटा सा था, वो भी दुबक कर अपने बिल तक पहुँच गया। हताश शिकारी भी अपना टूटा जाल समेट कर उसे ठीक करने चला गया। अब ऊँची डाल पर बैठी बिल्ली ने चूहे से फिर से दोस्ती गांठने कि कोशिश कि। दोस्ती कितनी अच्छी, कितनी महत्वपूर्ण होती है ये समझाने लगी। चूहे ने कई तर्कों का हवाला देकर उसकी दोस्ती को ठुकराया। यहाँ आपको कई महत्वपूर्ण तर्क सिर्फ बच्चों के सीखने के लिए ही नहीं अपने लिए भी मिल जायेंगे।
चूहा समझाता है कि दुनियां में दोस्त और दुश्मन कुछ नहीं होता, केवल परिस्थितियां होती हैं जिनके वश में हुआ आदमी अपने फायदे नुकसान को तौलता दोस्त या दुश्मन बनता है। दोस्त को दुश्मन, या दुश्मनों को दोस्त होते कई बार देखा गया। हर कोई अपने लाभ के चक्कर में होता है, फायदे के लालच के बिना सम्बन्ध नहीं बनते। चूहा बिल्ली को ये भी सिखाता है कि दोनों के पास कारण था इसलिए हम दोस्त बने, लेकिन उस परिस्थिति का अंत होते ही हममें दोस्ती का कोई कारण अब बचा नहीं है। अब जो तुम्हें मुझसे दोस्ती कि सूझ रही है वो तुम्हारे रात भर भूखे रहने के कारण है, मुझमें तुम्हें आहार दिख रहा है!
जिन परिस्थितियों में संधि या युद्ध होते हैं वो परिस्थितियां जैसे ही बदलती हैं, संधि या आक्रमण बेमानी हो जाते हैं। बिल्ली उसी दिन चूहे कि शत्रु थी, हालात बदले तो दोस्त बनी, और फिर हालत बदलते ही दोबारा दुश्मन हो चुकी थी। आँख मूंदकर दोस्त पर भरोसा या सिर्फ शत्रु है इसलिए उसपर अविश्वास करने वाले मूर्ख होते हैं। समझदार लोग धन-बल के अहंकार में रहने वालों के आस पास ना रहने की भी सलाह देते हैं। संधि के ये सिद्धांत उतने पुराने और बेकार भी नहीं जितना शायद आप सोच रहे हैं। भारतीय कानून अभी भी कॉन्ट्रैक्ट एक्ट में करीब करीब इसे मानता है। जैसे अभी मैं प्रधानमंत्री के साथ किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर के कल पलट सकता हूँ।
भारतीय कानूनों पर भरोसा रखिये, मुझे थोड़ी परेशानी जरूर हो सकती है, लेकिन अदालत से मुझे सजा तो हरगिज़ नहीं होगी जी। सैद्धांतिक तौर पर समझौते या कॉन्ट्रैक्ट पर दो समान स्तर के लोग हस्ताक्षर करते हैं जी। एक व्यक्ति प्रधानमंत्री जितना बड़ा आदमी हो और दूसरा मेरे जैसा आम आदमी तो उनके बीच कॉन्ट्रैक्ट या समझौता नहीं हो सकता जी। मैं भी किसी आधे राज्य के प्रधान का बिलकुल उल्टा, यानी काम नहीं करने देते जी के बदले काम करवाना चाहता है जी तो कह ही सकता हूँ जी। प्रधानमंत्री जी मेरे साथ जबरन समझौता नहीं कर सकते जी! कोशिश कर के देखिये, ये जो मामूली सी बच्चों के लायक कहानी है वही मौजूदा कानून है।
कौन सी कहानी आपको बच्चों के लायक कहानी सुनाते सुनाते बड़ों के लायक नीतिनिर्देश दे रही है, ये तय कर के कहानियों को बच्चों और बड़ों के बीच छांटना भी महाभारत में संभव नहीं। आपको जो समझाना मुश्किल लगता हो उसे पहले खुद और बाद में दूसरों को समझाने के लिए भी महाभारत का शांति पर्व पढ़ने पर विचार किया जा सकता है। बाकी ये जो बच्चों को सिखा जाती है सो तो हैइये है!
✍🏻 आनन्द कुमार
