मत: “संस्कृति के चार अध्याय” लोभ में लिखी कि दबाव में दिनकर ने ?

संस्कृति का नेहरुवादी पाठ

संस्कृति के चार अध्याय (1955 ईस्वी में प्रकाशित) राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की अत्यन्त चर्चित ऐतिहासिक वैचारिक व संस्कृति निर्माण को प्रयत्नशील सैनिक प्रहरी जैसी समादृत कृति रही है।

जिन विद्वानों की कृतियां स्रोत सामग्री के रूप में आधार बनायी है दिनकर ने यह पुस्तक लिखने को, उनमें से कुछ विद्वानों के नाम पढिये। असल बात तो यह है कि जिन कृतियों को स्रोत व शोध का विषय बनाए हैं वे खुद कितनी पूर्वग्रहमुक्त रही… यह बात जाननी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

वैसे इस सूची में “कई” विद्वानों का सर्जनात्मक कर्म बहुत ही प्रशस्त, वस्तुनिष्ठ, गम्भीर तथा पूर्वाग्रहमुक्त रहा है।
कोई भी लेखक खुद क्या पैमाना सेट कर रहा है अपने लेखन का, यह कौशल और जादूगरी तो खुद उसकी अपनी होती है। कहना अनावश्यक है कि इस काम में दिनकर हों या लिबरल धारा के और महानुभाव, अत्यन्त माहिर रहे हैं। दिनकर ने अपनी इस पुस्तक में जिन रचनाकारों, इतिहासकारों और चिंतकों, विचारकों की कृतियों से सहायक सामग्री ली है, उनमें हैं-जयचन्द्र विद्यालंकार, विसेन्ट स्मिथ, मंगलदेव शास्त्री, के.एस. आयंगार, फुरर हैमनदोर्फ, पी टी श्रीनिवास यंगार, डाक्टर आर जी भंडारकर, नीलकण्ठ शास्त्री, विल डूरन्त, गिब्बन, स्टोडार्ड, डी एस शर्मा, सर विलियम जोन्स, बाल गंगाधर तिलक, विन्टरनिट्ज, क्रेमरिश, जैकोबी, मैक्समूलर, सिल्वा लेवी, ए बी कीथ, बिल्बेरफोर्स, विल्किन्स, मोनियर विलियम्स, हर्बर्ट रिजले, रामचन्द्र दीक्षिततर, के पी जायसवाल, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, रमेश चन्द्र मजूमदार, सुनीति कुमार चतुज्र्या, डाक्टर काल्डबेल, डॉक्टर अब्राहम ग्रियर्सन, प्रोफेसर बी एस गुहा, प्रोफेसर सत्यकेतु विद्यालंकार, सर चार्ल्स इलियट, डाउसन एंड एलियट, लक्ष्मण शास्त्री जोशी, डॉक्टर अम्बेडकर, क्षितिमोहन सेन, धर्मानन्द कोसांबी, आचार्य नरेन्द्रदेव, राहुल सांकृत्यायन, इगोन फ्रिदेल, मोहम्मद हबीब, एम एन राय, राजबली पांडेय, महर्षि दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, मुहम्मद अली, ए सी बकेट, चन्द्रबली पांडेय, इकबाल, श्यामलदास कविराज, ताराचन्द, प्रोफेसर हुमायूं कबीर, एस आबिद हुसैन, सर सैय्यद अहमद खान, पी वी काणे, आनन्द केंटिश कुमारास्वामी, एस अल्तेकर आदि…

यह पूरी सूची नहीं है। बहुत नाम छूट गए हैं। यह तो सरसरी दृष्टि से जो याद आये, लिखता गया…
सेकुलर लिबरल व वामपन्थी धारा के लेखक बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ते थे। विधिवत अध्ययन कर नैरेटिव्स सेट करते थे और अपनी ऐंद्रजालिक झप्पी बौद्धिक समाज व सुकोमल पाठकों को देते थे। इसीलिए देश की परम्परा, सनातन जीवन धारा तथा जातीय अस्मिता के मूल आत्मबिम्ब ऐसे गड्डमड्ड हुए कि सब गुड़ गोबर हो गया।

