मत: आरक्षण पर चर्चा छोड़ आगे बढने का है समय

ब्राह्मणवाद से आजादी चाहिए या वोट बैंक की राजनीति?
जिस देश में कलेक्टर अनुसूचित जाति जनजाति का हो और ब्राह्मण चपरासी, वहां आखिर कौन सा ब्राह्मणवाद है?

कन्हैया कुमार, प्रियंका भारती, योगेंद्र यादव और RJD की कंचना यादव का ढोल-डफली नृत्य हाल ही में जेएनयू में फिर वही पुराने नारे गूंजे – “ब्राह्मणवाद से आजादी”, “मनुवाद से आजादी”। कांग्रेस नेता और पूर्व जेएनयू छात्र कन्हैया कुमार डफली बजाते हुए वहाँ पहुँचे, जहाँ कुछ ‘बुजुर्ग’ छात्र (जिन्हें हमारे टैक्स के पैसे से अभी भी पढ़ाया जा रहा है) के साथ मिलकर ये नारे लगा रहे थे। चुनाव में जमानत जब्त कर चुके कन्हैया अब फिर उसी जेएनयू में, हमारे पैसे पर पल रहे लोगों के साथ, ढोल-डफली लेकर ‘आजादी की मांग’ का ढिंढोरा पीट रहे हैं।सवाल बड़ा साफ है – आखिर किस ब्राह्मणवाद से आजादी चाहिए?
जिस देश में सैकड़ों कलेक्टर, मंत्री, सांसद, विधायक अनुसूचित जाति-जनजाति से आ चुके हैं, उनके अधीन ब्राह्मण चपरासी काम कर रहे हैं। जहाँ 99.99% लोग कभी मनुस्मृति पढ़े ही नहीं, वहाँ यह ‘ब्राह्मणवाद’ कौन सा है जो आज भी आजादी मांग रहा है?
यह सिर्फ वोट बैंक को जिंदा रखने का बहाना नहीं तो और क्या है?वी.पी. सिंह ने एससी-एसटी-ओबीसी और मुस्लिमों को मिलाकर एक ऐसा वोट बैंक तैयार करने की कोशिश की थी, जिससे सौ साल राज किया जा सके। लेकिन कुदरत ने उनकी अकाल मृत्यु (कैंसर) कर दी। उनकी नीतियों के विरोध में दर्जनों युवकों ने आत्मदाह किया। याद रखें, ओबीसी आरक्षण की मांग उस समय ओबीसी खुद नहीं कर रहे थे – ‘ओबीसी’ शब्द भी प्रचलन में नहीं था।दरअसल, दलित और ओबीसी दो अलग-अलग बातें हैं।
दलितों को सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ा, जबकि ओबीसी (और कथित सवर्णों सहित 98% भारतीय) मुख्य रूप से आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। लेकिन आज कुछ नेता इन दोनों को मिलाकर एक ही डिब्बे में बेच रहे हैं – सिर्फ वोट के लिए।
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हिंदुस्तान में कोई भी पार्टी या तानाशाह आए, आरक्षण अगले 1000 साल तक नहीं हटेगा। क्यों? क्योंकि यह अब सामाजिक-आर्थिक उत्थान का नहीं, बल्कि शुद्ध वोट बैंक का मुद्दा बन चुका है।
कोई भी संगठित वोट बैंक खोना नहीं चाहता।
इसलिए जिन लोगों को आरक्षण मिल रहा है उन्हें और जिन्हें नहीं मिला है उन्हें भी,इस मुद्दे पर चुप बैठ जाना चाहिए।
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कुछ राजनीतिक दल (जैसे राजद,सपा और वामपंथी) ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं कि समाज दो हिस्सों में बंट जाए – आरक्षण वाले और गैर-आरक्षण वाले। इनमें आपस में शादी-ब्याह तक नहीं हो जाए। अगर एससी-एसटी मुख्यधारा में पूरी तरह आ गए, तो इन पार्टियों को वोट कौन देगा? आजकल ये मुसलमानों से भी परहेज करने लगे हैं, क्योंकि हिंदुओं का वोट बैंक नाराज हो सकता है।
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ऐसे फर्जी नेताओं के नाम गिनें तो – कन्हैया कुमार, प्रियंका भारती (आरजेडी प्रवक्ता), योगेंद्र यादव (जो अक्सर जाति-आरक्षण पर बहस को भड़काते हैं), और आरजेडी की ही राष्ट्रीय प्रवक्ता कंचना यादव (जिन्होंने हाल में विवादास्पद बयान दिए कि सामान्य वर्ग के युवाओं को झूठे केस में फंसाया जाना चाहिए, ताकि ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का बदला लिया जा सके)।
ये लोग आरक्षण के नाम पर नफरत फैला रहे हैं, जबकि असल में ये दलित-ओबीसी समुदाय की प्रगति नहीं चाहते – बस वोट चाहिए।
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एक कड़वी सच्चाई – सरकारी नौकरियाँ कुल रोजगार का मुश्किल से 3% हैं। असली मलाई प्राइवेट सेक्टर, बिजनेस और उद्यमिता में है। लेकिन एससी-एसटी-ओबीसी के युवा पटवारी से आईएएस तक की तैयारी में 15-20 साल लगा देते हैं। नौकरी नहीं मिली तो जीवन बर्बाद।मेरा मानना है कि आरक्षण पर बहस बंद होनी चाहिए।
एससी-एसटी-ओबीसी को अब स्किल डेवलपमेंट, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उद्यमिता और प्राइवेट सेक्टर में अवसरों पर फोकस करना चाहिए। आरक्षण तो मिल ही रहा है – इन फर्जी नेताओं की ‘पहली’ की जरूरत नहीं है।जब तक कन्हैया कुमार, प्रियंका भारती, योगेंद्र यादव, कंचना यादव और ऐसे नेता बिना मौसम के ‘आरक्षण-आरक्षण’, ‘जाति-जाति’, ‘ब्राह्मणवाद-मनुवाद’ चिल्लाते रहेंगे, तब तक जातिवाद नहीं मिटेगा। बल्कि प्राइवेट सेक्टर में कंपनियाँ आरक्षण वाली जातियों से डरने लगेंगी – कहीं एससी-एसटी एक्ट में झूठा केस न हो जाए।यह समय है कि एससी-एसटी-ओबीसी समुदाय ऐसे फर्जी नेतागिरी करने वालों को हतोत्साहित न करें। असली आजादी तो सामाजिक-आर्थिक समानता, स्किल और आत्मनिर्भरता से आएगी – न कि ढोल-डफली, नफरत भरे नारों और झूठे वादों से।
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मेरा मानना है कि तथाकथित सवर्ण जाति के लोगों को भी आरक्षण हो या ना हो इस बहस में पड़ने के बजाय लगातार स्किल डेवलपमेंट से स्वरोजगार और बिजनेस पर फोकस करना चाहिए।

