अमरीका-भारत ट्रेड डील: अंदर की कहानी क्या है? विवरण भी है शेष
Indo Us Trade Deal How Did Donald Trump Get Clean Bowled While Talking On Tariffs And Ceasefire
Indo-US Trade Deal: टैरिफ और सीजफायर की गुगली पर खुद ही कैसे क्लीन बोल्ड हो गए डोनाल्ड ट्रंप
Indo-US Trade Deal: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते 10 महीनों में भारत के साथ संबंधों में तनाव पैदा करने में कोई कमी नहीं रखी थी। लेकिन, दोनों देशों के मंत्रियों, राजनयिकों, सांसदों और अधिकारियों ने ऐसा आधार तैयार किया कि ट्रंप को भी आखिर हां कहना पड़ गया।
नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करके टैरिफ घटाकर 18% करने और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का ऐलान किया, वह पूरी दुनिया को चौंका गया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही ट्रंप ने भारत के खिलाफ खुन्नस निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। न जाने कितनी बार भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराने वाला दावा किया। 50% टैरिफ लगाने के बाद भी उस अमेरिकी सांसद से गलबहियां करने में परहेज नहीं किया, जिसने इसे 10 गुना बढ़ाने तक की बातें उगलीं। सवाल है कि क्या इन जमीनी हालातों के बावजूद ट्रेड डील अचानक हो गया या फिर यह दोनों देशों के बीच लंबी चर्चाओं और आपसी समझदारी के बाद ही संभव हुआ?
Indo US Trade Deal How did Donald Trump get clean bowled.
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता और डोनाल्ड ट्रंप
भारत-अमेरिका ने भविष्य के रोड मैप पर काम किया
भारत के प्रति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना रवैया ऑपरेशन सिंदूर के बाद की परिस्थियों में पूरी तरह से बदल लिया। उन्हें लगता था कि अगर उन्हें सीजफायर कराने का वाकई में श्रेय मिल जाता तो वह शांति के मसीहा बन जाते और नोबेल प्राइज भी झटक लेते। लेकिन, जब भारत से उन्हें इसपर जरा भी भाव नहीं मिला तो वह इतने चिढ़ गए कि दोनों देशों की वर्षों की दोस्ती को भी दांव पर लगाना शुरू कर दिया। लेकिन, वास्तविकता ये है कि मई 2025 से लेकर फरवरी 2026 तक के 10 महीनों में ट्रंप के कार्यकाल में ही दोनों देश आपसी संबंधों को कायम रखने के लिए भविष्य के रोड मैप पर काम करते रहे।
भारत-अमेरिका में डील को लेकर चला बैठकों का दौर
ट्रंप की जुमलेबाजी के बावजूद सच ये है कि दोनों देशों में संबंधों को कायम रखने के लिए आधिकारिक बैठकों का दौर कभी नहीं रुका। इसमें क्वाड (Quad)वर्किंग ग्रुप की बैठकों ने भी बड़ा योगदान दिया। अमेरिका के दोनों दलों के कई सांसद आपसी संबंधों के समर्थन में भारत दौरे पर आते रहे। दूसरी तरफ भारत ने भी अमेरिका के साथ अपने पुराने संबंधों को कूटनीतिक तौर पर कभी कमतर नहीं होने दिया। ट्रंप एक तरफ जो मन में आया बोलते रहे और विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिसरी और डिप्टी एनएसए पवन कपूर पिछले साल अमेरिका यात्रा पर जाते रहे। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने भी वाशिंगटन में अमेरिकी सांसदों और अधिकारियों से कूटनीतिक मेलजोल बनाए रखा। पिछले महीने आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव भी क्रिटिकल मिनरल्स पर हो रही बड़ी पहल में शामिल होने के लिए वाशिंगटन पहुंचे थे।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी निभाया बड़ा रोल
