गहराता असली खतरा:यूं ही नही बदल रही भारत की जनसांख्यकी

15 अगस्त 2025 को देश स्वतंत्रता उत्सव मना रहा था, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से एक अति महत्वपूर्ण बात कही कि देश की जनसंख्या की बनावट यानी जनसांख्यिकी को लेकर बड़ा खतरा हमारे है। मोदी ने बताया कि सीमावर्ती इलाकों में यह बदलाव तेजी से हो रहा है और यह सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा को भी गंभीर खतरा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कुछ लोग षड्यंत्रपूर्वक देश की जनसांख्यिकी बदलना चाहते हैं। यह सिर्फ जनसंख्या नहीं है, बल्कि सोची-समझी चाल है। घुसपैठिए देश में आकर न सिर्फ भारत के युवाओं की नौकरी और रोज़गार छीनते हैं, बल्कि देश की बहनों और बेटियों को भी निशाना बनाते हैं।
मोदी ने कहा कि ये लोग भोले-भाले जनजातीय लोगों को धोखा देकर उनकी जमीन भी हड़प लेते हैं। यह सब कुछ सोच-समझकर किया जा रहा है । समय रहते इसे रोका नहीं गया तो यह भारत के भविष्य में बड़ी मुसीबत बन सकता है। इसी के साथ मोदी ने ‘उच्च-शक्ति जनसांख्यिकी मिशन‘ शुरु करने की घोषणा की, ताकि इस खतरे का मुकाबला किया जा सके। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश अब यह सब और सहन नहीं करेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाषण में बहुत गंभीर बात कही कि देश के सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या बनावट बदलती है तो यह सिर्फ सामाजिक विषय नही, यह देश की सुरक्षा को खतरा बनता है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं कि वह अपने देश के क्षेत्र पर घुसपैठियों को कब्जा करने दे।
यह बात उन्होंने तब कही जब केंद्र सरकार पहले से ही बांग्लादेशी और रोहिंग्या जैसे अवैध घुसपैठियों के खिलाफ पूरे देश में अभियान चला रही है। खासकर सीमावर्ती राज्यों में ये लोग तेजी से बसते जा रहे हैं, जिससे स्थानीय आबादी और सुरक्षा दोनों प्रभावित हैं।
केंद्र सरकार ने इन अवैध प्रवासियों का पता लगा, उन्हें हिरासत में ले वापस भेजने को ‘ऑपरेशन पुशबैक‘ शुरू किया है। यह नया जनसांख्यिकी मिशन इस संकट के प्रति सरकार की गंभीरता दर्शाता है।
प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि खतरा सिर्फ बाहरी घुसपैठियों तक सीमित नहीं है। भारत में भी कुछ संगठन और समूह देश की धार्मिक बनावट बदलने में लगे हैं। जैसे,कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मांतरण को विदेशी पैसों से काम कर रहे हैं। छांगुर पीर जलालुद्दीन,अब्दुल रहमान जैसे लोग इसमें शामिल हैं। वहीं, ईसाई मिशनरी भी ‘प्रार्थना सभा‘ के नाम पर गरीब लोगों को धर्म बदलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने इन सब को जोड़ते हुए देश को चेताया कि अब समय आ गया है कि इस तरह के षड्यंत्र रोके जाए। वरना आशंकित नुकसान की भरपाई मुश्किल होगी।
असम और बंगाल में बढ़ते घुसपैठिए
जनसंख्या में यह बदलाव सिर्फ गैर-कानूनी घुसपैठियों से नहीं हो रहा है। कुछ स्थानीय कारण भी हैं, जैसे अलग-अलग समुदायों के बीच बच्चे पैदा करने की दर में अंतर।
असम में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर कार्रवाई– असम में भारत और बांग्लादेश की सीमा खुली है, जिससे अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम भारत में अवैध घुसपैठ करते हैं। ये लोग आधार कार्ड, राशन कार्ड आदि जैसे नकली कागजात बनवाकर भारत में रहते हैं।
