माफी आयोग अध्यक्ष के दावेदार मार्कडेय काटजू

काटजू के कई संभव उपयोग!
BY: विवेक सक्सेना
पुरानी कहावत है कि यदि कोई समस्या है तो उसका समाधान भी जरुर होगा। अगर भगवान ने बीमारी बनाईं है तो उसकी दवा भी तैयार की। अब लगता है कि जब ईश्वर ने मार्कडेय काटजू को धरती पर भेजा तो उन्हें लगने लगा कि इनका तोड़ निकालना भी जरुरी है, इसलिए उसने कुछ दशक बाद रवींद्र कुमार को दुनिया में भेज दिया!

रवींद्र कुमार पूर्व कानून मंत्री राम जेठमालानी के खास रह चुके हैं। उनकी कुछ आदतें उनसे मिलती जुलती हैं। जैसे कि वे किसी से भी टकराव ले सकते हैं। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं के वोट खरीदने के आरोप में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव के खिलाफ मामला दर्ज करवाकर सुर्खियों में आए थे। आज भी वे आए दिन प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कोसते रहते हैं।

रविंद्र कुमार का नवीनतम निशाना प्रेस परिषद के अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि पहले संजय दत्त को माफी की मांग और अब जैबुनिस्सा की माफी की मांग कर न्यायमूर्ति के एन काटजू के पोते न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू ने विवादों का पिटारा खोल दिया है। पिटारा तो उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश रहते हुए भी खोला था, जब उन्होंने पूरे इलाहाबाद के न्यायाधीशों के बारे में कहा था- ‘वहां कुछ सड़ रहा है!’

न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की इन हरकतों से जाहिर है कि केन्द्र सरकार को ‘अपराधी माफी प्राधिकरण’ बनाकर उसका आजीवन अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू को बना देना चाहिए, ताकि वह बहैसियत अध्यक्ष सभी अपराधियों को माफी दिए जाने की वकालत कर सकें।

वर्ष 1993 के मुंबई बम विस्फोटों में 257 लोग मारे गए थे और 700 से ज्यादा घायल हुए थे। संजय दत्त पर आरोप है कि वह अपराध के सूत्रधारों के संपर्क में थे। उन्हें जब इन अपराधियों ने हथियारों का जखीरा भेजा, तो उन्होंने एक .9 एमएम की पिस्टल, एके-56 एसाल्ट राइफल, दो हथगोले अपने पास रख लिए। जब बम ब्लास्ट में अपराधी आरोपियों की धर-पकड़ शुरु हुई, तो संजय दत्त ने पहले हथियार वापस देने की पेशकश की और बाद में एके-56 राइफल को फर्नेस में गलाने की कोशिश की। पूरी राइफल गल गई, लेकिन उसकी स्प्रिंग, जो 14000 डिग्री तापमान पर गल सकती थी, नहीं गल पाई। जब फर्नेस के मालिक को पकड़ा गया, तो स्प्रिंग बरामद हो गई।

ये तथ्य आतंकवादी एवं विध्वंसक गतिविधि निरोधक कानून ‘टाडा’ में संजय दत्त ने खुद अपना बयान देकर बताए थे। टाडा में यह प्रावधान है कि यदि अभियुक्त अपना इकबालिया बयान देता है, तो वह न्यायालय में स्वीकार योग्य है। इसलिए संजय दत्त को देश के भावी प्रधान न्यायाधीश सदाशिवम और न्यायमूर्ति बी एस चौहान की बैंच ने 5 साल के कठोर कारावास की सजा दी है।

संजय दत्त एक ऐसा राजनैतिक अपराधी है, जिसकी जमानत के लिए राम जेठमलानी और कपिल सिब्बल सरीखों ने पैरवी की थी और बालासाहब ठाकरे, विलास राव देशमुख, शरद पवार आदि ने जिसकी जमानत के लिए अपील की थी। तब बाला साहब ठाकरे ने कहा था -‘संजय बेल का हकदार है। उससे बचपने में यह गैरकानूनी कृत्य हो गया है।’ ऐसे में उस मामले में भी सवाल है जिसमें बीएमडब्ल्यू कार हादसे में 6 लोगों की पटरी पर सोते हुए कुचलकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भी अपील में यही कहा गया था कि बचपने में यह अपराध हो गया था।

