विद्या ददाति विनयं
शिक्षा पर एक पोस्ट पर हुई चर्चा में मित्रवर अमरनाथ झा ने एक प्रश्न पूछा था कि यदि विद्या को हम कौशल मानें तो इससे विनय कैसे उत्पन्न होगा।
इस प्रश्न का मूल कारण विनय शब्द का आज प्रचलित अर्थ है। आज विनय का अर्थ माना जाता है नम्र होना। वास्तव में विनय शब्द में जो नय है, उसका अर्थ है नीति, नेता तथा मार्गदर्शन। इसलिए विनय शब्द का अर्थ जो “विद्या ददाति विनयं” में नीतिकार का अभिप्रेत है, वह नम्रता नहीं है, बल्कि विशेष नीति तथा मार्गदर्शन का जानकार होना है। विशेष नीति केवल सामाजिक ही नहीं होती, वह हरेक क्षेत्र में होती है। विशेष नीति से संपन्न व्यक्ति ही पात्र यानी योग्य माना जाता है। यह विनय और उससे जन्य पात्रता कौशल यानी विद्या से ही मिल सकती है।
विनय शब्द के इस अर्थ की ओर मेरा ध्यान सर्वप्रथम गुरुवर रामेश्वर मिश्र पंकज जी ने दिलाया था। अमरनाथ जी ने जब यह प्रश्न पूछा तो इस पर मुझे और अध्ययन करने का अवसर मिला। इससे यह विषय और अधिक स्पष्ट हुआ कि शास्त्रों का अर्थ करने के लिए परंपरा का ज्ञान भी अत्यावश्यक है, आवश्यक नहीं कि शब्दों के जो अर्थ अभी प्रचलित हैं, वही शास्त्रकारों का भी मन्तव्य रहा हो, वह भिन्न हो सकता है, क्योंकि आज यूरोपीय प्रभाव में संस्कृत शब्दों के अंग्रेजी अर्थ ही प्रचलित हैं, उसके शास्त्रशुद्ध अर्थ नहीं।
परस्पर सुसंस्कृत संबोधनों की जगह भद्दे संबोधनों का लज्जास्पद चलन
यदि हम महाभारत तथा अन्य इतिहास ग्रंथों और श्रेष्ठ साहित्य एवं धर्मशास्त्र को पढ़ने लगें तो हमें इन दिनों हमारे घरों में पति और पत्नी के लिये प्रयुक्त भद्दे संबोधनों पर गहरी लज्जा अवश्य होगी।
अपनी प्रिया पत्नी के लिये हमारे समस्त वांग्मय में कितने सुन्दर संबोधन भरे पड़े हैं। मैं इन दिनों महाभारत पर बोल रही हूं और फिर से वह सब सामने आ रहा है। दुष्यंत और शकुन्तला का ही संवाद ही लें जो आदिपर्व में वर्णित है – दुष्यंत शकुन्तला को देवि, विशाल लोचने, कल्याणी, सुभगे आदि संबोधनों से ही संबोधित करते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी वरारोहे, शुचिस्मिते, आर्ये आदि सुन्दर संबोधन हैं। पत्नी को कांता, कमललोचने, सहधर्मचारिणी, प्रिया, प्रियतमा, सुन्दरी आदि संबोधन संस्कृत साहित्य में भरे पड़े हैं।
परन्तु इन सुन्दर और श्रेष्ठ शब्दों के प्रयोग में वर्तमान शिक्षित हिन्दू ईसाइयों और म्लेच्छों के दबाव में शर्माते हैं और उसकी जगह इन भद्दे संबोधनों और शब्दों का प्रयोग करते हैं – ये मेरी वाइफ हैं, श्रीमती हैं, बीबी हैं, मिसेज हैं आदि-आदि। इन घटिया शब्दों का प्रयोग करने में किसी भी संस्कारी हिन्दू को लज्जा होनी चाहिये, परन्तु नहीं होती।
-प्रो. कुसुमलता केडिया
(जम्बू टॉक्स पर ‘अथ श्री महाभारत कथा के चौथे व्याख्यान का एक अंश’)
✍🏻कुसुमलता केडिया
संस्कृत के ‘उपायन’ शब्द से आपका पाला नहीं पड़ा होगा, पर ‘उपायन’ से अवश्य पड़ा होगा,
उपायन यानी भेंट, उपहार …
यह उपायन शब्द हमारी भोजपुरी में ‘बायन’ होकर प्रजाजनों मने परजूनियों को बँटने लगा,
मैथिली में बेन, अवधी में बैना, और
कन्नौज-कानपुर से ब्रज होते हुए राजस्थान तक यह ‘बायना’ रूप में प्रसारित होता है,
और; उर्दू में जाकर अग्रिम, एडवांस के प्रतिरूप ‘बयाना’ में परिवर्तित हो गया।
