सिर्फ पूछताछ को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती, सुको का महत्वपूर्ण निर्णय
Supreme Court Big Decision Police Cannot Arrest Solely For Interrogation Know The Bnss Rules
Supreme Court on Police Arrest: सिर्फ पूछताछ के लिए पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सात वर्ष से कम कारावास की सजा वाले अपराधों के मामलों में आरोपी को गिरफ्तार करने के बजाय धारा 35(3) का नोटिस दिया जाना चाहिए। पीठ ने पुलिस को कहा है कि गिरफ्तारी से पहले खुद से पूछें कि क्या यह जरूरी है?
नई दिल्ली 06 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। यह देखते हुए कि किसी पुलिस अधिकारी के लिए ऐसा करना वैध है, मात्र इसलिए गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।जांच एजेंसी को किसी आरोपी को पूछताछ के लिए हिरासत में नहीं लेना चाहिए और ऐसा तभी किया जाना चाहिए जब जांच के लिए यह जरूरी हो। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ गिरफ्तारी से जुड़ी भारतीय नागरिक संहिता ( BNSS ), 2023 की कई धाराओं की व्याख्या कर दी है। पूरा मामला समझते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का गिरफ्तारी पर पुलिस को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा-7 साल की जेल के मामलों में नोटिस जरूरी
लाइवा लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता(BNSS), 2023 की विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सात वर्ष तक के कारावास से जुड़े दंडनीय अपराधों के संबंध में किसी आरोपी या संबंधित व्यक्ति को कानून की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना नियम है।
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पुलिस की गिरफ्तारी की शक्ति की सुप्रीम कोर्ट ने कर दी व्याख्या
पीठ ने कहा-BNSS, 2023 की धारा 35(6) को धारा 35(1)(ख) के साथ मिलाकर दी गई गिरफ्तारी की शक्ति को पुलिस अधिकारी की व्यक्तिपरक सुविधा के बजाय एक सख्त वस्तुनिष्ठ आवश्यकता के रूप में समझा जाना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं है कि पुलिस अधिकारी केवल पूछताछ के लिए गिरफ्तार कर सकता है।
बल्कि, इसका अर्थ यह है कि पुलिस अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि 7 वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध के संबंध में जांच संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लिए बिना प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ सकती। इसके विपरीत कोई भी व्याख्या BNSS की धारा 35(1)(ख) और धारा 35(3) से 35(6) के उद्देश्य और विधायी आशय को स्पष्ट रूप से विफल कर देगी।
गिरफ्तारी के लिए लिखित में कारण होने जरूरी
सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है और केवल गिरफ्तारी के कारणों को दर्ज करके इसे टाला नहीं जा सकता। पीठ ने कहा-यह कहना पर्याप्त है कि गिरफ्तारी के बिना भी जांच जारी रह सकती है। गिरफ्तारी की वजहों को लिखित में होना चाहिए।
संज्ञेय अपराध के घटित होने के संबंध में अपनी राय बनाने के उद्देश्य से साक्ष्य जुटाते समय, एक पुलिस अधिकारी को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है। यह सुरक्षा उपाय इसलिए प्रदान किया गया है क्योंकि किसी भी स्थिति में, किसी आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति हमेशा एक पुलिस अधिकारी के पास उपलब्ध होती है। भले ही उसने पहले के चरण में ऐसा न करने के अपने लिखित कारण दर्ज कर लिए हों।
पुलिस अफसर खुद से पूछे कि क्या गिरफ्तारी जरूरी
पीठ ने कहा-हमारे द्वारा दी गई व्याख्या के आधार पर हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि पुलिस अधिकारी की ओर से गिरफ्तारी केवल एक वैधानिक विवेकाधिकार है जो उसे साक्ष्य एकत्र करने के रूप में उचित जांच करने में सुविधा प्रदान करता है। इसलिए इसे अनिवार्य नहीं माना जाएगा।
नतीजतन पुलिस अधिकारी को उक्त कार्रवाई करने से पहले खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं।…भले ही बीएनएसएस, 2023 की धारा 35 (1) (ख) के तहत उल्लिखित शर्तों के अनुसार किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी को उचित ठहराने वाली परिस्थितियां उपलब्ध हों, गिरफ्तारी तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि यह बिल्कुल आवश्यक न हो।
कब और कौन करता है गिरफ्तारी? जानिए कब और कौन करता है गिरफ्तारी?
