कौन लिख सकता है नाम के साथ “डॉक्टर”? चिकित्सा स्नातक भी क्या डॉक्टर हैं?

अपने नाम के साथ कौन लिख सकता है डॉक्टर… हाई कोर्ट ने MBBS होल्डर्स को झटका देते हुए सुनाया बड़ा फैसला

डॉ.’ लिखना सिर्फ डॉक्टरों की बपौती नहीं, केरल हाईकोर्ट ने निरस्त कर दी याचिकाएं 

अदालत ने कहा, यह धारणा कि ‘डॉक्टर’ टाइटल केवल मेडिकल प्रोफेशनल्स का विशेषाधिकार है, एक गलतफहमी है. पीएचडी जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यताओं वाले व्यक्ति ‘डॉक्टर’ शब्द उपयोग के अधिकारी है.

कोच्चि,25 जनवरी 2026,केरल हाई कोर्ट ने ‘डॉक्टर’ शब्द और इसे इस्तेमाल करने को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ कहा कि ‘डॉक्टर’ टाइटल पर केवल एमबीबीएस या मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोगों का विशेषाधिकार नहीं है.

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ‘डॉक्टर’ या ‘डॉ.’ शब्द का इस्तेमाल केवल मेडिकल डॉक्टरों तक सीमित नहीं है। अदालत ने फिजियोथेरेपिस्ट और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के ‘डॉ.’ लिखे जाने के खिलाफ मेडिकल पेशेवरों की याचिकाएं निरस्त कर दीं।

कोर्ट ने एनएमसी कानून का दिया संदर्भ, कहा- ये केवल एमबीबीएस ग्रेजुएट्स का एकाधिकार नहीं

फिजियोथेरेपिस्ट और आक्यूपेशनल थेरेपिस्ट भी अपने नाम के आगे लिख सकते हैं डॉक्टर

न्यायमूर्ति वीजी अरुण ने अपने फैसले में कहा कि ‘डॉक्टर’ शब्द की उत्पत्ति चिकित्सा क्षेत्र से नहीं हुई है। शुरुआती दौर में यह शब्द उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता था, जिन्होंने शिक्षा के उच्चतम स्तर को प्राप्त किया हो और जिन्हें पढ़ाने का अधिकार मिला हो, जैसे धर्मशास्त्र, कानून और दर्शन के विद्वान।

अदालत ने कहा कि समय के साथ, जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान  विकसित हुआ, विश्वविद्यालयों से प्रशिक्षित डॉक्टरों को भी ‘डॉक्टर’ कहा जाने लगा। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह शब्द केवल मेडिकल पेशेवरों की पहचान है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो एमबीबीएस या अन्य मेडिकल डिग्री धारकों को कानूनी रूप से ‘डॉ.’ उपसर्ग इस्तेमाल करने का विशेषाधिकार देता हो। इसी तरह, केरल राज्य चिकित्सा प्रैक्टिशनर्स अधिनियम की धारा 40 में प्रयुक्त ‘टाइटल’ शब्द का भी यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि डाक्टरों को वैधानिक रूप से ‘डॉ.’ लिखने का अधिकार मिल जाता है।

अदालत ने कहा, “जब कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो मेडिकल पेशेवर ‘डा.’ शब्द पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकते।” अदालत ने यह भी जोड़ा कि आज भी पीएचडी जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यताओं वाले लोग ‘डॉक्टर’ उपाधि का इस्तेमाल करते हैं, जैसा कि पहले के समय से है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने नेशनल कमीशन फार एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशन (एनसीएएचपी) अधिनियम, 2021 के प्रविधानों में हस्तक्षेप से मना कर दिया। अदालत ने कहा कि फिजियोथेरेपिस्ट और आक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को केवल मेडिकल डॉक्टरों का सहायक मानने को कानून की व्याख्या सीमित करना अनुचित  होगा।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि कुछ मेडिकल पेशेवरों की मांग पर केंद्र सरकार की नीति, कानून या पाठ्यक्रम में छेड़छाड़ करना ठीक नहीं है।

मात्र ग्रेजुएट करते ही, बिना अधिकार लिखते है डॉक्टर
legaluptodate January 24, 2023

जिस शब्द से इज्जत मिले उसे सभी पाना चाहते है। देखा यह जायेगा कि इससे उनको कोई फर्क न  पड़े वो उसके हक़दार हैं।  डॉक्टर उपीधि पाने को पूरी दुनियां में पिछले 1000 साल से घमाशान मचा है।

