कम कार्यरत जन,ज्‍यादा पेंशन,मुफ्त की रेवडियां पडेंगी मंहगी, शीर्ष अर्थशास्त्री सान्याल ने दिया फ्रांस का उदाहरण

Top Economist Sanjeev Sanyal Warns Of High Pensions Working Population To Shrink Will India Become Like France
घट जायेगी काम करने वाली जनसंख्या, ज्‍यादा पेंशन और मुफ्त की रेवडियों पर शीर्ष अर्थशास्त्री सान्याल ने चेताया, फ्रांस का दिया उदाहरण?
अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने मुफ्त की रेवड़ियों और अत्यधिक पेंशन योजनाओं के खिलाफ आगाह किया है। उन्होंने कहा कि ये लंबे समय में आर्थिक समस्याएं पैदा कर सकती हैं। सान्याल गरीबों के लिए लक्षित मदद का समर्थन करते हैं, लेकिन बिना सोचे-समझे लोकलुभावन योजनाओं की आलोचना की। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों की अधिक पेंशन को भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ बताया।

नई दिल्‍ली: दिग्‍गज अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ संजीव सान्याल ने बिना सोचे-समझे मुफ्त की रेवड़ियों और बहुत ज्‍यादा पेंशन योजनाओं के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर इन्हें ठीक से नहीं संभाला गया तो ये लंबे समय में आर्थिक समस्याएं पैदा कर सकती हैं। एक पॉडकास्ट में स्मिता प्रकाश के साथ सोशल बेनिफिट्स की भूमिका पर बात करते हुए सान्याल ने कहा, ‘मैं हमेशा से मुफ्त की रेवड़ियों को लेकर बहुत असहज रहा हूं। लेकिन, मैं मुफ्त की रेवड़ियों और सुरक्षा जाल (सेफ्टी नेट्स) के बीच अंतर करूंगा। इसलिए, किसी भी जोखिम लेने वाली संस्कृति में कुछ हद तक सुरक्षा जाल की जरूरत होती है क्योंकि कुछ चीजें परिभाषा के अनुसार गलत हो जाती हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘जोखिम लेना सिर्फ अमीरों के लिए नहीं है। छोटी सी दुकान खोलना भी जोखिम भरा होता है।’
Sanjeev Sanyal Warning on Pensions

सान्याल गरीबों के लिए उनके सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए लक्षित मदद का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं गरीबों को ऊपर उठने के लिए सीढ़ी देने के लिए कुछ लाभ पहुंचाने के पक्ष में भी हूं। इसमें भी मुझे कोई समस्या नहीं है।’ उन्होंने माना कि आर्थिक लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचते हैं। ऐसे में कुछ तरह की सहायता जरूरी है। उन्‍होंने कहा, ‘आपको ऊपर चढ़ने के रास्ते बनाने होंगे और कुछ लोगों को ऊपर खींचना होगा। यह ठीक है।’

उदाहरण से समझाया रेवड़ी और सब्‍स‍िडी में फर्क
हालांकि, सान्याल ने बिना सोचे-समझे की जाने वाली लोकलुभावन योजनाओं की आलोचना की। उन्होंने महिलाओं के लिए बसों में मुफ्त यात्रा का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, ‘यह लक्षित नहीं है… चाहे आप अमीर हों या गरीब। एक गरीब आदमी सार्वजनिक परिवहन पर एक महिला जितना ही समर्थन का हकदार है। यह स्पष्ट रूप से मुफ्त की रेवड़ी का मामला है।’ उन्होंने कहा कि आर्थिक वास्तविकताओं के अनुसार सावधानीपूर्वक बनाई गई सब्सिडी को उचित ठहराया जा सकता है। लेकिन, लोकलुभावन उपायों से अनावश्यक वित्तीय बोझ पैदा होने का खतरा है।

सरकारी कर्मचार‍ियों की ज्‍यादा पेंशन पर दी चेतावनी
सान्याल ने यह भी चेतावनी दी कि सरकारी कर्मचारियों के लिए बहुत ज्‍यादा पेंशन भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ डाल सकती है। उन्होंने कहा, ‘आपको इसे लेकर बहुत, बहुत सावधान रहना होगा क्योंकि आप प्रभावी रूप से अगली पीढ़ी के लिए देनदारियां बना रहे हैं… 25 साल बाद… काम करने वाली उम्र की आबादी सिकुड़ जाएगी और आप पिछली पीढ़ी की पेंशन का बोझ इस सिकुड़ती हुई काम करने वाली आबादी पर डाल देंगे और वे इसका भुगतान नहीं कर पाएंगे।’ उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा, ‘आज फ्रांस में काम करने वाले लोगों से ज्‍यादा लोग पेंशन ले रहे हैं। अगर आप इन बातों पर विचार नहीं करेंगे तो एक गंभीर संकट आ जाएगा।’

उन्होंने युवा सिविल सेवकों को अपनी उम्मीदों को प्रबंधित करने की सलाह दी, ‘अपने कामकाजी जीवन के दौरान अगले 35 वर्षों तक आपका टैक्स काटा जाएगा। लेकिन, जब आप इसे लेने के लिए कतार में सबसे ऊपर पहुंचेंगे तो बिल्कुल स्पष्ट रहें कि आपको भुगतान करने के लिए कोई पैसा नहीं होगा।’

बुनियादी ढांचे और विकास के लिए संघर्ष कर रहे राज्यों के बारे में चिंताओं को दूर करते हुए सान्याल ने कहा कि संसाधन उपलब्ध हैं। लेकिन, उनका बुद्धिमानी से इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘राज्यों के लिए अब जो संसाधन उपलब्ध हैं, चाहे वह जीएसटी से उनके हिस्से से हो या अन्य स्रोतों से, या जमीन के मुद्रीकरण (मॉनिटाइजिंग लैंड) जैसे अवसरों से, उनका प्रभावी ढंग से इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

 

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 4 नवंबर, 2024

संजीव सान्याल भारत के पूर्व-पश्चिम विभाजन, सर्वश्रेष्ठ राज्यों और भारत की कार्यप्रणाली पर चर्चा कर रहे हैं।

भारत कैसे काम करता है, इसकी एक झलक

संजीव सान्याल भारत सरकार में सचिव के पद पर कार्यरत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं

NEON शो के इस एपिसोड में संजीव सान्याल भारत की आर्थिक यात्रा और राज्यों में विकास की असमानता पर चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि क्यों कुछ क्षेत्र तेजी से आगे बढ़े जबकि अन्य पिछड़ गए, और इसके लिए वे प्रमुख शहरों की भूमिका और माल ढुलाई समानीकरण नीति जैसी पुरानी नीतियों का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने पूर्वी राज्यों का विकास बाधित किया। वे सरकारों को त्वरित बनाने पर भी बात करते हैं और “रचनात्मक विनाश” पर प्रकाश डालते हैं, जहां दिवालियापन और दिवालिया संहिता जैसी नीतियां संसाधनों को पुराने क्षेत्रों से उभरते उद्योगों की ओर स्थानांतरित करने में मदद करती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धी बनी रहती है।

द नियॉन पॉडकास्ट के सभी अन्य एपिसोड देखें – नियॉन या  इसे यूट्यूब चैनल The Neon Show–YouTube पर देख सकते हैं 

सिद्धार्थ अहलूवालिया

नमस्कार, मैं सिद्धार्थ अहलूवालिया, नियॉन शो का होस्ट। मेरे साथ प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद सदस्य संजीव सान्याल हैं। वे भारत में कई सुधारों को जिम्मेदार व्यक्ति हैं, जिनमें बैंकिंग सुधार भी  हैं। उन्हें अर्थशास्त्री रूप में पसंद किया जाता  हैं। वे भारत के सबसे सम्मानित अर्थशास्त्रियों में से हैं। छह साल पहले एक साल में 10,000 पेटेंट से बढ़कर अब 1 लाख पेटेंट तक पहुंचने का श्रेय उन्हीं को जाता है, यानी भारत में एक साल में 1 लाख पेटेंट।

मैं उनकी लागू की गई प्रक्रियाओं, सुधारों, जिनमें बैंकिंग व्यवस्था में सुधार, और जी20 कार्य योजना शामिल है, जिसने 2022 के कोविड वर्षों में वित्तीय संकट और आपूर्ति श्रृंखला संकट से निपटने में दुनिया को सहारा दिया, पर चर्चा करने को उत्सुक हूं। 

मैं नीतिगत सुधारों और प्रक्रियागत सुधारों जैसे एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर बात करुंगा। एलन मस्क ने हाल ही में कहा कि वे अमेरिका में एक संगठन या सरकारी निकाय स्थापना की कोशिश कर रहे हैं जो सभी विभागों को घटायेगा। आप भारत में पिछले पांच सालों से यही कर रहे हैं। इसके बारे में और विस्तार से बताइए।

संजीव सान्याल

 देखिए, लोग हमेशा बड़े संरचनात्मक सुधार पसंद करते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि इनकी ज़रूरत नहीं है। इन बड़े सुधारों की ज़रूरत है, जैसे कि हमारी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को जीएसटी से बदलना। या हमारी रचनात्मक विनाश प्रणाली को बदलकर उसे दिवालियापन और दिवालिया संहिता से उन्नत करना। या हमारे मुद्रास्फीति प्रबंधन के तरीके को मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण तंत्र से बदलना, इत्यादि। तो ये बड़े संरचनात्मक सुधार हैं जो उस गतिविधि की संरचना बदल देते हैं जिसे आप सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मैं अब वकालत कर रहा हूँ, और अब मैं वैश्विक स्तर पर भी कुछ लोगों को अपनी बात मनवा रहा हूँ, कि हमें जिन सुधारों की ज़रूरत है उनमें से कई संरचना नहीं बदल रहे हैं
मौजूदा ढांचा भी बेहतर बनाया जा सकता है। इसको हमें प्रक्रियागत सुधार करना होगा, यानी जो भी काम हम कर रहे हैं, उसकी प्रक्रिया  बेहतर बहोनी होगी। ज़रा सोचिए, पासपोर्ट बनवाने में कितना समय लगता था? ऐसा नहीं है कि पासपोर्ट पूरी तरह खत्म हो गए हैं, बस पासपोर्ट बनवाने की प्रक्रिया सरल बना दी गयी है। मैंने ऐसा नहीं किया, मैं इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हूँ, इसलिए मैं बस स्पष्ट कर रहा हूँ, लेकिन यह प्रक्रिया सुधार है। मेरा योगदान यह है कि प्रक्रिया सुधार को एक मानक संस्थागत गतिविधि रूप में देखा जाए, यानी यह कोई अपवाद नहीं है, बल्कि सरकारों से नियमित रूप से करणीय काम है।

तो आप  देखते हैं कि किसी भी सरकारी गतिविधि की प्रक्रिया हम कहां सुधार सकते हैं, हम अभी भी वही काम कर रहे हैं, है ना, और हम इसे सुधारते हैं। हो सकता है कोई ऐसा विभाग हो जिसकी उपयोगिता अब समाप्त हो गई हो, क्या हम उसे बंद कर सकते हैं या किसी अन्य विभाग में विलय कर सकते हैं? यानी, सरकार सुव्यवस्थित करना, और यह हर बड़ा संगठन नियमित रूप से करता है। यदि आपने एमबीए किया है, तो संभवतः आपको कंपनियों के नियमित कार्यों के हिस्से के रूप में व्यावसायिक प्रक्रिया पुनर्रचना (बिजनेस प्रोसेस री-इंजीनियरिंग) सिखाई गई होगी। लेकिन सरकारों के लिए इसे करने का कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है…