किसी भी मुजरिम की गिरफ्तारी से ही कोई भी क्रिमिनल केस में कार्यवाही को आगे बढ़ाया जा सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(1) (2) के अंतर्गत यह बताया गया है की गिरफ्तारी किस समय की जा सकती है। इस धारा के अंतर्गत किसी पुलिस अधिकारी को बगैर वारंट के गिरफ्तार करने संबंधी अधिकार दिए गए है। इस धारा के अंतर्गत पुलिस अधिकारी बिना किसी प्राधिकृत मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना व्यक्तियों को गिरफ्तार कर सकता है।
इस धारा के अंतर्गत कुछ कारण दिए गए हैं कुछ शर्ते रखी गई हैं जिन कारणों के विद्यमान होने पर पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी कर सकता है वह भी किसी प्राधिकृत मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना और कोई प्राधिकृत मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए वारंट के बिना ऐसी गिरफ्तारी कर सकता है। पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में यदि गिरफ्तार होने वाला व्यक्ति कोई संज्ञेय अपराध करता है तो पुलिस अधिकारी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है।
पुलिस अधिकारी ऐसे व्यक्ति को भी गिरफ्तार कर सकता है जिसके विरुद्ध कोई परिवाद मिला है और विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली है। उस व्यक्ति द्वारा कोई ऐसा अपराध कारित किए जाने की जानकारी है जिस अपराध में 7 वर्ष से कम का कारावास है तो पुलिस अधिकारी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। पुलिस अधिकारी को परिवाद की जानकारी पर संदेह होता है तो वह संदेह के आधार पर ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी कर सकता है। पुलिस अधिकारी को यह समाधान हो गया है कि ऐसी गिरफ्तारी किसी दूसरे अपराध को करने से निवारित करने के लिए है।
पुलिस अधिकारी को यह विश्वास होता है कि अपराध के समुचित अन्वेषण के लिए ऐसी गिरफ्तारी नितांत आवश्यक है। पुलिस अधिकारी को या विश्वास होता है कि यदि ऐसी गिरफ्तारी नहीं की गई तो साक्ष्य से छेड़छाड़ हो जाएगी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 35 के अंतर्गत पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी करने संबंधी अभूतपूर्व शक्तियां दी गई हैं। गिरफ्तारी के संबंध में ऐसी कोई भी रोक नहीं लगायी गयी है जिस पर पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी करने में कोई भी परेशानी हो। पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी करने संबंधी सारी छूट दे दी गई है। जंगी सिंह वर्सेस सम्राट के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह भी मत प्रकट किया कि धारा में प्रयुक्त पुलिस अधिकारी शब्द से आशय पुलिस विभाग के किसी भी कर्मचारी से है जिसमे सिपाही से लेकर सर्वोच्च अधिकारी तक सम्मलित है। एक सिपाही भी गिरफ्तारी कर सकता है वह भी पुलिस अधिकारी शब्द के दायरे में आता है।
लेकिन गिरफ्तारी से दैहिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है अतः गिरफ्तारी सदैव विधि द्वारा स्थापित सम्यक प्रक्रिया के अनुसार ही की जानी चाहिए। मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी बीएनएसएस की धारा 41 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को गिरफ्तार करने संबंधी शक्तियां दी गई हैं इन शक्तियों के अधीन कोई भी मजिस्ट्रेट गिरफ्तारी कर सकता है। धारा 41 में वर्णित उपबंध के अधीन कार्यपालक मजिस्ट्रेट तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट को गिरफ्तारी करने के लिए विशेष रूप से अधिकृत किया गया है। धारा 41 के अनुसार मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराधी को स्वयं गिरफ्तार कर सकते हैं या किसी अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार करने का निर्देश दे सकते है बशर्ते कि उक्त अपराधी ने अपराध उसकी उपस्थिति में उसकी स्थानीय अधिकारिता के अंतर्गत किया हो। इस धारा के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को गिरफ्तार करने के लिए अपराध के स्थान पर उपस्थित होने की बाध्यता नहीं है। क्योंकि धारा का अगला ही वाक्य मजिस्ट्रेट को यह भी शक्ति दे रहा है कि यदि कोई अपराध उसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर होता है तो भी वह गिरफ्तारी करने के लिए प्राधिकृत होगा। मजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति को भी गिरफ्तार कर सकेंगे या गिरफ्तार करने का निर्देश दे सकेंगे जिसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी करने के लिए अधिकृत है। उल्लेखनीय की इस धारा के अंतर्गत की जाने वाली गिरफ्तारी की कार्रवाई प्रशासकीय तथा न्यायिक कार्य है। शैलजा नंद पांडे बनाम सुरेश चंद्र गुप्ता के मामले में यह कहा गया है कि किसी कानूनी कार्यवाही के लंबित रहने की दशा में गिरफ्तारी की शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। शक्ति का प्रयोग करने के लिए पुलिस द्वारा प्रारंभ में की गई गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है। बाद में मजिस्ट्रेट के संज्ञान में कोई मामला जाता है तो भी वह गिरफ्तारी कर सकता है। गिरफ्तारी में मजिस्ट्रेट की स्थानीय अधिकारिता का महत्व है। मजिस्ट्रेट उसी स्थानीय अधिकारिता में गिरफ्तारी कर सकता है जो उसका क्षेत्राधिकार है। क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर की गई गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी। संहिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय के आदेश से सत्र न्यायाधीश द्वारा क्षेत्राधिकार प्रदान किया जाता है तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अपने से अधीन मजिस्ट्रेट को क्षेत्राधिकार प्रदान कर देता है। अमूमन नगर, कस्बों और ग्रामीण के थाना क्षेत्रों के कोर्ट जिला एवं सत्र न्यायालय के भीतर होते है। इन थाना क्षेत्रों के अलग अलग पीठासीन अधिकारी होते है। यही पीठासीन अधिकारी मजिस्ट्रेट होते हैं। कोई भी मजिस्ट्रेट गिरफ्तारी तभी कर सकता है जब अपराध उसको दिए गए थाना क्षेत्र के अंतर्गत किया जाता है। प्राइवेट व्यक्ति द्वारा गिरफ्तारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में केवल मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को ही गिरफ्तार करने संबंधी शक्तियां नहीं दी गई है अपितु मजिस्ट्रेट एवं पुलिस से अलग हटकर कोई अन्य व्यक्ति भी गिरफ्तारी कर सकता है। अन्य व्यक्ति गिरफ्तारी करता है तो प्राइवेट व्यक्ति द्वारा गिरफ्तारी कहा जाता है जिसका उल्लेख बीएनएसएस की धारा 40 के अंतर्गत किया गया है। धारा 40 के अंतर्गत प्राइवेट व्यक्ति द्वारा की जाने वाली गिरफ्तारी एवं अपनायी जाने वाली प्रक्रिया के बारे में उपबंध किए गए है। इस धारा में वर्णित उपबंध के अनुसार कोई भी प्राइवेट व्यक्ति अर्थात जो ना तो मजिस्ट्रेट है और ना ही पुलिस अधिकारी है किसी ऐसे व्यक्ति को जो उस की उपस्थिति में संज्ञेय और अजमानतीय अपराध