बीमारों का इलाज करना नोबल प्रोफेशन है, इसलिए मेडिकल स्नातक नाम के आगे डॉक्टर जोड़ रहे हैं। नियमानुसार पीएचडी (डॉक्टर ऑफ फिलॉस्फी) या अन्य डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त व्यक्ति ही अपने नाम के आगे डॉक्टर लिख सकता है, लेकिन विभिन्न चिकित्सीय पद्धतियों में सिर्फ बैचलर डिग्रीधारी, इंडियन मेडिकल कौंसिल एक्ट 1956, आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम 1987 में प्रैक्टिस को पंजीयन करवाकर नाम के आगे डॉक्टर लिख रहे हैं। अब इस दौड़ में डिप्लोमा, डिग्री करने वाले फार्मासिस्ट और डिग्री करने वाले फिज़ियोथेरेपिस्ट भी कूद पड़े है यहाँ तक की वो तो सुप्रीम कोर्ट तक चले गए है । बिना ये जाने कि डॉक्टर का मतलब क्या है, बखेड़े की जड़ है बैचलर डिग्री लेने के बाद डॉक्टर लिखना ।

नोबल प्रोफेशन के नाम का उठाया गया फायदा

बीमारों का इलाज करना नोबल प्रोफेशन है, इसलिए मेडिकल स्नातक नाम के आगे डॉक्टर जोड़ रहे हैं। नियमानुसार पीएचडी (डॉक्टर ऑफ फिलॉस्फी) या अन्य डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त व्यक्ति ही अपने नाम के आगे डॉक्टर लिख सकता है, जबकि विभिन्न चिकित्सीय पद्धतियों में बैचलर डिग्रीधारी सिर्फ इंडियन मेडिकल कौंसिल एक्ट 1956, आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम 1987 में प्रैक्टिस के लिए पंजीयन करवाकर नाम के आगे डॉक्टर लिख रहे हैं।

आरटीआई से खुली पोल
हमने एमबीबीएस, बीएएमएस, बीएचएमएस और बीयूएमएस डिग्रीधारियों के स्वयं को डॉक्टर लिखने के आधार के बारे में आरटीआई में जानकारी मांगी थी। इसके जबाव में बीएएमएस, बीएचएमएस, बीयूएमएस के लिए कहा गया, ये बैचलर डिग्री हैं, न कि डॉक्टरेट। एमबीबीएस के संदर्भ में कोई जवाब नहीं दिया गया है, पर मप्र एमसीआई के प्रेसीडेंट ने टेलिफोनिकली बातचीत में स्वीकारा कि एमबीबीएस बैचलर डिग्री है, डॉक्टरेट नहीं यानी एमसीआई खुद भी मान रहा है, उक्त स्नातकों को बैचलर डिग्री दी जाती है, डॉक्टरेट नहीं।

नोबल प्रोफेशन के चलते लिखा जाता है डॉक्टर

भारत में नाम के आगे डॉक्टर लिखने को पीएचडी या एमडी जैसी डिग्री होना अनिवार्य है। गोवा में एलएलबी कर वकालत करने वाले भी खुद को पुर्तगाली कानून के समय से डॉक्टर लिख रहे हैं, जबकि नियमानुसार उन्हें डॉक्टर लिखने का अधिकार नहीं है। इंडियन मेडिकल कौंसिल एक्ट 1956 की धारा 15 (2) एवं मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम 1987 की धारा 24के प्रावधानों के अनुसार मार्डन साइंटिफिक मेडिसिन में चिकित्सा व्यवसाय करने के लिए मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान परिषद अधिनियम 1987 की धारा 11 में संधारित स्टेट मेडिकल रजिस्टर में नाम दर्ज होना अनिवार्य है। इसमें बताया गया है किसी भी चिकित्सा पद्धति में मान्यता प्राप्त चिकित्सीय अर्हता रखने वाला चिकित्सक नियमानुसार पंजीबद्ध होने के बाद स्वयं को डॉक्टर लिख सकता है। अन्य कोई अगर चिकित्सीय व्यवसाय के लिए खुद को डॉक्टर लिखता है तो अपराध माना जाएगा, लेकिन यह उल्लेख नहीं है, चिकित्सीय शिक्षा की बैचलर डिग्रीधारी व्यक्ति को डॉक्टर लिखने की अनुमति है या नहीं।

