जबरन,धोखे और लोभ में मतांतरण रोकने को केंद्रीय कानून क्यों नही?
भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून: राज्य धर्मांतरण से कैसे निपटते हैं
भारत में कोई केंद्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून नहीं है। जिन राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, वे बलपूर्वक या प्रलोभन देकर धर्मांतरण को दंडनीय अपराध मानते हैं। भारत में राज्य धर्मांतरण से कैसे निपटते हैं, इसका एक इतिहास है।
देहरादून , 17 फरवरी 2026। राज्य सरकारों धर्मांतरण विरोधी कानूनों को देख प्राय: कहा जाता है कि केंद्र सरकार इसको एकीकृत कानून क्यों नही बना देती? पहले जबरन, धोखे या लालच में धर्मांतरण से संबंधित मौजूदा कानूनों पर एक नजर।
धर्मांतरण विरोधी कानून की मांग कई स्तरों पर उठती है, और संसद में भी राष्ट्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून के संबंध में राजनीतिक बयानबाजी होती है।
औपनिवेशिक काल में धर्मांतरण विरोधी कानून
अमेरिकी कांग्रेस पुस्तकालय (एलओसी) के शोध पत्र के अनुसार, धार्मिक धर्मांतरण प्रतिबंधकारी कानून मूलत: ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में हिंदू रियासतें लाई थी – विशेषत: 1930 के दशक के उत्तरार्ध और 1940 के दशक में।
इन राज्यों ने “ब्रिटिश मिशनरियों से हिंदू धार्मिक पहचान संरक्षण प्रयास में” ये कानून बनाए थे। एलओसी के शोध पत्र से पता चलता है कि “कोटा, बीकानेर, जोधपुर, रायगढ़, पटना, सरगुजा, उदयपुर और कालाहांडी सहित एक दर्जन से अधिक रियासतों में ऐसे कानून थे।
राष्ट्रीय कानून लागू करने के प्रयास
भारत की स्वतंत्रता बाद, संसद में धर्मांतरण विरोधी कई विधेयक आए, लेकिन उनमें से कोई भी पारित नहीं हुआ। सबसे पहले, 1954 में भारतीय धर्मांतरण (नियमन और पंजीकरण) विधेयक आया, जिसका उद्देश्य “मिशनरियों को लाइसेंस देना और सरकारी अधिकारियों के पास धर्मांतरण का पंजीकरण कराना” था। इस विधेयक को लोकसभा में बहुमत नही मिला।
इसके बाद 1960 में पिछड़े समुदाय (धार्मिक संरक्षण) विधेयक का उद्देश्य हिंदुओं को ‘गैर-भारतीय धर्मों’ में परिवर्तित होने से रोकना था। विधेयक में इस्लाम, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म और पारसी धर्म शामिल थे।
धर्म की स्वतंत्रता विधेयक 1979 में संसद में आया जिसका उद्देश्य “अंतर-धार्मिक धर्मांतरण पर आधिकारिक प्रतिबंध” लगाना था। राजनीतिक समर्थन के अभाव से ये विधेयक भी संसद से पारित नहीं हो पाये।
2015 में, केंद्रीय विधि मंत्रालय ने राय दी थी कि जबरन और धोखाधड़ी से धर्मांतरण के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर कानून नहीं बन सकता, क्योंकि संविधान में कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। हालांकि, राज्य सरकारें ऐसे कानून बना सकती हैं।
अब राज्यों की ओर
