A toZ : बिना स्नान अविमुक्तेश्वरानंद का भारी मन से लौटना: किसके हाथ क्या लगा?

अव‍िमुक्‍तेश्‍वरानंद का माघ मेले से ब‍िना स्‍नान किए लौट जाना, धर्म के अखाड़े में क‍िसे क्‍या मिला?
प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच टकराव गहराने के बाद उन्होंने बिना स्नान किए मेला छोड़ दिया. पुलिस कार्रवाई, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बीच यह मामला प्रशासनिक, धार्मिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, जो अब न्यायिक स्तर तक पहुंच चुका है।
प्रयागराज माघ मेले से वाराणसी के श्रीविद्या मठ लौटे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती.
नई दिल्ली,29 जनवरी 2026,स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती प्रयागराज छोड़कर काशी पहुंच चुके . स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में स्नान को प्रयागराज पहुंचे थे.  पुलिस और प्रशासन से विवाद और उत्तर प्रदेश सरकार के साथ आरोप-प्रत्यारोप के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 11 दिन धरने पर बैठे । स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 28 जनवरी को घोषणा की कि माघ मेले में स्नान नहीं करेंगे, और दुखी मन से मेले से जाना पड़ रहा है. रात साढ़े नौ बजे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वाराणसी के केदारघाट श्रीविद्या मठ पहुंच गए. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के माघ मेला छोड़कर जाते ही शिष्यों ने भी शिविर खाली कर दिया. माघ मेला स्नान जा रहे अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी पुलिस ने 18 जनवरी को रोक दी थी. विरोध में अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों और पुलिस में धक्का-मुक्की हुई. पुलिस पर शिखा पकड़कर घसीटने का आरोप भी लगा.

जाने से पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज प्रशासन पर आरोप लगाया कि सरकारी सुविधाओं से उन्हे संतुष्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन मेले में मारपीट और बाकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

अव‍िमुक्‍तेश्‍वरानंद का भारी मन से लौटना

माघ मेले से निकलते भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया, ‘कल मुझे माघ मेला प्रशासन से एक पत्र और प्रस्ताव भेजा गया… कहा गया, मुझे पूरे सम्मान के साथ पालकी से संगम ले जाकर स्नान कराया जाएगा… मुझ पर फूल बरसाए जाएंगे, लेकिन मैंने प्रस्ताव ठुकरा दिया… जब दिल में दुख और गुस्सा हो, तो पवित्र पानी भी शांति नहीं दे पाता.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने राजनीतिक बयान दिया, ‘आज मन इतना व्यथित है कि हम बिना स्नान किए ही विदा ले रहे हैं… इस दुख की भरपाई को पता नहीं कौन सा नेता आएगा कौन सी पार्टी आएगी जो करेगी… प्रयागराज हमेशा से आस्था और शांति की धरती रही है… श्रद्धा से यहां आया था, लेकिन एक ऐसी घटना हो गई, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी.’

योगी आद‍ित्‍यनाथ ने महत्व नहीं दिया

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है, उनके जीवन में पहले भी कई दुख हुए हैं. लेकिन मौजूदा स्थिति, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासन में सनातनधर्मियों को चोट पहुंची है, उनको सबसे ज्यादा कष्ट दे रही है. नाम लेकर तो नहीं, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनको कालनेमि संज्ञा दी, और आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने उनका बयान एनडोर्स भी किया है.

माघ मेले में इस विवाद बीच उत्तर प्रदेश के दो अफसरों के त्यागपत्र भी चर्चित हुए . बरेली के एसडीएम अलंकार  अग्निहोत्री ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के सपोर्ट में, तो अयोध्या में जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने विरोध में त्यागपत्र की घोषणा कर डाली.

प्रशांत सिंह के त्यागपत्र को लेकर अपडेट है कि अब तक उनका त्यागपत्र न तो शासन पहुंचा है, और न ही राज्य कर आयुक्त कार्यालय में कोई आधिकारिक पुष्टि . याद दिला दें कि प्रशांत सिंह के भाई ने भी उन पर गंभीर आरोप लगाया है.