दिनकर का जीवन, आचरण और उनकी साहित्यिक सर्जनात्मक प्रतिभा में कोई मेल नहीं था। ज्यादातर यही देखा जाता है कि किसी भी सर्जक की कारयित्री भावयित्री प्रतिभा और उसके निजी जीवन कार्याचरण में बड़ा दुरंगापन रहता है। ये दोनों क्षेत्र इतने भिन्न हैं कि यदि उस साहित्यकार की आत्मकथा या जीवनी या निज वृत्तान्त से हमारा परिचय न हो तो हम कभी न जान पाएंगे कि हमारा यह आदर्शवान सर्जक अपने व्यक्तित्व में है कैसा ?

दिनकर की काव्यात्मक रचनात्मक प्रतिभा देखकर कोई भी प्रभावित हो जाएगा, हालांकि ठीकठाक पारखी हो तो ज्यादा प्रभावित भी नहीं होगा -लेकिन उनके ऐतिहासिक ग्रन्थ ”संस्कृति के चार अध्याय” ने उनके बेमेल, दुरंगे व्यक्तित्व को हम सबके सामने लाकर खड़ा कर दिया है।

ऐतिहासिक विश्लेषण और उसमें भी संस्कृति की मीमांसा के क्रम में एकदम विपरीत ध्रुव पर खड़ी इस्लामी संस्कृति व मजहब के साथ हिन्दू जीवनधारा के विवेचन में दिनकर की सारी चालाकी, धूर्ततापूर्ण कोशिश निकल कर सामने आती है।

यह हिंदीपट्टी के अकेले एक साहित्यकार का नहीं बल्कि तमाम आत्महीन साहित्यकारों का हास्यास्पद चेहरा है —- एक बानगी है, चाहे प्रेमचंद हों, यशपाल हों, रामविलास हों, नामवर सिंह हों, रांगेय राघव हों, अशोक बाजपेयी हों…सब बेनकाब हो जाएंगे जब आप इनकी वैचारिक स्थिति का वास्तविक आकलन करेंगें।

दाराशिकोह,अकबर और गांधी अमृततुल्य हैं भारतीय राष्ट्र के लिए तथा सरहिंदी,औरंगजेब और मुहम्मद अली जिन्ना हलाहल तुल्य।

अमृत और हलाहल के इस संघर्ष में क्या हरदम हलाहल ही जीतेगा ?
यह है दिनकर की तुलना !

बताइए —- अकबर, औरंगजेब और दाराशिकोह अलग कहाँ से हुए मुगल वंशावली में !
सारी मनमानी इसी एक किताब में दिनकर करना चाहते थे क्या ?

वैसे दारा, अकबर के साथ गांधीजी को आत्मीय वृत्त में रखकर दिनकर ने अपने कुत्सित व शरारती विश्लेषण में आधा झूठ और आधा सच लिख ही दिया !

बाकी अब बात हो जाए दाराशिकोह की। लिबरल खेमे का वह वैसे ही हथियार है जैसे अकबर। राहुल सांकृत्यायन और सतीश चंद्र तो अकबर के इबादतखाने की स्थापना (1576 ईस्वी) तथा इसका उद्देश्य बतलाते हुए अकबर को शिकागो धर्म सम्मेलन का पूर्ववर्ती प्रवर्तक तथा स्वामी विवेकानन्द का पथ प्रदर्शक बता देते हैं। महापण्डित उलरते हुए लिखते हैं कि शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन(1893 ईस्वी) के 300 वर्ष पूर्व महान मुगल सम्राट अकबर ने इबादतखाने के माध्यम से सभी धर्मों, सम्प्रदायों और नेताओं को बुलाकर वह सत्य प्रकट कर दिया था जिसे विवेकानन्द ने 1893 में संसार के सम्मुख रखा।

साथ ही अकबर के राज्य को ‘सांस्कृतिक राज्य’ का प्रस्तावक बताते हैं, ठीक वैसे जैसे अशोक, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, शार्लमान तथा लुई चौदहवें और यूनान के पेरीक्लीज का युग था। इतना ही नहीं, अकबर को सोलहवीं सदी से खींचकर इक्कीसवीं सदी का सांस्कृतिक दूत बतलाते हैं।