सिद्धार्थ अहलूवालिया

विश्व स्तर पर…

संजीव सान्याल

वैश्विक स्तर पर,यह केवल भारत की समस्या नहीं है, वैश्विक स्तर पर यूरोपीय संघ में मैं दर्जनों हास्यास्पद प्रक्रियाएं और आवश्यकताएं बता सकता हूं जिनकी आज यूरोपीय देशों को आवश्यकता है, जो उनकी व्यवस्थायें अवरुद्ध कर रही हैं।

अमेरिका में भी यही हो रहा है। आपने एलोन मस्क का जिक्र किया, ट्रंप के चुनाव प्रचार अभियान के वादों में से एक यह भी था कि एलोन मस्क ही इसे साफ करेंगे। लेकिन क्या वे ऐसा कर पाये, यह अलग बात है। लेकिन मैैं बस यह बताना चाहता हूं कि अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि यह एक गंभीर मुद्दा है।

लेकिन भारत में हम कुछ समय से छोटे-छोटे सुधार और उदारीकरण कर रहे हैं, लेकिन ये सब मिलकर बहुत बड़ा प्रभाव डालते हैं। वास्तव में, इनमें से कुछ छोटे सुधार स्वयं में बहुत बड़े हो सकते हैं, इनका प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

उदाहरण को, आपके बैंकिंग सुधार से बैंकिंग प्रणाली में बड़ा बदलाव आया। अब भारतीय बैंकिंग प्रणाली सबसे मजबूत प्रणालियों में से एक मानी जाती है। 

संजीव सान्याल

लेकिन वास्तव में यह प्रक्रिया सुधार नहीं, वास्तव में एक संरचनात्मक सुधार है क्योंकि मूल रूप से, हमने जो किया वह यह था कि हमारे पास एक एनपीए के भारी ढेर वाली बैंकिंग प्रणाली थी. 2017-18 में प्रचलित धारणा यह थी कि चलो एक बैड बैंक बनाते हैं, उन सभी को इस गोदाम में डालते हैं और फिर बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करते हैं और वास्तव में कुछ भी बदले बिना ऋण देना जारी रखते हैं।

यहां हमने वास्तव में एक ढांचागत बदलाव को नये कानून  दिवालियापन और दिवालिया संहिता का इस्तेमाल किया। हमने एस्सार स्टील जैसी बड़ी कंपनियां दिवालिया घोषित की। कोविड में हमने जेट एयरवेज जैसी बड़ी कंपनियों के साथ भी काम किया। हे भगवान, हम एक कंपनी दिवालिया कर रहे हैं, इतनी सारी नौकरियाँ चली जाएँगी।

नहीं, असल में होता ये है कि कोई और वे संपत्तियां खरीद लेता है, क्योंकि वे अच्छी संपत्तियां होती हैं। और वास्तव में, वे अक्सर उन लोगों में से कई को वापस नौकरी पर रख लेते हैं, क्योंकि वे उन कंपनियों को फिर से पटरी पर ला कर नए रोजगार पैदा करते हैं।

तो यह रचनात्मक विनाश की प्रक्रिया है। ऐसा नहीं है कि हमारा एयरलाइन उद्योग खत्म हो गया, क्योंकि जेट एयरवेज उससे पहले ही बंद हो गया था, वास्तव में, जेट एयरवेज खुद कई अन्य कंपनियों ईस्ट वेस्ट, दमानिया, किंगफिशर आदि के दिवालिया होने से लाभान्वित हुआ था। तो जेट एयरवेज में कुछ भी खास नहीं था। वे समय के साथ ही खत्म हो गए, नई कंपनियां उभर आईं, और भविष्य में भी और उभरेंगी। तो यह एक रचनात्मक विनाश है, लेकिन मेरा मानना ​​है कि यह एक ढांचागत सुधार है।

इसने नवाचार, जोखिम लेने और रचनात्मक विनाश के बारे में हमारी सोच बदल दी। यह एक अन्य परिवर्तन से अलग एक समानांतर परिवर्तन है, जिसमें दिवालिया और आर्थिक रूप से अक्षम कंपनियां  बंद होना शामिल था। अब उन कंपनियों की बात करते हैं जो दिवालिया नहीं हुई हैं और विभिन्न कारणों से बंद होना चाहती हैं।

दरअसल, दुनिया भर में बंद होने की इच्छा रखने वाली 80 से 90% कंपनियां दिवालिया नहीं हुई हैं।

या तो मालिक बूढ़ा हो गया है, उसके बच्चे वह व्यवसाय नहीं करना चाहते, वे इसे बंद करना चाहते हैं या उद्योग बदल गया है या कोई बड़ी कंपनी जिसकी एक सहायक कंपनी थी, उसे बंद करना चाहती है, कारण कुछ भी हो सकता है, इसे बंद करने का कोई बिल्कुल सामान्य कारण। फिर भी, कोई भारतीय कंपनी बंद करने में सालों लग जाते थे। श्रम मंत्रालय, कर मंत्रालय,  हर तरह के मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती थी, इसे बंद करने को भी अनुमति लेनी पड़ती थी।  इनके बंद होने पर कोई आपत्ति नहीं । बस प्रक्रिया बहुत जटिल थी।

 आपको जगह-जगह जाकर सभी एनओसी प्राप्त कर कंपनी रजिस्ट्रार को अपने नाम का विज्ञापन करने को मनाना पड़ता था ताकि इसे बंद किया जा सके। विभिन्न चरणों में, भ्रष्टाचार का भी बोलबाला रहा। इसलिए, लगभग एक साल पहले, मई 2023 में, सी-पेस  नया वेब सिस्टम, ऑनलाइन सिस्टम बनाया गया। अगर मैं कोई ऐसा व्यक्ति हूं जो स्वेच्छा से कोई कंपनी बंद कर रहा है, तो याद रखें, यह सब कंपनियों के स्वैच्छिक बंद होने के बारे में है, दिवालिया कंपनियों के बारे में नहीं। इसे बंद करना चाहता हूँ, इससे तंग आ चुका हूँ, मैं बस इसे बंद करना चाहता हूँ। मैं अपना सामान सिस्टम पर अपलोड करता हूँ। सिस्टम क्रमबद्ध काम नहीं करता, पहले यह NOC के लिए क्रम से पूछता था, अब यह समानांतर रूप से पूछता है। अगर 21 दिनों में किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई, किसी भी विभाग ने कोई आपत्ति नहीं जताई, तो स्वतः ही अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी हो जाता है।

जैसा कि मैंने बताया, ये स्वैच्छिक बंद हैं। अधिकतर मामलों में, किसी को कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने अपना बकाया चुका दिया है, अपने कर्मचारियों को वेतन दे दिया है, सब कुछ ठीक है।

इसलिए, एनओसी (NOC) बहुत ही कम बार सामने आती है। ज्यादातर मामलों में, कुछ नहीं होता। फिर सिस्टम खुद ही एक सूची तैयार करता है जिसे कंपनी रजिस्ट्रार को विज्ञापित करना होता है।

कंपनी रजिस्ट्रार का विज्ञापन जारी होगा और कंपनी बंद हो जाती है। अब इसमें सिर्फ 90 दिन लगते हैं, यह दुनिया में सबसे तेज़ तरीकों में से एक है, शायद दुनिया में सबसे तेज़ तरीका है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

  यह कौन सी वेबसाइट है जहाँ लोगों को इसे देखने जाना होगा?

संजीव सान्याल

सी-पेस। इसे गूगल पर खोज सकते हैं। भारत में कंपनी बंद करने के दो तरीके हैं। एक, जैसा मैंने बताया, आईबीसी मार्ग है

इनमें से अधिकतर मामले दिवालिया कंपनियों से संबंधित हैं, हालांकि कुछ स्वैच्छिक कर्मचारी भी वहां जाते हैं। लेकिन ज्यादातर कंपनियां कंपनी कानून में बंद कर दी जाती हैं। और इसके लिए सी-पेस सबसे उपयुक्त जगह है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आप इसे साकार करने को पूरी नीति और मौलिक तंत्र तैयार करते हैं।

संजीव सान्याल

नहीं, सिर्फ मैं ही नहीं।  इन सभी सुधारों में कई लोग शामिल हैं। मैंने पूरी की रूकावटें पता कर समस्या की अवधारणा तैयार की। प्रक्रिया विश्लेषित करते हैं, तो अक्सर पाते हैं कि 80% या 90% समस्या प्रक्रिया के केवल 10% या 20% हिस्से में ही होती है। इसलिए पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से बदलने की ज़रूरत नहीं है। केवल वो हिस्से ठीक करने हैं जहाँ सबसे ज़्यादा देरी हो रही है।  दो-तीन साल पहले, जब मैं वित्त मंत्रालय में था, निर्मलाजी उनकी टीम को एक प्रस्तुति दी, जिसमें कॉरपोरेट मामलों के सचिव या तत्कालीन सचिव भी थे।

जैसा कि जानते हैं, समस्या स्पष्टत: सामने रखी , समस्या कहाँ थी यह स्पष्ट बताया, और फिर कई चरणों में इसका समाधान निकाला गया। तो यहाँ कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के अधिकारियों ने स्वयं इसका हल निकाला और यह प्रणाली काम करती है। तात्पर्य यह है कि इनमें से कई चीजें सुधारी जा सकती हैं। लोग भी ऐसा करने को तैयार हैं, लेकिन इसको प्रक्रियागत सुधारों पर व्यवस्थित सोच चाहिए। ऐसे सैकड़ों काम हैं।  मैं जो करने की कोशिश में हूँ, जरूरी नहीं कि सिर्फ समस्यायें खुद ही हल करना हो, कुछ समस्यायें मैं हल करूँगा, लेकिन वास्तव में प्रक्रिया सुधारों के विचार को संस्थागत रूप देना है।

हर मंत्रालय, हर विभाग, हर स्वायत्त निकाय में सुधार की गुंजाइश है।  अगर किसी सरकारी दफ्तर के सामने लंबी कतार लगी हो, तो किसी को घड़ी लेकर वहाँ खड़े होकर समय नोट करना पड़ता है।  काम में कितना समय लग रहा है?  प्रक्रिया काफी हद तक सरल बना सकते हैं। अक्सर पाएंगे कि लगभग सब कुछ अच्छे से काम करता है, क्योंकि किसी काम का सिर्फ एक 10% हिस्सा छोड़कर, 90% जो अक्सर सबसे कम महत्वपूर्ण चरण होता है, वही पूरा सिस्टम बाधित करता है। मूल रूप से यही समस्या का प्रक्रिया-आधारित समाधान है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

 यहाँ 850 सरकारी विभाग हैं, केंद्रीय सरकार के विभाग।

संजीव सान्याल

नहीं, 850 स्वायत्त निकाय।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

स्वायत्त निकाय। और आप उन अप्रचलित निकाय बंद कर रहे हैं जिनकी आवश्यकता नहीं है।

संजीव सान्याल

जी हां, विभिन्न प्रकार के लगभग 840 स्वायत्त निकाय हैं। मैं मंत्रालयों या विभागों की बात नहीं कर रहा, ये स्वायत्त निकाय हैं। ऐसा नहीं कि ये सभी अप्रासंगिक हैं, कुछ तो स्पष्टत: प्रासंगिक हैं, जैसे सेबीआई या भारतीय रिजर्व बैंक, और बड़ी संख्या में अनुसंधान संस्थान भी।

एक तो इन संस्थानों को बेहतर प्रदर्शन को प्रेरित करना है, यह एक हिस्सा है। लेकिन कई ऐसे संस्थान हैं जो किसी कारणवश किसी समय आवश्यक थे । अब अप्रचलित हो चुके। अब उन्हें बंद करने, कभी-कभी उनका विलय करने आदि के प्रयास होने चाहिए।