विवाद के बाद प्रयागराज प्रशासन की तरफ से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस देकर उनके शंकराचार्य होने पर जवाब मांगा गया था. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने वकील के माध्यम से नोटिस का जवाब दिया .

एक धार्मिक कार्यक्रम में पहुंचे योगी आदित्यनाथ ने बगैर किसी का नाम लिए कहा था, ऐसे तमाम कालनेमि होंगे जो धर्म की आड़ में सनातन धर्म कमज़ोर करने की षड्यंत्र रच रहे होंगे… हमें उनसे सावधान होना होगा… हमें उनसे सतर्क रहना होगा.

पौराणिक मान्यता के अनुसार, कालनेमि एक असुर था. रामायण में इस मायावी राक्षस का जिक्र आता है, जो रावण का भाई था. योगी आदित्यनाथ के बयान पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की भी प्रतिक्रिया आई थी. उनका कहना था, मुख्यमंत्री को अपने प्रदेश की खुशहाली के बारे में चर्चा करना चाहिए… धर्म-अधर्म की बात धर्माचार्यों पर छोड़ देना चाहिए.

थोड़े कठोर शब्दों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा था, ‘एक राजनेता जो मुख्यमंत्री है, वह शिक्षा की बात नहीं करता, स्वास्थ्य की बात नहीं करता, लॉ एंड ऑर्डर की बात नहीं करता, प्रदेश की खुशहाली की बात नहीं करता… वो कालनेमि और धर्म-अधर्म के बारे में बात करता है. यह कहां तक उचित है?’

व‍िपक्ष को अवसर का लाभ तो मिला ही

सत्ता पक्ष से टकराव स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के लिए कोई नई बात नहीं है. वाराणसी में पुलिस के लाठियां बरसाने की दस साल पुरानी घटना गवाह है. यह तब की बात है जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. और, अब जबकि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ हैं, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उसी छोर पर खड़े हैं.

विवाद में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का पूरा समर्थन मिला. भाजपा करीब-करीब खामोश है, और संघ सपोर्ट में नजर आ रहा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडेय माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने गए. समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता संदीप यादव भी लगातार समर्थन में रहे.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के साथ प्रयागराज के सांसद उज्ज्वल रमण सिंह और उनके पिता रेवती रमण भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से मिल चुके हैं. कांग्रेस से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में लगातार बयान आये.

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सोशल साइट एक्स पर लिखा है, संतों का मन दुखी करके कोई सुख नहीं पा सकता… भूल करने से बड़ी गलती, क्षमा न मांगना है. कोई भी राजनीतिक पद, संतों के मान से बड़ा नहीं हो सकता… भाजपा सनातन की भी सगी नहीं है… आज हर सनातनी मन से बेहद दुखी है.

अपनी पोस्ट के आखिर में अखिलेश यादव लिखते हैं, आहत संत अर्थात सत्ता का अंत!

2015 में गणेशोत्सव के दौरान वाराणसी में साधु-संत और आयोजन समिति से जुड़े लोग गंगा में ही मूर्ति विसर्जित करने पर अड़े हुए थे. प्रशासन की तरफ से वैकल्पिक कुंड की व्यवस्था की गई थी. साधु-संत जब पीछे नहीं हटे और 24 घंटे से ज्यादा समय तक प्रदर्शन करते रहे, तो पुलिस ने रात में लाठीचार्ज कर दिया. पुलिस की कार्रवाई में घायल होने वालों में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी शामिल थे.

बाद में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा था कि उस प्रकरण के बाद उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी सरकार चली गई. और अब कह रहे हैं, ‘जिन्होंने सनातनी प्रतीकों का अपमान किया है, उन्हें औकात दिखानी होगी.’ वैसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने एक बार कांग्रेस नेता राहुल गांधी को भी हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने की घोषणा की थी.

धर्म और राजनीति का टकराव

माघ मेला 15 फरवरी तक चलेगा. मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी के बाद अभी दो विशेष स्नान बचे हैं. 1 फरवरी को माघी पूर्णिमा, और 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का स्नान. लेकिन, बगैर कोई स्नान किए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शिविर छोड़ दिया है.