क्या करेंगें भाई — नेहरूवियन युग में चापलूसों की कमी थी ही नहीं। जिधर देखिए, कोई न कोई चिमटा करताल बजाते गंगा जमुनी उदार सहिष्णु संस्कृति का पोस्टर बैनर लिये दौड़ता ही रहता था। इतिहासकार लिख भी तो मारे हैं दारा लघु अकबर साबित होता और दिनकर तो अकबर दाराशिकोह और गांधी को अमृत तथा औरंगजेब, सरहिंदी और जिन्ना को हलाहल बताते हैं।

इतनी मनमानी कि बदमाश अकबर जिसने बड़ी चालाकी से मुगलिया साम्राज्यवाद और इस्लामिक संस्कृति को देशव्यापी विस्तार दिया, वह राष्ट्रीय एकीकरण का प्रवर्तक और अपने पोते औरंगजेब का दुश्मन बताया गया। इतनी आत्महीनता कहीं न दिखेगी आपको।

बाकी — दाराशिकोह बड़ा चोंचला है। इसे जानने को अल्लामा इकबाल की रमूज़े बेखुदी  में औरंगजेब और दाराशिकोह की तुलना पढऩी चाहिए।

वेदान्त रूपी जड़ी बूटी से दिनकर ने हिन्दू-मुस्लिम एकता का रहस्य खोज निकाला है अपनी चर्चित पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में।

मुझे लगता है भारतीय चिन्तकों और बुद्धिजीवियों में जो दिनकर का दृष्टिकोण और समझ है, वही बीसवीं सदी के राष्ट्रीय आन्दोलन के लगभग सभी राजनेताओं, विचारकों और अग्रदूतों की रही है। बहुत विस्मय और आश्चर्य का विषय है कि राष्ट्रीय आंदोलन में ही इन नेताओं के बीच मौजूद डाॅक्टर अम्बेडकर की समझ हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न पर एकदम यथार्थवादी और निर्भान्त थी, फिर भी न तो किसी समकालीन नेता, चिन्तक विचारक ने डॉक्टर अम्बेडकर का दृष्टिकोण और विश्लेषण  गम्भीरतापूर्वक, प्रमुखता से हाईलाइट किया, न ही राजनीतिक विमर्श में वह अत्यन्त सारगर्भित विश्लेषण सामने रखा।सारे के सारे नेता व कर्णधार गांधी, नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश, नरेन्द्रदेव, धूर्त मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसों के फूहड़, झूठ, अवास्तविक और बिल्कुल झूठ के रूप में प्रचलित, स्थापित सन्दर्भों पर बात करते रहे।

इसी झूठ और अवास्तविक समझ को दिनकर अपनी किताब में किस नजाकत से प्रस्तुत करते हैं देखिए:
‘हिन्दू मुस्लिम एकता की समस्या भारतवर्ष की सबसे भयानक समस्या है। जब सन 1920 ईस्वी में गांधीजी आये और उन्होंने खिलाफत तथा असहयोग आंदोलनों को मिलाकर हिन्दुओं और मुसलमानों को एक कर दिया, अंग्रेज घबरा गए थे और भारतवासियों का हृदय आशा से फूल उठा था, किन्तु एकता टिकी नहीं। जिन मुसलमानों ने राष्ट्रीयता का व्रत लिया, बाकी मुस्लिम जनता उनके खिलाफ हो गयी। आखिर को, आजादी के समय, भारत का विभाजन इस उम्मीद में किया गया कि इससे हिन्दू-मुस्लिम समस्या समाप्त हो जाएगी। सो, देश बंट गया यह सही है, परन्तु एकता आज भी नहीं है।
सोचिए —- इतनी फूहड़, अवास्तविक और झूठ आधारित समझ होगी इनकी या किसी भी राजनेता की तो अंजाम क्या होगा ? इन्हें — हसरत मोहानी, मोहम्मद अली, शौकत अली, हकीम अजमल खान, मौलाना अबुल कलाम आजाद, अब्दुल बारी जैसे इस्लामपरस्त, आले दर्जे के धूर्त जिन्होंने आजीवन कट्टरता तथा अपना मजहब बढ़ाने को राष्ट्रीय प्रश्न दरकिनार किये, ये इन विचारकों को राष्ट्रीयता का व्रती मानते हैं और पूरे राष्ट्रीय आंदोलन व बाद में भी अपने हरेक नैरेटिव्स में इनका भारतीयता व राष्ट्रीयता का सन्दर्भ बेहिचक स्थापित करते हैं।

