वराह जयन्ती:चालुक्य और सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार का राजचिन्ह थे भगवान वराह

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह की जयन्ती भी है…
भगवान विष्णु ने इस दिन वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष दैत्य का वध किया था।

सब को श्री वराह जयंती की शुभकामनायें। श्री हरि नारायण की कृपा बनी रहे।

एक पोस्ट लिखी थी कभी श्री वराह जी पर उसको ही दुबारा कॉपी पेस्ट कर रहा हूँ। ईश्वर का स्मरण बना रहना चाहिए। ये भी एक तरह का सत्संग कहलाता है।

*विष्णु के तीसरे अवतार वराह की कथा है :- दुष्ट असुर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया, विष्णु वराह अवतार में प्रकट हुए, फिर समुद्र में जाकर अपनी थूथनी से समुद्र अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी बाहर ले आए।

हिरण्याक्ष ने यह देखा तो उसने वराह भगवान को युद्ध को ललकारा, अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया, इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल स्तंभित कर उस पर पृथ्वी स्थापित कर दी।

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पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है, पृथ्वी में तीन मुख्य रेखा गुज़रती हैं, एक कर्क रेखा, दूसरी मकर रेखा, दोनो के मध्य भूमध्य रेखा है।

सूर्य का प्रकाश इन ही रेखाओं के आसपास रहता है, जिस के फल स्वरूप ये जगह कृषि को खनिज को उत्तम मानी गयी हैं।

गर्मी के मौसम में सूर्य उत्तर दिशा को कर्क रेखा पर होता है, इसको उत्तरायण कहा जाता है, सर्दियों में सूर्य मकर रेखा पर होता है इसको दक्षिणायन कहा जाता है दोनों समय के मध्य मानसून भी आता है। यही कारण है ये जगह बहुत उपजाऊ होती है कृषि को भी और खनिज को भी, जिस से पृथ्वी के मानवों का जीवन चलता है।

उत्तरायण शुभ माना जाता है, दक्षिणायन को अशुभ तो नहीं कहूँगा मगर पंचांग के हिसाब से ठीक नहीं माना जाता। कर्क रेखा पर ज़ायदतर ग़रीब देश आते हैं, केवल सउदी अरब, यूएई और ओमान अमीर देश हैं, अमेरिका और चीन से भी कर्क रेखा जाती है मगर किसी विशेष भाग से नहीं गुज़रती। इसके अलावा लीबिया, नाइजर, माली, मैक्सिको, सहारा, चाड, मिस्र, अल्जीरिया, बर्मा, बांग्लादेश , ताइवान के साथ-साथ भारत से भी गुज़रती है।

कर्क रेखा जहाँ से गुज़रती है वो देश सम्पन्न होने चाहिए थे, कृषि और खनिज से, खनिज में सभी प्राकृतिक उत्पाद आ जाते हैं। मगर हो इसका उलटा रहा है, ये सब देश आतंकवाद, भ्रष्टाचार, ग़रीबी से परेशान हैं। इन देशों को लूट कर उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध के पास रहने वाले देश लूट ले जाते हैं और हाथ में बाइबल क़ुरान थमा जाते हैं।

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पृथ्वी पर ही समुद्र होता है, फिर हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को पृथ्वी के  समुद्र में कैसे डुबाया होगा? वराह अवतार ने समुद्र से कैसे पृथ्वी को निकला होगा?

ख़ैर ये कथा रूपांतरण होगा किसी बड़े विज्ञान का, पृथ्वी अगर अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री नहीं झुकी होती तो ये ऋतु परिवर्तन नहीं होते, कहीं बहुत अधिक गर्मी तो कहीं बहुत अधिक ठंड होती। ऐसे में कृषि खनिज होना तो भूल जाओ। ये 23.5 डिग्री पर पृथ्वी का एंगल, और वराह अवतार कथा, इनका कोई ना कोई सम्बंध ज़रूर है।

बस दिमाग़ में एक ही बात घूम रही है:- क्या पृथ्वी को 23.5 डिग्री एंगल देना किसी ऋषि मुनि के लिए सम्भव हो सकता था? या पृथ्वी प्राकृतिक रूप से 23.5 डिग्री झुकी हुई है? अगर प्राकृतिक है तो ये वराह अवतार कथा का क्या अर्थ है?