ऐसे में भाजपा सरकार असम में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासी पहचानने, उन्हें हिरासत में ले देश से बाहर भेजने को सख्त कदम उठा रही है। साल 2019 में, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) की प्रक्रिया में असम के 19 लाख लोग रजिस्टर से बाहर कर दिये गये थे। यानि ये नागरिकता साबित नहीं कर पाए थे।
2011 जनगणना के अनुसार, असम में मुस्लिम जनसंख्या 2001 के 30.9% से बढ़कर 34% हो गई। इससे धुबरी, बारपेटा और गोलपाड़ा जिले मुस्लिम-बहुल बन गए हैं।
पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में अवैध घुसपैठियों की समस्या- पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी की अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। इस घुसपैठ के कारण उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार (TMC) पर आरोप लगते रहे हैं कि वह राजनीतिक फायदे के लिए इन अवैध मुस्लिम घुसपैठियों के साथ सख्ती से पेश नहीं आती है। पश्चिम बंगाल के अलावा, त्रिपुरा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी अवैध प्रवासियों के आने की समस्या देखी गई है।
भारत में धार्मिक जनसंख्या में बदलाव पर रिचर्स
एक रिसर्च पेपर के अनुसार, भारत की धार्मिक पॉपुलेशन की संरचना में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव दिखे हैं। स्टडी इकोनॉमिस्ट और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य प्रोफेसर शमिका रवि और उनके साथियों ने की है। स्टडी में 2001 से 2011 तक की जनगणना के आँकड़ों का विश्लेषण है, जिसमें भारत के 640 जिलों का धार्मिक स्ट्रक्चर देखा गया।
2001 से 2011 के बीच भारत की जनसंख्या में महत्वपूर्ण बदलाव दिखे। इस बीच देश की जनसंख्या 17.7% बढ़ी। इस वृद्धि के बावजूद, धार्मिक-मजहबी समूहों की जनसंख्या बढ़ने की गति अलग-अलग रही। सबसे तेज़ी से मुस्लिम बढे, जिनकी जनसंख्या 24.6% बढ़ी। वहीं, जैन जनसंख्या सबसे धीमी गति से केवल 5.4% बढ़ी।

इस दशक में, भारत की जनसंख्या में हिंदुओं का हिस्सा घट गया। यह 2001 में 80.46% से घटकर 2011 में 79.8% हो गया। जबकि मुस्लिम 13.43% से बढ़कर 14.23% हो गये। एक और दिलचस्प बात यह कि जिन्होने जनगणना में धर्म नहीं बताया, वें तीन गुना से ज़्यादा बढ़ गये। इससे पता चलता है कि समाज में कुछ और बदलाव भी हो रहे हैं, जिनका संबंध धार्मिक पहचान छुपाने में है।
पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ और कुछ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि से जनसांख्यिकी बदलाव दिखा है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों में मुस्लिम जनसंख्या हिंदूओं के मुकाबले तेजी से बढ़ी है। यह प्राकृतिक बढ़ोतरी ही नहीं, बल्कि सीमा पार से अवैध घुसपैठ भी बड़ा कारण है।

इस बदलाव से, कुछ जिलों में हिंदुओं की आबादी एक प्रतिशत से ज़्यादा घटी है, जो राष्ट्रीय जनसंख्या बदलाव की तुलना में काफी ज़्यादा है। यह स्थिति राज्य के इन हिस्सों में सामाजिक और राजनीतिक संतुलन प्रभावित कर रही है।
असम के कई जिलों में मुस्लिम आबादी पहले से ज़्यादा हो गई । खासकर बांग्लादेश की सीमा के पास के जिलों में यह बढ़ोतरी साफ दिखी है। धुबरी, बारपेटा, ग्वालपाड़ा और मोरीगाँव जैसे जिलों में मुस्लिम तेजी से बढ़े हैं। यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि कई कारणों से धीरे-धीरे हुआ।
