ईरान विद्रोह दबाने में सफल,12 हज़ार जानें गई, भारतीयों का निकास टला

ईरान में टला युद्ध का खतरा! भारत ने होल्ड किया ऑपरेशन, नागरिकों को लेकर स्वदेश लौटने का था प्लान
भारतीय दूतावास के ईरान में फंसे नागरिकों की स्वदेश वापसी को शुरू निकासी प्रक्रिया अगले आदेश तक रोक दी है. भारतीय दूतावास ने कहा कि पहले ये फैसला सावधानी को लिया गया था. आधिकारिक पुष्टि के बाद कि युद्ध जैसी स्थिति या आगे तनाव बढ़ने की कोई आशंका नहीं है,इसे टाल दिया गया.

ईरान में बवाल के बीच अपने नागरिकों को निकालने का भारत ने तैयार किया प्लान.. (File Photo: Reuters)

नई दिल्ली,15 जनवरी 2026, ईरान में लगातार बढ़ते तनाव के बीच भारत सरकार ने वहां फंसे अपने नागरिक निकालने को ‘कंटिन्यूजेंसी प्लान’ तैयार कर लिया है. सूत्रों के अनुसार, सरकार ने युद्ध का खतरा टलने से भारतीय नागरिकों को ईरान से निकालने का ऑपरेशन रोक दिया है.  पहले जानकारी थी कि शुक्रवार को भारतीयों का पहला प्लेन स्वदेश जा सकता है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार, भारतीय दूतावास की निकासी प्रक्रिया को अगले आदेश तक रोक दिया गया है. पहले निकासी का फैसला युद्ध संबंधी चिंतायें देख सावधानी को लिया गया था.  आधिकारिक पुष्टि के बाद कि युद्ध जैसी स्थिति या आगे तनाव बढ़ने की कोई आशंका नहीं है. अब ये स्पष्ट है कि अभी निकासी की कोई जरूरत नहीं है.

इस बीच दूतावास के अधिकारी छात्रों के सीधे संपर्क में हैं और यदि निकासी आवश्यक होती है तो वे व्यक्तिगत रूप से छात्रों से मिलेंगे और उन्हें आधिकारिक माध्यमों से सूचित करेंगे.

Iran में फंसे भारतीयों को निकालने की तैयारी

इससे पहले सूत्रों ने बताया कि तेहरान में भारतीय दूतावास ने विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय छात्रों से संपर्क शुरू किया है, ताकि पता चले कि कौन देश छोड़ना चाहता है. हालांकि, इंटरनेट सेवाओं के कई इलाकों में बंद होने और फोन लाइनों के बीच-बीच में काम न करने से ये प्रक्रिया भौतिक रूप से हो रही है.

ग्राउंड पर उतरे अधिकारी

सरकारी सूत्र के अनुसार ‘ईरान में संचार सेवाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं, जिससे भारतीय नागरिकों की जानकारी जुटाने मुश्किल  है.’ सूत्रों ने बताया कि दूतावास के अधिकारी खुद उन इलाकों में जाकर भारतीय छात्रों की पहचान कर जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं, जहां इंटरनेट और दूरसंचार सेवाएं काम नहीं कर रही.

संपर्क में हैं सभी भारतीय नागरिक

सरकारी सूत्र के अनुसार वे भारतीय छात्रों के संपर्क में हैं और जल्द से जल्द चार्टर्ड उड़ानों की व्यवस्था की कोशिश में हैं. प्राथमिकता उन क्षेत्रों को दी जायेगी जो हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित हैं.

ईरान में मौजूद 10 हजार भारतीय नागरिक

सरकार ने स्थिति अनुसार त्वरित प्रतिक्रिया की तैयारियां पूरी कर ली हैं, जिसमें भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना शामिल है. अनुमान अनुसार, ईरान में 10,000 से अधिक भारतीय  हैं, जिनमें बड़ी संख्या छात्रों की है.

