A to Z: स्वयंभू शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की दुर्गति क्यों हो रही है?
अविमुक्तेश्वरानंद के साथ क्या विवाद है?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (जिन्हें ज्योतिष पीठ, बद्रीनाथ के शंकराचार्य के रूप में जाना जाता है) के साथ मुख्य रूप से हालिया विवाद प्रयागराज के माघ मेले 2026 में छिड़ा है। यह विवाद मौनी अमावस्या (18-19 जनवरी 2026) के दौरान संगम स्नान को लेकर शुरू हुआ और अब काफी बड़ा हो गया है।मुख्य विवाद क्या है?स्नान रोकने का आरोप: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी (या रथ/पालकी) पर सवार होकर अपने शिष्यों के साथ संगम में स्नान करने जा रहे थे। मेला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा कारणों (भीड़ के दबाव और स्टाम्पेड जैसी स्थिति से बचाव) बताते हुए उन्हें रोका। इससे उनके समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की/झड़प हुई।
धरना और अनशन: स्वामीजी ने इसे अपमान मानकर धरना शुरू कर दिया, जो अब भी जारी है। वे प्रशासन से माफी की मांग कर रहे हैं और कह रहे हैं कि माफी के बिना आश्रम में नहीं लौटेंगे। उन्होंने दावा किया कि उन्हें मारने की कोशिश हुई (खून लगा पटका दिखाया)।
शंकराचार्य पद पर नोटिस: माघ मेला प्राधिकरण ने उन्हें नोटिस जारी किया है, जिसमें 24 घंटे के अंदर यह साबित करने को कहा गया है कि वे कैसे खुद को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य कह रहे हैं। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया था कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर कोई नया पट्टाभिषेक (नियुक्ति) तब तक नहीं हो सकता, जब तक मामला पूरी तरह निपट नहीं जाता। मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
पुराना विवाद (शंकराचार्य पद को लेकर)यह नया नहीं है—स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का शंकराचार्य होने का दावा ही विवादास्पद रहा है:स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (पूर्व शंकराचार्य) की मृत्यु के बाद उन्होंने खुद को उत्तराधिकारी घोषित किया।
लेकिन कई पक्षों (जैसे गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य) ने इसे मान्यता नहीं दी।
सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है, जहां पट्टाभिषेक पर रोक है।
कुछ संत (जैसे जगद्गुरु रामभद्राचार्य) ने भी उनकी आलोचना की है कि रथ पर सवार होकर स्नान करना शास्त्र-विरुद्ध है।
अन्य पुराने विवाद
वे समय-समय पर मुखर बयानों के कारण सुर्खियों में रहे हैं, जैसे:केदारनाथ मंदिर से सोना गायब होने का आरोप।
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में शामिल न होना।
राजनीतिक टिप्पणियाँ (योगी सरकार, कांवड़ यात्रा नियम, आदि)।
राहुल गांधी को हिंदू धर्म से “निष्कासित” करने का बयान (जिसके बाद कांग्रेस ने भी उनका बचाव किया)।
यह विवाद अब धार्मिक परंपरा vs प्रशासनिक सुरक्षा/कानूनी आदेश और राजनीतिक रंग ले चुका है। कांग्रेस ने यूपी सरकार की आलोचना की है, जबकि प्रशासन का कहना है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहे हैं। स्वामीजी का पक्ष है कि शंकराचार्य पद परंपरा से तय होता है, न कि अदालत या सरकार से।विवाद अभी चल रहा है, और धरना जारी होने से स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।
अन्य शंकराचार्य विवाद,सुप्रीम कोर्ट केस विस्तार से
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ज्योतिष पीठ (ज्योतिरमठ), बद्रीनाथ के शंकराचार्य पद से जुड़े सुप्रीम कोर्ट केस का विस्तार से विवरण इस प्रकार है। यह मामला लंबे समय से चल रहा है और अभी भी पूरी तरह निपटारा नहीं हुआ है (जनवरी 2026 तक)।
मुख्य केस और पृष्ठभूमि