रविंद्र कुमार के मुताबिक मार्कण्डेय काटजू के दुस्साहस की दाद दी जानी चाहिए कि उन्होंने जिस दिन फैसला आया उसी दिन 4 बजे यह बयान जारी कर दिया कि संजय दत्त को भारतीय संविधान के तहत माफी दी जानी चाहिए। 4 बजे तक पूरा फैसला किसी को नहीं मिला था। हो सकता है पूर्व न्यायाधीश की हैसियत से मार्कण्डेय काटजू ने फैसला लेने और पढ़ने के बाद यह बयान दिया हो। अभी तक परम्परा है कि न्यायमूर्ति, सर्वोच्च न्यायालय और अन्य नयायाधीशों के फैसलों पर टिप्पणियां या राय जनता के बीच नहीं देते हैं। ऐसा सिर्फ कानूनी राय देते हुए करते हैं।

काटजू सर्वोच्च न्यायालय से अवकाश ग्रहण कर प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष बने हैं। उनके दादा कानून मंत्री थे। इसलिए उनकी रगों में कांग्रेसी खून जोर मारता रहता है। उन्होंने संजय दत्त की माफी का पिटारा खोला, तो फिर दिग्विजय सिंह, प्रिया दत्त, जया बच्चन, अजय देवगन, मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, जयाप्रदा आदि सभी संजय दत्त की सजा पर संताप मनाने लगे। तब किसी को याद नहीं आया कि संजय दत्त उन लोगों के साथ सक्रिय था, जिन्होंने मुंबई में 257 लोगों की हत्या की और देश की आर्थिक राजधानी को बर्बाद करने की कोशिश की थी।

[मार्कंडेय काटजू और जैबुन्निसा एक-दूसरे से 1993 के मुंबई बम विस्फोट मामले के संदर्भ में जुड़े हुए हैं, जब पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने जैबुन्निसा काजी के लिए राष्ट्रपति से मानवीय आधार पर माफी की मांग की थी। जैबुन्निसा इस मामले में एक दोषी थीं, और काटजू ने इस से पहले अभिनेता संजय दत्त के लिए भी ऐसी ही मांग की थी।
मार्कंडेय काटजू: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष थे। वह अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं।
जैबुन्निसा काजी: 1993 के मुंबई बम विस्फोट मामले में दोषी ।
संबद्धता: काटजू ने 2013 में जैबुन्निसा के लिए राष्ट्रपति से माफी की मांग की थी, क्योंकि वह इस मामले के अन्य दोषियों के लिए भी क्षमादान की अपील कर चुके थे। यह घटना एक उदाहरण है कि कैसे उन्होंने कई मामलों में सार्वजनिक रूप से अपनी राय व्यक्त की, विवादों में भी रहते हैं।]

रवींद्र कुमार कहते हैं कि संजय दत्त ने देश की आर्थिक राजधानी को नष्ट करने वालों का परोक्ष रुप से साथ देने का अपराध किया था। तो अफजल गुरु ने भी देश की संसद पर हमला करने वालों का साथ दिया था। अफजल के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने खुद कहा था कि वह किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य नहीं था। उस पर मात्र भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत सजा दी गई थी और फिर उसे फांसी पर लटका दिया गया था। ध्यान रहे संजय दत्त पर टाडा नोटिफाईड-अधिसूचित क्षेत्र में नाजायज हथियार रखने की धारा 25, 54, 59 के तहत सजा सुनाई गई है।

मार्कण्डेय काटजू को यदि पता होता कि अफजल गुरु पर दो ही आरोप थे, आरोपियों को दिल्ली लाकर मकान दिलाने व करोलबाग से एक एम्बेसडर कार दिलाने का आरोप है। यदि उन्हें पता होता कि जो कार आतंकवादियों ने संसद पर हमले के लिए इस्तेमाल की वह कार एक तत्कालीन एनडीए के केन्द्रीय मंत्री की थी और उसने उसे बिना स्टीकर उतारे 10 दिन पहले ही बेचा था। काटजू चाहते तो इसी तर्क का इस्तेमाल कर अपने कश्मीर के ही मूल निवासी अफजल को बचा सकते थे। ध्यान रहे काटजू भी कश्मीरी हैं।

केन्द्र सरकार ने कई अधिकरण बनाए हैं जहां रिटायर होने के बाद 63 सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को पांच साल का रोजगार मिलता है। सरकार को चाहिए कि वह अपराधी माफी प्राधिकरण बना कर मार्कण्डेय काटजू को उसका अध्यक्ष बना दे ताकि देश के असरदार और सत्ता से जुड़े लोगों को जेल जाने से बचाया जा सके।

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