ईरान छोड़ने की सलाह

उधर, बुधवार को ईरान में लगातार बिगड़ते हालत देख भारतीय दूतावास ने एडवाइजरी जारी कर सभी भारतीय नागरिकों- छात्रों, तीर्थयात्रियों, व्यापारियों और पर्यटकों से उपलब्ध साधनों या कमर्शियल फ्लाइट्स से ईरान छोड़ने को कहा था. तेहरान में भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों को अशांत इलाकों से दूर रहने, सतर्क और संबंधित यात्रा डॉक्यूमेंट्स तैयार रखने को कहा.

मोदी से अपील

ईरान में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे कश्मीर के सैकड़ों छात्रों के परिवारों में भारी घबराहट है. श्रीनगर के प्रेस कॉलोनी में परिजनों ने प्रदर्शन कर प्रधानमंत्री मोदी से बच्चों की सुरक्षित वापसी की गुहार लगाई है. उनको डर है कि अमेरिका और इजराइल के हमलों से स्थिति और बिगड़ सकती है. छात्र वर्तमान में रसद की कमी और असुरक्षित संचार व्यवस्था से जूझ रहे हैं, जिससे उनकी जान खतरे में है.

व्यवस्था से तंग आ चुके हैं ईरान के लोग?

ईरान की मौजूदा स्थिति पर ईरान में भारत के पूर्व राजदूत गद्दाम धर्मेंद्र कहते हैं, ईरान के लोग क्या चाहते हैं? वे व्यवस्था से तंग आ चुके हैं. वे बदलाव चाहते हैं. वे अस्थिरता के लिए कितने बेताब हैं? उन्होंने इराक, सीरिया, अफगानिस्तान और लीबिया को देखा है. ईरान का विशाल मध्य वर्ग पीड़ा झेल रहा है. वे 45 से अधिक वर्षों से पीड़ा सह रहे हैं… लेकिन शासित और शासकों के बीच एक लचीलापन होता है. शासित एक सीमा तक दबाव डालेंगे और फिर पीछे हट जाएंगे. इसलिए हमें पश्चिम से नहीं, बल्कि ईरान के अंदर से भी खबरें मिल रही हैं कि तेहरान, इस्फ़हान, शिराज जैसे बड़े शहरों में अब शांति है. साथ ही लोग मृतकों, अपने प्रियजनों के शव ले जा रहे हैं और खामेनेई को श्रद्धांजलि दे रहे हैं.

उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि हम एक ऐसे मोड़ पर हैं जो किसी भी दिशा में जा सकता है, लेकिन लोग अस्थिरता नहीं चाहते.

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नई दिल्ली,15 जनवरी 2026,ईरान एक बार फिर आक्रोश और सत्ता के टकराव की आग में जल रहा है. इस दौरान देश की सड़कों पर उतरे हजारों प्रदर्शनकारी या तो गोलियों का शिकार बने या जेलों में गुम हो गए हैं. तेहरान की सत्ता इन मौतों को विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहरा रही है और मोसाद का नाम ले रही है. वहीं, मानवाधिकार रिपोर्ट्स सीधे तौर पर खामेनेई के नेतृत्व वाले तंत्र पर उंगली उठा रही हैं. तो आखिर सच्चाई क्या है? विदेशी हस्तक्षेप या सत्ता का क्रूर दमन ?

28 दिसंबर 2025
यही वो तारीख थी, जब ईरान के अंदर जनता ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए, जिनका मूल कारण बढ़ती महंगाई,आर्थिक कठिनाइयां, बेरोज़गारी और रोज़मर्रा की वस्तुओं की भारी कीमतों में वृद्धि थी. शुरुआती प्रदर्शन स्थानीय बाजारों,व्यापारिक इलाकों और राजमार्गों पर केंद्रित रहे, लेकिन जल्द ही इनका रूप व्यापक राजनीतिक असंतोष में बदल गया. खामेनेई के शासन के ख़िलाफ़ सबसे बड़ी भीड़ जुटी, जिसने समाज के विभाजन, शासन की नीतियों और मौजूदा राजनैतिक ढांचे को चुनौती दे डाली. यह आंदोलन सिर्फ अर्थशास्त्र नही, बल्कि बलपूर्वक शासन के खिलाफ विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग बन गया.