मुख्य विवाद: ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मृत्यु (11 सितंबर 2022) के बाद उत्तराधिकार को लेकर विवाद। स्वामी स्वरूपानंद ने अपनी वसीयत में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराधिकारी घोषित किया था, लेकिन अन्य पक्षों (जैसे स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती और गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य) ने इसे चुनौती दी।
केस का नाम: मुख्य रूप से Civil Appeal No. 3010/2020 (Jagat Guru Shankaracharya Jyotishpeeth P.S.S.N. Saraswati vs Swami Vasudevanand Saraswati) और इससे जुड़ी अन्य याचिकाएँ। यह 2020 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
मुख्य आरोप: याचिकाकर्ता का दावा है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने झूठा दावा किया कि वे स्वामी स्वरूपानंद से नियुक्त उत्तराधिकारी हैं। साथ ही, पट्टाभिषेक (शंकराचार्य पद की औपचारिक दीक्षा) पर रोक मांगी गई, क्योंकि अन्य शंकराचार्यों (विशेषकर पुरी के गोवर्धन मठ) ने इसे मान्यता नहीं दी।
महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट आदेश (2022)15 अक्टूबर 2022 का आदेश (न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और बी.वी. नागरत्ना की बेंच):सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सूचित किया कि गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति को वे मान्यता नहीं देते।
कोर्ट ने याचिका की प्रार्थना (प्रेयर क्लॉज A) को मंजूर किया और पट्टाभिषेक (coronation/consecration) पर रोक लगा दी।
आदेश: जब तक अपील/मामला पूरी तरह निपट नहीं जाता, तब तक कोई भी व्यक्ति ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेकित नहीं हो सकता। 17 अक्टूबर 2022 को प्रस्तावित पट्टाभिषेक रद्द हो गया।
अगली सुनवाई 18 अक्टूबर 2022 को निर्धारित की गई, लेकिन मामला अभी भी लंबित है (2026 तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया)।
2026 में हालिया विकास (माघ मेला विवाद से जुड़ा)प्रयागराज मेला प्राधिकरण का नोटिस (जनवरी 2026): मौनी अमावस्या स्नान विवाद के बाद मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया।नोटिस में 2022 के सुप्रीम कोर्ट आदेश का हवाला दिया गया।
कहा गया कि मामला अभी विचाराधीन है, इसलिए कोई पट्टाभिषेक नहीं हो सकता। फिर भी वे खुद को शंकराचार्य कह रहे हैं और शिविर पर बोर्ड लगाए हैं—यह सुप्रीम कोर्ट आदेश की अवहेलना है।
24 घंटे में जवाब मांगा गया कि वे शंकराचार्य पद कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं।
स्वामीजी का पक्ष: उनके वकील (पी.एन. मिश्र) ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल पट्टाभिषेक पर रोक लगाई है, ‘शंकराचार्य’ शब्द इस्तेमाल करने पर नहीं। वे स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य हैं और वसीयत के आधार पर खुद को शंकराचार्य मानते हैं। पट्टाभिषेक श्रंगेरी और द्वारका पीठ के शंकराचार्यों ने किया था।
वर्तमान स्थिति: केस अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। कोई अंतिम फैसला नहीं आया, इसलिए पट्टाभिषेक पर रोक बरकरार है। लेकिन ‘शंकराचार्य’ टाइटल इस्तेमाल पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है, जिस पर दोनों पक्ष अलग-अलग दावा कर रहे हैं।
अन्य संबंधित बिंदु
ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य पद पर पहले से भी विवाद रहा है (स्वामी स्वरूपानंद vs
स्वामी वासुदेवानंद)।
परंपरा के अनुसार, चार पीठों (ज्योतिष, द्वारका, पुरी, श्रंगेरी) के शंकराचार्यों की मान्यता आपसी सहमति से होती है, लेकिन यहां गोवर्धन मठ ने विरोध किया।
यह विवाद अब धार्मिक + कानूनी + प्रशासनिक हो गया है, और माघ मेले में इस्तेमाल हो रहा है।