इसलिए अब यह विचार करना जरूरी है। अच्छी खबर यह है कि पिछले पांच वर्षों में सरकार ने इस दिशा में प्रयास किए और कई कार्य पूरे भी किए जा चुके । उदाहरण को, पहले रेलवे में सैकड़ों प्रशिक्षण संस्थान थे। यह संख्या घटकर एक तिहाई रह गई, जितनी 10 साल पहले थी। बस एकीकरण हो गया है।

इसी तरह, टैरिफ आयोग था। टैरिफ आयोग ने देश के टैरिफ तय करने में कोई खास भूमिका नहीं निभाई। यह उदारीकरण पूर्व की एक पुरानी संस्था थी जो यूं ही अस्तित्व में रही और धीरे-धीरे भुला दी गई।  फिर अंततः 2022 में इसे बंद कर दिया गया। क्या इससे सीमा शुल्क निर्धारण में वाकई कोई कठिनाई आई है? नहीं।

कम से कम किसी ने इस पर ध्यान तो नहीं दिया। और भी बहुत सी चीजें हैं, यहाँ तक कि लोगों के पास मौजूद चीजों की सूचियों में भी, जो सरकारें कर रही हैं। मैं एक उदाहरण देता हूँ। राष्ट्रीय महत्व के स्मारक। किसी भी देश की तरह, हमारे पास स्मारकों की सूची है जिन्हें हम देश के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित स्मारक मानते हैं। इनमें से कुछ जगहों पर जाएँगे, तो आपको वह नीला बोर्ड दिखेगा, जो मूल रूप से आपको धमकाता है कि आपने उन्हें नुकसान पहुँचाया, तो आपको तरह-तरह की सजाएँ होंगी। किसी भी देश की तरह, हमारे पास भी राष्ट्रीय स्मारक होने चाहिए। सवाल यह है कि उस सूची में क्या-क्या शामिल है? दुर्भाग्य से, स्वतंत्रता बाद से हमने उस सूची पर ध्यान नहीं दिया। हमने जो किया वह यह है कि हमें अंग्रेजों से सूची का बड़ा हिस्सा परंपरा में मिला। हमने रियासतें शामिल की तो उन रियासतों में कुछ राष्ट्रीय महत्व के स्मारक भी शामिल किए। फिर धीरे-धीरे, कुछ न कुछ होता चला गया और कुछ और जुड़ते चले गए। इस तरह अंत में हमारे पास लगभग 3,700 राष्ट्रीय स्मारक हो गए।

किसी ने भी यह नहीं देखा कि वे उचित थे या नहीं। इसलिए आज भी, आजादी के 77 साल बाद भी,  पागलपन की हद तक, कुछ राष्ट्रीय स्मारक हैं। उदाहरण को, औपनिवेशिक काल के कुछ ऐसे, गुमनाम, महत्वहीन अधिकारियों की कब्रें भी, राष्ट्रीय स्मारक मानी जाती हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

यह तो बहुत ही विचित्र है।

संजीव सान्याल

हाँ, उनमें से कुछ तो दूर-दराज भी नहीं हैं। दिल्ली में औपनिवेशिक काल के अधिकारी की कब्र और मूर्ति है, जो 1858 में विद्रोह बाद दिल्ली लूटने और बड़े नरसंहार को जिम्मेदार था। यह प्रतिमा अंग्रेजों ने लगाई थी, क्योंकि वे 1857-58 के महान विद्रोह कुचलने को उनके कृतज्ञ थे। समझ सकते  है कि उन्होंने इसे क्यों राष्ट्रीय स्मारक बनाया। कश्मीरी गेट में उनकी समाधि भी राष्ट्रीय स्मारक मानी जाती है। अब इस कहानी की विचित्रता बताने को, हम स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता के 20 साल बाद, 1960 के दशक में, इस अधिकारी के गृहनगर ने  प्रतिमा भेजने का अनुरोध किया, क्योंकि वे उनकी स्मृति में समारोह कर रहे थे, उनके लिए वे नायक थे। प्रतिमा उत्तरी आयरलैंड भेज दी गई। लेकिन हमने इसे यहाँ सूची से नहीं हटाया।  जिस जगह मूर्ति होती थी, वहां मूर्ति नहीं है, लेकिन दो महीने पहले तक राष्ट्रीय स्मारक बनी हुई थी। उनकी समाधि कश्मीरी गेट मेट्रो स्टॉप के ठीक सामने, कश्मीरी भाषा में है, अभी भी राष्ट्रीय स्मारक है। अब इसे सूची से हटाने पर विचार हो रहा हैं। मैं बस यही बता रहा हूँ कि असलियत क्या है, किसी ने भी राष्ट्रीय स्मारकों की सूची देखी तक नहीं। उसमें कई अजीब बातें हैं। इसी तरह, कुछ दर्जन राष्ट्रीय स्मारक गायब हो गए । हमें नहीं पता कि वे कहाँ हैं। उन्हें 20-30 साल से, या उससे भी ज़्यादा, शायद 50 साल से किसी ने नहीं देखा। इनमें से कुछ स्मारक तो 1970 के दशक से ही हैं, जब संसद में यह विषय उठा कि ये स्मारक कहाँ हैं, एएसआई को भी नहीं पता कि वे कहाँ हैं। तो कम से कम उन्हें सूची से हटा दें और सूची साफ कर दें, शायद इसमें कई अच्छी चीजें, नई चीजें जोड़ी जा सकती हैं। यह कोई ढांचागत सुधार नहीं है। यह एक सतत प्रक्रियात्मक सुधार है, और ऐसा होना चाहिए।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

हम विनाशक शिव पूजते हैं, लेकिन हम उसकी भूमिका नहीं निभाते

संजीव सान्याल

बिल्कुल। तो शिव, संहारक की भूमिका, एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए, आप जानते हैं, इसीलिए मैं कहता रहता हूँ…

सिद्धार्थ अहलूवालिया

यह मामला उठाने के लिए धन्यवाद।

संजीव सान्याल

रचनात्मक विध्वंस एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी जैसी संस्थाएं भी हैं। आपको याद हो 80-90 के दशक का गाना, हम एक समथिंग, क्या था? एक चढ़िया, अनेक चढ़िया, याद है? हममें से कई लोग इसे सुनते बड़े हुए । इससे बहुत चिढ़ते भी थे। यह चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी से आया था। संस्था दशकों से निष्क्रिय है। वह खास जिंगल शायद इसका आखिरी काम था, जिस पर किसी ने ध्यान दिया होगा। यह दो साल पहले तक अस्तित्व में था, आखिरकार इसे एक इकाई में मिलाया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में ऐसी कई इकाइयाँ थीं। अब उन्हें एक बड़ी इकाई में मिला कर एक तरह से उनका पुनर्गठन किया गया है। देश में ऐसे सैकड़ों निकाय हैं। मैंने केंद्र सरकार की बात की थी। हर राज्य सरकार के पास ऐसे निकाय हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

मुझे खुशी है कि आप केंद्र में इस विषय को एक जिम्मेदारी के रूप में ले रहे हैं, लेकिन मैं हैरान हूं कि अगर यह राज्य स्तर तक है, तो हम कितना बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।

संजीव सान्याल

बिल्कुल। उदाहरण को, एक औसत जिला मजिस्ट्रेट को क्या-क्या काम करने होते हैं। जानकर आश्चर्य होगा कि एक औसत जिला मजिस्ट्रेट दर्जनों संस्थानों का अध्यक्ष होता है। वह 18 महीने वहाँ रहेगा, किस्मत अच्छी रही तो दो साल। ज़्यादातर डीएम 18 महीनों को होते हैं। इनमें से ज़्यादातर डीएम ने वास्तव में कभी भी उन कई निकायों में से किसी की भी बैठक की अध्यक्षता नहीं की, या बहुत कम निकायों की अध्यक्षता की, जिनकी उन्हें अध्यक्षता करनी चाहिए। मानवीय रूप से संभव नहीं है। किसी का दोष नहीं है। वह सूची साफ करने की जरूरत है। उन्हे हर चीज का अध्यक्ष बनाने से  समस्या हल नहीं होगी, क्योंकि यह मानवीय रूप से संभव ही नहीं है। हर मंदिर ट्रस्ट, हर सरकारी योजना, केंद्र, राज्य, स्थानीय, हर चीज का अध्यक्ष डीएम । इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं ? वह लगभग 30 वर्ष का युवा या महिला होती है, उसे वास्तव में बैठक करने का मौका भी नहीं मिलता है। ये सारी गतिविधियाँ बेकाबू हो जाती हैं। इन चीज़ों के लिए पैसे होते हैं। इन पर नज़र रखने वाला कोई नहीं है। भले इसके संचालक  अधिकारी ईमानदार हों, फिर भी कोई मार्गदर्शन नहीं है। इस तरह के अनगिनत संगठन और चीजें यूं ही इधर-उधर बिखरी हैं। उन पर ध्यान नहीं  है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

इसलिए पारिस्थितिकी तंत्र या प्रणाली में अराजकता है क्योंकि जो चीजें समाप्त होनी है उन पर ध्यान नहीं है

संजीव सान्याल

 सिस्टम साफ करना और प्रक्रियायें देखना। प्रक्रिया, नौकरशाही,  इसके लिए उसे बहुत हद तक दोषी ठहराया जाता है।उन्हें ठहराया जाना चाहिए, वह खुद भी इनमें से कई चीजों के शिकार हैं

सिद्धार्थ अहलूवालिया

यह कैसे है?

संजीव सान्याल

 मान लीजिए कि आप एक अधिकारी हैं, तो आपको व्यापार सौदों या कई चीजों पर बातचीत करने अधिकारी भेजने होगें, सरकारी अधिकारियों को उचित ही विदेश यात्रा करनी पड़ती है। किसी भी सरकारी अधिकारी से पूछें कि उन्हें बहुत से मानक प्राप्त करने को कितनी बाधायें पार करनी पड़ती हैं

यह आपात स्थिति नहीं है, सामान्य, अच्छी प्रचारित घटना है। मान लीजिए कि छह महीने बाद कोई व्यापारिक वार्ता होगी या हम कोई और वार्ता कर रहे होंगे, या कोई वैश्विक संधि पर हस्ताक्षर कर रहे होंगे। किसी संयुक्त सचिव को जाकर वहां हस्ताक्षर करने होंगे, है ना? या फिर बातचीत करके इसे सुलझा लें। अब छह महीने आगे, हम जानते हैं कि उसे वहाँ जाना ही होगा। अब, प्रक्रियाएँ ऐसी हैं कि जिस दिन उसे उड़ान पकड़नी है, उस दिन दोपहर तक भी उन प्रक्रियाओं में लगना और फॉर्म भरवाना कोई असामान्य बात नहीं है। कल्पना कर सकते हैं कि यह कितना परेशान करता है? और अक्सर उस व्यक्ति के लिए यह काम नहीं किया जाता है। दो लोगों की एक टीम जा रही है, उनमें से एक जाता है, दूसरा व्यक्ति जो शायद दोनों में अधिक जानकार है, उड़ान नही पकड़ पाता है या आखिरी मिनट में उड़ान निरस्त हो जाती है क्योंकि… अब, उस सिस्टम का खाका किसने बनाया?

इस व्यवस्था नियंत्रण में कोई सुधार नहीं हो रहा। मैं सहमत हूँ कि अधिकारियों के विदेश यात्रा और उनके संपर्क में आने वाले लोगों आदि पर कुछ नियंत्रण हो। लेकिन इसका इससे कोई लेना-देना नहीं है। ये बस कुछ निरर्थक अनुमतियों की श्रृंखला है जिनकी बार-बार आवश्यकता पड़ती है और जिनका किसी भी चीज़ से कोई लेना-देना नहीं है। इन्हें समय रहते आसानी से पूरा किया जा सकता है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और यह अभी बदल रहा है?

