मोदी डर गया? कह भी कौन रहा है? जिसने कॉलेज एडमिशन को बदला नाम

जिसने अपनी मौत के डर से विदेश भाग गया और डर से अपना नाम भी छिपा लिया वो आज कह रहा है कि मोदी डर गया

भारतीय राजनीति के गलियारों में आज जब ‘डर’ और ‘पलायन’ जैसे शब्दों का प्रयोग प्रधानमंत्री मोदी के संदर्भ में किया जाता है, तो यह न केवल हास्यास्पद लगता है, बल्कि यह उन लोगों की ऐतिहासिक अज्ञानता को भी दर्शाता है। राजनीति में आरोप लगाना सरल है, लेकिन चरित्र का निर्माण जिस आग में तपकर होता है, उसका प्रमाण 90 के दशक का इतिहास देता है।

90 के दशक की शुरुआत कश्मीर के लिए किसी प्रलय से कम नहीं थी। वह दौर था जब वादी की हवाओं में केसर की खुशबू नहीं, बल्कि बारूद की गंध और मजहबी उन्माद का जहर घुला था।

* नरसंहार और पलायन: मस्जिदों से ‘रालिब, गालिब या चालिब’ के डरावने नारे गूंज रहे थे। कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से बेदखल कर दिया गया, महिलाओं के साथ बर्बरता हुई और मासूमों का खून बहाया गया।

* सत्ता का सरेंडर: उस वक्त की सरकारें और प्रशासन घुटनों पर थे। तिरंगा फहराना तो दूर, श्रीनगर के लाल चौक पर भारत का नाम लेना भी अपनी मौत को दावत देना था। आतंकियों ने खुली चुनौती दी थी कि “अगर किसी ने माँ का दूध पिया है, तो यहाँ तिरंगा फहराकर दिखाए।”

उसी खौफनाक दौर में, जब बड़े-बड़े दिग्गज कश्मीर जाने के नाम से भी थर्राते थे, तब नरेंद्र मोदी ने डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी के साथ ‘एकता यात्रा’ का बीड़ा उठाया। मोदी ने छुपकर नहीं, बल्कि डंके की चोट पर आतंकियों को जवाब दिया। उन्होंने तारीख, समय और स्थान का सार्वजनिक ऐलान किया और कहा

“हम आ रहे हैं, देखते हैं किसने अपनी माँ का दूध पिया है।”

26 जनवरी 1992: श्रीनगर का लाल चौक गोलियों और रॉकेटों की गूंज से थर्रा रहा था। लेकिन सुरक्षा घेरों को तोड़ते हुए, अपनी जान हथेली पर रखकर मोदी ने वहां भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में तिरंगा फहराया। वह एक ऐसी ललकार थी जिसने अलगाववाद की कमर तोड़ दी और साबित किया कि साहस क्या होता है।

जहाँ एक ओर मोदी जमीन पर संघर्ष कर रहे थे, वहीं राहुल गांधी का 90 का दशक बिल्कुल विपरीत था।

पहचान का संकट: पिता राजीव गांधी की हत्या के बाद डर से राहुल गांधी को विदेश में जाकर छुपना पड़ा। अमेरिका के रोलिंस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्हें अपनी पहचान छिपानी पड़ी और वे ‘रॉल विंची’ के नाम से रहे।

जब भारत कश्मीर में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था, तब राहुल गांधी कैम्ब्रिज में एम.फिल कर रहे थे और बाद में लंदन की एक मैनेजमेंट फर्म में नौकरी कर रहे थे। उन्होंने उस दशक में भारत की किसी भी गंभीर समस्या या संघर्ष में कोई भूमिका नहीं निभाई।

विडंबना देखिए, आज वही राहुल गांधी ‘मोदी डर गया’ जैसे जुमले उछालते हैं। यह व्यंग्य की पराकाष्ठा है कि जिसे एक बच्चों वाली लेजर लाइट के लाल बिंदु से अपनी जान का खतरा महसूस होने लगा था, वह उस व्यक्ति के साहस पर सवाल उठा रहा है जिसने आतंकियों के गढ़ में जाकर तिरंगा गाड़ा था।

“गीदड़ जब शेर की खामोशी को डर समझ ले, तो यह उसकी मंदबुद्धि का प्रमाण है। जिसे संघर्ष का ‘स’ भी मालूम नहीं, वह तपस्या के शिखर पर बैठे व्यक्ति को भागने की नसीहत दे रहा है।”