संक्षेप में, सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में पट्टाभिषेक पर अंतरिम रोक लगाई, जो अभी भी लागू है। अंतिम फैसला आने तक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का दावा विवादास्पद बना हुआ है।
ज्योतिष पीठ और इसके कानूनी विवाद का इतिहास काफी पुराना और पेचीदा है। इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें इसके इतिहास और कानूनी पेचों को देखना होगा:
1. ज्योतिष पीठ का ऐतिहासिक संकट
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से ज्योतिष पीठ (बद्रीनाथ) सबसे लंबे समय तक विवादों में रही है।
- यह पीठ करीब 165 वर्षों (1876-1941) तक खाली रही थी।
- 1941 में इसे फिर से पुनर्जीवित किया गया और स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती पहले शंकराचार्य बने। लेकिन उनके बाद से ही उत्तराधिकार को लेकर गुटबाजी शुरू हो गई।
2. मुख्य कानूनी विवाद: स्वामी स्वरूपानंद बनाम स्वामी वासुदेवानंद
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, का दशकों तक स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के साथ कानूनी विवाद चला।
- निचली अदालत और हाई कोर्ट का फैसला: 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि स्वामी वासुदेवानंद की नियुक्ति अवैध थी क्योंकि उन्होंने संन्यास के नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया था। साथ ही कोर्ट ने स्वामी स्वरूपानंद की नियुक्ति को भी पूरी तरह सही नहीं माना था।
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया।
3. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति का ‘पेच’
सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के तुरंत बाद, उनके पार्थिव शरीर के सामने ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया।
- विवाद की जड़: विरोधियों का तर्क है कि शंकराचार्य का चयन ‘मठ आम्नाय’ (मठों के संविधान) के अनुसार होना चाहिए, जिसमें विद्वानों की सभा और अन्य पीठों की सहमति जरूरी है।
- सुप्रीम कोर्ट का आदेश (2022): जब पट्टाभिषेक की तैयारी हो रही थी, तब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई कि यह प्रक्रिया अवैध है। कोर्ट ने आदेश दिया: “अगले आदेश तक कोई पट्टाभिषेक समारोह नहीं होगा।”
4. वर्तमान स्थिति (2026)
आज विवाद इस बात पर है कि:
- अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष: वे तर्क देते हैं कि वे अपने गुरु की वसीयत और परंपरा के अनुसार काम कर रहे हैं।
- प्रशासन और कोर्ट का पक्ष: कानून की नजर में, जब तक नियुक्ति की प्रक्रिया को अदालत “वैध” घोषित नहीं कर देती, तब तक वे आधिकारिक रूप से इस पद के विशेषाधिकारों का उपयोग नहीं कर सकते।

निष्कर्ष: यह विवाद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी है। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पर अंतिम फैसला नहीं सुनाता, “शंकराचार्य” की पदवी को लेकर यह खींचतान जारी रहने की संभावना है।
इन विवादों का बद्रीनाथ मंदिर के प्रबंधन या धार्मिक अनुष्ठानों पर क्या असर पड़ता है?
ज्योतिष पीठ के इस लंबे विवाद का सीधा असर न केवल मंदिर के प्रबंधन पर पड़ता है, बल्कि आम श्रद्धालुओं और धार्मिक व्यवस्थाओं पर भी इसके गहरे प्रभाव होते हैं:
1. बद्रीनाथ मंदिर के प्रबंधन पर असर
बद्रीनाथ मंदिर का संचालन ‘श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति’ (BKTC) द्वारा किया जाता है, जो उत्तराखंड सरकार के अधीन है।
- औपचारिक भूमिका: परंपरा के अनुसार, शंकराचार्य को मंदिर के धार्मिक मामलों में सर्वोच्च सलाहकार माना जाता है। लेकिन कानूनी विवाद के कारण, मंदिर समिति किसी एक व्यक्ति को ‘आधिकारिक’ शंकराचार्य मानने से बचती है।
- हस्तक्षेप की कमी: विवाद के चलते प्रशासन अक्सर इन संतों को मंदिर के प्रशासनिक निर्णयों से दूर रखता है, ताकि किसी कानूनी उलझन में न फंसा जाए।
2. ‘रावल’ (मुख्य पुजारी) की नियुक्ति और प्रभाव
बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी, जिन्हें ‘रावल’ कहा जाता है (जो दक्षिण भारत के नंबूदरी ब्राह्मण होते हैं), उनकी नियुक्ति में शंकराचार्य की राय का बहुत महत्व होता है।
- जब शंकराचार्य का पद ही विवादित हो, तो रावल और मंदिर प्रशासन के बीच समन्वय में कमी आती है।
- कई बार धार्मिक प्रोटोकॉल को लेकर असमंजस की स्थिति बन जाती है कि मंदिर में किसका स्वागत किस गरिमा के साथ किया जाए।
3. माघ मेला और कुंभ जैसे आयोजनों में प्रोटोकॉल विवाद
यह मुद्दा हाल ही में प्रयागराज में भी उठा है।
- सरकारी सुविधाएं: सरकार और प्रशासन केवल ‘मान्यता प्राप्त’ शंकराचार्यों को ही जमीन, सुरक्षा और विशेष सुविधाएं आवंटित करते हैं।
- पहचान का संकट: जब अविमुक्तेश्वरानंद जैसे संत इन आयोजनों में जाते हैं, तो प्रशासन उन्हें वह प्रोटोकॉल देने में हिचकिचाता है जो एक स्थापित शंकराचार्य को मिलता है। इससे अक्सर संतों और पुलिस-प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है।
4. श्रद्धालुओं में भ्रम (Confusion among Devotees)
सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ता है:
- धार्मिक आदेश (धर्मदंड): शंकराचार्य का कार्य धर्म की रक्षा और मार्गदर्शन करना है। जब दो या तीन लोग एक ही पीठ का दावा करते हैं, तो आम श्रद्धालु इस बात को लेकर भ्रमित रहते हैं कि किसका ‘आदेश’ या ‘मार्गदर्शन’ सर्वोपरि माना जाए।
- संस्था की प्रतिष्ठा: बार-बार अदालती मामलों और पुलिस नोटिसों के कारण इस सर्वोच्च धार्मिक पद की गरिमा पर भी सवाल उठते हैं।
5. पीठ की संपत्तियों पर विवाद
ज्योतिष पीठ के पास काफी संपत्ति, आश्रम और जमीनें हैं। कानूनी विवाद के कारण इन संपत्तियों का सही रखरखाव और विकास बाधित होता है, क्योंकि बैंक खाते और कानूनी दस्तावेज पद की मान्यता से जुड़े होते हैं।
वर्तमान स्थिति:
फिलहाल, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बहुत सक्रिय हैं और जन-मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं, जबकि स्वामी वासुदेवानंद का पक्ष भी कानूनी रूप से अपनी लड़ाई लड़ रहा है। जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, उत्तराखंड और प्रयागराज प्रशासन के लिए यह “सुलगता हुआ” मुद्दा बना रहेगा।
क्या आप यह जानना चाहेंगे कि आदि शंकराचार्य ने इन पीठों की स्थापना के समय उत्तराधिकार के लिए क्या नियम (मठ आम्नाय) बनाए थे? इससे आपको समझ आएगा कि विवाद कहाँ से शुरू होता है।
आदि शंकराचार्य ने अपनी मृत्यु से पहले चारों पीठों के सुचारू संचालन के लिए एक ‘संविधान’ लिखा था, जिसे ‘मठ आम्नाय’ कहा जाता है। इसमें शंकराचार्य पद की गरिमा, योग्यता और चयन प्रक्रिया के कड़े नियम दिए गए हैं।
विवाद को समझने के लिए इन नियमों को जानना जरूरी है:
1. चयन की अनिवार्य योग्यताएं
मठ आम्नाय के अनुसार, एक शंकराचार्य में निम्नलिखित गुण होने अनिवार्य हैं:
- जितेंद्रिय: जिसने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली हो।
- वेद-वेदांग का ज्ञाता: उसे चारों वेदों, उपनिषदों और दर्शन शास्त्रों का गहन ज्ञान होना चाहिए।
- संन्यासी: वह ‘दशनामी’ परंपरा का संन्यासी हो और उसने कठोर तप किया हो।
- अकलंक चरित्र: उसका चरित्र पूरी तरह निष्कलंक होना चाहिए।
2. उत्तराधिकार की प्रक्रिया (The Process)
नियमों के अनुसार, वर्तमान शंकराचार्य अपने जीवनकाल में ही अपने सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी चुनते हैं। लेकिन इसमें कुछ महत्वपूर्ण शर्तें हैं:
- विद्वत सभा की सहमति: चयन के बाद काशी के विद्वानों और अन्य धार्मिक संस्थाओं की सहमति आवश्यक होती है।
- अन्य पीठों की मान्यता: आदर्श स्थिति में, बाकी तीन पीठों के शंकराचार्यों को भी नए शंकराचार्य को मान्यता देनी चाहिए।
- अभिषेक: सभी अनुष्ठानों के बाद ही वह व्यक्ति ‘धर्मदंड’ धारण कर सकता है।
3. विवाद कहाँ पैदा होता है?