बड़ा कारण अवैध प्रवासन है। बांग्लादेश से लोग बिना अनुमति सीमा पार असम आते रहे हैं। इनमें ज़्यादातर मुस्लिम होते हैं। कुछ जगहों पर धर्मांतरण भी हुआ, जिससे मुस्लिम और बढ़े है।

इस बदलाव से स्थानीय लोगों में चिंता है। उन्हें लगता है कि इससे उनकी पहचान और जीवनशैली प्रभावित होगी। बहुत से लोग डरे हैं कि कहीं उनकी संस्कृति और धर्म खतरे में न पड़ जाए। साथ ही, रोज़गार और ज़मीन जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ने की भी आशंका है। इससे लोगों में नाराज़गी और असुरक्षा भावना बढ़ी है।
भारत के अलग-अलग जिलों में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई जनसंख्या वृद्धि गति में कुछ खास बातें पता चलती हैं। एक शोध में पता चला कि 458 जिलों में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर 18% से ज़्यादा थी। यह देश के कुल जिलों का 72% है।
इसके मुकाबले, हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 268 जिलों (42%) में 18% से ज़्यादा थी, जबकि ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर 417 जिलों (65%) में 18% से ज़्यादा निकली।
79 जिलों में ईसाई जनसंख्या कम हुई, जबकि हिंदुओं के मामले में यह संख्या 50 और मुस्लिमों में 28 थी। शोध में यह भी पता चला कि 238 जिलों में ईसाई आबादी 50% से भी ज़्यादा बढ़ी। हिंदुओं के लिए यह संख्या केवल 23 और मुस्लिमों के लिए 55 थी।
एक अध्ययन में 2001 से 2011 के बीच ईसाइयों, हिंदुओं और मुस्लिम जनसंख्या बदलाव पर ध्यान दिया गया। इसमें देखा गया कि देश के ज़्यादातर जिलों में मुस्लिम आबादी का हिस्सा बढ़ा है। कुल 80% जिलों में मुस्लिम जनसंख्या अनुपात पहले से ज़्यादा हुआ है।
केवल 27% जिलों में ही हिंदुओं की आबादी बढ़ी है। ईसाई आबादी 69% जिलों में बढ़ी। यानी ईसाई और मुस्लिम जनसंख्या ज़्यादातर जिलों में बढ़ी, जबकि हिंदुओं की अपेक्षाकृत कम जिलों में।
आबादी के हिस्से में वृद्धि थोड़ा गहराई से देखें, तो पाया गया कि 150 जिलों में मुस्लिम जनसंख्या 0.8% से ज़्यादा बढ़ी है। हिंदु केवल 60 जिलों में और ईसाई 50 जिलों में बढ़े। यानि सबसे तेज़ वृद्धि मुस्लिम आबादी में हुई है।
अब गिरावट की बात करें तो 227 जिलों में हिंदु 0.7% से ज़्यादा घटे है। वहीं, मुस्लिम सिर्फ 24 जिलों में और ईसाइयों सिर्फ 32 जिलों में घटे हैैं।

पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में ईसाई बहुत तेज़ी से बढ़े हैं। नागालैंड, मिज़ोरम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह बदलाव साफ दिखा है। 2001 से 2011 के बीच, देश के 238 जिलों में ईसाई 50% से ज़्यादा बढ़े हैं । इन इलाकों में ईसाई मिशनरियाँ काफी सक्रिय हैं। वे गरीब और गैर-ईसाई जनजातीयों को आर्थिक मदद, नौकरी, शिक्षा और इलाज का वादा देकर ईसाई बना रही हैं।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में हिंदु घट रहे हैं। यही हाल, उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में भी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक के तटीय जिले और केरल का मालाबार क्षेत्र भी बदलाव रहा हैं। यहाँ भी हिंदू कम हुये हैं। इसके अलावा, महाराष्ट्र, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच के जिलों में भी हिंदू घटे हैं।
पेपर में यह भी बताया गया है कि कुछ खास इलाकों में मुस्लिम तेजी से बढ़े है, जैसे- महाराष्ट्र के बीच के जिले, कर्नाटक और मालाबार के तटीय इलाके और पश्चिम बंगाल व असम के पूर्वी जिले। यहाँ मुस्लिम आबादी के अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि दिखी है।