स्पष्ट गाइडलाइन बने

जैसे पीएचडी करने के बाद नाम के आगे डॉक्टर लिखने की पात्रता है, वैसे ही चिकित्सीय शिक्षा में डी एम डिग्री पा ही व्यक्ति नाम के आगे डॉक्टर लिख सकता है। एमबीबीएस, बीएएमएस, बीएचएमएस और बीयूएमएस चिकित्सीय बैचलर डिग्री हैं। सिर्फ चिकित्सा व्यवसाय के चलते इन डिग्रियों के धारक स्वयं को डॉक्टर लिखते हैं। केंद्र और राज्य को इसके लिए स्पष्ट गाइडलाइन और नियम बनाना चाहिए।

राकेश पांडेय, राष्ट्रीय प्रवक्ता आयुष एसोसिएशन

चलन में आ गया शब्द

एमबीबीएस, बीएएमएस, बीएचएमएस और बीयूएमएस डिग्री अलग-अलग चिकित्सीय पद्धतियों में बैचलर डिग्री हैं। देश में चिकित्सीय प्रैक्टिस करने वालों को आमतौर पर डॉक्टर कहा जाता है। यही चलन में आ गया है। यह नोबल प्रोफेशन है, इसके चलते डॉक्टर शब्द को सामाजिक मान्यता मिली है। इसीलिए चिकित्सीय बैचलर डिग्री होने पर डॉक्टर लिखने का चलन है। चिकित्सीय बैचलर डिग्रीधारी को डॉक्टर लिखने की पात्रता है बिना ये जाने की इसका मतलब क्या है लेकिन होड़ लगी है एक नाम को पाने की । ये लड़ाई ख़त्म नहीं होने वाली है अब यह सम्मान पाने को PHYSIOTHERAPIST भी कूद पड़े है और सुप्रीम कोर्ट में 2019 से उनका भी केस चल रहा है, इसके अलावा राजस्थान में फार्मासिस्ट भी डिप्लोमा और डिग्री करके नाम के आगे डॉ लिखने का अधिकार मांग रहे हैं I

क्या चिकित्सा स्नातक डॉक्टर उपाधि लिखने के अधिकारी हैं?

हाँ—कुछ शर्तों के साथ।
भारत में स्थिति साफ़ है:
MBBS (Bachelor of Medicine & Bachelor of Surgery) की डिग्री पाने वाला व्यक्ति “Doctor / Dr.” लिखने का अधिकारी होता है, लेकिन
👉 उसे National Medical Commission (NMC) / State Medical Council में पंजीकृत (Registered) होना चाहिए।
इंटर्नशिप पूरी होने के बाद और रजिस्ट्रेशन मिलने पर ही व्यक्ति कानूनी रूप से मरीज देख सकता है और Dr. लिख सकता है।
किन्हें “Dr.” लिखने की अनुमति नहीं (चिकित्सा संदर्भ में)?
B.Sc. Nursing, BAMS/BHMS/BUMS (जब तक वे अपने सिस्टम का स्पष्ट उल्लेख न करें)
पैरामेडिकल, फार्मेसी, लैब टेक्नीशियन आदि
👉 ये लोग एलोपैथिक डॉक्टर के रूप में “Dr.” नहीं लिख सकते।
PhD धारक का मामला
PhD धारक अकादमिक रूप से “Dr.” लिख सकते हैं,
❌ लेकिन चिकित्सा उपचार के लिए नहीं।
संक्षेप में:
✔ MBBS + NMC रजिस्ट्रेशन = “Dr.” लिखने का अधिकार
❌ बिना पंजीकरण = अधिकार नहीं

 

कानूनी प्रावधान और न्यायालयी दृष्टांत संक्षेप में 👇
1) कानून क्या कहता है?
National Medical Commission Act, 2019 (NMC Act)
एलोपैथिक चिकित्सा (Modern Medicine) में प्रैक्टिस का अधिकार केवल उसी को है जो
NMC/State Medical Council में पंजीकृत (Registered Medical Practitioner – RMP) हो।
MBBS डिग्री + अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी करने के बाद रजिस्ट्रेशन मिलने पर ही व्यक्ति मरीज देख सकता है और “Dr.” (चिकित्सकीय संदर्भ में) लिख सकता है।
बिना रजिस्ट्रेशन इलाज करना अवैध माना जाता है।
(पहले यही व्यवस्था Indian Medical Council Act, 1956 में थी, जिसे NMC Act, 2019 ने प्रतिस्थापित किया।)
2) सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
Poonam Verma v. Ashwin Patel (1996)
अदालत ने स्पष्ट किया कि एक चिकित्सा पद्धति का पंजीकरण रखने वाला व्यक्ति दूसरी पद्धति (cross-pathy) में इलाज नहीं कर सकता।
नतीजा: एलोपैथिक इलाज केवल एलोपैथिक में पंजीकृत डॉक्टर ही कर सकते हैं।
3) “Dr.” लिखने को लेकर न्यायिक समझ
MBBS + वैध रजिस्ट्रेशन → “Dr.” लिखना और एलोपैथिक प्रैक्टिस कानूनी।
इंटर्न/बिना रजिस्ट्रेशन → “Dr.” लिखना और मरीज देखना अनुमत नहीं।
AYUSH डिग्रीधारी अपने सिस्टम (जैसे BAMS, BHMS) के भीतर प्रैक्टिस कर सकते हैं,
लेकिन एलोपैथिक डॉक्टर के रूप में “Dr.” लिखकर भ्रम पैदा करना अवैध माना गया है।
PhD धारक अकादमिक रूप से “Dr.” लिख सकते हैं,
पर चिकित्सकीय उपचार/क्लिनिक के लिए नहीं।
4) निष्कर्ष (एक लाइन में)
MBBS + इंटर्नशिप + NMC/SMC रजिस्ट्रेशन = “Dr.” लिखने और एलोपैथिक प्रैक्टिस का वैध अधिकार।