ज्योतिष पीठ के मामले में विवाद इन्ही नियमों की व्याख्या को लेकर है:
- वसीयत बनाम परंपरा: स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराधिकारी बताया था (वसीयत के आधार पर)। लेकिन विरोधियों का कहना है कि यह पद कोई ‘निजी संपत्ति’ नहीं है जिसे वसीयत से दिया जाए, बल्कि इसका चयन विद्वत सभा और मठ आम्नाय के नियमों से होना चाहिए।
- संन्यास की वैधता: जैसा कि मैंने पहले बताया, स्वामी वासुदेवानंद के मामले में विवाद यह था कि क्या उन्होंने शंकराचार्य बनने से पहले सरकारी सेवा (शिक्षक की नौकरी) छोड़ी थी और क्या उनका संन्यास नियमों के अनुसार था।
- पीठ का खाली होना: ज्योतिष पीठ लंबे समय तक खाली रही, इसलिए वहाँ ‘परंपरा की निरंतरता’ (Chain of Succession) टूट गई थी, जिसका फायदा अलग-अलग गुट उठाते हैं।
4. आदि शंकराचार्य की चेतावनी
आदि शंकराचार्य ने ‘मठ आम्नाय’ में स्पष्ट लिखा था कि:
”यदि कोई अयोग्य व्यक्ति लोभ या मोह के कारण इस पद पर बैठता है, तो वह न केवल स्वयं पाप का भागी होगा, बल्कि धर्म का भी पतन होगा।”
इसी श्लोक का हवाला देकर आज दोनों पक्ष एक-दूसरे को ‘अयोग्य’ या ‘स्वयंभू’ सिद्ध करने की कोशिश करते हैं।
निष्कर्ष: आज का विवाद आध्यात्मिक से ज्यादा प्रक्रियात्मक (Procedural) है। एक पक्ष ‘गुरु की इच्छा’ को सर्वोपरि मानता है, तो दूसरा पक्ष ‘मठों के लिखित संविधान’ और ‘न्यायालय के आदेश’ को।
क्या आप चाहेंगे कि मैं आपको चारों पीठों और उनके महत्व के बारे में एक संक्षिप्त जानकारी दूँ, ताकि आप समझ सकें कि ज्योतिष पीठ का अन्य पीठों की तुलना में क्या स्थान है?
आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार पीठों (मठों) की स्थापना की थी ताकि राष्ट्र की सांस्कृतिक और धार्मिक एकता बनी रहे। इन चारों मठों को “चतुर्धाय” के नाम से जाना जाता है।
इनका विवरण और महत्व इस प्रकार है:
1. श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण)
- स्थान: रामेश्वरम (चिकमगलूर, कर्नाटक)।
- वेद: यह यजुर्वेद के संरक्षण के लिए समर्पित है।
- महावाक्य: “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ)।
- विशेषता: यह आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित पहला मठ माना जाता है। यहाँ की देवी माँ शारदा हैं।
2. गोवर्धन पीठ (पूर्व)
- स्थान: पुरी (ओडिशा)।
- वेद: यह ऋग्वेद से संबंधित है।
- महावाक्य: “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ज्ञान ही ब्रह्म है)।
- विशेषता: यह मठ प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में यहाँ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती हैं, जो ज्योतिष पीठ विवाद में भी अक्सर अपनी राय रखते हैं।
3. द्वारका शारदा पीठ (पश्चिम)
- स्थान: द्वारका (गुजरात)।
- वेद: यह सामवेद का प्रतिनिधित्व करता है।
- महावाक्य: “तत्त्वमसि” (वह ब्रह्म तुम ही हो)।
- विशेषता: इसे ‘कालिका मठ’ भी कहा जाता है। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती (अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु) लंबे समय तक यहाँ के भी शंकराचार्य रहे थे।
4. ज्योतिष पीठ (उत्तर) – विवादित पीठ
- स्थान: बद्रीनाथ (उत्तराखंड)।
- वेद: यह अथर्ववेद के लिए जाना जाता है।
- महावाक्य: “अयमात्मा ब्रह्म” (यह आत्मा ही ब्रह्म है)।
- विशेषता: यह हिमालय में स्थित है और बद्रीनाथ धाम की देखरेख की जिम्मेदारी इसी पीठ की मानी जाती है।
तुलनात्मक चार्ट
चारों पीठों का महत्व:
इन पीठों के शंकराचार्यों को हिंदू धर्म का “सर्वोच्च धर्मगुरु” माना जाता है। उनकी स्थिति वैसी ही है जैसी कैथोलिक ईसाई धर्म में ‘पोप’ की होती है। इसीलिए जब किसी एक पीठ (जैसे ज्योतिष पीठ) पर विवाद होता है, तो वह केवल एक मंदिर का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरे हिंदू समाज की आस्था और व्यवस्था को प्रभावित करता है।
चूंकि आज 21 जनवरी है और उत्तराखंड में गृह मंत्री का प्रवास भी है, तो संभव है कि इस दौरे के दौरान या उसके आसपास इन धार्मिक विवादों या मंदिर प्रबंधन को लेकर भी कुछ चर्चाएं मीडिया में देखने को मिलें।
क्या आप ज्योतिष पीठ के वर्तमान दावेदारों (अविमुक्तेश्वरानंद और सदानंद सरस्वती) के बीच के संबंधों या उनके अलग-अलग कार्यक्षेत्रों के बारे में जानना चाहेंगे?