इन सब को नक्शे में देखें तो भारत में धर्म आधारित जनसंख्या परिवर्तन चिंताजनक हैं। यह दिखाता है कि कुछ जगहों पर जनसंख्या संतुलन तेजी से बदला है जिसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव पड़ेगें।
इस विश्लेषण में बताया गया है कि भारत में धार्मिक बदलाव सिर्फ राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर देखने से पूरी तस्वीर साफ नहीं होती। जिला स्तर पर हो रहे बदलाव कई बार नजरअंदाज हो जाते हैं। जबकि असली बदलाव वहीं से शुरू होते हैं।
धार्मिक जनसंख्या परिवर्तन केवल यह नहीं दिखाता कि कितने लोग बढ़े हैं। यह भी देखना जरूरी होता है कि किस धर्म की आबादी कितनी तेजी से बढ़ रही है। यानी बात केवल कुल संख्या की नहीं, बल्कि बढ़ने की रफ्तार की भी है।
साथ ही, यह बात भी अर्थपूर्ण है कि किसी जिले में किसी धर्म की शुरूआती हिस्सेदारी कितनी थी। अगर किसी धर्म की जनसंख्या पहले कम थी, लेकिन वह तेजी से बढ़ी तो उसका असर ज्यादा दिखेगा। इसलिए धार्मिक बदलाव समझने को सिर्फ बड़ी तस्वीर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे इलाकों की स्थिति भी ध्यान से देखना जरूरी है।
जनवरी 2025 में एक रिपोर्ट सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़ (CPS) नामक थिंक-टैंक ने जारी की थी। इसमें बताया गया कि भारत के कई राज्यों में धार्मिक आधार पर जनसंख्या संतुलन बदल रहा है। केरल में यह बदलाव साफ दिखता है। केरल में मुस्लिम जनसंख्या 2011 में 27% थी, लेकिन 2015 के बाद पैदा बच्चों में उनकी हिस्सेदारी हिंदुओं से ज़्यादा हो गई।
2019 में केरल में जन्मे बच्चों में 44% मुस्लिम थे और 41% हिंदू। यह बदलाव अचानक नहीं आया। 2008 से 2021 के बीच मुस्लिम हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ती गई। कुछ सालों में उनकी हिस्सेदारी हिंदुओं से ज़्यादा हो गई। वहीं, ईसाइयों की हिस्सेदारी भी घट गई।
रिपोर्ट के अनुसार 2008 से 2019 के बीच मुस्लिमों की हिस्सेदारी 36% से बढ़कर 44% हो गई। इसी दौरान हिंदु 45% से घटकर 41% और ईसाइई 17% से घटकर 14% रह गये। यानि जन्म के आँकड़ों में मुस्लिमों की संख्या, उनकी कुल जनसंख्या से कहीं ज्यादा है। यानी उनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है।
एक और अध्ययन प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने किया था। इसमें बताया गया कि 1950 से 2015 के बीच, भारत में हिंदु 84% से घटकर 78% रह गये। वहीं, मुस्लिम 9.8% से बढ़कर 14% हो गये। यानी मुस्लिम बहुत तेजी से बढ़े। ईसाई और सिख भी थोड़े बढ़े हैं।
ये सारे आँकड़े दिखाते हैं कि मुस्लिम जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। जबकि हिंदु कुल मिलाकर घट रहे हैं। भारत की कुल प्रजनन दर अब 2 से भी कम हो गई है और कुछ राज्यों में यह और भी नीचे है। यह जनसंख्या संतुलन को चिंता का विषय बन रहा है।
इस बदलाव के पीछे धर्मांतरण, लालच और अन्य सामाजिक दबावों पर भी सवाल उठे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया जा रहा रणनीतिक बदलाव है। इसलिए यह विषय सिर्फ आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
बदलती जनसांख्यिकी: भारत की संस्कृति, सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता पर गहराता संकट