कोई ज्ञानी जन मार्गदर्शन करे बड़ी कृपा होगी। बहुत से प्रश्नों के उत्तर इस पटल पर मिले हैं।

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प्रश्नों के उत्तर या तो खोजने पड़ते हैं या किसी ज्ञानीजन से पूछने पड़ते हैं।

मेरी खोज और समझ मतलब जितना समझ आया उतना मैंने पोस्ट में लिख दिया।

आगे की पोस्ट Nishu Pandit की : –

हिरण्याक्ष या हिरण्य अक्ष या सोने के रंग का अक्ष अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विशाल लिक्विड आग की लपटों में घिरा था या खौलता हुआ लसलसा मैग्मा या लावा के रूप में था व ब्रह्माण्ड का कोई अक्ष या एक्सिस नहीं था क्योंकि सब द्रव्यमय था। इसी को समझाने हेतु कीचड़ ( रसातल ) की कल्पना की गई, जिसमें हिरण्याक्ष सम्पूर्ण वेद ले कर छुप गया ।

तब पृथ्वी देवी [ क्षेत्र या फील्ड ] के प्रार्थना पर बल ने दूसरा अवतार दो दांतों वाले वाराह ( दो ध्रुव = विष्णु का परम पद ) के रुप में लिया (क्योंकि वराह ही कीचड़ ( रसातल ) में स्वच्छन्द विचरण कर सकता है)। इसी को समझाने हेतु वराह की कल्पना की गई , हिरण्य अक्ष मारा गया व अपने दो दांतों ( S pole + N pole ) पर उन्होंने पृथ्वी को धारण किया व इस प्रकार क्षेत्र या फील्ड , पोल या एक्सिस बना।

अक्ष या पोल या एक्सिस रूद्र का अक्ष ( रुद्राक्ष ) है , जो एक मुखी से अनंत मुहों वाला है। उन ध्रुवों के ज्ञान से गति , झुकाव , कोण इत्यादि का ज्ञान होता है। कश्यप ऋषि ( पाताल या कछुए के खोल जैसी मृत पथरीली सतह या उल्का जैसी आवरण या क्रोड़ ) के चुम्बकीय जाल से स्थिरता का ज्ञान होता है।

एक अक्ष या कक्षा में स्थिर होना,निशारात्रि,मोहरात्रि,काल रात्रि [तीन प्रकार के ब्लैक होल] के आकर्षण में स्वप्न जैसा विचरण करना ही 84 लाख आसन है,आसन ही ब्रम्हांड को सुख में स्थिर रखता है।

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आदिकाल से ही सनातन धर्म में श्री हरि विष्णु के वराह अवतार मुख्य रूप से पूज्य रहे है…देश के अलग अलग भागों में भी अति प्राचीन वराही अवतार के मंदिर, मूर्तियाँ है..!

प्रस्तर पर उत्कीर्ण माता पृथ्वी को उठाये हुए..और विष्णुपद,शँख, सुदर्शन चक्र धारण किये वाराही अवतार की यह तस्वीर रानी की वाव से है… रानी की वाव को रानी उदयामती ने अपने पति राजा भीमदेव की स्मृति में सन् 1063 में बनवाया था। राजा भीमदेव गुजरात के सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे।

भारत के गुजरात राज्य के पाटण ज़िले में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। 23 जून, 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया। बावड़ी में बनी बहुत-सी कलाकृतियों की मूर्तियों में ज्यादातर भगवान विष्णु से संबंधित हैं। भगवान विष्णु के दशावतार के रूप में ही बावड़ी में मूर्तियों का निर्माण किया गया है, जिनमे मुख्य रूप से, श्री राम, कृष्णा, नरसिम्हा, वामन, वाराही, कल्कि और दुसरे मुख्य अवतार भी शामिल हैं।

मिहिरभोज प्रतिहार, प्रतिहार राजवंश के सबसे महान राजा माने जाते हैं। इन्होने लगभग ५० वर्ष तक राज्य किया था। इनका साम्राज्य अत्यन्त विशाल था और इसके अन्तर्गत वे क्षेत्र आते थे जो आधुनिक भारत के राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियांणा, उडीशा, गुजरात, हिमाचल आदि राज्यों हैं।

मिहिरभोज प्रतिहार विष्णु भगवान के भक्त थे तथा कुछ सिक्कों मे इन्हे ‘आदिवराह’ भी माना गया है। मेहरोली नामक जगह इनके नाम पर रखी गयी थी।आदिवराह एक प्रसिद्ध उपाधि थी, जिसे कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज (840-890 ई.) ने धारण किया था। मिहिर भोज के चाँदी के सिक्कों पर यह नाम अंकित मिलता है..!