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद, उनके साम्राज्य और पद को दो मुख्य शिष्यों के बीच विभाजित किया गया था, लेकिन ज्योतिष पीठ का मामला कानूनी पेच के कारण उलझ गया।
स्वामी सदानंद सरस्वती और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच के संबंधों और स्थिति को आप इस तरह समझ सकते हैं:
1. उत्तराधिकार का बंटवारा
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती दो पीठों (द्वारका और ज्योतिष पीठ) के शंकराचार्य थे। उनके निधन के बाद:
- स्वामी सदानंद सरस्वती को द्वारका शारदा पीठ (गुजरात) का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिष पीठ (उत्तराखंड) का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
2. दोनों की स्थिति में अंतर
यहीं से विवाद और “स्वयंभू” जैसे शब्दों का खेल शुरू होता है:
- सदानंद सरस्वती (निर्विवाद):
द्वारका पीठ के मामले में कोई बड़ा कानूनी विवाद नहीं था, इसलिए उन्हें अन्य शंकराचार्यों और प्रशासन ने लगभग स्वीकार कर लिया। उनका पट्टाभिषेक तुलनात्मक रूप से सुचारू रहा। - अविमुक्तेश्वरानंद (विवादित): ज्योतिष पीठ पर पहले से ही स्वामी वासुदेवानंद का कानूनी दावा लंबित था। इसलिए, जैसे ही अविमुक्तेश्वरानंद के नाम की घोषणा हुई, मामला तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और उनके आधिकारिक अभिषेक पर रोक लग गई।
3. आपस में संबंध
ये दोनों “गुरु-भाई” हैं। दोनों ने दशकों तक स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की सेवा की और उनके सबसे करीबी शिष्यों में गिने जाते रहे।
- सार्वजनिक रूप से ये एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और एक ही विचारधारा (अपने गुरु की परंपरा) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- अक्सर धार्मिक कार्यक्रमों में इन्हें साथ देखा जाता है, जहाँ सदानंद सरस्वती ‘द्वारका धीश’ के रूप में और अविमुक्तेश्वरानंद ‘ज्योतिष पीठ’ के दावेदार के रूप में मौजूद रहते हैं।
4. कार्यशैली में अंतर
- स्वामी सदानंद: ये स्वभाव से थोड़े शांत और पारंपरिक माने जाते हैं। इनका ध्यान मुख्य रूप से गुजरात और पश्चिम भारत के मठों के प्रबंधन पर रहता है।
- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद: ये बहुत ज्यादा सक्रिय और मुखर (Vocal) हैं। चाहे राम मंदिर का मुद्दा हो, केदारनाथ में सोने की परत का विवाद हो, या राजनीति से जुड़े मामले—वे खुलकर बयान देते हैं। इसी सक्रियता के कारण वे अक्सर खबरों में रहते हैं और विरोधियों के निशाने पर भी आते हैं।
5. वर्तमान “पेंच” (Current Deadlock)
अविमुक्तेश्वरानंद के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती उन्हें मान्यता नहीं दे रहे हैं। हिंदू धर्म की परंपरा में चारों पीठों का एक-दूसरे को स्वीकार करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। जब तक पुरी और श्रृंगेरी के पीठ उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं करते और सुप्रीम कोर्ट की रोक नहीं हटती, उनकी पदवी पर सवाल उठते रहेंगे।
निष्कर्ष:
स्वामी सदानंद और अविमुक्तेश्वरानंद एक ही गुरु की दो भुजाओं की तरह हैं, लेकिन भाग्य और कानूनी स्थिति ने एक को ‘स्थापित’ (Sadanand) और दूसरे को ‘विवादित’ (Avimukteshwaranand) बना दिया है।