हिंसक दमन की शुरुआत
ईरानी सुरक्षा बलों, खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और बसीज मिलिशिया ने विरोध प्रदर्शन दबाने को कठोर तरीके अपनाए. स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने बताया कि कई शहरों में सुरक्षा बलों ने सीधे गोलियां चलाईं, जिससे व्यापक मौतें हुईं. अस्पतालों में शव और घायल लोगों का अंबार लग गया; डॉक्टर्स थकावट से गिर पड़े और सरकारी दमन ने हिंसा और बढ़ा दी.

मृतकों की संख्या के आंकड़ों का अंतर
गोलीबारी में कई प्रदर्शनकारियों की जान चली गई. ये संख्या हजारों तक जा पहुंची. लेकिन सरकारी आंकड़ों और स्वतंत्र समूहों की रिपोर्टों में भारी अंतर है. ईरान सरकार ने लगभग 2,000 मौतें मानी है, जबकि मानवाधिकार समूहों का अनुमान ज़्यादा है; कुछ रिपोर्टस् में 3,000 – 3,400 से अधिक 3428 तक मौतों का दावा किया गया है. कुछ मीडिया रिपोर्टस् के आंकड़ों में 12,000 से ज़्यादा भी मौतों का दावा किया गया है, हालांकि इंटरनेट ब्लैकआउट और सूचना प्रतिबंधों के कारण सही आंकड़ा प्रमाणित नहीं है.

ईरान का दावा- USA और इज़राइल ज़िम्मेदार
ईरान के अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों की मौत और अशांति को अमेरिका और इज़राइल को दोषी ठहराया है. इसके लिए विदेशी षड्यंत्र का आरोप लगाया गया और ट्रंप – नेतन्याहू को सार्वजनिक रूप से मौतों का जिम्मेदार बताया गया. ईरानी मीडिया और सरकारी बयानों में प्रदर्शनकारियों को अल्लाह का दुश्मन और साबोटर बताया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि आस-पास के देशों और विदेशी एजेंसियों को आंदोलन के पीछे की शक्ति बताया जा रहा है.

खामेनेई का आरोप 
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई ने विरोध प्रदर्शनों को विदेशी षड्यंत्र और देश के खिलाफ षडयंत्र बताया. उन्होंने IRGC को उच्चतम अलर्ट पर रखा और कठोर दमन के आदेश दिए, जिससे सुरक्षा बलों की क्रूरता और बढ़ गई. राज्य नियंत्रित मीडिया में खामेनेई के आदेश को समर्थन मिला, लेकिन वैश्विक आंकड़ों की तुलना में सरकारी मान्यता सीमित और संदेहास्पद रही.

मोसाद, इज़राइल पर आरोप
कुछ ईरानी अधिकारियों ने यह दावा किया कि इज़राइल और अन्य विदेशी एजेंसियां आंदोलन में हस्तक्षेप कर रही हैं, लेकिन वास्तविक स्वतंत्र सबूत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं. इस तरह के आरोप आमतौर पर राजनीति का हिस्सा होते हैं, जहां शासन किसी भी बाहरी शक्ति को विरोध का कारण बताकर स्थिति नियंत्रित करता है. मौज़दा अनावरण यह है कि ऐसे आरोपों को पुष्टि करने वाले स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं, और इज़राइल या मौसाद को प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शनकारियों की मौतों का जिम्मेदार ठहराना तथ्य के स्तर पर ठोस नहीं है.