राजनीति की तरह शंकराचार्य विवाद पर संत समाज भी दो हिस्सों में बंट गया. जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने सरकार के स्टैंड का समर्थन किया, जबकि द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का समर्थन किया.

विश्व हिंदू परिषद का भी मानना है कि माघ मेले में ऐसा विवाद नहीं होना चाहिए था, नियम और कानून सभी को बराबर हैं. अगर पालकी पर बैठकर संगम तक जाने पर पाबंदी है, तो शंकराचार्य को उसका पालन करना चाहिए था. लेकिन, बटुकों की चोटी खींचने और मारपीट की घटना भी निंदनीय है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट भी पहुंच गया . एडवोकेट गौरव द्विवेदी ने 18 जनवरी की घटना को लेकर चीफ जस्टिस को लेटर-पिटिशन भेजी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लेटर-पिटीशन भेजकर मौनी अमावस्या घटना की सीबीआई जांच कराने के साथ ही प्रयागराज कमिश्नर, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर और मेला अधिकारी को सस्पेंड आदेश का निवेदन किया  है. पत्र-याचिका में बाल बटुकों की पिटाई करने को जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर मुकदमा करने की भी मांग की गई है.

अविमुक्तेश्वरानंद एपिसोड ने संघ-भाजपा को कैसे एक पीठ के रूप में स्थापित कर दिया
माघ मेले में पालकी पर जाने से रोके गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का धरना पर तबीयत भी बिगड़ गई और विवाद भी नहीं थमा. असल में, वो धर्म और राजनीति के घालमेल के शिकार हैं, और जब तक अपना स्टैंड पर फोकस नहीं करते ये सिलसिला चलता रहेगा.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर योगी आदित्यनाथ के बयान का संघ नेता इंद्रेश कुमार ने भी समर्थन किया है. (Photo: ITG)

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर योगी आदित्यनाथ के बयान का संघ नेता इंद्रेश कुमार ने भी समर्थन किया है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती विवादों के केंद्र में हैं. पहले भी उनके साथ ऐसा होता रहा है. वाराणसी में पुलिस उन पर लाठियां बरसा चुकी है, और प्रयागराज प्रशासन उनके शंकराचार्य होने का ही सबूत मांग रहा है – और लड़ाई में एक बार फिर वो अकेले पड़ते दिखाई पड़ रहे हैं.

ऐसे दौर में जब राजनीति पर धर्म का खासा प्रभाव महसूस किया जाता है, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती राजनीति के चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं, और संत के वेष में उनको असुरों की संज्ञा दी जाने लगी है – लेकिन, ऐसी बातों के लिए कुछ हद तक वो खुद भी जिम्मेदार लगते हैं.

माघ मेले में दाखिल होने से रोक दिए जाने पर अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठे हैं, और हालत ये है कि उनके धरने को लेकर संत समाज भी बंटा हुआ है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और जगद्गुरु रामभद्राचार्य आमने-सामने आ गए हैं, और एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।

धरने का 5वां दिन, तबीयत बिगड़ी

18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम में स्नान के लिए पहुंचे थे, लेकिन मेला प्रशासन ने पालकी पर सवार होकर जाने से रोक दिया. फिर पुलिस और उनके समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की हुई, वो नाराज होकर धरने पर बैठ गए. धरने के पांचवें दिन अविमुक्तेश्वरानंद की तबीयत बिगड़ी हुई बताई जा रही है. उनके शिष्यों का कहना है कि वो सुबह से ही वैनिटी वैन से बाहर नहीं आए हैं. अंदर लेटे हैं, उन्हें तेज बुखार है. वसंत पंचमी पर भी उन्होंने संगम स्नान भी नहीं किया.

अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि जब तक प्रशासन माफी नहीं मांगता, तब तक वो स्नान नहीं करेंगे. कहते हैं, प्रशासन नोटिस-नोटिस खेल रहा है… अभी मेरा मौनी अमावस्या का स्नान नहीं हुआ है, तो मैं वसंत का स्नान कैसे कर लूं?