हालात तब और तेजी से सकारात्मक होने शुरू हो गए, जब भारत में नए अमेरिकी राजदूत के तौर पर सर्जियो गोर ने काम संभाल लिया। व्हाइट हाउस में उनकी सीधी पहुंच ने काम को बहुत ही आसान बना दिया। यूं तो वे अपनी नियुक्ति के साथ ही अमेरिका में सक्रिय हो गए थे, लेकिन उनके नई दिल्ली आते ही अमेरिकी सांसदों, मंत्रियों और अधिकारियों की भारत यात्रा की झरी लग गई। भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा से ठीक पहले अमेरिकी संसद की सशस्त्र सेवा समिति के अध्यक्ष माइकल रोगर्स दो दलीय सांसदों का प्रतिनिधिमंडल लेकर भारत आए। पिछले हफ्ते ही रैंकिंग मेंबर एडम स्मिथ भी अमेरिकी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल के साथ दिल्ली होकर लौटे हैं।
राजनयिकों, मंत्रियों, सांसदों ने डील का आधार बनाया
दिल्ली में इन अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों ने जिस तरह से विदेश मंत्री एस जयशंकर, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा दोनों देशों के बिजनेस लीडरों से चर्चाएं की हैं, उससे साफ है कि वह ट्रेड डील को फाइनल करने से पहले उसका आधार तैयार करने के लिए ही भारत आए थे। रोगर्स ने कहा, ‘अमेरिका भारत को एक प्रमुख रक्षा सहयोगी की तरह देखता है।’ वहीं स्मिथ ने कहा कि दोनों देशों में रक्षा सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता और दोनों के आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए फायदेमंद है।
खुद ही कैसे क्लीन बोल्ड हो गए डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी कांग्रेस के सांसदों से पहले पिछले महीने अमेरिकी सीनेटर स्टीव डानिस भी भारत आए थे। वे अमेरिकी सीनेट के फॉरेन रिलेशन कमेटी के सदस्य हैं। उन्होंने विदेश मंत्री के अलावा वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, भारतीय सांसदों और दोनों देशों के उद्योगपतियों के साथ भी बैठकें की थी। 25 जनवरी को अमेरिका के आर्मी सेक्रेटरी डेनियल ड्रिस्कॉल भी भी भारत आए थे और सीडीएस जनरल उपेंद्र द्विवेदी के साथ बैठक की थी। मतलब, 10 महीने से सिर्फ टैरिफ और सीजफायर की भाषा समझने वाले ट्रंप ने भारत के साथ जो ट्रेड डील का ऐलान किया है, उसका आधार खुद उन्हीं के मंत्रियों और अधिकारियों ने तैयार किया, जिसके सामने उनके पुराने नैरेटिव पूरी तरह से फीके पड़ गए।
Ajit Doval Strong Message To Marco Rubio Will Wait Out Us President Trump Term And Do Not Try To Bullied India
भारत को डराइए मत,ट्रंप के हटने का इंतजार करेंगे,डोभाल ने अमेरिकी विदेश मंत्री को सुना दिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर टैरिफ लगाने के बाद से ही भारत-अमेरिका के संबंध बेहद कड़वाहट भरे हो गए। हाल ही में अमेरिका ने भारत पर थोपे गए 50 % टैरिफ को घटाकर 18 % कर दिया। इस कदम से दोनों देशों के संबंधों में सहजता आई है। इसके पीछे की इनसाइड स्टोरी जानते हैं।
हाल ही में एक रिपोर्ट आई है, जिसने तहलका मचा दिया है। ब्लूूमबर्ग की इस रिपोर्ट में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को खरी-खरी सुनाने की बात कही गई है। इस मुलाकात के बाद से ही दोनों देशों के बीच कड़वाहट में कमी आई और रिश्ते सहज हो पाए। हाल ही में अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया है।
Ajit Doval vs Marco Rubio