वेद माथुर

थआईएएस और आईएफएस की तुलना में आईपीएस में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के अधिक लोग चयनित होते हैं।

पांच वर्षों में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस) की तुलना में ओबीसी, एससी और एसटी श्रेणियों के अधिक उम्मीदवारों की नियुक्ति हुई है। यह जानकारी राज्यसभा में कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉक्टर जितेंद्र सिंह ने लिखित उत्तर में दी।

2020 से 2024 के बीच, सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद तीनों सेवाओं में 255 ओबीसी, 141 एससी और 71 एसटी उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया। इसी अवधि में, 245 ओबीसी उम्मीदवारों को आईएएस, 135 एससी उम्मीदवारों को भारतीय पुलिस सेवा और 67 एसटी उम्मीदवारों को आईएफएस में नियुक्त किया गया। अकेले आईएफएस में, पिछले पांच वर्षों में 231 ओबीसी, 95 एससी और 48 एसटी उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया।

इन नियुक्तियों के बावजूद, अधिकारियों की अभी भी कमी है।

आईएएस विभाग में स्वीकृत 6,877 पदों के मुकाबले 1,300 अधिकारियों की कमी है। आईपीएस विभाग में 5,099 पदों के मुकाबले 505 अधिकारियों की कमी है। आईएफएस विभाग में स्वीकृत 3,193 पदों के मुकाबले 1,029 अधिकारियों की कमी है। 1 जनवरी, 2025 तक, भारत भर में 5,577 आईएएस, 4,594 आईपीएस और 2,164 आईएफएस अधिकारी कार्यरत हैं।

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