इस समझ पर एकदम दो टूक इतना ही जानें सब तथा इसे जानते भी हैं हम सब कि इस्लाम और उसके चरित्र की ऐसी अवास्तविक व तथ्यहीन समझ हो तो किसी राष्ट्र का बंटवारा बार-बार होता रहेगा।

आगे दिनकर इस हिन्दू मुस्लिम एकता स्थापना को जो रसायन परोसते हैं उसे देखिए ‘हिन्दू-मुस्लिम-एकता की राहें केवल दो हैं। एक तो यह कि देश से धर्म का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जाए, मस्जिद और मन्दिर नेस्तनाबूद कर दिए जाएं और आदमी केवल आर्थिक और राजनीतिक यन्त्र का पुर्जा बनाकर छोड़ दिया जाय। गाय और बाजे के पीछे आदमी की कीमती जानें इस देश में इतनी ज्यादा बर्बाद हुई हैं कि बीसवीं सदी के अनेक चिन्तकों और कवियों को एक समय यही राह ठीक दिखाई देती थी।

(समस्या की मूल जड़ इस मजहब में मौजूद जो मूलभूत पक्ष हैं जिसमें अपने मजहब की भयानक कट्टरता, सत्य का एकांगी दृष्टिकोण, आसमानी पुस्तक के इतर कुछ भी सत्य नहीं, मोहम्मदवाद जैसे सन्दर्भ — और इसे अम्बेडकर को छोड़कर तत्समय के नेताओं, चिन्तकों में और किसी ने रेखांकित तक नहीं किया।)

दिनकर का दूसरा रास्ता या नुस्खा भी देखिए इस आधारभूत प्रश्न के सम्बन्ध में। यह भी कितना हास्यास्पद और तरस खाने वाला है:

  ‘इस एकता स्थापना की दूसरी राह वेदान्त की राह है। वेदान्त हिन्दू दर्शन का शब्द जरूर है, लेकिन, वह हिन्दुत्व नहीं है। सच्चा वेदांती न हिन्दू होता है, न मुसलमान, न बौद्ध या क्रिस्तान, वह केवल अच्छा आदमी होता है या केवल दिनकर होता है। ………ऐसे ही बड़ा भौंडा काफी लंबा चौड़ा लिखे हैं। बस समापन वाक्य देखिए, उसी में दिनकर की हिन्दू मुस्लिम एकता स्थापना की कसौटी क्या जादुई सुरमा लगाकर प्रकट हुई है।

”वेदान्त धर्म का वह रूप है जो मुसलमान को पहले से अच्छा मुसलमान और हिन्दू को पहले से अच्छा हिन्दू बना सकता है।”संस्कृति के चार अध्याय, 281, 282.
कितने चालाक थे ये सब, पढ़कर देखिए आप सब !
दिनकर ने ”संस्कृति के चार अध्याय” में तीसरे संस्करण की भूमिका (3 अगस्त 1962 ईस्वी) में स्पष्ट लिखा है कि: इस संस्करण में इस्लाम खण्ड को पूरा-का-पूरा दुबारा से लिखा है मैंने।’
ऐसे में अगर कोई पाठक या अध्येता तमाम नए तथ्य, सन्दर्भ व हास्यापद प्रसंग दिनकर से विश्लेषित होता पाते हैं तो वे परेशान न हों। जो भी संशोधन या बदलाव दिनकर ने किया है, खुद किया है।