पिछले कुछ वर्षों में, कई राज्यों ने बलपूर्वक, धोखाधड़ी से या प्रलोभन से धार्मिक धर्मांतरण प्रतिबंधित करने को “धर्म की स्वतंत्रता” संबंधी कानून बनाए। शोध संगठन, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने कई राज्यों में मौजूद विभिन्न धर्मांतरण-विरोधी कानूनों की तुलना करते हुए रिपोर्ट जारी की ।
“धर्म की स्वतंत्रता कानून” अभी आठ राज्यों(i) ओडिशा (1967), (ii) मध्य प्रदेश (1968), (iii) अरुणाचल प्रदेश (1978), (iv) छत्तीसगढ़ (2000 और 2006), (v) गुजरात (2003), (vi) हिमाचल प्रदेश (2006 और 2019), (vii) झारखंड (2017), और (viii) उत्तराखंड (2018) में है।
हिमाचल प्रदेश (2019) और उत्तराखंड में पारित कानूनों में भी यह घोषित है कि यदि विवाह केवल धर्मांतरण के उद्देश्य से हो, या धर्मांतरण केवल विवाह को किया गया हो, तो विवाह अमान्य होगा।
तमिलनाडु राज्य ने 2002 में और राजस्थान राज्य ने 2006 और 2008 में भी ऐसे कानून पारित किए। लेकिन ईसाईयों के विरोध पर तमिलनाडु का कानून 2006 में निरस्त कर दिया गया था, जबकि राजस्थान के विधेयकों को राज्य के राज्यपाल और भारत के राष्ट्रपति की सहमति नहीं मिली थी।
नवंबर 2019 में, जबरन या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन की बढ़ती घटनाओं का हवाला देते हुए, उत्तर प्रदेश विधि आयोग ने धर्म परिवर्तन को विनियमित करने को एक नया कानून बनाने की सिफारिश की थी। इसी के चलते राज्य सरकार ने अध्यादेश जारी किया था।
धर्मांतरण विरोधी कानूनों का व्यवहार
अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर संयुक्त राज्य आयोग (USCIRF) की 2016 और 2018 की रिपोर्टों के अनुसार, पर्यवेक्षकों ने पाया है कि इन कानूनों में बहुत कम गिरफ्तारियां या अभियोग होते हैं, लेकिन वे “धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लिए एक शत्रुतापूर्ण, और कभी-कभी हिंसक, वातावरण बनाते हैं क्योंकि उन्हें गलत काम के आरोपों का समर्थन करने के लिए किसी भी सबूत की आवश्यकता नहीं होती है”।
यूएससीआईआरएफ की हालिया रिपोर्टों में गिरफ्तारी की कुछ घटनाओं पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें 2017 की एक घटना भी शामिल है, जहां धार्मिक अल्पसंख्यक नेताओं और अनुयायियों को इन कानूनों के परिणामस्वरूप धमकी और गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा।
उदाहरण को, जून 2017 में एक कैथोलिक नन को चार वनवासी महिलाओं के साथ जबरन धर्म परिवर्तन के संदेह में पकड़ा गया था। अप्रैल 2017 में, मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में तीन ईसाइयों को लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में पकड़ा गया था।
जुलाई 2017 में, पंजाब के लुधियाना में ईसाइयों ने विरोध प्रदर्शन किया, जब टेंपल ऑफ गॉड चर्च के पादरी सुल्तान मसीह की सार्वजनिक रूप से हत्या हो गई, इस संदेह पर कि वह धर्मांतरण में शामिल हो सकते हैं।
धर्मांतरण विरोधी कानूनों में क्या शामिल है?