मिहिरभोज प्रतिहार साम्राज्य विस्तार आज के मुलतान से पश्चिम बंगाल और कश्मीर से कर्नाटक तक फैला हुआ था। ये धर्मरक्षक सम्राट शिव के परम भक्त थे। स्कंध पुराण के प्रभास खंड में सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार के जीवन के बारे में विवरण है। 50 वर्ष  राज्य कर वे अपने बेटे महेंद्रपाल को राज सिंहासन सौंपकर सन्यासवृति को वनगमन कर  गए थे। अरब यात्री सुलेमान ने भारत भ्रमण में लिखी पुस्तक सिलसिलीउत तुआरीख 851 ईस्वीं में सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया है, साथ ही मिहिरभोज प्रतिहार की महान सेना की तारीफ भी की है,  मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं दक्षिण में राजकूटों के राज्य, पूर्व में बंगाल के पाल शासक और पश्चिम में मुलतान के शासकों की सीमायें छूती बतायी गई है।

915 ईस्वीं में भारत आए बगदाद के इतिहासकार अल- मसूदी ने अपनी किताब मरूजुल महान मेें भी मिहिरभोज प्रतिहार की 36 लाख सेनिको की पराक्रमी सेना पर लिखा है। इनकी राजशाही का निशान “वराह” था और मुस्लिम आक्रमणकारियों के मन में इनका इतना भय था कि वे वराह यानि सूअर से नफरत करते थे। मिहिरभोज की सेना में सभी वर्ग एवं जातियों ने राष्ट्र रक्षा को हथियार उठा इस्लामिक आक्रान्ताओं से लड़ाईयाँ लड़ी।

प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज के मित्र काबुल का ललिया शाही राजा, कश्मीर का उत्पल वंशी राजा, अवन्ति वर्मन तथा नैपाल का राजा राघवदेव और आसाम के राजा थे। सम्राट मिहिरभोज के तब शत्रु, पालवंशी राजा देवपाल, दक्षिण का राष्ट्र कटू महाराज आमोधवर्ष और अरब के खलीफा मौतसिम वासिक, मुत्वक्कल, मुन्तशिर, मौतमिदादी थे। अरब के खलीफा ने इमरान बिन मूसा को सिन्ध क्षेत्र पर शासक नियुक्त किया था। जिस पर अरबों का अधिकार रह गया था। सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र नारायणलाल को युद्ध में परास्त करके उत्तरी बंगाल अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था। दक्षिण के राष्ट्रकूट राजा अमोधवर्ष को हरा उनके क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिये थे। सिन्ध के अरब शासक इमरान बिन मूसा को पूरी तरह पराजित करके समस्त सिन्ध राजपूत प्रतिहार साम्राज्य का अभिन्न अंग बना लिया था। केवल मंसूरा और मुलतान दो स्थान अरबों के पास सिन्ध में इसलिए रह गए थे कि अरबों ने क्षत्रिय प्रतिहार सम्राट के तूफानी भयंकर आक्रमणों से बचने को अनमहफूज गुफाए बनवाई हुई थी जिनमें छिप कर अरब अपनी जान बचाते थे।

सम्राट मिहिरभोज नही चाहते थे कि अरब इन दो स्थानों पर भी सुरक्षित रह आगे संकट का कारण बने । इसलिए उन्होने कई बड़े सैनिक अभियान भेज कर इमरान बिन मूसा के अनमहफूज नामक जगह जीत कर प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की पश्चिमी सीमाएं सिन्ध नदी से सैंकड़ों मील पश्चिम तक पंहुचा दी और इसी प्रकार भारत देश को अगली शताब्दियों तक अरबों के बर्बर, धर्मान्ध तथा अत्याचारी आक्रमणों से सुरक्षित कर दिया था। इस तरह सम्राट मिहिरभोज के राज्य की सीमाएं काबुल से रांची व आसाम तक, हिमालय से नर्मदा नदी व आन्ध्र तक, काठियावाड़ से बंगाल तक, सुदृढ़ तथा सुरक्षित थी।
उनकी जयंती पर राष्ट्र का जन जन उनके चरणों मे वंदन करता है।
✍🏻शैलेंद्र सिंह

चालुक्य वंश (सोलंकी/बाघेल) उत्पत्ति का सार इन दोहों में हे.. जय वराह अवतार की

सौरभद्र वराह धरा ,
ब्रह्म कुण्डली करतार |
करदमाण ऋषि मंत्र उच्चारे ,
हरीदेव , चळु अंजुली अवतार |                              नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम्।
खुर मध्य गतो यस्य मेरु: खणखणायते॥