1962 ईस्वी में उनका क्या अंदरूनी उद्देश्य था, यह पोलिटिकल एजेंडा छुपा नहीं है किसी से। मुझे नहीं मालूम पहले व दूसरे संस्करण में यह किताब किन बातों को समेटती थी, लेकिन तीसरे संस्करण के बाद जिसमें दिनकर ने बहुत बदलाव कर दिया है, जो भी पुस्तक का रूप है पढऩे को वही पढ़कर मैने यह सामग्री रखी है।

कई साथियों ने जिज्ञासा प्रकट की कि क्या वास्तव में ऐसा लिखा है दिनकर ने ?तो उनके ही समाधान को यह स्पष्टीकरण आवश्यक था।
इस पुस्तक के इस्लाम खण्ड में एक अध्याय है —- प्रकरण।
इसका नाम है: अमृत और हलाहल का संघर्ष। इसमें कुछ बड़े मजेदार व हास्यास्पद प्रसंग दिए गए हैं, उन्हें देखिए :
अकबर ने कुछ दिनों तक पुनर्जन्म में विश्वास किया था और कभी-कभी वह दरबार मे चन्दन लगाकर बैठता था।
अमृत और हलाहल की दूसरी लड़ाई फिर बीसवीं सदी में आकर हुई, जब भारत के नेता महात्मा गांधी हुए। अकबर ने जैसी उदारता हिन्दुओं के साथ बरती थी, बहुत कुछ वैसी ही उदारता का व्यवहार गांधीजी ने मुसलमानों से किया। (देखें इनका विश्लेषण, गांधीजी भी ब्रिटिश हुकूमत के भीतर सार्वभौम निरंकुश सम्राट थे मुगले आजम की तरह) लेकिन, इस देश मे जो मुसलमान हिन्दुओं का पक्षपाती होता है, उसे मुसलमान मार डालते हैं, जैसे औरंगजेब ने दाराशिकोह को मार डाला। और जो हिन्दू मुसलमानों का पक्षपाती होता है, उसे हिन्दू मार डालते हैं, जैसे गोडसे ने गांधी की हत्या कर दी।

कहने को कुछ बचता है ?औरंगजेब, सरहिंदी, जिन्ना, गोडसे और अन्य हिन्दू जो हिन्दुत्व पर कट्टर आस्था रखें एक पलड़े में, दाराशिकोह, अकबर और गांधी दूसरे पलड़े में। हिंदुओं ने मुस्लिमों की दिन रात वकालत करने वाले कितने लिबरल सेकुलर लोगों की हत्या की, इन्हें बताइए। इतना लिजलिजा, फूहड़ हास्यास्पद विश्लेषण करता कौन है ?
इतना ही नहीं, ये आगे जो लिखते हैं उसमें इनकी इस्लाम धर्म की समझ देखिए। समझ इन्हें पूरी है लेकिन अपने चाचू नेहरु का दबाव देखिए: अकबर के विचार 16वीं सदी के लिए समय से बहुत आगे थे। लेकिन, गांधीजी का जो हाल हुआ उससे यही दिखाई देता है कि पिछले 400 वर्षो में भी हम आगे नहीं बढ़े हैं। अकबर अपने समय से आगे थे, लेकिन, गांधीजी भी अपने समय से आगे ही दिखाई पड़े। भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए यह कितनी ग्लानि की बात है ?
चार अध्याय, 331.
सोचिए, यह है इनका विश्लेषण और इनकी समझ। इस्लाम को ये इस तरह समझे हैं। जो लोग 2014 से 2026 का 12 वर्ष नहीं बर्दाश्त कर पा रहे, वे समझ विकसित करेंगें हिन्दुओं के साथ? ऐसे ही विचार गांधी, नेहरू, दिनकर और समस्त उस बुद्धिजीवी वर्ग के थे और आज तक हैं जिन्हें लिबरल सेकुलर और कम्युनिस्ट के रूप में हम आप जानते हैं। यह है दिनकर का पोलिटिकल एजेंडा।
चलिए इसी चैप्टर से कुछ और हास्यास्पद व लज्जास्पद दृष्टान्त देते हैं:
जहांगीर और शाहजहाँ, दोनों की माताएं हिन्दू थीं, अतएव, हिन्दू-विरोधी कट्टरपन इन लोगों में नहीं आया। (संस्कृति के चार अध्याय,  331.)
अब बताइए, शाहजहाँ बनारस में 63 मन्दिर गिराकर भी कट्टर नहीं है। इतना ही नहीं, मन्दिर तोडऩे के उसके राजाज्ञा (1632 ईस्वी) के क्रम में कुछ पुराने मन्दिर नहीं तोड़े गए जिस पर राष्ट्रकवि लिखते हैं कि: इससे शाहजहाँ की उदारता परिलक्षित होती है। क्या कहा जाए इन्हें….
शरीयत के हरेक सिद्धांत, कानून को लागू करके हिन्दुओ को अपने शासनकाल में गुलाम सामाजिक स्थिति में रखने वाला सुन्नी मुसलमान शाहजहाँ कट्टर नहीं है क्योंकि उसकी मां हिन्दू है।😊😊
शाहजहाँ का एक और चुलबुला प्रसंग इन्होंने उद्धृत किया है उसे देखिए:
 ‘……शाहजहाँ ने अपने मुस्लिम अफसरों में से एक का दाहिना हाथ इसलिए कटवा दिया था क्योंकि उसने दो मोर पक्षियों का शिकार किया था और शाहजहाँ की आज्ञा थी कि जिन-जिन जीवों का वध करने से हिन्दुओं की भावना को ठेस पहुंचे, उनका वध न किया जाय(संस्कृति के चार अध्याय 332.) —–