मोदी को ‘डरपोक’ कहना केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों के संघर्ष का अपमान है जिन्होंने 90 के दशक की आग झेली है। एक शांत व्यक्ति का सब्र जब टूटता है, तो वह केवल सत्ता नहीं, बल्कि इतिहास के पन्ने बदल देता है। अनुच्छेद 370 का खात्मा और आज लाल चौक पर तिरंगे की शान, मोदी के उसी पुराने संकल्प की सिद्धि है।

आरोप लगाने वालों को याद रखना चाहिए— इतिहास चिल्लाने वालों का नहीं, बल्कि इतिहास रचने वालों का होता है। #viralvideoシ #romance #lovesong #stories #science #love #viralphoto #reelsfypシ

@सोशल मीडिया

 

कैम्ब्रिज में राहुल गांधी: राउल विंची, राहुल विंची या दा विंची?
1991 में उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद, राहुल के सबसे करीबी लोग उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे और संभवतः उन्होंने ही उन्हें भ्रामक उपनाम में छिपने को मजबूर किया था।

अब इस बात की पुष्टि हो गई है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 1994-95 में कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में एक साल की पढ़ाई में “राहुल विंची” नाम अपनाया था।

द टेलीग्राफ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार , 1991 में उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या बाद, राहुल के सबसे करीबी लोग उनकी सुरक्षा को चिंतित थे और संभवतः उन्होंने ही उन्हें भ्रामक उपनाम में छिपने को मजबूर किया था।

रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के सूत्रों का हवाला दे बताया गया है कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सदस्यों की सूची वाली “रेड बुक” में उनका नाम “VINCI, Rahul T MPHIL95” के रूप में दर्ज है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां “टी” उनके कॉलेज, ट्रिनिटी को दर्शाता है, जहां उनके परदादा जवाहरलाल नेहरू और पिता राजीव गांधी स्नातक थे – पूर्व ने प्राकृतिक विज्ञान की पढ़ाई की, बाद वाले ने इंजीनियरिंग की, हालांकि आमतौर पर यह माना जाता है कि राजीव ने अपनी डिग्री पूरी नहीं की।

“रेड बुक” में छिपे रहस्यमय कोड का अर्थ है कि राहुल विंची ने 1995 में एमफिल उपाधि प्राप्त की थी। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रोफेसर एलिसन रिचर्ड ने हाल ही में एक पत्र में पुष्टि की थी कि राहुल को वास्तव में 1995 में राउल विंची के नाम से विकास अध्ययन में एमफिल उपाधि से सम्मानित किया गया था। उन्होंने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपकी डिग्री को लेकर विवाद हुआ है और हम इस विवाद को तुरंत समाप्त करना चाहते है।

इस बीच, ब्रिटेन स्थित एक शिक्षाविद ने राहुल गांधी के कैम्ब्रिज स्नातक होने की साख को लेकर चल रही अटकलें दूर करने की कोशिश करते हुए कहा कि कांग्रेस उपाध्यक्ष को इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाने में उनका हाथ था।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो डॉ. अनिल सील ने कहा, “हां, कुछ साल पहले जब राहुल दा विंची नाम से गुप्त रूप से ट्रिनिटी आया था, तब उसे लाने में मेरा हाथ था, लेकिन मैंने वास्तव में विकास अध्ययन नहीं पढ़ाया।”

आधे भारतीय मूल के इस विद्वान का परिचय राहुल के “निजी शिक्षक”  रूप में कराए जाने और उनसे पहले उनके पिता राजीव के रूप में कराए जाने पर यह प्रतिक्रिया थी, जिन्हें उन्होंने “शायद हमारा सबसे होनहार छात्र नहीं” बताया था।

तो, कैम्ब्रिज में पढ़ाई में राहुल ने सही नाम क्या रखा था: राउल विंची, राहुल विंची या दा विंची? यह तो सिर्फ कांग्रेस उपाध्यक्ष ही बता सकते हैं कि उनके एमफिल सर्टिफिकेट पर कौन सा नाम लिखा है।

हाल ही में टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को साक्षात्कार में राहुल गांधी ने भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी के उन आरोपों का जवाब दिया, जिनमें उन्होंने उनकी डिग्रियां फर्जी बतायी थी। कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर स्वामी चाहें तो अपनी डिग्रियां दिखा सकते हैं । साथ ही यह भी कहा कि स्वामी पिछले 40 वर्षों से उनके परिवार पर आक्रामक हैं। गांधी ने कहा कि उन्होंने लोकसभा में अपनी डिग्रियों के संबंध में शपथ पत्र प्रस्तुत किया था और यदि वे फर्जी हैं तो स्वामी कानूनी कार्रवाई करने को स्वतंत्र हैं।

 

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