करता है को गिरफ्तार कर सकता है तथा ऐसी गिरफ्तारी के पश्चात वह अविलंब ऐसे व्यक्ति को पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के समक्ष पेश करेगा। इस धारा के अधीन कोई भी प्रायवेट व्यक्ति केवल ऐसे व्यक्ति को ही गिरफ्तार कर सकेगा जिसने कोई संज्ञेय अजमानतीय अपराध किया हो। कोई भी प्राइवेट व्यक्ति किसी व्यक्ति को केवल सूचना मात्र के आधार पर गिरफ्तार नहीं कर सकता यदि उसने सूचना मात्र के आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है तो ऐसी गिरफ्तारी पूर्णतः अवैध और दोषपूर्ण होगी। अपराध गिरफ्तार करने वाले व्यक्ति के सामने घटित होना चाहिए उस समय वह व्यक्ति उस स्थान पर उपस्थित होना चाहिए। गोरी प्रसाद बनाम चार्टर्ड बैंक आफ इंडिया का एक वाद है। इस वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि आवश्यक नहीं है कि गिरफ्तार करने वाला पहला व्यक्ति संज्ञेय तथा अजमानतीय होते समय भौतिक रूप से घटनास्थल पर उपस्थित हो। यदि उसके समक्ष ऐसा अपराध किया जाता है तो ऐसे अपराधी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा भी गिरफ्तार करवा सकता है अर्थात ऐसा व्यक्ति सूचना देकर किसी अन्य व्यक्ति से गिरफ्तार करवा सकता है। बजिंदर सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य 2012 का एक महत्वपूर्ण मामला है। इस वाद में अभियुक्त के विरुद्ध आरोप था कि वह मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश हेतु व्यवासिक परीक्षा मंडल द्वारा आयोजित प्री मेडिकल एंट्रेंस में किसी अन्य की जगह उसका प्रतिरूपण करते हुए परीक्षा दे रहा था। उसे व्यवासिक परीक्षा मंडल के परीक्षा हाल में ड्यूटी कर रहे वीक्षक ने प्रतिरूपण करते हुए पकड़ा था। उसका कहना था कि वह वही परीक्षार्थी है जिसके नाम से परीक्षा दे रहा था उसके द्वारा कोई अपराध नहीं किया गया है। आरोपी का फोटो विधि विज्ञान प्रयोगशाला परीक्षण हेतु भेजा गया। इस जांच के दौरान अभियुक्त को मेडिकल कॉलेज में कक्षा में उपस्थित रहने की अस्थाई अनुमति इस शर्त के साथ दी गई कि यदि वह प्रतिरूपण के अपराध का दोषी पाया गया तो उसे कक्षा में हाजिरी की पात्रता नहीं होगी और उसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही की जाएगी। फॉरेंसिक परीक्षण में विलंब को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में तीन लोगों की एक समिति बना दी जिसमें एक प्रोफेसर एनाटॉमी का होना आवश्यक था तथा समिति की रिपोर्ट को अनुमति दी गयी। इस मामले में प्राइवेट व्यक्ति द्वारा गिरफ्तारी का महत्वपूर्ण रोल है क्योंकि गिरफ्तार करने वाला वीक्षक ना तो मजिस्ट्रेट और ना ही पुलिस अफसर था। गिरफ्तार करने के बाद शिक्षक द्वारा अभियुक्तों को पुलिस के हवाले कर दिया गया। इस धारा का प्रावधान यही है कि यदि कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी को गिरफ्तार करता है तो उसमें केवल दो शर्त महत्वपूर्ण है। पहली शर्त यह है कि ऐसा प्राइवेट व्यक्ति केवल संज्ञेय अजमानतीय अपराध की दशा में ऐसी गिरफ्तारी कर सकता है। दूसरी शर्त यह है कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद निकटतम पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के समक्ष गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को सौंपा जाए। यदि गिरफ्तारी धारा 35 के उपबंध के अंतर्गत आती है तो पुलिस अधिकारी फिर से गिरफ्तारी करता है। Tags PoliceArrestPolice ArrestCourtBNSBNSSNew Criminal Law