संजीव सान्याल

जी हाँ। वैसे, हर कदम, मैं इन सब बातों की शिकायत करता हूँ और कुछ पुराने लोग कहते हैं कि तुम्हें दस साल पहले की स्थिति का कोई अंदाजा नहीं है। तो यह बेहतर स्थिति है।

लेकिन इनमें लगातार सुधार करते रहना ज़रूरी है। और जैसे-जैसे हम एक तरफ सुधार कर रहे हैं, वैसे-वैसे किसी न किसी कारण से कहीं और कुछ न कुछ जोड़ भी रहे हैं। तो, हमेशा कुछ न कुछ नई रुकावटें आती ही रहती हैं।

हमें उन बाधाओं पर ध्यान देना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि हम उनसे उत्पन्न बाधाओं का हिसाब रखें। हो सकता है कि ऐसा करना अच्छा हो, लेकिन इसके लागत-लाभ विश्लेषण आवश्यक है। अन्यथा, हर कोई बाधा उत्पन्न कर सकता है। किसी को भी वहां जाकर बाधा दूर करने का अधिकार, दायित्व या कर्तव्य नहीं है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

हम आपके उस शोध पत्र पर चर्चा कर हैं, जिसे आपने हाल ही में प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है “1960 से 2023-2024 तक भारतीय राज्यों का सापेक्षिक आर्थिक प्रदर्शन”। सबसे पहले, शोध पत्र प्रकाशन का उद्देश्य क्या था? इससे क्या बदलाव लाना चाहते हैं?

संजीव सान्याल

जिस शोधपत्र का आप जिक्र कर रहे हैं, वह 1960-61 से लेकर आज तक, यानी 2023-2024 तक, भारतीय राज्यों के सापेक्ष प्रदर्शन पर है। शोधपत्र का उद्देश्य साढ़े छह दशकों की इस लंबी अवधि में दो मापदंडों पर विभिन्न राज्यों का प्रदर्शन दर्शाना था।

पहला है राष्ट्रीय जीडीपी में उनकी हिस्सेदारी, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उनकी हिस्सेदारी और राष्ट्रीय औसत के अनुपात में उनकी प्रति व्यक्ति आय स्तर। इसलिए इसमें से समग्र वृद्धि और निरपेक्ष वृद्धि  हटा दी है और उनके सापेक्ष प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित किया है। ताकि, पता चले कि स्थानीय या यूं कहें कि राज्य स्तस्तरी नीतियां समग्र स्थिति को कैसे प्रभावित करती हैं, क्षेत्रीय असमानताएं क्या हैं, इत्यादि। मैंने सोचा कि सबसे पहले तो, वहाँ का अधिकांश काम डेटा  विश्लेषण नहीं है, जिस पर हम चर्चा भी कर सकते हैं, बल्कि केवल डेटा प्रस्तुत करना है कि ठोस डेटा क्या कहता है।  अलग-अलग लोग इसकी अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और इन आंकड़ों से कुछ चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, है ना? सबसे पहले, हमने 1960 के दशक से आकलन शुरू किया था, तब उत्तर प्रदेश का योगदान 14% था, और आज 60 साल बाद यह लगभग 8% रह गया है।  इस गिरावट का कारण क्या है? मैं अन्य राज्यों की बात भी कर रहा हूँ,  पश्चिम बंगाल, बिहार ने 1960 में भारत के कुल जीडीपी में 10% का योगदान दिया था, जो आज लगभग 5% है।

संजीव सान्याल

 सबसे पहली महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है, वह यह है कि, निश्चित रूप से, 1960 में, हम एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थे, जिसमें कृषि का बहुत अधिक महत्व था। अविभाजित उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था थी, उसके बाद महाराष्ट्र का स्थान था । पश्चिम बंगाल तीसरे नंबर पर था। येें तब की प्रेरक शक्ति थी।  तब भी उत्तर प्रदेश में कानपुर जैसे कुछ उभरते औद्योगिक केंद्र थे, जिसे ‘पूर्व का मैनचेस्टर’ कहा जाता था, इत्यादि। तो यह पूरी तरह से कृषि प्रधान राज्य नहीं था, लेकिन फिर भी, सबसे बड़ा राज्य, सबसे अधिक जनसंख्या, विशाल उपजाऊ भूमि। उस समय उत्तर प्रदेश देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। फिर अगले कुछ दशकों में, यानी 60 और 70 के दशक में, आप स्पष्ट देख सकते हैं कि 2010 तक इसकी हिस्सेदारी लगातार घटती गई।  इसके कारणों पर बहस हो सकती है, लेकिन मैंने इस लेख में इस विषय पर चर्चा नहीं की।

लेकिन ज़ाहिर है, कई चीजें अर्थपूर्ण हैं । उनमें से एक है, वो लंबा दौर जब इसकी छवि अराजक बनी रही, जिससे पर्याप्त निवेश नहीं हुआ। यह न तो नए औद्योगिक केंद्र विकसित कर पाया, न ही कानपुर जैसे मौजूदा केंद्रों को मूल्य श्रृंखला में ऊपर ले जा पाया। इसका दूसरा पहलू भी हाल के आंकड़ों में देख सकते हैं, जब आप इसके विपरीत करने में सफल होते हैं, तो यह कैसे काम करता है। इसलिए यदि कानून व्यवस्था सुधारते हैं, यदि आप नोएडा को औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करना शुरू करते हैं, तो पहली बार उत्तर प्रदेश को पहले स्थिर होते हुए और फिर हाल के वर्षों में जीडीपी में हिस्सेदारी या राष्ट्रीय आय के अनुपात में प्रति व्यक्ति आय में थोड़ी वृद्धि होते  देखते हैं। उत्तर प्रदेश के खराब प्रदर्शन का कोई अंतर्निहित कारण नहीं है। यह दशकों पुरानी स्थानीय नीतियों का नतीजा है जिन्होंने निवेश प्रोत्साहित नहीं किया।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

क्या यह कहना उचित है कि जिन राज्यों ने कृषि को अपनी मुख्य ताकत बनाए रखा, जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, उनमें 60 वर्षों की अवधि में गिरावट देखी गई?

संजीव सान्याल

हाँ, यदि आप निरंतर उच्च विकास चाहते हैं, तो आपको औद्योगीकरण, शहरीकरण और सेवाओं और निर्माण तथा अन्य क्षेत्रों का निर्माण करना होगा । कृषि  विकास, चाहे समय अनुकूल ही क्यों न हो, एक निश्चित गति से ही हो सकता है। ऐसे भी दौर रहे जब कुछ राज्यों ने विशुद्ध कृषि के बल पर कुछ समय को बहुत अच्छा प्रदर्शन किया । पंजाब इसका एक अच्छा उदाहरण है।

1960 के दशक में हरित क्रांति में , और यहाँ तक कि 70 के दशक में भी, इसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। फिर इसमें ठहराव आ गया। मेरे शोधपत्र में इस बात का विस्तार से वर्णन नहीं है कि इसमें ठहराव क्यों आया। लेकिन मैंने जिन चीजों का जिक्र किया उनमें से एक यह भी है कि शायद हमें इस की जांच करनी चाहिए कि क्या यह डच रोग की समस्या से ग्रस्त था या नहीं। डच रोग की समस्या क्या है? डच रोग की समस्या यह है कि मान लीजिए किसी अर्थव्यवस्था का एक क्षेत्र बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, तो होता यह है कि अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्से निश्चिंत हो जाते हैं क्योंकि वह क्षेत्र बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। फिर इससे पूरी व्यवस्था गड़बड़ाती है। मान लीजिए कि किसी एक क्षेत्र में कोई झटका लगता है, या उस क्षेत्र में विकास सीमा तक पहुँच जाता हैं, तो आप अगले क्षेत्र में नहीं जा पाते,एक तरह से अपनी ही सफलता के कैदी बन जाते हैं। पंजाब उन में से एक प्रतीत होता है जहां वह अपनी ही सफलता का कैदी है, इस मायने में कि यह कृषि में अच्छा प्रदर्शन करता है, 70 के दशक की शुरुआत तक इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है, और फिर यह स्थिर हो जाती है। यह स्थिति इस हद तक बिगड़ी कि आज पंजाब की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से मुश्किल से ही अधिक है। राष्ट्रीय जीडीपी में इसका हिस्सा 70 के दशक के शुरु की ऊंचाई से लगातार घट रहा है। ऐसा क्यों हुआ? इसका एक पहलू यह है कि हमने पंजाब को हमेशा एक कृषि प्रधान केंद्र देखने की धारणा को जन्म दिया है।  अगर 70 और 80 के दशक की बात करें, तो वहां कुछ औद्योगिक केंद्र विकसित हो रहे थे। लुधियाना में, अगर आप बैडमिंटन खेलते थे, तो आप शटलकॉक खरीदते थे, या फिर बैट और बॉल वगैरह खरीदते थे। वे सभी जालंधर या लुधियाना से आते थे। गुणवत्तापूर्ण खेल सामग्री बनाने को हमारे पास केवल दो ही स्थान थे। लेकिन इससे गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ। आज हम इसका बहुत सारा सामान आयात करते हैं। ये केंद्र कुछ खास विकसित नहीं हुए हैं… आज भी यहाँ खेल के सामान का उद्योग तो है, लेकिन ये बाकी अर्थव्यवस्था के साथ विकसित नहीं हुए। हमने बेंगलुरु में विश्व स्तरीय सॉफ्टवेयर उद्योग खड़ा किया, जो पहले नहीं था। लेकिन पंजाब विश्वस्तरीय खेल सामग्री उद्योग या किसी अन्य प्रकार के उद्योग विकसित करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ा। इसलिए लगता है कि यह नीतियों की विफलता थी। हमने शहरी पंजाब पर ध्यान नहीं दिया। समस्या यह भी है कि पंजाब में जिन लोगों ने अपनी आय बढ़ाई और शिक्षा प्राप्त की, वे पंजाब के शहरों की बजाय, वे वैंकूवर चले गए।  ये सभी बातें परस्पर प्रभावित करती हैं।

मुझे लगता है कि शहरी पंजाब पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसा कि किसी भी चीज़ में होता है, आपको मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ना और ऊपर जाना होता है। हम यह नहीं कह सकते कि हम एक ही जगह अटके हुए हैं, कि हम किसी कारण से एक समय में सफल हुए और फिर वह सफलता अपने आप ही दोहराई जाने लगी।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

अन्य राज्यों की बात करें जिनमें गिरावट आई है, उदाहरण को, पश्चिम बंगाल के बारे में, आपने एक पिछले प्रकरण का उल्लेख किया है जो  वायरल हुआ था, जैसे आकांक्षा की गरीबी

और अब आपके शोधपत्र में इन आंकड़ों से यह स्पष्ट देखा जा सकता है। पश्चिम बंगाल का योगदान पहले 10 प्रतिशत था, जो तीसरा सबसे अधिक था, और अब यह मुश्किल से 5 प्रतिशत रह गया।

संजीव सान्याल

 इसे बहुत स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। पश्चिम बंगाल, वास्तव में 1950 के दशक में जो तीन बड़े राज्य औद्योगिक राज्य थे, वे आश्चर्यजनक रूप से औपनिवेशिक युग के पुराने प्रेसीडेंसी शहर थे।  मुंबई या बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास। इसलिए औद्योगिक केंद्र भी वहीं थे। कोलकाता उन केंद्रों में सबसे बड़ा था।  विभाजन से इसे थोड़ा झटका लगा।