अजीत डोभाल बनाम मार्को रुबियो
पुतिन-जिनपिंग और मोदी की मुलाकात से असहज हो गए थे ट्रंप
टाइम्स ऑफ इंडिया में ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि बीते साल शुरुआती सितंबर की बात है। यह बात तब की है, जब तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक मीटिंग हो चुकी थी। पीएम मोदी ने उस वक्त डोभाल को भारत के अमेरिका से रिश्ते सुधारने के लिए वॉशिंगटन भेजा था। मोदी-जिनपिंग और पुतिन की मुलाकात की तस्वीर वायरल होते ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप असहज हो गए थे।
मार्को रुबियो के लिए संदेश लेकर गए थे डोभाल
अजीत डोभाल विदेश मंत्री मार्को रुबियो के लिए एक संदेश लेकर गए थे। यह बात दिल्ली के उन अधिकारियों ने बताई, जो इस बैठक से परिचित हैं और जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर उन गोपनीय चर्चाओं पर बात की। डोभाल ने अमेरिकी विदेश मंत्री से कहा कि भारत दोनों देशों के बीच कड़वाहट को पीछे छोड़कर समझौते पर बातचीत फिर से शुरू करना चाहता है।
डोभाल ने रुबियो को जमकर सुना दिया
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि डोभाल ने रुबियो से साफ कहा कि भारत ट्रंप और उनके सहयोगियों के दबाव में नहीं आएगा। भारत उनके कार्यकाल के खत्म होने तक इंतजार करेगा। भारत अतीत में भी अमेरिकी प्रशासन की दुश्मनी जैसी हरकतें झेल चुका है। हालांकि, डोभाल ने रुबियो से मुलाकात में कहा कि भारत चाहता है कि ट्रंप और उनके सहयोगी भारत की सार्वजनिक आलोचना कम करें, ताकि दोनों देशों के संबंध फिर से पटरी पर आ सकें।
भारत टैरिफ और डेड इकनॉमी की बात से आहत
रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय भारत ट्रंप के अपमानों और अगस्त में उनके द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ से आहत था। ट्रंप ने भारत को उच्च टैरिफ वाली डेड इकनॉमी करार दिया था। ट्रंप ने कहा था कि वह रूसी तेल खरीदकर यूक्रेन में पुतिन के युद्ध को वित्त पोषित कर रहा है।
डोभाल की मुलाकात बाद कम हुआ तनाव
डोभाल की मुलाकात के कुछ ही समय बाद भारत-अमेरिका में तनाव कम होने के पहले संकेत दिखाई दिए। 16 सितंबर को ट्रंप ने मोदी को उनके जन्मदिन पर फोन किया और उनके शानदार काम की प्रशंसा की। साल के अंत तक, दोनों नेताओं ने टैरिफ कम करने के समझौते की ओर बढ़ते हुए चार बार और फोन पर बात की।
अमेरिका ने भारत की वस्तुओं पर टैरिफ घटा दिया
अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने कहा कि मानक राजनयिक प्रथा के अनुसार, वे निजी चर्चाओं का विवरण नहीं देते हैं। बीते सोमवार को ट्रंप ने घोषणा की कि उन्होंने मोदी के साथ एक व्यापार समझौता किया है जिससे भारत के सामान पर टैरिफ घटकर 18% हो जाएगा, जो एशिया के अधिकांश समकक्ष देशों से कम है।
इंडो-यूएस ट्रेड डील में चार सबसे ‘विवादित‘ विषयों का सच समझिये
अमेरिका और भारत के बीच करीब छह महीने टैरिफ को लेकर तनातनी चली. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने के नाम पर भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ थोपा. लेकिन, 2 और 3 फरवरी की मध्यरात्रि ट्रंप ने ही अपने टैरिफ वापस लेते हुए भारत से ट्रेड डील होने की घोषणा की. लेकिन, उनकी घोषणा से कई तरह दावे और आरोप उपजे.
पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई भारत यूएस ट्रेड डील को लेकर कई दावे और आरोप हैं.
पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई भारत यूएस ट्रेड डील को लेकर कई दावे और आरोप हैं
इंडिया और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की खबरें तरह-तरह के दावे, जश्न, आरोप और कन्फ्यूजन का सबब बनी हुई हैं. 2 फरवरी 2026 को अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर अनाउंस किया कि दोनों देशों के बीच एक ट्रेड डील हो गई है. उसके थोड़ी देर बाद हमारे पीएम नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर कन्फर्म किया कि ये डील रिश्तों को मजबूत करेगी. लेकिन जैसे ही डिटेल्स बाहर आने लगीं, कन्फ्यूजन शुरू हो गया. लोग पूछ रहे हैं कि क्या इंडिया अमेरिकी सामान पर टैरिफ जीरो कर देगा? क्या हम 500 बिलियन डॉलर का सामान अमेरिका से खरीदेंगे? रशियन तेल की खरीद पूरी तरह बंद हो जाएगी? और एग्रीकल्चर सेक्टर को डील में शामिल करके किसानों का नुकसान तो नहीं होगा? इन सब पॉइंट्स पर सबसे ज्यादा विवाद है. चलिए, एक एक करके देखते हैं कि अमेरिकी और इंडियन अधिकारियों ने क्या कहा है. तथ्यों के जरिये समझते हैं इस ट्रेड डील से जुड़े दावों और आरोपों की हकीकत.
सबसे पहले बात अमेरिकी निर्यात पर जीरो टैरिफ की.
ट्रंप ने अपनी पोस्ट में साफ कहा कि इंडिया अमेरिका के सामान पर टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर्स को जीरो कर देगा. उन्होंने लिखा, ‘इंडिया अपने टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर्स को अमेरिका के खिलाफ जीरो कर देगी.’ अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जमिसन ग्रीर ने भी सीएनबीसी को दिए इंटरव्यू में ये दोहराया. उन्होंने कहा कि इंडिया का एवरेज इंडस्ट्रियल टैरिफ 13.5% से जीरो हो जाएगा, और कई एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स जैसे ट्रीनट्स, वाइन, स्पिरिट्स, फ्रूट्स और वेजिटेबल्स पर भी टैरिफ जीरो होगा. ग्रीर ने ये भी जोड़ा कि भारत कुछ अमेरिकी स्टैंडर्ड्स को मान्यता देगा, जिससे ट्रेड बैरियर्स कम होंगे.
He added that India has reduced tariffs on many goods from the US but has been protectionist in select areas, just like the United States.
कुछ एग्री और मेडिकल पर ‘0’ टैरिफ लगाएगा भारत, ट्रंप के दावे
लेकिन इंडियन साइड से क्या? कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने 3 फरवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि डील में इंडिया के सेंसिटिव सेक्टर्स प्रोटेक्टेड हैं, लेकिन उन्होंने जीरो टैरिफ का जिक्र नहीं किया. लोकसभा और राज्यसभा में भी उन्होंने यही कहा कि डील किसानों और MSME के लिए फायदेमंद है, लेकिन कोई स्पेसिफिक डिटेल नहीं दी कि किन अमेरिकी गुड्स पर टैरिफ कम होगा. यहां कन्फ्यूजन ये है कि अगर इंडिया जीरो टैरिफ करता है, तो घरेलू इंडस्ट्री पर असर पड़ेगा, खासकर अगर अमेरिकी गुड्स सस्ते होकर बाजार में आ जाएं. लेकिन गोयल ने बार-बार जोर दिया कि ये डील ‘हर इंडियन को गर्व करने लायक’ है और ‘नेशनल इंटरेस्ट’ को सेंटर में रखा गया है. अभी तक कोई ऑफिशल जॉइंट स्टेटमेंट नहीं आया, तो ये क्लियर नहीं कि जीरो टैरिफ कितने गुड्स पर होगा.
फिर अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर के आयात के दावे की हकीकत.