यह बात शायद बार-बार सुनने को मिलती है, लेकिन सच यही है कि ‘जनसांख्यिकी’ यानी लोगों की संख्या और उनकी बनावट बहुत अर्थपूर्ण है। इतिहास साक्षी है कि जहाँ भी हिंदू कम हुए, वहाँ धर्मनिरपेक्षता यानी सभी धर्म समान नीति खत्म हो गई। भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वभाव इसलिए बना हुआ है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं।
जब जनसंख्या परिवर्तन होता है, जैसे सीमाओं के पास अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिए आते हैं या मुस्लिम संख्या जल्दी बढ़ती है तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। कई बार ये अवैध लोग सीमा पार तस्करी करते हैं, हिंसा फैलाते हैं और धर्म परिवर्तन भी कराते हैं। साथ ही, वे स्थानीय लोगों की नौकरियाँ, आजीविका और संसाधन कब्ज़ा लेते हैं। इससे भारतवासियों की मुश्किलें बढ़ती हैं और उनका भविष्य खतरे में आता है।
इसके अलावा, जिन इलाकों में मुस्लिम ज्यादा हैं, वहाँ हिंदू मंदिरों को नुकसान पहुँचाने की घटनाएँ होती हैं। इन घटनाओं में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ी गयी और मंदिरों के पास गायों के सिर और बाकी हिस्से फेंके गए। जैसे, जून 2025 में धुबरी में हनुमान मंदिर में बकरीद के बाद गाय का कटा हुआ सिर मिला था।
जनसंख्या में इन बदलावों से भारतीय संस्कृति को भी खतरा है। त्रिपुरा में हिंदू जनजातीय जनसंख्या, मुस्लिमों के मुकाबले घट गई है। इन बदलावों से हिंदु विरोधी हिंसा भी बढ़ी है। अपने शक्तिप्रदर्शन को मुस्लिम मंदिर क्षतिग्रस्त करते हैं, गोहत्या करते हैं और भीड़ बनाकर हिंदुओं पर हमला करते हैं।
कई जगह दिखा कि जहाँ मुस्लिम आबादी बहुत अधिक है, वहाँ हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम लोग खुलकर अपने त्योहार या परंपराएँ नहीं निभा पाते। ऐसे इलाके ‘मुस्लिम क्षेत्र’ बन जाते हैं, जहाँ बाकी समुदाय डरते हैं।
कई बार हुआ है कि हिंदू अपने धार्मिक जुलूस लेकर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरे तो उन पर पथराव हुआ। कुछ मामलों में तो मस्जिदों से ऐलान कर लोग जमा कर हमला किया गया। सिर्फ त्योहार ही नहीं, अगर कोई हिंदू क्रिकेट मैच जीतने की खुशी मना रहा हो, तब भी हमला कर दिया गया।
ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग कई बार हुई है। रामनवमी, हनुमान जयंती, कावड़ यात्रा जैसे धार्मिक कार्यक्रमों पर हमले हुए। यहाँ तक कि देश ने क्रिकेट विश्व कप जीता या किसी फिल्म में इस्लामी हमलावरों का सच दिखाया, तब भी हिंसा हुई। इन घटनाओं से पता चलता है कि कुछ लोगों को दूसरों की धार्मिक अभिव्यक्ति या जीत की खुशी भी सहन नहीं ।
धार्मिक जनसंख्या बदलाव धीरे-धीरे होता है। लेकिन इसके असर बहुत गहरे और दूरगामी हैं। कई जगहों पर दिखा है कि जहाँ मुस्लिमों की संख्या बढी, वहाँ हिंदू त्योहार खुलेआम मनाने में दिक्कत आई। होली, दिवाली, दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव जैसे त्योहारों पर आपत्ति जताई गई। हिंदुओं को धमकाया, मारा या दबाव डाला कि वे त्योहार न मनाएँ।
ऐसा सिर्फ मुस्लिम बहुल इलाकों में ही नहीं, बल्कि मिली-जुली आबादी क्षेत्रों में भी हुआ। ये घटनाएँ बताती हैं कि कुछ इलाकों में धार्मिक असहिष्णुता इतनी बढ़ी कि लोग डरकर जीने लगे हैं।
उत्तर प्रदेश के संभल जिला बड़ा उदाहरण है। वहाँ मस्जिद सर्वे पर बड़ा हंगामा हुआ। मस्जिद असल में पुराना हरिहर मंदिर था। इलाके में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। वहाँ कई हिंदू मंदिर सुनसान और बंद पड़े हैं। कारण कि मुस्लिमों ने वहां धीरे-धीरे कब्जा किया और हिंदू समुदाय को या तो वहाँ से हटना पड़ा या चुपचाप रहना पड़ा।