फिर भी, 1950 के दशक में भारत में यह बहुत ही महत्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र था। वहां नई चीजों में निवेश हो रहा था, इत्यादि। कुछ हद तक केंद्रीय स्तर पर खराब नीति निर्माण भी कोलकाता के पतन का कारण बना। इसका जिक्र होना चाहिए। माल ढुलाई समतुल्यीकरण  व्यवस्था थी, जिसका अर्थ था कि कोलकाता झारखंड आदि में सस्ते कच्चे माल के कई स्रोतों के निकट होने का लाभ नहीं उठा सकता था। तो यह भी इसका एक हिस्सा था। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इसका एक बड़ा कारण राज्य की घरेलू नीतियां थीं। उद्यमिता, व्यापार और जोखिम लेने को नकारात्मक रूप से देखा गया।आश्चर्य की बात नहीं है कि 70, 80 और 90 के दशक में व्यापार ने व्यवस्थित रूप से कोलकाता छोड़ दिया, यहां तक ​​कि आज यह राष्ट्रीय स्तर पर भी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाता है। अगर 1950 के दशक में जाएं, तो इसे पूरे एशिया के सबसे बड़े  औद्योगिक क्षेत्रों में माना जाता था। आज भारत में इसे उन क्षेत्रों में से एक नहीं माना जाता। तो… आप जानते हैं, खराब नीतियों का असर पड़ता है।

यही बात अन्य स्थानों पर भी लागू होती है। ठीक बगल के बिहार में भी, सामाजिक न्याय की अतार्किक राजनीति ने अंततः व्यवस्था ठप्प कर दी, जिससे गुंडाराज का पूरा दौर चला, और वह भी लंबे समय तक। और फिर, पूर्वी भारत के कई हिस्सों में आकांक्षाओं का अभाव एक समस्या है। इसलिए, अगर कानून-व्यवस्था  नहीं है, निवेश प्रोत्साहित नहीं करते, तो युवा पलायन कर जाते हैं। फिर वही सिलसिला दोहराता है, पंजाब की तरह ही। आज, कोलकाता में पलने-बढ़ने वाला  प्रतिभाशाली युवा प्रतिभा  कोलकाता में नहीं रहती। वे दिल्ली या एनसीआर के किसी अन्य शहर में जाएंगे। वे बैंगलोर या हैदराबाद भी जा सकते हैं। वे विदेश भी जा सकते हैं। 

सिद्धार्थ अहलूवालिया

बिहार के साथ भी यही स्थिति है। चलिए थोड़ा पूर्व की ओर, पूर्वी राज्यों की ओर । लोग उत्तर बनाम दक्षिण विभाजन की बात करते रहते हैं, जबकि वास्तव में यह पूर्व बनाम पश्चिम विभाजन है

संजीव सान्याल

बिलकुल। भारत में एक गंभीर पूर्व-पश्चिम विभाजन है। उत्तर-दक्षिण विभाजन गंभीर विभाजन नहीं है। नक्शा देखिए, यह बात आपके सामने स्पष्ट हो जाएगी क्योंकि दक्षिण भारत ने 1991 के बाद से स्पष्ट  अच्छा प्रदर्शन किया है। दक्षिण भारत की यह सफलता काफी हाल की है।

1991 तक इसका प्रदर्शन कुछ खास अच्छा नहीं था। तमिलनाडु, जो 1960 में उच्च प्रदर्शन वाला राज्य था, 1991 तक कुछ मायनों में पिछड़ गया था। अन्य राज्यों का प्रदर्शन भी कुछ खास अच्छा नहीं था। केरल के सामाजिक संकेतक तो ठीक थे, लेकिन अन्य मामलों में वह कोई बहुत अच्छा प्रदर्शन वाला राज्य नहीं था।

उदारीकरण के बाद ही दक्षिणी राज्यों का वास्तविक प्रदर्शन दिखा है।  तेलंगाना और कर्नाटक ने इसमें बेहतरीन प्रदर्शन किया। पश्चिमी भारत के अन्य राज्यों को देखें, तो महाराष्ट्र का प्रदर्शन लगभग स्थिर रहा। लेकिन गुजरात ने पिछले 25 वर्षों में असाधारण  प्रदर्शन किया है। गोवा ने बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया। छोटा राज्य होने के बावजूद, इसकी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से तीन गुना और बिहार से दस गुना अधिक है। अंतर आसानी से देख सकते हैं।

 दक्षिण भारत, पश्चिमी भारत, यहाँ तक कि उत्तर भारत में भी यही स्थिति है। हाँ, पंजाब पिछड़ा है, लेकिन हरियाणा ने अच्छा प्रदर्शन किया, दिल्ली ने भी ठीक-ठाक प्रदर्शन किया । भारत भर में कई ऐसे स्थान हैं जो ठीक-ठाक प्रदर्शन कर रहे हैं।

लेकिन पूर्वी भारत कई मायनों में बेहद पिछड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल और बिहार को ही देख लीजिए। बिहार की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का केवल 33 प्रतिशत है, यानी एक तिहाई।

पिछले एक दशक से इसकी स्थिति में गिरावट नहीं आई । यह स्थिर है, लेकिन बहुत निचले स्तर पर। उससे पहले, 1960, 1970, 1980, 1990 और 2000 के दशक में इसमें लगातार गिरावट आ रही थी। पिछले एक दशक में ही इसमें कुछ स्थिरता आई है, लेकिन अभी भी यह बहुत निचले स्तर पर है, इतना कम आधार है। अब, मैं मानता हूँ कि, शायद मैंने जो संख्या दी है, वह वास्तविक घरेलू आय से थोड़ी बेहतर हो सकती है क्योंकि मेरी गणनाओं में प्रेषण शामिल नहीं है।

इसलिए मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ, ताकि अगर कोई इस ओर ध्यान दे तो उसे पता चल जाए। इसमें विदेशों से आने वाली धनराशि शामिल नहीं है, लेकिन फिर भी, अंतर साफ दिखाई देता है। इसलिए पूर्वी भारत में स्पष्ट रूप से समस्या है और हमें इसके बारे में कुछ करना होगा।

लेकिन यह समस्या, जैसा कि मैंने कहा, हो सकता है कि कोई पुरानी, ​​आप जानते हैं, माल ढुलाई समानीकरण या कुछ इसी तरह की चीज हो जो समस्या का मूल कारण हो सकती है।

असल बात तो यह है कि पिछले तीन दशकों से माल ढुलाई के समानीकरण के खत्म होने के बाद से सबसे बड़ी समस्या यही है। अब असली समस्या यह है कि इन राज्यों में स्थानीय स्तर पर ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो प्रगतिशील हों, उद्यमी-हितैषी हों और अर्थव्यवस्था के अनुकूल हों।

और कुछ राज्यों में तो बुनियादी कानून व्यवस्था की ही समस्या है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में देखा जा सकता है। पश्चिम बंगाल में अभी जो हो रहा है, आप उसे देख सकते हैं। और, आप जानते हैं, ये मुद्दे हैं।

लेकिन जब आप वास्तव में कमोबेश अच्छा काम करते हैं, तो ये चीजें वापस सामने आ जाती हैं। और मैं आपको इसके कुछ उदाहरण दूंगा। ओडिशा।

पूर्वी भारत के संदर्भ में भी ओडिशा को हमेशा से ही एक पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता रहा है। पिछले 20 वर्षों में इसकी प्रति व्यक्ति आय में काफी सुधार हुआ है और यह राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंच गई है। यह अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है, लेकिन अब यह न केवल बिहार और झारखंड से अधिक है, बल्कि पश्चिम बंगाल से भी अधिक है।

क्योंकि याद रखिए, पश्चिम बंगाल कभी समृद्ध राज्य हुआ करता था। 1960 में, विभाजन और तमाम उथल-पुथल के बावजूद, पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय बाकी राज्यों की तुलना में 27% अधिक थी, है ना? आज यह 15% कम है।

दूसरी ओर, ओडिशा, जिसे हमेशा से पिछड़ा राज्य माना जाता था, अब वास्तव में पश्चिम बंगाल से अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य है। इसी प्रकार, असम की प्रति व्यक्ति आय 1960 के दशक में लगभग राष्ट्रीय औसत के बराबर थी। लेकिन इसमें लगातार गिरावट आती रही।

फिर से वही बात, असम आंदोलन, और वहाँ हुए अन्य सभी व्यवधान। लेकिन फिर भी, पिछले एक दशक में इसमें काफी सुधार हुआ है। अभी भी राष्ट्रीय औसत से नीचे है, लेकिन उछाल तो देखिए।

इसलिए, समझदारीपूर्ण नीतियां बनाने और सामान्य शासन व्यवस्था में सुधार करने से निश्चित रूप से प्रभाव पड़ता है।

और मुझे लगता है कि यही एक मुख्य बात है जिसे मैं अपने काम के माध्यम से उजागर करना चाहता हूं, कि सामान्य शासन, उद्योग को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना, ये चीजें मायने रखती हैं, और आपको इन्हें लगातार उन्नत करते रहना होगा।

सिर्फ इसलिए कि आपको एक अच्छी नीति मिल गई और वह कुछ समय के लिए कारगर रही, जैसा कि पंजाब के मामले में हुआ, इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा के लिए कारगर रहेगी।

आपको अगला कदम उठाना होगा, फिर अगला कदम, और इसी तरह आगे बढ़ते रहना होगा। यानी, आपको वैल्यू चेन में ऊपर जाना होगा। और हाँ, यही मुख्य निष्कर्ष हैं।

और निश्चित रूप से, इसका एक परिणाम यह भी है कि इस विकास को गति देने वाले महत्वपूर्ण शहरी केंद्रों का होना आवश्यक है। इसलिए, हर मामले में, जहाँ भी आप इस तरह की उच्च विकास दर देख रहे हैं, वहाँ एक प्रमुख शहरी केंद्र मौजूद है। और ये केंद्र अलग-अलग हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, कर्नाटक का प्रदर्शन काफी हद तक बेंगलुरु पर निर्भर करता है। हैदराबाद का प्रभाव तेलंगाना पर काफी हद तक पड़ता है। मुंबई-पुणे नेटवर्क, और कुछ हद तक नागपुर, महाराष्ट्र के प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं।

गुजरात में यह काफी फैला हुआ है। यहाँ अहमदाबाद तो है ही, साथ ही राजकोट, बड़ौदा, सूरत आदि भी हैं। फिर भी, एक नेटवर्क के रूप में यह काम करता है।

दिल्ली एनसीआर विकास का एक प्रमुख चालक है, दिल्ली शहर स्वयं तो है ही, लेकिन निश्चित रूप से अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नोएडा भी है। हरियाणा है, गुड़गांव है, और अब यह सोनीपत और अन्य स्थानों में भी फैल रहा है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

चंडीगढ़ भी आ रहा है।

संजीव सान्याल

जी हां, यह चंडीगढ़ से जुड़ता है और फिर नीमराना और जयपुर तक भी जाता है। मतलब, यह लगभग पूरी तरह से शहरी क्षेत्र है। तो, शहरी विकास के इन सभी कारकों का जाल उच्च विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कोलकाता को वह विकास क्षेत्र होना चाहिए था…

सिद्धार्थ अहलूवालिया

पूर्व का लंगर

संजीव सान्याल

जी हां, पूर्वी बंगाल का केंद्र। इसलिए, कोलकाता को पुनर्जीवित करना केवल पश्चिम बंगाल को पुनर्जीवित करने के बारे में नहीं है। यह पूर्वी बंगाल का केंद्र है, क्योंकि जब यह गति पकड़ता है, तो यह भुवनेश्वर, रांची, गुवाहाटी या पटना से कहीं अधिक बड़ा शहर बन जाता है।

कोलकाता को विरासत में जो संसाधन प्राप्त हैं, उन्हें हासिल करने में हमें बहुत लंबा समय लगेगा। ऐतिहासिक या अन्य कारणों से आज भी कई राष्ट्रीय संस्थान यहीं स्थित हैं। इसलिए, यदि आप वास्तव में पूर्वी भारत को प्रगति की ओर ले जाना चाहते हैं, तो आपको कोलकाता को प्रगति की ओर ले जाना होगा।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आप बिलकुल सही हैं। अगर हम आपके लेख को देखें, तो दक्षिण के प्रमुख शहर बेंगलुरु और हैदराबाद हैं। पश्चिम के प्रमुख शहर महाराष्ट्र, राजधानी मुंबई और थोड़ा ऊपर की ओर बढ़ते हुए अहमदाबाद हैं। उत्तर के प्रमुख शहर दिल्ली, गुरुग्राम और चंडीगढ़ हैं। लेकिन पूर्व में तो कोई प्रमुख शहर है ही नहीं।

संजीव सान्याल

बिल्कुल सही। और जो दूसरे शहर बन सकते हैं, वे बहुत छोटे हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और क्या आपको लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण की विफलता का कितना श्रेय राज्य स्तर पर नीति निर्माण को जाता है?