बता दें, अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से उनके वकील ने नोटिस का जवाब दे दिया है. 8 पेज के जवाब में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन पर लागू नहीं होता, क्योंकि आदेश जारी होने के दो दिन पहले ही उनका पट्टाभिषेक हो चुका था.

राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे अविमुक्तेश्वरानंद

माघ मेले में पालकी पर सवार होकर जाने से रोके जाने पर विवाद के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से बात की थी. अखिलेश यादव का कहना था, किसी भी साधु-संत का अपमान होगा तो समाजवादी पार्टी उसके विरोध में खड़ा रहेगी – और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तीक्ष्ण प्रतिक्रिया को इतना काफी था.

हरियाणा में एक प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम के दौरान योगी आदित्यनाथ का कहना था, एक योगी के लिए, संन्यासी के लिए, संत के लिए… धर्म और राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता… उसकी निजी संपत्ति कुछ नहीं होती, धर्म और राष्ट्र ही उसका स्वाभिमान है… ऐसे कई कालनेमि होंगे जो धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे होंगे… हमें उनसे सावधान और सतर्क रहना होगा.

अविमुक्तेश्वरानंद ने भी योगी आदित्यनाथ के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. कहा है, कालनेमि का मतलब है कि जो नहीं है, वो बनकर दिखाए… जब आप राजनेता हो, मुख्यमंत्री बने हो, तो अपने आप को धर्माचार्य क्यों दिखा रहे हो? कालनेमि तो वही सिद्ध होते हैं… कोई व्यक्ति एक समय एक ही चीज हो सकता है, दो चीजें तो नहीं हो सकतीं. कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री और धर्माचार्य तो नहीं हो सकता है.

मामला ये है कि अखिलेश यादव की सहानुभूति लेकर, अविमुक्तेश्वरानंद ने भाजपा और योगी आदित्यनाथ से बैर मोल लिया – और एक झटके में संघ के निशाने पर भी आ गए हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सीनियर नेता इंद्रेश कुमार भी बगैर नाम लिए, योगी आदित्यनाथ की बात को एनडोर्स कर रहे हैं, ‘जहां देवताओं और मानवता का वास रहता हो, वहां शैतान और राक्षसी ताकतें ज्यादा देर चलती नहीं हैं.’

इंद्रेश कुमार इशारों इशारों में ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि मेले के दौरान किसी ने शरारत करने का प्रयास किया था, लेकिन उसका फल नहीं मिला. इंद्रेश कुमार का कहना है, माघ मेला पूरे देश में मनाया जाता है, कोई तीर्थ नहीं है, जहां माघ मेला न लगता हो. बड़े धूमधाम से मनाया जाता है.

अविमुक्तेश्वरानंद के दुर्व्यवहार के आरोपों को भी इंद्रेश कुमार खारिज कर देते हैं. अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर वो पूछते हैं, कौन सा दुर्व्यवहार हुआ है… कुछ लोग कहते हैं कि सरकार और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होना उनके स्वभाव में आ गया है… मैं तो प्रभु से यही प्रार्थना करूंगा कि कोई भी हो, कहीं भी हो… सबको शांति और सद्भाव से रहने की आजादी दें.

ये धर्म और राजनीति के घालमेल का रिजल्ट है

अविमुक्तेश्वरानंद, शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं. स्वरूपानंद सरस्वती भी अपने राजनीतिक बयानों की वजह से विवादों में रहा करते थे. और, अविमुक्तेश्वरानंद भी मौजूदा राजनीति में धीरे धीरे पक्षकार बनते जा रहे हैं. कोई भी हो, जाहिर है, एक पक्ष का होने पर उसे दूसरे पक्ष के निशाने पर तो स्वाभाविक रूप से आना ही होगा.

एक जमाने में शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के बयानों में कांग्रेस के प्रति सहानुभूति का भाव महसूस किया जाता था, लेकिन अविमुक्तेश्वरानंद तो राहुल गांधी के हिंदुत्व पर भी सवाल उठा चुके हैं. और अब योगी आदित्यनाथ को भी कठघरे में खड़ा कर दे रहे हैं.