ट्रंप ने अपनी पोस्ट में दावा किया कि इंडिया ‘500 बिलियन डॉलर से ज्यादा का अमेरिकी एनर्जी, टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर, कोल और दूसरे प्रोडक्ट्स खरीदेगा.’ स्पोकेसपर्सन कैरोलाइन लेविट ने भी ये दोहराया कि मोदी ने 500 बिलियन डॉलर के इन्वेस्टमेंट्स का कमिटमेंट किया है, जिसमें ट्रांसपोर्टेशन, एनर्जी और एग्रीकल्चर शामिल हैं. अमेरिकी पक्ष इसे ‘Buy American’ कमिटमेंट कह रहा है. लेकिन ये नंबर कितना रियलिस्टिक है? 2024 में भारत ने अमेरिका से सिर्फ 41.5 बिलियन डॉलर के गुड्स और 41.8 बिलियन डॉलर की सर्विसेस इंपोर्ट की थीं, कुल मिलाकर 83 बिलियन के आसपास. 500 बिलियन पहुंचने के लिए 500% बढ़ोतरी चाहिए, जिसके लिए सालों लगेंगे. कार्नेगी एंडावमेंट के इवान फाइगेनबॉम ने कहा कि ये ‘स्ट्रेच’ है, क्योंकि करंट ट्रेड बहुत कम है.
कॉमर्स मिनिस्टर गोयल ने इस नंबर का जिक्र नहीं किया है. उन्होंने सिर्फ कहा कि डील एक्सपोर्ट्स बढ़ाएगी और लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स जैसे टेक्सटाइल्स, लेदर, जेम्स एंड ज्वेलरी को फायदा होगा. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा कि 500 बिलियन पहुंचने में 20 साल लग सकते हैं, और ये शायद लॉन्ग-टर्म एस्पिरेशन है, न कि इमीडिएट कमिटमेंट. यहां विवाद ये है कि इंडिया का कुल इंपोर्ट 2025 में 720 बिलियन डॉलर था, तो एक देश से 500 बिलियन का इंपोर्ट मतलब अमेरिका का दबदबा, जो दूसरे सप्लायर्स को हटा देगा. गोयल ने लोकसभा में कहा कि डील ‘फ्यूचर-डिफाइनिंग’ है और ट्रेड को 500 बिलियन तक ले जाएगी, लेकिन ये द्विपक्षीय कारोबार का लक्ष्य लगता है, न कि सिर्फ इंपोर्ट्स का.
तीसरा बड़ा पॉइंट रशियन तेल की खरीद पर रोक का.
ट्रंप ने कहा कि मोदी ने ‘रशियन ऑयल खरीदना बंद करने’ का वादा किया है, और अब अमेरिका और वेनेजुएला से खरीदेगा. जो कि यूक्रेन वॉर को खत्म करने में मदद करेगा. रॉयटर्स ने व्हाइट हाउस ऑफिशल के हवाले से कहा कि रशियन ऑयल पर 25% पनिशमेंट टैरिफ हट गया है. लेकिन भारतीय पक्ष चुप है. गोयल ने रशियन ऑयल का जिक्र नहीं किया. रूस ने भी कहा कि दिल्ली से कोई ऐसी जानकारी नहीं मिली.
इंडियन रिफाइनर्स ने बताया कि मार्च 2026 तक शिपमेंट्स बुक हैं, और कोई डायरेक्टिव नहीं आया बंद करने का. इंडिया रशियन ऑयल पर डिपेंडेंट है – 2025 में एक तिहाई इंपोर्ट्स रशिया से थे, डिस्काउंटेड प्राइस पर. इसे बंद करने से सालाना 3-4 बिलियन डॉलर का एक्स्ट्रा कॉस्ट आएगा. फिच क्रेडिटसाइट्स ने कहा कि ये कमिटमेंट इकोनॉमिक और पॉलिटिकल रिस्क लाएगा. यहां कन्फ्यूजन सबसे ज्यादा है, क्योंकि अगर इंडिया रूसी तेल खदीदना बंद करता है, तो रूस से संबंधों पर असर पड़ेगा, जो डिफेंस का बड़ा पार्टनर है. गोयल ने सिर्फ कहा कि डील ‘स्ट्रैटेजिक डी-एस्केलेशन’ है, लेकिन ऑयल पर कुछ नहीं. कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत का रूसी तेल खरीदना उस पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और डिस्काउंट पर निर्भर करेगा.
