जब 260 बलिदानी सत्याग्रहियों की कीमत पर गांधी ने पीछा छुडाया असहयोग आन्दोलन से

चौरीचौरा काण्ड की बरसी पर बलिदानियों को नमन
और उनके बदनाम करने वालों को धिक्कार
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भारत के लोग काफी समय से अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे. 1915 में भारत में गांधी  आगमन हुआ. गांधी  ने लोगों को अहिंसा का रास्ता दिखाया जो लोगों को काफी पसंद आया. लोगों को लगा कि ये बहुत अच्छा रास्ता है, इससे बिना खून खराबे के आसानी से आजादी मिल जायेगी. ये सोंचकर बहुत सारे लोग गांधी के रास्ते पर चल पड़े.

17 नबम्बर 1921 को गांधी  और उनकी कांग्रेस ने असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया. लगभग सारा देश ही गांधी  के आव्हान पर आन्दोलन में कूद पड़ा. लोग इसे आजादी की निर्णायक लड़ाई समझ रहे थे जबकि कांग्रेस अंग्रेजों से अंग्रेजी शासन के अधीन थोड़ी सी स्वायत्तता की मांग कर रही थी. लोग स्वराज और सुराज में फर्क नहीं समझ पा रहे थे.

आँदोलन की तैयारियों के समय गांधी ने 8 जनवरी 1921 चौरीचौरा के मैदान में विशाल जनसभा को संबोधित भी किया था, यहाँ के लोग पहले से ही अंग्रेजों से बहुत नफरत करते थे क्योंकि यह रियासत (डुमरी) 1857 में भी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर चुकी थी और इसलिए रियासत के जागीरदार “बंधू सिंह” को अंग्रेजों ने फांसी दी थी.

गांधी जी के आव्हान के बाद सारे देश की तरह गोरखपुर में भी जनता अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन में कूद पडी. अकेले गोरखपुर जिले में ही 15,000 वालन्टियरों की भर्ती हो गई. इन वालन्टियर ने शराब और ताड़ी की दुकानों पर धरना, प्रदर्शन, पिकेटिंग, आदि के कार्यक्रम तथा विदेशी कपड़ों की होली जलाने और खादी का प्रचार करने लगे.

ऐसे ही एक प्रदर्शन को रोकने के लिए 1 फरवरी 1922 को चौरीचौरा थाने के दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने सदल बल वहां पहुंच कर वालन्टियरों पर लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज की इस घटना की प्रतिक्रियास्वरूप 4 फरवरी 1922 को वालन्टियर्स की सभा “डुमरी” में बुलाई गई, जिसे स्थानीय नेताओं ने संबोधित किया और जुलूस निकाला.

शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, जिससे भगदड़ मच गई और चारों तरफ शोरशाराबा और चीखें सुनाई पड़ने लगी. इस लाठीचार्ज की प्रतिक्रियास्वरूप, भीड़ भी पुलिस पर पथराव करने लगी. इस पर पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलानी प्रारंभ कर दी. इस गोली काण्ड 260 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई और अनेक घायल हो गए.

अपने साथियों की लाशों और घायलों की हालत देखकर उन वालन्टियर्स के धैर्य का बांध टूट गया और उन्होंने पुलिस पर हमला बोल दिया. कुछ पुलिसवाले चौरी-चौरा थाने में छुप कर जनता पर गोलियां चलाने लगे. पुलिसवालों ने थाने के अन्दर घुसकर दरवाजा बंद कर लिया. तब गुस्साए आन्दोलनकारियों ने थाने पर तेल छिड़क कर आग लगा दी.

इस अग्निकांड में सभी 23 पुलिसकर्मी जल कर राख हो गये. उसके बाद लोगों ने थाने, रेलवे स्टेशन और डाकघर पर भारतीय पहचान दर्शाते झंडे फहरा दिय और अपने आपको आजाद घोषित कर दिया. लेकिन अगले ही दिन बहुत बड़ी संख्या में अंग्रेजों की सेना और पुलिस ने सारा इलाका घेर कर, वहां की जनता पर भीषण अत्याचार शुरू कर दिए.

चौरीचौरा और आसपास के इलाके में, लोगों के मकान जलाये गये, खेतों में आग लगा दी गई. औरतों और बच्चों तक को नही बख्शा गया. इसके अलावा इस काण्ड में कुल 232 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया. पुलिस की पिटाई से घायल दो सत्याग्रहियों की मुकदमें के दौरान मृत्यु हो गई थी और 172 व्यक्तियों को “मौत की सजा” सुनाई गई .

यह आन्दोलनकारी कांग्रेस के किये गए आन्दोलन का हिस्सा थे और कांग्रेस में एक से बढ़कर एक वकीलों की भरमार थी, लेकिन कोई कांग्रेसी वकील उनको बचाने आगे नहीं आया. तब हिन्दू महासभा के नेता और वकील “पं. मदनमोहन मालवीय” ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आन्दोलनकारियों के समर्थन में, फैसले के खिलाफ अपील दायर की.

पंडित मालवीय  ने अपनी दलीलों से न्यायालय को संतुष्ट करके, 153 लोगों को फांसी की सजा से बचा लिया. महामना मालवीय  ने उन 19 आन्दोलनकारियों की फांसी की सजा को माफ़ करने के लिए वायसराय के पास अपील की जिसमे देश के ज्यादातर प्रभावशाली लोगों ने हस्ताक्षर किये, लेकिन नेहरु और गांधी ने इस पर हस्ताक्षर करने से भी इंकार कर दिया.

गांधीजी को 260 सत्याग्रहियों के मारे जाने और सैकड़ों सत्याग्रहियों के घायल होने का दुःख नहीं हुआ, लेकिन 23 पुलिस वालों के मारे जाने का इतना दुःख हुआ कि 8 फरवरी 1922 को उन्होंने अपना आंदोलन वापस ले लिया. पुलिस वालों की आत्मा की शांति और थाना जलाने की घटना का प्रायश्चित करने के लिए वे पांच दिनों के उपवास पर बैठ गए.

दरअसल गांधी का वह असहयोग आन्दोलन बुरी तरह असफल हो गया था और वो किसी तरह से अपने आन्दोलन को सथागित करने का वहाना ढूंढ रहे थे. गांधीजी ने “चौरी चौरा काण्ड” को असहयोग आन्दोलन की असफलता को छुपाने का हथियार बनाया था. आन्दोलन में हिंसा का बहाना बनाकर अपना “असहयोग आन्दोलन” वापस ले लिया.

आन्दोलन को अचानक वापस लेने से सारा देश सकते में आ गया. लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि गांधी ऐसा क्यों कर रहे हैं ? असहयोग आंदोलन वापस लेने की घोषणा सुन, सुभाष चंद्र बोस ने लिखा था – ‘जब जनता का जोश उबल रहा था, तब ऐसे में पीछे हटने का बिगुल बजा देना, राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी दुर्घटना है’.

चन्द्र शेखर आजाद जैसे जोशीले कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस का रास्ता छोड़कर अपना अलग क्रांतिकारी दल बना लिया. डा. हेडगेवार  ने भी कांग्रेस  छोड़ दी और आजाद जी के दल में शामिल हो गए. कुल मिलाकर सत्याग्रहियों के पुलिस वालों की हत्या का बहाना बनाकर अपने इस असफल असहयोग आन्दोलन से अपना पीछा छुडाया था.

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