सोचिए जो बदमाश बादशाह हिन्दुओं के धर्मांतरण को बाकायदा राज्य मशीनरी से दो मुस्लिम अधिकारी तैनात करता हो, उसे हिन्दुओं की भावनाओं का ख्याल रहेगा।

( शाहजहाँ की धर्मांतरण मुहिम पढें एस एल भैरप्पा की कृति ”आवरण the vail**** में.)

आगे देखें —– राष्ट्रकवि और महाकवि दिनकर अकबर जिल्ले इलाही की तारीफ में राहुल सांकृत्यायन को कई मील पीछे छोड़ गए:
कितने विस्मय की बात है कि जब फ्रान्स में कैथोलिक लोग प्रोटेस्टेंट को जिंदा जला रहे थे, जब इंग्लैंड में एलिजाबेथ प्रथम के समय प्रोटेस्टेंट लोग कैथोलिकों से फ्रान्स का बदला दुगुने बल से चुका रहे थे और जब इनक्विजिशन के मारे स्पेन में यहूदियों का बुरा हाल था, तब भारतवर्ष में अकबर हिन्दुओं पर मुस्लिम अत्याचारों का निशान दूध और अमृत से धो रहा था। (संस्कृति के चार अध्याय, 331.)
इससे ज्यादा हास्यास्पद और कुछ पढऩा चाहेंगे आप? तब काहे न देश भर में मुगले आजम की कीर्ति गायी जाय….। और एक फूहड़ दृष्टान्त देखिए:
जिस दिन दाराशिकोह मारा गया और औरंगजेब गद्दीनशीन हुआ, सामासिक संस्कृति का कलेजा असल में, उसी रोज फटा और तब से, यद्यपि, हम इस फटन को बार बार सीने की कोशिश करते रहे हैं, किन्तु, वह ठीक से सिल नहीं पाती। (संस्कृति के चार अध्याय,  332.)
अब सोचिए, यह सामासिक संस्कृति है इनकी। जब 1947 से 2014 तक नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया सबने मिलकर इसे सिला तब भी बंगाल, कश्मीर, केरल, पंजाब में जो हुआ उसे दिनकर और नेहरू नहीं बचा पाए।
कश्मीर में 5 लाख हिन्दू कश्मीरी मार डाले गए, उन्हें मारने औरंगजेब और सरहिंदी आये थे…..इस आदमी की जोकरई का जबाव नहीं इस पुस्तक में।
इस्लाम का मूल चरित्र जानना हो तो सीताराम गोयल, गोलवलकर, सावरकर व  पुरुषोत्तम नागेश ओक की किताबें पढि़ए । ये लोग तो देश को वहीं ले जाकर पटकेंगे जहां वह 1947 के समय था।