हरी के वंशज बादामी अभिलेख में चालुक्य वंश को ‘ हरी पुत्र ‘ कहा है । पुलकेशिन द्वितीय _ _ द्वितीय के हैदराबाद के दानलेख ( 612 ई . ) में चालुक्य वंश का उल्लेख आया है ‘

सकल संसार में वंद्य मानव्य गोत्र के हारीतिपुत्र,सप्तलोकों की जननी सप्तमातृकाओं से पालित,कार्तिकेय की कृपा से निरंतर धनधान्य से पूर्ण रहने वाले,नारायण की कृपा से प्राप्त जिनके वराहध्वज को देखते ही सारे राजाओं ने अधीनता स्वीकार कर ली ।

फोटो में वरहा भगवान , चालुक्य का सिम्बल है ,गद्दा भगवान विष्णु का प्रतीक है,और तलवार मां भवानी की प्रतीक हे ,सुवर (शुक्र) विष्णु भगवान का दूसरा वराह अवतार है , जब तक सूरज चान्द , रहगा तब तक ईतिहास अमर रहेगा , चालुक्य वंश के सिबोल चिन्ह् का मतलब यह है….

माता गंगा पिता हरी,ब्रहम अंजली अवतार ।
ऋक्ष नाम चालुकय देव, वंश सोलंकी विस्तार ।।

भगवान विष्णु के तृतीय अवतार और धरणी उद्धारक भगवान वराह के प्रागट्य दिन पर कोटी कोटी वंदन । सोलंकी राजवंश का उत्पत्ति स्थान सोरों (सोरमगढ-उत्तरप्रदेश) है। यह सोलंकियों का उत्पत्ति स्थान और भगवान वराह से जुडा हुआ महत्वपूर्ण स्थान है। ये चालुक्य  इतिहास से करीब से जुडा हुआ है।

सोलंकी वंश की उत्पत्ति के समय वराह अवतार को ही चालुक्य वंश का चिन्ह्न माना गया हैं | सम्राट कुमारपाल तक के शिलालेख में वराह का उल्लेख होता है | वराह  निशान को मानने का कारण सोरम जी में विष्णु भगवान का वराह अवतार धारण करना है | और चालुक्य वंश की उत्पत्ति भी सोरम घाट हैं | यही कारण हैं कि चालुक्य वंश का निशान वराह हैं |
✍🏻बलवीर सिंह सोलंकी

वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना ।
शशिनी कलंककलेव निमग्ना ।।
केशवधृत सुकररूप जय जगदीश हरे ।।

7वी शदी से 12वी शदी तक प्रतिहार चालुक्य चौहान राजपूत कुलो में इनकी विशेष पूजा की परम्परा रही हैं।

वराहं पूजयेद्देवं प्रारम्भे कृषिकर्मणि – विष्णुधर्मोत्तरपुराण

वराह और उनकी शक्ति वाराही के आयुधों में हल तथा मुसल भी हैं।
हल में एकदंष्ट्र ही तो होता है. !
यह कृषि-सभ्यता का अध्याय वाराह कल्प के आदि से चला आ रहा है।
एकदंष्ट्र से लेकर शतबाहु तक का उल्लेख कृषि उपकरणों व कृषि की विधियों के विकास की गाथा है।
अवतारों में फिर आठवें अवतार बल-राम के हाथों में यही आयुध आते हैं, वे यमुना का संकर्षण करते हैं ताकि कृषि केवल इन्द्र के सहारे न रहे। हाथों में हल होगा तो श्रम करना पड़ेगा, कृषि में श्रम की महत्ता है।

आधुनिक विज्ञान में एक अवधारणा यह है कि मानव सहित इस सृष्टि की उत्पत्ति समुद्र से हुई है। वैसे तो मानव शरीर में बहने वाले रक्त और समुद्र जल में रासायनिक तौर पर कोई बहुत समानताएं नहीं हैं किंतु सोडियम और क्लोरीन ऐसे तत्व हैं जो दोनों में पाये जाते हैं यद्यपि दोनों के अनुपात में जमीन-आसमान जैसा अंतर है।