संजीव सान्याल

नहीं, जैसा कि मैंने कहा, राष्ट्रीय स्तर की नीतियां मायने रखती हैं। मैंने 1950, 60, 70 के दशक से लेकर 1993 तक माल ढुलाई के समानीकरण की जानबूझकर बनाई गई नीति का उदाहरण दिया, जिसने पूर्वी भारत को नुकसान पहुंचाया। लेकिन इसे लागू हुए 30 साल हो गए हैं

तो चलिए, शुरू हो जाइए। ऐसा क्यों नहीं होता? दरअसल, अगर केंद्र सरकार सहायता देना भी चाहे, तो स्थानीय स्तर पर ऐसी नीतियां होनी चाहिए जो इस सहायता को ग्रहण कर सकें और अवसर को व्यर्थ न जाने दें।

तो, आप जानते हैं, अवसरों का लाभ उठाने की इच्छा होनी चाहिए। और वैसे, यह केंद्र सरकार बनाम विपक्षी राज्य का मामला नहीं है। भारत में कई सफल राज्य हैं जिन पर अलग-अलग समय पर विपक्षी दलों का शासन रहा है। न केवल अभी, बल्कि पहले भी। ऐसे राज्य जो…

सिद्धार्थ अहलूवालिया

उदाहरण के लिए ओडिशा।

संजीव सान्याल

हाँ, ओडिशा ने ऐसा किया और उससे पहले गुजरात ने ऐसा किया।

इसलिए, स्थानीय मामले मायने रखते हैं। इसलिए, स्थानीय नीतियाँ मायने रखती हैं। तो, आपके पास गुजरात था, जिसे राजनीतिक रूप से समस्या थी जब हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इसके साथ राजनीतिक समस्याएं थीं। लेकिन उनका राज्य समृद्ध हुआ

बाद में, जब वे प्रधानमंत्री बने, तो उनके नेतृत्व में कई राज्यों ने तरक्की की। तेलंगाना इसका अच्छा उदाहरण है। ओडिशा भी इसका अच्छा उदाहरण है। इसलिए, यह हमेशा सच नहीं होता कि आप जानते हैं कि यह एक… आप जानते हैं कि जब तक आप उसी क्षेत्र में काम नहीं करेंगे, तब तक आप विकास नहीं कर सकते।

ऐसे कई सफल उदाहरण हैं जहां राज्यों ने जमीनी स्तर पर बेहतरीन नीतियां अपनाई हैं और इसका भरपूर लाभ उठाया है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आपके शोध पत्र से यह भी पता चलता है कि विभिन्न राज्यों की तरह किसी स्थिति को स्थिर होने में एक दशक लग जाता है।

संजीव सान्याल

जी हाँ। जब स्थिति पूरी तरह से खराब हो, तो उसे स्थिर करना भी एक कठिन काम है। बिहार और उत्तर प्रदेश ने पिछले 10-15 वर्षों में कुछ हद तक स्थिरता हासिल कर ली है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो, अब यह वास्तव में विकास की ओर गति पकड़ने लगा है।

बिहार में अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। लेकिन इसके लिए लोगों का ज़मीनी स्तर पर मौजूद होना ज़रूरी है और इसीलिए मैं बार-बार इस बात पर ज़ोर देता हूँ कि अंततः हम एक लोकतंत्र हैं। और लोकतंत्र की यही मांग होती है, अंततः जनता की मांग ही पूरी होती है।

इसलिए, आकांक्षा और आकांक्षा की कमी का मुद्दा कोई मामूली बात नहीं है। अगर आपकी आकांक्षा ट्रेड यूनियन के नारे लगाना है, तो वही आपको मिलेगा। अगर आपकी आकांक्षा गुंडागर्दी की राजनीति है, तो वही आपको मिलेगा।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और यह जानना बेहद दिलचस्प है कि आज पांच दक्षिणी राज्य राष्ट्रीय जीडीपी में 30% का योगदान करते हैं और यह सब उदारीकरण के बाद ही संभव हुआ। बाकी राज्य उदारीकरण का उतना अच्छा लाभ क्यों नहीं उठा पाए जितना कि…

संजीव सान्याल

जी हाँ, उन्होंने ऐसा किया। मतलब, हमने दिल्ली-एनसीआर की बात की। वह भी इसी का नतीजा है। उदारीकरण की वजह से ही गुजरात सफल हुआ।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

गुजरात में यह सब 2000 के बाद से शुरू हुआ।

संजीव सान्याल

हाँ, मेरा मतलब है, हमने 1991 में उदारीकरण किया था, इसलिए इसमें कुछ समय लगा। लेकिन 2000 के बाद, कुछ वर्षों में, इसने वास्तव में गति पकड़ी।

तो ऐसा नहीं है कि इसका फायदा सिर्फ दक्षिण भारत ने उठाया है। लेकिन हां, दक्षिण भारत ने इसमें विशेष सफलता हासिल की है। और मैं यहां विशेष रूप से कर्नाटक और तेलंगाना का जिक्र करना चाहूंगा। ये राज्य ही इसके असली प्रणेता रहे हैं।

हैदराबाद इस विकास का एक प्रमुख चालक है। और फिर से उसी मुद्दे पर आते हैं, विकास को गति देने के लिए इन शक्ति केंद्रों की आवश्यकता होती है। और… लेकिन अन्य स्थान भी हैं जो सफल रहे हैं।

तो चलिए, मैं यहां दो छोटे राज्यों का जिक्र करता हूं जिन्होंने वास्तव में काफी बड़ी सफलता हासिल की है। इनमें से एक है सिक्किम। सिक्किम के बारे में कोई ज्यादा नहीं सोचता। लेकिन वास्तव में, सिक्किम में देश के किसी भी राज्य की तुलना में प्रति व्यक्ति आय सबसे अधिक है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

लगभग 4 गुना।

संजीव सान्याल

खैर, 4 गुना नहीं, बल्कि 3 गुना से थोड़ा ज़्यादा। गोवा, 3 गुना। और ये छोटे राज्य… गोवा हमेशा देश के बाकी हिस्सों से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करता रहा है। लेकिन सिक्किम नहीं

तो यह अपेक्षाकृत हाल ही में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कंपनी है। और इसने उन क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया है जिन्हें आमतौर पर राष्ट्रीय चर्चा में नजरअंदाज कर दिया जाता है, मानो वे कोई मामूली चीज हों जिनसे खेलना नहीं चाहिए।

पर्यटन। मेरा मतलब है, सिक्किम और गोवा की प्रेरक शक्ति क्या है? पर्यटन। आप जानते हैं, इससे जुड़े अन्य क्षेत्र भी हैं। शिक्षा और इसी तरह की चीजें।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आपको लगता है कि इनमें से सिर्फ दो क्षेत्र जैसे पर्यटन और…

संजीव सान्याल

हाँ, छोटे राज्यों के लिए तो बिल्कुल सही। मेरा मतलब है, पर्यटन ही काफी है। और भारत में कई छोटे राज्य हैं जो सिर्फ इसी एक चीज़ के दम पर कामयाब हो सकते हैं। मेरा मतलब है, उत्तर-पूर्वी भारत के कई राज्य बेहद खूबसूरत हैं। उनकी आबादी ज्यादा नहीं है। अगर वे पर्यटन पर ध्यान केंद्रित कर लें, तो उन्हें और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं होगी।

और अब ऐसा नहीं है कि ये सभी जगहें दूरदराज हैं और हम वहां नहीं पहुंच सकते। लगभग सभी जगहों के लिए रोजाना उड़ानें उपलब्ध हैं। और कुछ जगहों पर अच्छे हवाई अड्डे भी हैं…

मतलब, लगभग हर मामले में, उस स्थान पर एक बहुत अच्छा हवाई अड्डा मौजूद है। और सिर्फ दिल्ली से ही नहीं, बल्कि पूरे देश में उड़ानें फैल रही हैं। उड़ान योजना ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि आप लगभग कहीं से भी कहीं भी उड़ान भर सकते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा एक स्टॉप के साथ।

तो, इन सभी संबंधों को देखते हुए, छोटे राज्यों के लिए कुछ करने का बहुत बड़ा अवसर है। मैंने पर्यटन का उदाहरण दिया। लेकिन यह कोई और चीज भी हो सकती है जो उस राज्य के संसाधनों के अनुकूल हो। और आप उसमें शानदार सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन या राष्ट्रीय पर्यटन ही इन राज्यों के लिए फायदेमंद साबित होता है?

संजीव सान्याल

दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार राष्ट्रीय पर्यटन है। तो, हमने जो दिलचस्प बात पाई, चलिए गोवा का उदाहरण लेते हैं। गोवा कभी हिप्पी लोगों का गढ़ हुआ करता था।

श्वेत यूरोपीय लोगों के लिए सस्ता पर्यटन स्थल, जो या तो कुछ अनोखा अनुभव चाहते थे या किसी अन्य स्थान पर जाने के महंगे खर्च से बचना चाहते थे। इस प्रकार, यह हिप्पी संस्कृति वाले पश्चिमी पर्यटकों के लिए एक सस्ता स्थान बन गया, जिन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

अगर आप अभी वहां जाएं तो आपको ज्यादातर भारतीय पर्यटक ही मिलेंगे। और भारतीय पर्यटक खर्च करने को तैयार रहते हैं। ऐसा नहीं है कि भारतीय मध्यम वर्ग के पास खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं।

और हुआ ये कि कोविड की वजह से ये बदलाव आया। दिलचस्प बात ये है कि कोविड के दौरान विदेशी पर्यटक वहां नहीं आ पा रहे थे, इसलिए पूरा सिस्टम ही ध्वस्त हो गया।

लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग कहीं भी यात्रा नहीं कर सकता था। इसलिए उन्होंने कहा, चलो गोवा चलते हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय मध्यम वर्ग के पैसे ने ही गोवा को उन्नत बनाया है।

पिछले पांच वर्षों में, भारतीय मध्यम वर्ग के पैसों की बदौलत गोवा का विकास हुआ है। इसलिए, एक दिलचस्प बात यह भी है कि यह पहले से कम अपवित्र हो गया है। मतलब, वह पूरा…

मुझे यकीन है कि यह अभी भी कहीं न कहीं मौजूद है। लेकिन एक समय था जब यह सब ऐसे पर्यटकों द्वारा संचालित होता था जो वहाँ जाकर गांजा पीते थे। अब इसने खुद को बेहतर बना लिया है, अपनी छवि सुधार ली है। यह एक अधिक सभ्य जगह है। और यह एक ऐसी जगह है जहाँ लोग भारतीय मानकों के अनुसार महंगे होटलों के लिए जाते हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और सिक्किम के मामले में क्या कारण था? सिक्किम ने खुद को कैसे उन्नत किया?