शिव कुमार
लेखक स्वतंत्र अध्येयता हैं।

संदर्भ***** प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक एस.एल. भैरप्पा (S.L. Bhyrappa) के प्रसिद्ध और विवादास्पद उपन्यास ‘आवरण’ (Aavarana – The Veil) में मुगल काल में धर्मांतरण (Conversion) का चित्रण मिलता है।
इसमें धर्मांतरण और ऐतिहासिक संदर्भों का विवरण है:
 उपन्यास ‘आवरण’ में, भैरप्पा ने मुगलों के अधीन भारत में धर्मांतरण के भयावह इतिहास उजागर किया है। इसमें एक मुख्य उप-कथा (subplot) ख्वाजा जहां (Khwaja Jahan) की है, जो एक हिंदू राजपूत राजकुमार था। उसे मुगलों ने बंदी बना लिया और मुगल हरम में सेवा करने को नपुंसक (Eunuch) बना दिया । उपन्यास दिखाता है कि कैसे इतिहास को एक विशेष वैचारिक लेंस (Ideological lens)  से देखा गया है। भैरप्पा के अनुसार, सदियों से लूटी गई संस्कृति और धर्मांतरण की वास्तविकता छिपायी गयी है।
 भैरप्पा ने अपने लेखन में प्रश्न उठाया है कि इतिहास में जो हुआ, उसे वैसे ही क्यों नहीं देखा जाना चाहिए। उनके उपन्यासों में, विशेषकर ‘आवरण’ में, हिंदू मंदिरों के विनाश और जबरन धर्म परिवर्तन की घटनायें प्रमुखता से चित्रित की गयी हैं।
‘आवरण’ एक ऐसी कहानी है जो इतिहास की परतें खोलती है और पाठक को मुगल काल में जबरन धर्मांतरण और सांस्कृतिक विनाश दिखाती है ।
‘आवरण’ ऐतिहासिक घटनाओं और साक्ष्यों पर आधारित उपन्यास (फिक्शन)  है, जो काफी चर्चित रहा है।

एस.एल. भैराप्पा रचित ‘आवरण’ (Aavarana: The Veil), 2007 में कन्नड़ में प्रकाशित अत्यंत चर्चित ऐतिहासिक उपन्यास है। यह भारतीय इतिहास, विशेषकर मुगल काल और इस्लामी आक्रमणों के दबे पक्ष उजागर करती है। कहानी लक्ष्मी (बाद में रज़िया) के माध्यम से अपनी हिंदू जड़ों की ओर वापसी और सत्य की खोज को दर्शाती है।
उपन्यास के मुख्य बिंदु:
मूल विषय: ‘आवरण’ (पर्दा) का अर्थ है – वह झूठ जो सत्य छुपाता है। उपन्यास भारत के ऐतिहासिक तथ्यों, धर्म, और पहचान पर सवाल उठाता है।
कहानी:  वामपंथी हिंदू महिला लक्ष्मी, मुस्लिम आमिर से शादी कर रज़िया बन जाती है। वह इतिहास में औरंगजेब जैसे शासकों के मंदिरों के विध्वंस पर गहराई से शोध करती है, तो उसका वैचारिक दृष्टिकोण बदल जाता है, जिससे उसका वैवाहिक जीवन टूट जाता है।
प्रतिक्रिया: पुस्तक प्रकाशित होने से पहले ही बिक गई थी और इस पर खूब चर्चा हुई। इसे कुछ लोग हिंदू समर्थक मानते हैं, जबकि लेखक इसे ऐतिहासिक सत्य का अनावरण कहते हैं।
लेखन शैली: यह ‘कहानी के भीतर कहानी’ (रूसी गुड़िया शैली) के रूप में रचित है, जिसमें इतिहास और वर्तमान मिलाये गये हैं।

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