किसी जगह मुस्लिम जनसंख्या बढती है, तो वहाँ की राजनीति भी बदलती है। मुस्लिम एकजुट वोट करते हैं। इसलिए कई राजनीतिक पार्टियाँ उनका समर्थन पाने को तुष्टिकरण की राजनीति करती हैं। इससे इस्लामवादियों को ताकत मिलती है। उन्हें लगता है कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि उनके पीछे राजनीतिक ताकत खड़ी है।
हिंदू या दूसरे गैर-मुस्लिम समुदाय इतनी एकता से वोट नहीं करते। इसलिए उनका असर धीरे-धीरे घटता है। जैसे-जैसे जनसंख्या परिवर्तन होता है, वैसे-वैसे चुनावी नतीजे भी बदलते हैं। जो समुदाय ज़्यादा होता है, उसका प्रतिनिधित्व बढ़ता है और बाकियों की आवाज दब जाती है।
ऐसा पहले भी हो चुका है। आजादी से पहले बंगाल और पंजाब में मुस्लिम आबादी बढ़ी। वहाँ सांप्रदायिक तनाव भी बढ़े। इसका फायदा मुस्लिम लीग ने उठाया। उन्होंने माँग की कि मुसलमानों को अलग से चुनाव में सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवारों को ही वोट देने का अधिकार मिले।
अंग्रेजों ने माँग मान ली। उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ नीति अपनाई। 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधारों से मुसलमानों की अलग निर्वाचिकाएँ बन गईं। फिर 1935 में भारत सरकार अधिनियम से इन्हें और बढ़ाया गया। इस तरह मुस्लिमों को राजनीतिक विशेषाधिकार मिले, जबकि हिंदुओं को ऐसा कुछ नहीं मिला। यही चीज़ें बाद में भारत विभाजन का कारण बनी।
1876 में सैयद अहमद खान ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ विचार दिया था। यानि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं जो एक साथ नहीं रह सकते। यह सोच मुस्लिमों में अलगाव की भावना को जन्म देती गई। बाद में मुस्लिमों को पृथक निर्वाचिका यानी अलग से सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट देने का अधिकार मिला तो यह सोच और मजबूत हुई।
इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को खास सम्मान नहीं दिया जाता। मूर्ति पूजने वाले हिंदुओं को तो ‘मुशरिक’ यानी सबसे बड़ा पापी कहा गया है। इसलिए अगर कुछ मुस्लिम हिंदुओं, सिखों या दूसरे गैर-मुस्लिमों को पसंद नहीं करते तो यह बहुत चौंकाने वाली बात नहीं है। मुस्लिम लीग ने इस सोच का फायदा उठाया। उन्हें जो राजनीतिक अधिकार मिले थे, उनका इस्तेमाल भारत को बाँटने की माँग करने में किया गया। इससे देश में अलगाव की भावना और बढ़ गई।
आज कई लोग कहते हैं कि 1947 में भारतीय मुस्लिमों ने भारत को चुना, पाकिस्तान को नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि 1946 के चुनावों में ज़्यादातर मुस्लिमों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया था। मुस्लिम लीग उस समय एक अलग इस्लामी देश की माँग कर रही थी। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए मुसलमानों को आजादी के बाद अपना अलग देश चाहिए। यही माँग बाद में पाकिस्तान के निर्माण की वजह बनी।
1946 में भारत आज़ादी की दहलीज पर था, तब मुस्लिम लीग ने बड़ा राजनीतिक फैसला लिया। उस साल प्रांतीय चुनावों में उन्होंने कुल 87% मुस्लिम सीटें जीत लीं। यह दिखाता है कि ज़्यादातर मुसलमान तब लीग के साथ थे, जो भारत को धार्मिक आधार पर बाँटकर अलग इस्लामी देश माँग रही थी।
इसी सोच में जिन्ना ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ घोषित किया। मुसलमानों ने मारकाट मचा दी। जगह-जगह खून बहा, बलात्कार, आगजनी और चारों तरफ अराजकता। लाखों निर्दोष लोग मरे और इन्हीं लाशों पर पाकिस्तान बना।