 

ठीक है—अब हाईकोर्ट के उदाहरण और क्लिनिक/साइनबोर्ड पर “Dr.” लिखने के नियम साफ़-साफ़ देखिए 👇
1) हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश (सार रूप में)
🔹 दिल्ली हाईकोर्ट
अदालत ने माना कि बिना एलोपैथिक रजिस्ट्रेशन कोई भी व्यक्ति
एलोपैथिक डॉक्टर बनकर “Dr.” लिखकर इलाज नहीं कर सकता।
AYUSH डिग्रीधारी यदि एलोपैथिक दवाएँ लिखते हैं या बोर्ड पर ऐसा संकेत देते हैं, तो यह जनता को भ्रमित करना है।
🔹 मद्रास हाईकोर्ट
स्पष्ट कहा गया कि डिग्री और पंजीकरण का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
साइनबोर्ड/विज़िटिंग कार्ड पर ऐसी कोई चीज़ नहीं होनी चाहिए जिससे मरीज यह समझे कि व्यक्ति एलोपैथिक MBBS डॉक्टर है, जबकि वह नहीं है।
🔹 बॉम्बे हाईकोर्ट
Cross-pathy (एक पद्धति का डॉक्टर दूसरी पद्धति में इलाज) को अवैध माना।
“Dr.” लिखना तब गलत है जब उससे गलत चिकित्सा योग्यता का संकेत मिले।
कुल मिलाकर अदालतों का एक ही स्टैंड है:
मरीज को भ्रम नहीं होना चाहिए।
2) क्लिनिक / साइनबोर्ड / विज़िटिंग कार्ड के नियम
✔ MBBS डॉक्टर (वैध स्थिति)
साइनबोर्ड पर यह लिख सकते हैं:
Dr. Xyz
MBBS
Reg. No. (State Medical Council / NMC)
👉 यह सबसे सुरक्षित और कानूनी तरीका है।
⚠ AYUSH डॉक्टर
“Dr.” लिख सकते हैं तभी, जब साथ में स्पष्ट रूप से लिखा हो:
Dr. Xyz (BAMS) / (BHMS) / (BUMS)
❌ “MBBS डॉक्टर” जैसा संकेत देना या
❌ एलोपैथिक दवाओं का प्रचार/उपचार — अवैध
❌ बिना रजिस्ट्रेशन / इंटर्न
“Dr.” लिखना
क्लिनिक चलाना
मरीज देखना
👉 तीनों गैरकानूनी
🎓 PhD धारक
कॉलेज, रिसर्च, किताबों में “Dr.” ✔
क्लिनिक, अस्पताल, इलाज के संदर्भ में ❌
3) एक लाइन में निष्कर्ष
“Dr.” लिखना तब गलत है जब उससे मरीज यह समझ ले कि सामने वाला एलोपैथिक MBBS डॉक्टर है—जबकि वह नहीं है।

“‘डॉक्टर’ लिखने का अधिकार डिग्री से नहीं, वैध पंजीकरण से आता है।
MBBS करने के बाद इंटर्नशिप और NMC/State Medical Council में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है।
बिना रजिस्ट्रेशन ‘Dr.’ लिखना और मरीज देखना कानूनन अपराध है।
अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों में cross-practice न्यायालयों द्वारा अवैध ठहराई जा चुकी है।
सबसे बड़ा सिद्धांत यही है—मरीज को भ्रमित करना अपराध है, चाहे वह बोर्ड पर हो या इलाज में।”

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