“>मुश्किल तो ये है कि अविमुक्तेश्वरानंद को न धर्म का सपोर्ट मिल पा रहा है, न मजबूत राजनीतिक समर्थन – और जो भी विवाद हो रहा है, उसमें अपने बयानों की वजह से भी वो टार्गेट बन जाते हैं. आदि शंकराचार्य ने हिंदुत्व की रक्षा को पीठों की स्थापना की थी -और अविमुक्तेश्वरानंद हैं कि उन्होंने संघ-भाजपा को भी एक अलग पीठ के रूप में स्थापित कर दिया

Prayagraj Magh Mela Controversy Who Are Four Shankaracharyas And Why Is There An Uproar Over Swami Avimukteshwaranand
प्रयागराज माघ मेला विवाद: कौन हैं चार शंकराचार्य, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर क्यों मचा बवाल
प्रयागराज माघ मेला में मचे बवाल के बाद राजनीति भी खूब चली। लोग बंट गए । कुछ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष में तो कुछ इनको शंकराचार्य ही नहीं मान रहे ।
माघ मेला प्रयागराज में 18 जनवरी को मौनी अमावस्या स्नान पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को डोली समेत स्नान न करने देने पर बवाल मच गया । आरोप है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थकों को पुलिस ने जमकर पीटा। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गए। बवाल के बीच लोगों में सवाल उठे कि देश में कितने मठ हैं और इनके शंकराचार्य कौन हैं?

ज्योतिर्मठ, उत्तराखंड
भारत में चार प्रमुख मठ हैं, जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने देश के चारों दिशाओं में स्थापित की थी। उत्तर भारत के उत्तराखंड के चमोली जिले में ज्योतिर्मठ है। इसके वर्तमान में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती हैं। हालांकि, इनके शंकराचार्य को लेकर विवाद बना हुआ है। अन्य मठों के शंकराचार्य इनको शंकराचार्य नहीं मानते हैं। इनके शंकराचार्य बनने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है। इन्होंने अपने गुरु निधन बाद खुद को शंकराचार्य घोषित कर लिया था।

शारदा मठ, द्वारका, गुजरात
शारदा मठ सबसे प्रमुठ माना गया है। यह मठ गुजरात के द्वारका में है। इसके अलावा कश्मीर के शारदा गांव में एक प्राचीन ज्ञान केंद्र है। साथ ही केरल में श्री नारायण गुरु और कोलकाता रामकृष्ण संबंधित मठ है। यह विद्या की देवी सरस्वती को समर्पित मठ है और आध्यात्मिक शिक्षा व सेवा प्रदान करता हैं। शारदा मठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती हैं।

गोवर्धन मठ, पुरी, ओडिशा
गोवर्धन मठ भारत के ओडिशा राज्य के पुरी में है। यह पूर्व दिशा में स्थित है। यह अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करता है। इसके शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती है।

श्रृंगेरी मठ, कर्नाटक
श्रृंगेरी मठ दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले के तुंगा नदी के किनारे है। इसको श्रृंगेरी शारदा पीठम भी कहते हैं। इसके शंकराचार्य भारती तीर्थ पीठ हैं। इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।
अफसरों ने अविमुक्तेश्वरानंद के आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में उनको शंकराचार्य का प्रोटोकॉल देने का कोई प्रावधान नहीं है। इससे पहले भी उन्हें माघ मेले में कभी भी शंकराचार्य सुविधा नहीं दी गई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु यानी ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य रहे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उनको कभी भी अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद खुद ही अविमुक्तेश्वरानंद ने शंकराचार्य घोषित कर लिया। इसको लेकर विवाद है।

2025 महाकुंभ में एक साथ तीन शंकराचार्यों ने किया था स्नान
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती और शृंगेरी मठ के शंकराचार्य श्री विधुशेखर भारती ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ महाकुंभ मेला 2025 के दौरान साथ में डुबकी लगाई थी। पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने भी मेले में आए थे, लेकिन वह शंकराचार्यों के साथ स्नान के लिए नहीं गए थे।

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