निंदा और प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने ईरान में हजारों लोगों के मारे जाने की निंदा करते हुए कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग हुआ. साथ ही यूरोपीय देशों और अमेरिका ने कड़ी निंदा कर प्रतिबंधों की धमकी दी और इज़राइली हस्तक्षेप के आरोपों को खारिज कर राज्यीय दमन को प्राथमिक कारण बताया.

ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी बयानबाज़ी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य पश्चिमी नेताओं ने मृत्युदंड और हिंसा को ईरान सरकार की आलोचना की, साथ ही उन्होंने कहा कि अगर यह जारी रहा तो कड़ी कार्रवाई करेंगें. ईरानी अधिकारियों ने इन टिप्पणियों को और भी विदेशी दखल बताया, जिससे अमेरिका-ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया.

विरोध पीछे की व्यापक राजनीतिक
प्रदर्शन केवल आर्थिक कारणों के कारण नहीं, बल्कि इस्लामी शासन, सीमित राजनीतिक स्वतंत्रता, और सामाजिक असंतोष के कारण भी थे. ये जड़ें बड़ी गहरी रही और पिछले विरोधों की तरह, जनता की मांगें केवल अधिकारियों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि पूरे राजनैतिक ढांचे में बदलाव की थीं.

दमन से संकट तक
ईरानी प्रतिक्रिया में दमन, गिरफ्तारियां, मौत की सजा के फैसले और इंटरनेट ब्लॉक जैसे क़दम थे. एक प्रदर्शनकारी इरफान सुल्तानी को फांसी की तैयारी की खबर ने अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ा दी. इन उपायों से देश में असंतोष और कड़े प्रतिबंधों के प्रति प्रतिक्रिया और तेज़ हुई. इसके बाद फिलहाल, सुल्तानी की फांसी टाल दी गई है.

मानवाधिकार संगठनों के बयान
मानवाधिकार समूहों ने ईरानी सरकार के कार्रवाई के तरीक़ों को भयानक और निष्पक्ष न्याय शून्यता बताया है. कई प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर बिना मुक़दमे मार दिया गया या मौत की सजा सुना दी गई. अंतरराष्ट्रीय निगरानी समूहों ने विश्व समुदाय से देश में कार्रवाई को रोकने को अधिक दबाव डालने का आग्रह किया है.

मीडिया ब्लैकआउट
ईरानी सरकार ने इंटरनेट और फोन सेवायें ब्लॉक कर दी, जिससे स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि मुश्किल है. स्टारलिंक आदि से कुछ जानकारी बाहर आ रही है, लेकिन व्यापक सूचना प्रतिबंध है. यह ब्लैकआउट मौतों और हिंसा की वास्तविक संख्याओं को छुपाने का उपाय माना जा रहा है.

कौन है असली जिम्मेदार?
अंततः उपलब्ध विश्वसनीय आंकड़ों से स्पष्ट है कि विरोध प्रदर्शनकारियों की मौतों को मुख्य जिम्मेदार ईरानी सुरक्षा बल बताए जा रहे हैं, जिनके आदेश केंद्रीय नेतृत्व-विशेषकर खामेनेई के शासन-से सीधे जुड़े हैं. विदेशी एजेंसियों या मोसाद की भूमिका को लेकर अभी तक कोई ठोस प्रमाण नहीं है; इन आरोपों का इस्तेमाल राजनीतिक रक्षा रणनीति है.

समाधान और वैश्विक भूमिका
स्थिति अब व्यापक अंतरराष्ट्रीय दबाव, मानवाधिकार संस्थाओं की जांच और राजनीतिक विचार विमर्श का केंद्र है. विश्व समुदाय को ईरानी अधिकारियों पर अधिक पारदर्शिता और शांतिपूर्ण समाधान की मांग जारी रखनी है. एशिया, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र के संगठनों ने पहले ही ईरान से हिंसा रोक शांतिपूर्ण बातचीत का आग्रह किया है.

 

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