प्रख्यात वेद विज्ञान ममर्ज्ञ मधुसूदन ओझा के विद्वान शिष्य मोतीलाल शर्मा के अनुसार वेदों में तमाम तरह के प्राणों का वर्णन है, यथा वशिष्ट प्राण, अगस्त्य प्राण आदि। इसी प्रकार वराह प्राण हैं। हमारे शास्त्रों में आता है कि विष्णु भगवान के तीसरे अवतार भगवान वराह ने पृथ्वी का उद्धार किया था।
अब वेदों में जो यह वराह प्राण का वर्णन है, यह एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य करता है। समुद्र जल की लहरों में जो पानी उछलता है, उसके कणों में इसी वराह प्राण के कारण वायु उलझ कर झाग बनता है। यही झाग सूख कर रेत कण बनाते हैं। बस यही रेत कण पृथ्वी के उत्पत्ति का मूल हैं। ऐसा वेद के कुछ मनीषियों का मानना है।

भगवान विष्णु के दशावतारों में प्रथम दो अवतार..मत्स्य एवं कूर्म तो पूर्णत: जल में रहने वाले हैं। किंतु तीसरे अवतार का संबंध जल एवं थल दोनों से है। मेरा मानना है कि ऐसी भूमि प्राय: दलदली भूमि होगी। सृष्टि के विकास के क्रम में दलदली भूमि में मनुष्य ने अपने कामों के लिए वराह प्राणी को उपयोगी पाया होगा।
कश्मीर में एक स्थान है बारामूला। आजकल वहां की स्थानीय आबादी ने इसे ‘बारामुल्ला’ कहना शुरू कर दिया है। नाम को अपने मजहब के अनुरूप बदलने का एक भौंड़ा प्रयास। इस स्थान का वास्तविक नाम वराहमूल है। ऐसा संभव है कि वराहमूल पहले दलदली भूमि हो।
वैसे उत्तर प्रदेश के वर्तमान कासगंज जिले के सोरों को ‘शूकर क्षेत्र’ कहते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि यह क्षेत्र कभी दलदली भूमि हो। मनुष्य ने विकास क्रम में दलदली भूमि को शुष्क भूमि में परिवर्तित करने की सीख शायद शूकर प्राणी से ली हो।

खैर, भारतीय शास्त्रों के प्रतीक बहुत दुरूह और अलग-अलग बिखरे हुए हैं। इनकी कड़ियों को आपस में जोड़ना काफी चिंतन मांगता है। अब बात ज्योतिष की। ज्योतिष में नौ ग्रह भगवान के नौ अवतारों के प्रतिनिधि माने गये है। यथा सूर्य राम, चंद्रमा कृष्ण, मंगल नरसिंह, बुध बुद्ध, बृहस्पति वामन, शुक्र परशुराम, शनि कूर्म, राहु वराह एवं केतु मीन।

अब जरा राहु पर विचार करें तो राहु ग्रह रूपांतरण की कला में माहिर है। पौराणिक आख्यान है कि किस प्रकार राहु ने भेष बदलकर देवताओं की पंक्ति में स्थान बनाया और अमृत पान किया। अब जरा रुककर विचार करिए तो दलदली भूमि को रूपांतरित कर शुष्क भूमि बनाने के प्रयास क्या वराह अवतार के काल में संभव नहीं हैं।

वराह भगवान से जुड़ा एक अन्य विषय समझते हैं। वैष्णव जन भगवान के कुछ स्वरूपों यथा नरसिंह, वराह, वामन और वटपत्र शायी मुकुंद को उग्र स्वरूप मानते हैं। ज्योतिष में राहु को मलेच्छ वर्ग का प्रतिनिधि भी माना जाता है। यह जो भगवान वराह हैं, वे मलेच्छ तंत्र के उच्छेदन में बहुत शक्तिशाली देव हैं। यह बात कोई सुनी-सुनायी या किताबी बात नहीं हैं। यह मेरे अनुभव से जुड़ी बात है। इस लिए यदि कोई ऐसा मामला हो तो संबंधित व्यक्ति के घर में भगवान वराह की तस्वीर लगवाने में तनिक भी विलंब नहीं किया जाना चाहिए।

विष्णु पुराण में भगवान वराह के पृथ्वी उद्धार उपरात ऋषि-मुनियों ने उनकी बहुत सुन्दर स्तुति की है। उसमें एक श्लोक आता है :-

द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव यदन्तरं तद्वपुषा तवैव
व्याप्तं जगद्व्याप्तिसमर्थदीप्ते हिताय विश्वस्य विभो भव त्वम्।।

(हे अतुलनीय प्रभाव वाले प्रभु, पृथ्वी और द्युलोक के बीच अन्तराल आपके शरीर से व्याप्त हो गया है, विश्व को व्याप्त करने में समर्थ दीप्ति (तेज) युक्त हे प्रभो, आप समस्त विश्व का कल्याण करें)
✍🏻प्रसिद्ध पातकी

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