पीआरएस के शोध से विभिन्न राज्य कानूनों की कुछ सामान्य विशेषताएं सामने आती हैं। हालांकि सभी राज्यों ने बलपूर्वक, धोखाधड़ी से या धन के प्रलोभन से धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन केवल हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कानून ही विवाह के माध्यम से धर्मांतरण पर रोक लगाते हैं।
धर्मांतरण की सूचना: अरुणाचल प्रदेश का कानून धर्मांतरण की सूचना देने की आवश्यकता के मामले में सबसे उदार माना जाता है। इसमें केवल धर्मांतरण करने वाले पुजारी को ही धर्मांतरण के बाद जिला मजिस्ट्रेट या इसी तरह के अधिकारियों को सूचना देना अनिवार्य है। धर्मांतरित व्यक्ति को ऐसी कोई घोषणा करने की आवश्यकता नहीं है।
अन्य सभी राज्यों में, धर्मान्तरित होने वाले व्यक्ति के साथ-साथ पुरोहित या “धर्मान्तरितकर्ता” द्वारा अग्रिम सूचना देना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश में सबसे कठोर प्रावधान हैं, जिसके अनुसार धर्मान्तरित होने के इच्छुक व्यक्ति को जिला अधिकारियों को 60 दिन पहले सूचना देनी होती है। पुरोहित को एक महीने पहले सूचना देना अनिवार्य है। उत्तराखंड में दोनों के लिए एक महीने की सूचना अवधि निर्धारित है।
दंड : ओडिशा और मध्य प्रदेश, के कानून सबसे पुराने हैं और जबरन धर्मांतरण को सबसे कम कारावास की सजा (एक वर्ष) निर्धारित करते हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जबरन धर्मांतरण को पांच वर्ष तक की कैद की सजा निर्धारित करते हैं। नाबालिग या महिला के मामले में, सभी राज्यों में सजा अधिक होती है।
विभिन्न राज्यों में लागू ( 23 दिसंबर 2020) किए गए धर्मांतरण विरोधी कानूनों की तुलना :

उत्तराखंड में जबरन धर्मांतरण रोकने को ‘उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2018’ लागू है, जिसे 2022 में और अधिक कठोर संशोधन जोड़ा गया। अब यह कानून देश के सबसे कठोर धर्मांतरण विरोधी कानूनों में से एक माना जाता है।
उत्तराखंड के इस कानून की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
1. सजा के कड़े प्रावधान
2022 के संशोधन के बाद सजा की अवधि और जुर्माने में भारी बढ़ोतरी की गई है:
सामान्य मामला: यदि कोई व्यक्ति बल, प्रलोभन (लालच) या धोखे से धर्मांतरण कराता है, तो उसे 3 से 10 साल तक की जेल हो सकती है।
विशेष वर्ग: यदि पीड़ित नाबालिग, महिला या SC/ST वर्ग से है, तो सजा कम से कम 3 साल और अधिकतम 10 साल तक हो सकती है।
सामूहिक धर्मांतरण (Mass Conversion): यदि एक साथ दो या दो से अधिक लोगों का धर्म बदला जाता है, तो दोषियों को 3 से 10 साल की कैद और कम से कम ₹50,000 का जुर्माना देना होगा।
2. आर्थिक दंड और मुआवजा
कानून के उल्लंघन पर कम से कम ₹50,000 का जुर्माना अनिवार्य है।
इसके अतिरिक्त, अदालत अपराधी को आदेश दे सकती है कि वह पीड़ित को ₹5 लाख तक का मुआवजा (Compensation) दे।
3. अपराध की प्रकृति (Cognizable & Non-Bailable) उत्तराखंड में अब यह अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) है। इसका मतलब है कि पुलिस आरोपित को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है और उसे आसानी से जमानत नहीं मिलेगी।
4. विवाह और धर्मांतरण
यदि कोई विवाह केवल धर्मांतरण को किया गया है, तो उसे अमान्य (Null and Void) घोषित किया जा सकता है।
झूठी पहचान छुपाकर या धोखे से शादी कर धर्म परिवर्तन कराना गंभीर अपराध माना गया है।
5. अनिवार्य घोषणा (Declaration)
स्वेच्छा से धर्म बदलने वाले व्यक्ति को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित सूचना देनी होगी।
धर्मांतरण कराने वाले धार्मिक गुरु (जैसे पंडित, मौलवी या पादरी) को भी इसकी सूचना DM को देनी अनिवार्य है। ऐसा न करने पर उनकी सजा का भी प्रावधान है।
विशेष नोट: अगस्त 2025 में उत्तराखंड सरकार ने कानून और अधिक कठोर बनाने को नए संशोधन विधेयक को मंजूरी दी है, जिसमें कुछ गंभीर मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा का प्रस्ताव है।