संजीव सान्याल

तो, कुछ ऐसा ही, सिक्किम ने खुद को उन्नत किया है, जो गोवा से भी छोटा राज्य है। इसने खुद को छुट्टियों आदि के लिए एक जगह के रूप में उन्नत किया है। लेकिन फिर, आपको पता है, मणिपाल विश्वविद्यालय का एक परिसर भी वहाँ है

यहां कई तरह के छोटे उद्योग चल रहे हैं। जलविद्युत क्षेत्र में भी कदम रखा गया, हालांकि एक बड़ी दुर्घटना हुई, जिसके कारण शायद उस क्षेत्र में थोड़ी सी रुकावट आ गई।

लेकिन फिर भी, मैं आपको बस यह बताना चाहता हूं कि इसने अपने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके कई अन्य क्षेत्रों में भी प्रवेश किया है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आखिरी बात जो मैं कहना चाहता हूं, वह यह है कि आप नौसेना और जहाजरानी के क्षेत्र में काफी काम कर रहे हैं। मैं उस पर भी थोड़ी चर्चा करना चाहता हूं।

संजीव सान्याल

तो आप जानते ही हैं, मुझे समुद्र से बहुत लगाव है। मैंने इसके बारे में लिखा भी है। खैर, इनमें से एक मुद्दा नीतिगत है, जो इस तथ्य से संबंधित है कि भारत को वास्तव में अपने जहाजरानी कारोबार को गति देने की जरूरत है।

इसलिए, जब हम समुद्री क्षेत्र की बात करते हैं, तो अक्सर हम इसके भूमि से घिरे हिस्से, यानी बंदरगाहों के बारे में सोचते हैं। और हम नए बंदरगाह बना रहे हैं। वधावन में एक विशाल नया बंदरगाह बन रहा है।

लेकिन मैं यहाँ जिस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ, वह यह है कि हमें एक बहुत बड़े जहाज़ी बेड़े की ज़रूरत है। भारतीय विश्व में जहाज़ी क्षेत्र के महान अग्रदूत हैं।

हजारों वर्षों से, हम समुद्री क्षेत्र के महारथी रहे हैं, हिंद महासागर और उससे भी आगे तक नौकायन करते रहे हैं। लेकिन आज, आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि दुनिया के लगभग 1% जहाज ही हमारे द्वारा निर्मित हैं। ठीक है। लगभग आधे जहाज चीन द्वारा निर्मित हैं।

और अगर जापान और कोरिया को भी शामिल कर लें, तो लगभग 90% या उससे भी ज़्यादा जहाज़ इन्हीं तीन देशों में बनते हैं। हमें भी इस क्षेत्र में सक्रिय होना होगा। इसी तरह, हमारे देश से आने-जाने वाले 90% से ज़्यादा सामान विदेशी शिपिंग कंपनियों द्वारा ले जाया जाता है, न कि भारतीय जहाज़ों द्वारा।

इसलिए हमें जहाज निर्माण, जहाज स्वामित्व और भारतीय ध्वज वाले जहाजों की संस्कृति को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। मेरा मानना ​​है कि यह न केवल एक आर्थिक गतिविधि के रूप में महत्वपूर्ण है, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। अगर दुनिया में किसी महामारी, युद्ध, प्रतिबंधों या ऐसी ही किसी वजह से कोई गड़बड़ी या व्यवधान उत्पन्न होता है, तो समुद्र में चलने के लिए हमारे पास अपने जहाज होने चाहिए।

इसलिए मैं इस बात का प्रबल समर्थक हूं कि ऐसा किया जाना चाहिए और आपने हाल ही में देखा होगा कि सरकार ऐसा कर रही है और निश्चित रूप से, जहाजरानी मंत्रालय में मेरे सहयोगी इस मामले में सबसे आगे रहे हैं। वे बहुत मेहनत कर रहे हैं और इन सभी चीजों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और लक्ष्य इसे उच्च एकल अंक प्रतिशत तक ले जाना होगा

संजीव सान्याल

हाँ, तो कम से कम आइए हम जहाजों के एक गंभीर निर्माता बनें, अपने खुद के जहाज रखें, अपने जहाजों पर अपना झंडा लगाएं और भारतीय बेड़ों पर गर्व करें। विडंबना यह है कि भारतीय नाविकों का दुनिया की, आप जानते हैं, भारतीय नाविकों द्वारा संचालित व्यापारिक नौसेनाओं में एक असमान अनुपात है। लेकिन वे किसी और के जहाजों के लिए नौकायन कर रहे हैं, हमारे जहाजों के लिए नहीं, लेकिन हमें अपने खुद के जहाजों का मालिक होना चाहिए

इसलिए मैं इसी बात को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा हूँ। दुर्भाग्यवश, भारत में ऐतिहासिक रूप से बुनियादी ढांचे को लेकर एक संकीर्ण सोच रही है। इसलिए हमें अपनी इस सोच को बदलना होगा।

असल समस्या हमारी अपनी सोच में है, क्योंकि जिस तरह से हम इतिहास पढ़ाते हैं, जिस तरह से हम भारत को देखते हैं, वह ऐतिहासिक रूप से एक भू-भाग से घिरा देश रहा है। अब, इसके पीछे क्या कारण है, इस पर बहस हो सकती है, शायद इसलिए कि हमारी राजधानी दिल्ली में है या कुछ और। लेकिन आज यह स्थिति बदलने लगी है।

और इसलिए हम अपने बारे में समुद्री दृष्टिकोण को फिर से अपनाने लगे हैं। मेरा मतलब है, उदाहरण के तौर पर, ब्रिटिश लोग स्पष्ट रूप से खुद को समुद्री दृष्टि से देखते हैं। जापानी लोग भी खुद को समुद्री दृष्टि से देखते हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

यहां तक ​​कि अमेरिकी भी।

संजीव सान्याल

अमेरिकियों का भी समुद्री दृष्टिकोण है। ऐतिहासिक रूप से हमारा समुद्री दृष्टिकोण नहीं था

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आप सही कह रहे हैं, क्योंकि हमारे प्रमुख शहरों में से केवल मुंबई ही इससे जुड़ा हुआ है। बाकी शहरों में तो कोई प्रमुख शहर ही नहीं है।

संजीव सान्याल

चेन्नई भी समुद्री संस्कृति का हिस्सा है, और ऐतिहासिक रूप से कोलकाता भी। लेकिन हमने किसी न किसी तरह अपनी संस्कृति के इस समुद्री पहलू को नहीं अपनाया है।

तो आप जानते हैं, हम इसके बारे में सोचते भी नहीं हैं, यहां तक ​​कि जब हम अपना इतिहास पढ़ाते हैं, तब भी हम इसके बारे में मुश्किल से ही बात करते हैं, मेरा मतलब है, समुद्री घटनाओं के बारे में आप तभी सुनते हैं जब, ओह, ईस्ट इंडिया कंपनी आई और उसने हम पर कब्जा कर लिया।

तो यह सिर्फ नकारात्मक अर्थ में है। इसलिए मैं व्यक्तिगत रूप से जो प्रयास कर रहा हूँ, उनमें से एक है इस विषय पर हमारी सोच को बदलना। एक तो है मेरी किताब ‘ओशन ऑफ चर्न’, जिसमें मैंने इस बारे में बात की है। लेकिन अभी मैं एक प्रोजेक्ट से जुड़ा हुआ हूँ, जिसे संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित किया जा रहा है।

भारतीय नौसेना ने बड़ी कृपा करके इस परियोजना का संरक्षण करने की सहमति दी है। हम पाँचवीं शताब्दी ईस्वी का एक जहाज बना रहे हैं। हम गुप्त काल के दौरान के जहाजों की संरचना के आधार पर लकड़ी का जहाज बना रहे हैं। यह जहाज वर्तमान में गोवा में निर्माणाधीन है।

इसके निर्माण में हम किसी भी प्रकार की कील का प्रयोग नहीं करेंगे, इसे सिलाई करके जोड़ा गया है। और इसमें उस काल की सभी जानकारियों का उपयोग किया जाएगा, चाहे वह अंजंत की कोई पेंटिंग हो या युक्तिकल्पतरु नामक पुस्तक, या विदेशी आगंतुकों द्वारा दिए गए विवरण।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

क्या यह हाल ही में आई फिल्म, पोन्नियिन सेल्वन थी?

संजीव सान्याल

नहीं, यह तो बॉलीवुड की बात है, हम इसमें बिल्कुल भी समय नहीं लगाने वाले। दरअसल, प्राचीन जहाज ऐसे नहीं दिखते थे। इसलिए हमें जो चाहिए, और जो हम कर रहे हैं, वह यह है कि हम यथासंभव सटीक पुनर्निर्माण कर रहे हैं।

और इस तरह जहाज का निर्माण कार्य चल रहा है। और फिर, यह कोई छोटा जहाज नहीं है, यह लगभग 21 मीटर लंबा है। और हमें उम्मीद है कि एक बार यह बनकर तैयार हो जाए और हम इसका परीक्षण कर लें, क्योंकि याद रखिए, हमें वास्तव में नहीं पता कि पानी में इसका प्रदर्शन कैसा होगा।

हम इसमें कुछ प्राचीन तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि हम इसके मूल स्वरूप को यथासंभव बरकरार रखना चाहते हैं। जैसा कि मैंने बताया, हम पतवार को जोड़ रहे हैं, कीलें नहीं लगा रहे हैं। हम आधुनिक पाल वाली नावों में इस्तेमाल होने वाले लालटेन पाल के बजाय चौकोर पाल का उपयोग करेंगे।

ऐसा नहीं है… हम पतवार के बजाय इसे निर्देशित करने के मुख्य साधन के रूप में एक पीछे की ओर चलने वाले चप्पू का उपयोग कर रहे हैं। और हम प्राचीन लंगर और इस तरह की अन्य चीजों को पुनः निर्मित कर रहे हैं।

तो…इन सभी चीजों को मिलाकर, हमें ठीक से पता नहीं है कि यह कैसे चलेगी। इसलिए हमें यह सीखना होगा। लेकिन एक बार जब हम यह सीख लेंगे, तो हमारा इरादा इसे सबसे पहले ओमान ले जाने का है।

और फिर, अगर यह यात्रा अच्छी रही, जो अपेक्षाकृत छोटी होगी, 2-3 सप्ताह की यात्रा होगी, तो हमारा विचार है कि अगले वर्ष, यानी हम 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत में इसे करने की उम्मीद कर रहे हैं, अगर यह सफल रहा, तो उसके अगले वर्ष, हम ओडिशा से बाली तक नौकायन करने की उम्मीद करते हैं, जो बाली यात्रा या बाली की यात्रा नामक एक बहुत ही प्राचीन यात्रा का पुनरावलोकन होगा।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आप शुरुआती यात्राओं में से एक में शामिल होने जा रहे हैं?