चौथा विवाद एग्रीकल्चर सेक्टर को डील का हिस्सा बताने पर.
अमेरिकी पक्ष से ग्रीर ने कहा कि इंडिया एग्री सेक्टर में कुछ प्रोटेक्शन रखेगी, लेकिन कई गुड्स जैसे नट्स, फ्रूट्स, वेजिटेबल्स पर टैरिफ जीरो होगा. उन्होंने इसे यूएस फार्मर्स के लिए ‘बिग विन’ कहा, क्योंकि इंडिया का मार्केट 1 बिलियन से ज्यादा लोगों का है. ट्रंप ने भी कहा कि डील में एग्रीकल्चर शामिल है.
लेकिन इंडियन साइड से गोयल ने बार-बार कहा कि एग्री और डेयरी ‘फुली प्रोटेक्टेड’ हैं. लोकसभा में भी उन्होंने यही दोहराया. और जोड़ा कि डील लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स को बूस्ट देगी, लेकिन किसानों के इंटरेस्ट सेफ हैं. यहां विवाद ये है कि विपक्ष जैसे कांग्रेस ने कहा कि डिटेल्स शेयर करो, किसानों को क्यों सैक्रिफाइस किया? एसकेएम जैसे फार्मर ग्रुप्स ने कहा कि यूएस सब्सिडाइज्ड प्रोडक्ट्स इंडियन मार्केट फ्लड कर देंगे. लेकिन गोयल ने कहा कि डील में ‘नेशनल इंटरेस्ट सुप्रीम’ है, और यूएस ऐग्री सेक्टर्स को लिमिटेड एक्सेस दिया गया है. यूएस एग्री सेक्रेटरी ब्रूक रॉलिन्स ने भी कहा कि डील अमेरिकी फार्म प्रोडक्ट्स को इंडियन मार्केट में एक्सपोर्ट बढ़ाएगी.
इन सभी बिंदुओं पर अमेरिका से ज्यादा डिटेल्स आ रही हैं, जबकि भारत सेंसिटिव सेक्टर्स के प्रोटेक्शन पर फोकस कर रहा है. गोयल कह रहे हैं कि जल्द ही जॉइंट स्टेटमेंट आएगा. विदेश मंत्री जयशंकर ने भी यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो से मिलकर डील पर बात की. दूसरी ओर विपक्ष ने लोकसभा में हंगामा किया, राहुल गांधी ने कहा कि पीएम ने ‘देश को बेच दिया.’ लेकिन गोयल ने कहा कि ये पॉलिटिकल अनार्की है. कुल मिलाकर, ये डील इंडियन एक्सपोर्टर्स के लिए रिलीफ है, क्योंकि 50% टैरिफ से टेक्सटाइल्स, लेदर जैसे सेक्टर्स हर्ट हो रहे थे. स्टॉक मार्केट्स में बूस्ट आया, रुपया मजबूत हुआ. लेकिन डिटेल्स की कमी से कन्फ्यूजन है. रॉयटर्स, अल जजीरा, न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्लूमबर्ग जैसे न्यूज सोर्सेज कह रहे हैं कि डील ‘अस्पष्ट’ है, और इंडिया ने ट्रंप के दावे कन्फर्म नहीं किए. हां, जब तक डील का एक-एक शब्द आधिकारिक रूप से सामने न आ जाए, तब तक कही गई सारी बातें या तो पॉलिटिक्स है या फिर जल्दबाजी. क्योंकि अभी तक कोई फाइनल टेक्स्ट नहीं है, सिर्फ अनाउंसमेंट्स हैं. इंतजार करो, सच्चाई खुद बाहर आएगी. और, वैसे भी सारी सच्चाई से ऊपर है ट्रंप का मूड. क्योंकि, सबसे भरोसेमंद है, उनका भरोसमंद न होना.