यह इतिहास याद करना जरूरी है क्योंकि अब फिर वही सोच सामने है। जहाँ मुस्लिम आबादी ज़्यादा होती है, वहाँ वे वर्चस्व बनाते हैं। चाहे वह छोटी बस्ती हो या पूरा इलाका। वे सरकार पर दबाव बनाने को हिंसा करते हैं, जैसा अभी वक्फ विधेयक विरोध में दिखा, जहाँ हिंदुओं को निशाना बनाया गया। वे आरक्षण जैसी विशेष माँगें भी करते हैं।
विभाजन का घाव आज भी भारतीय मन में ताजा है। हिंदू अब ऐसी कोई भी सोच या योजना स्वीकार नहीं कर सकता, जो भारतीय एकता और अखंडता घायल करे। देश के मुस्लिम बहुल इलाके ‘मिनी पाकिस्तान’ बन रहे हैं, जहाँ देश की मुख्यधारा से अलग सोच हावी दिखती है। यही चिंतनीय है।
भारत कोई बड़ा क्रिकेट मैच जीतता है, तो देशभर में लोग खुशी मनाते हैं। लेकिन कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू जीत का जश्न मनाते हैं तो उन पर हमला होता है। ऐसे कई मामले हैं जहाँ मुस्लिमों ने हिंदुओं पर हिंसा की। इसी तरह, कई जगह हिंदू दीवाली, होली या रामनवमी मनाते हैं तो मुस्लिम विरोध करता है। लेकिन इसके बावजूद, दिखाते हैं कि मुस्लिम पीड़ित हैं, जबकि सच्चाई उलटी होती है।
प्रधानमंत्री मोदी की जनसंख्या बदलाव की चिंता सही है। 2021 के एक सर्वेक्षण में 74% भारतीय मुस्लिमों का भारत के कानूनों से ज़्यादा शरिया कानूनों का पक्ष लेना बताता है कि बहुसंख्यक मुस्लिम भारतीय न्याय व्यवस्था से नहीं जुड़े। उनकी सोच बहुसंख्यक से अलग है। ऐसे में मुस्लिम आबादी बढने के परिमाण स्पष्ट हैं।
बांग्लादेश में सरकार बदली और चरमपंथी ताकतों ने वहाँ हिंदुओं पर हमले किये। यही हाल भारत के कुछ हिस्सों में भी, जैसे मुर्शिदाबाद, जहाँ वक्फ कानून के विरोध में हिंदुओं पर हमला हुआ। इन सभी घटनाओं से साफ है कि ‘ मुस्लिम प्रभुत्व बढ़ेगा तो सबसे पहले हिंदू ही उसका शिकार बनेगा।’
भारत विभाजन सिर्फ जमीन बँटवारा नहीं था, यह सोच और विचारधारा का टकराव था। तब, मुस्लिमों ने हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार किए, लेकिन खुद को दुनिया में पीड़ित बताया। यह सब इस्लामी सोच है, वे अपना मजहब दूसरों से ऊँचा मानते हैं। तब भारत के धर्मनिरपेक्ष नेता कट्टरपंथी सोच के सामने झुक गये। इसी कारण भारत बँटा।
अब भारत ने आज़ादी की 79वीं सालगिरह मनाई। इतने सालों में भारत तकनीक, शिक्षा, सेना, अर्थव्यवस्था, हर जगह आगे बढ़ा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान असफल देश बनकर रह गया, 1971 में खुद बँटा और बांग्लादेश बना।
लेकिन चिंता यह है कि भारत की जनसंख्या की बनावट यानी जनसांख्यिकी बदली तो सारी तरक्की मिट्टी होगी। मुस्लिम कुछ इलाकों में बहुत ज़्यादा बढ़े और अवैध प्रवासी समय पर रोके नहीं गये तो देश का सामाजिक संतुलन बिगड़ेगा।
सरकार ने इस पर ध्यान देना शुरू किया है। जनसांख्यिकी मिशन शुरु किया गया है। इसके साथ-साथ जरूरी है कि अवैध घुसपैठिये देश से निकाले जाए। साथ ही, हिंदुओं, सिखों या अन्य गैर-मुस्लिमों का जबरन धर्मांतरण कराने वालों के खिलाफ सख्त कानून बने और लागू हों।
आज भारत धर्मनिरपेक्ष है, यानी हर धर्म को बराबरी दी जाती है। लेकिन यह इसलिए संभव है क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्या में हैं। अगर हिंदू ही कम हो गए तो भारत का चेहरा भी बदल जाएगा। फिर यह देश वैसा नहीं बचेगा, जैसा आज है, बल्कि यह एक और पाकिस्तान बनने की दिशा में बढ़ सकता है।