संजीव सान्याल

खैर, मुझे उम्मीद है कि मैं इसमें शामिल हो पाऊंगा, बशर्ते मैं इस जहाज को चलाना सीख जाऊं। लेकिन अभी काफी लंबा रास्ता तय करना है। तो चलिए दुआ करते हैं।

तो, जैसा कि आप जानते हैं, इसे पानी में उतारने, सभी मस्तूलों और बाकी सब चीजों को ठीक करने, फिर इसे चलाना सीखने के बीच कई चरण होते हैं। और जब हमें लगता है कि हम इसे चलाना जानते हैं और यह काफी सुरक्षित है, तब हमें इसे चलाना होगा।

तो अभी बहुत सारे चरण बाकी हैं। लेकिन मैंने सोचा कि मैं आपको बता दूं क्योंकि मुझे लगा कि कई दर्शकों को यह एक दिलचस्प प्रोजेक्ट लग सकता है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, महोदय। हमेशा की तरह। हमें आपसे हुई बातचीत में बहुत आनंद आया और हमने अपने विभिन्न राज्यों की प्रगति के बारे में बहुत कुछ सीखा। इससे हमें यह भी पता चला कि प्रवासन किस आर्थिक क्षेत्र में हो रहा है।

उदाहरण के लिए, गोवा में पलायन क्यों हो रहा है? आप जानते हैं, शहरों से लोग गोवा में पलायन कर रहे हैं, लेकिन वे शायद अन्य स्थानों पर नहीं जाते। इसलिए ये बहुत दिलचस्प बातें हैं।

संजीव सान्याल

कई चीजें मायने रखती हैं। मेरा मतलब है, गोवा के विशेष मामले में, गोवा एक प्रकार का पर्यटन और जीवनशैली आकर्षण प्रस्तुत करता है। इसलिए हम एक निश्चित स्तर की जीवनशैली चाहते हैं, इत्यादि। और गोवा ने वह प्रदान किया है।

और चूंकि यह उच्च वर्ग के लोगों को आकर्षित कर रहा है, इसलिए इसकी अपनी एक अलग गतिशीलता है क्योंकि उनके मनोरंजन, रेस्तरां और अन्य चीजें जिनकी उन उच्च वर्ग के लोगों को आवश्यकता होती है, वहां विकसित की जाती हैं, एक विशेष प्रकार का सांस्कृतिक जीवन विकसित होता है, इत्यादि। तो ऐसा होता है।

लेकिन देखिए, अब हमें यह करना होगा कि गोवा एक मॉडल है। गुजरात एक और मॉडल बन सकता है, शायद वहां कारखाने स्थापित किए जाएं, औद्योगीकरण किया जाए और ऐसा किया जाए।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और उपहारों का शहर।

संजीव सान्याल

और उपहारों का शहर, जो एक वित्तीय केंद्र है। उदाहरण के लिए, मुंबई को खुद को एक वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में भी सोचना चाहिए। इसलिए आपको उन लोगों के लिए जीवन की गुणवत्ता का निर्माण करने की आवश्यकता है जो दुनिया भर में अरबों डॉलर का लेन-देन कर रहे हैं, वे आज के मुंबई में नहीं रहने वाले हैं। इसलिए इसे अपने बुनियादी ढांचे के गंभीर उन्नयन की आवश्यकता है, जिससे यह गुजर रहा है

आप जानते हैं कि हम इस समय मुंबई की परिवहन व्यवस्था का पुनर्निर्माण कर रहे हैं, चाहे वह एक साथ शुरू की जा रही मेट्रो लाइनें हों, तटीय सड़क हो, नया हवाई अड्डा हो, और फिर मुंबई के कुछ हिस्से हैं जिनका स्पष्ट रूप से उन्नयन किया जा रहा है, जैसे कि बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स।

मेरा मानना ​​है कि अभी यह मामूली सा अंतर है, लेकिन इसके भीतर कार्यालयों की गुणवत्ता सिंगापुर के स्तर की है। इसलिए आपको मूल्य श्रृंखला में कई स्थानों को उन्नत करने की आवश्यकता है। कुछ अन्य स्थानों पर अन्य कार्य करने की आवश्यकता हो सकती है।

कुछ क्षेत्रों में कृषि क्रांति की आवश्यकता हो सकती है। बिहार जैसे कुछ क्षेत्रों में जहां मजदूरी बहुत कम है, वहां बांग्लादेश में हो रही प्रगति को देखते हुए, कपड़ा उद्योग पर कब्जा करने का अवसर मिल सकता है।

कोलकाता को एक आधुनिक शहर के रूप में खुद को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है, न कि इसे एक जीर्ण-शीर्ण औपनिवेशिक अवशेष के रूप में देखने की। अब हमें कोलकाता का आधुनिक तरीके से पुनर्निर्माण करना होगा।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और आपने बिल्कुल सही कहा कि पंजाब ने खुद को नए सिरे से नहीं ढाला है। आपको लगातार खुद को नए सिरे से ढालने की जरूरत है।

संजीव सान्याल

जी हाँ। बिलकुल। सिंगापुर को ही देख लीजिए। मेरा मतलब है, सिंगापुर की शुरुआत 1960 के दशक में एक पूर्व ब्रिटिश बंदरगाह के रूप में हुई थी, जो ज्यादातर एक सैन्य बंदरगाह था। इसने ब्रिटिशों द्वारा छोड़े गए बंदरगाह का उपयोग किया और कंटेनर शिपिंग में कदम रखा, जो 1960 के दशक में एक नई चीज थी।

फिर यह इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में प्रवेश करता है। ठीक है। यह इन दोनों क्षेत्रों में सफल होता है। 80 और 90 के दशक में मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ते हुए वित्त क्षेत्र में प्रवेश करता है, उसमें भी सफल होता है, फिर मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, मनोरंजन और अन्य क्षेत्रों में और उससे भी उच्च स्तर के वित्त और अन्य क्षेत्रों में प्रवेश करता है।

तो इसने लगातार वैल्यू चेन में ऊपर की ओर प्रगति की है। मान लीजिए कि इसने सिर्फ पहला कदम उठाया होता, यानी हम कंटेनर शिपिंग करने वाली कंपनी हैं और यहीं अटके रहते हैं और कभी वैल्यू चेन में ऊपर नहीं बढ़ते, तो सिंगापुर आज जैसा है वैसा नहीं होता। इसलिए आपको वैल्यू चेन में ऊपर की ओर बढ़ते हुए खुद को पूरी तरह से नया रूप देना होगा।

इसलिए आपको न केवल आज जो कर रहे हैं उसमें निवेश करना होगा, बल्कि यह भी याद रखना होगा कि एक समय ऐसा आएगा जब वह गतिविधि आपके लिए बहुत महंगी हो जाएगी। इसलिए आज हम सिंगापुर के बारे में केवल कुछ बहुत ही उच्च श्रेणी के इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए ही सोचते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए यह उपयुक्त स्थान नहीं है।

और ऐसा ही होना चाहिए। मेरा मतलब है, सिंगापुर जैसा छोटा द्वीप, जहाँ श्रम बहुत महंगा है, आईफ़ोन बनाने के धंधे में क्यों फंसे? ऐसा नहीं है। वहाँ कुशल श्रमिक उपलब्ध हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स के कुछ विशेष क्षेत्रों में काम होता है, वरना वह इस व्यवसाय से बाहर निकल चुका होता।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और क्या आपको लगता है कि भारतीय राज्य पुनर्निर्माण के उस डीएनए को सही ढंग से प्राप्त कर रहे हैं?

संजीव सान्याल

इसलिए मुझे लगता है कि हमें इसके प्रति यह रवैया अपनाना होगा कि हमें लगातार मूल्य श्रृंखला में ऊपर जाना होगा और भारत के विभिन्न हिस्सों को मूल्य श्रृंखला में ऊपर जाना होगा

तो आप जानते हैं कि एक समय ऐसा आएगा जब कुछ भारतीय राज्यों में कुछ प्रकार की गतिविधियाँ करना बहुत महंगा पड़ जाएगा। हमें इस बारे में भावुक नहीं होना चाहिए, उन्हें किसी अन्य राज्य को सौंप देना चाहिए, क्योंकि गरीब राज्य कतार में हैं, उन्हें दे दें, इस तरह आप मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

और किसी राज्य को नया रूप देने के लिए, राज्य और केंद्र के बीच कितना संतुलन बनाए रखना पड़ता है?

संजीव सान्याल

वैसे तो केंद्र सरकार की इसमें कुछ भूमिका होती ही है, लेकिन इसे बीसीसीआई की तरह समझिए। उसका काम यह सुनिश्चित करना है कि मैदान तैयार हो, दर्शक मौजूद हों, टीवी प्रसारण अधिकार बिक चुके हों और कोई प्रसारण कर रहा हो, और दोनों अंपायर मौजूद हों। लेकिन खेल का संचालन करना ज्यादातर मामलों में केंद्र सरकार का काम नहीं है।

कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां केंद्र सरकार भूमिका निभाती है, लेकिन हमने अभी जिस विषय पर चर्चा की, उसमें ज्यादातर मामलों में, जब तक कि वह किसी प्रकार का रणनीतिक उद्योग न हो, निवेश आकर्षित करना और उसे एक अच्छा कार्यस्थल बनाना ही राज्यों की मुख्य भूमिका होती है।

और भारत भर में आपको जो बड़े अंतर देखने को मिलते हैं, वह वास्तव में इसी का परिणाम है, क्योंकि अधिकतर मामलों में नियम पूरे देश के लिए समान हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

हाँ। और मेरा मानना ​​है कि जिन राज्यों में चक्रवृद्धि ब्याज की व्यवस्था पहले से ही मौजूद है, जैसे महाराष्ट्र, वहाँ ब्याज दरें बढ़ती रहेंगी।

संजीव सान्याल

जी हां। महाराष्ट्र में ऐसा हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक बार करने के बाद बात खत्म हो जाए। आपको मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ते रहना होगा, इसलिए एक समय ऐसा आ सकता है जब महाराष्ट्र कुछ खास तरह के विनिर्माण के लिए सबसे उपयुक्त जगह न हो, इसके लिए बदलाव जरूरी है।

लेकिन ज़रा सोचिए, इसका क्या नतीजा हुआ। अगर आज भी परेल में सूती मिलें चल रही होतीं, तो ये सब व्यर्थ होता। ट्रेड यूनियन आंदोलन की वजह से ये मिलें बंद हो गईं और 80 और 90 के दशक में इससे काफी दिक्कतें हुईं। लेकिन आखिरकार, कुछ अव्यवस्थित तरीके से ही सही, मुंबई आगे बढ़ गया।

और अब उन पुरानी मिलों को अन्य कार्यों में लगा दिया गया है। और देखिए किस तरह की आर्थिक गतिविधियाँ उभर कर सामने आई हैं। मेरा मानना ​​है कि इसे बेहतर तरीके से किया जा सकता था, इस परिवर्तन से पहले बुनियादी ढांचा तैयार किया जा सकता था, खैर, जिस अव्यवस्थित तरीके से यह सब हुआ है, वह तो हो ही गया है।

फिर भी, इसके परिणामस्वरूप, चाहे वह कमला मिल्स हो या फीनिक्स मिल्स, वहां हर तरह की आर्थिक गतिविधियां हो रही हैं।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, महोदय। मुझे इस बातचीत में बहुत आनंद आया, इससे सचमुच नए विचार और नई बहसें जन्म लेती हैं और आपने इसमें उत्कृष्ट योगदान दिया है।

संजीव सान्याल

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

संजीव सान्याल

पिछली बार आपने यह बात उठाई थी कि UPSC समय की बर्बादी है और मुझे लगता है कि इससे देश में हलचल मच गई थी

संजीव सान्याल

नहीं, तो मेरा यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि, दुर्भाग्य से, भारतीय सार्वजनिक बहस विचारों का टकराव नहीं है। इसका अधिकांश भाग विभिन्न राजनीतिक समूहों की आपस में बहस है , और इसका बहुत कुछ निरर्थक है। इसलिए यदि कोई कहता है कि सूर्य पूर्व से उगता है, तो दूसरे को अचानक कहना पड़ेगा कि नहीं, यह पश्चिम से उगता है और फिर एक व्यर्थ की बहस छिड़ जाएगी।

मुझे लगता है कि एक स्वस्थ सार्वजनिक बहस विचारों के टकराव के बारे में होती है, अलग-अलग बहसें होने दें और आप जानते हैं, किसी भी बात पर आम सहमति होना जरूरी नहीं है।

लेकिन स्वस्थ बहसें होना ज़रूरी है और जैसा कि मैंने कहा, UPSC पर मेरे विचार और यह तथ्य कि बहुत से युवा उस एक छोटी सी परीक्षा को पास करने की कोशिश में अपनी बहुत सी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं, आप सहमत हो सकते हैं, आप असहमत हो सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह अच्छी बात है कि ऐसे विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हो रही है जो इतने सारे लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।

सिद्धार्थ अहलूवालिया

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

संजीव सान्याल

धन्यवाद।

 

 

 

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