पाखण्डी पर्यावरणवादी और अरावली सुरक्षा आंदोलन

अरावली के बहाने!

हमारी ओर घर की छत या कॉलम ढलाई के लिए दो तरह की गिट्टी आती है। एक झांसी की ओर से, और दूसरी झारखंड के पाकुड़ से। पाकुड़ वाली गिट्टी काले पहाड़ से निकाली जाती है, जबकि झाँसी वाली गिट्टी तनिक सफेद और पाकुड़ से अपेक्षाकृत कम मजबूत बताई जाती है, और इसी कारण पाकुड़ की गिट्टी लगभग 25% महंगी होती है। सामान्य छोड़िये, गरीब तबके के लोग भी घर बनवाते समय पाकुड़ गिट्टी खरीदते हैं आजकल। भले कर्जा लेकर या खेत बेंच के घर बनवा रहे हों, पर गिट्टी पाकुड़ की और बालू सोनभद्र का लगेगा। अब ऐसा भी नहीं कि झांसी वाली गिट्टी बीस पचास साल में गल जाएगी, वह भी पत्थर ही है, पर पाकुड़ का क्रेज है भाई साहब! जनता को वही चाहिये। पत्थर चाहिये और बेस्ट वाला चाहिये…
अब गाँव देहात के भी घरों में फर्श पर पत्थर के लग रहे हैं। अब वे पत्थर अरावली के हैं या सह्याद्रि के यह नहीं पता, पर फर्श में मार्बल लगाना आवश्यक है। गोपालगंज जैसे छोटे शहर में भी लोग किराए का घर ढूंढने निकलते हैं तो बिना मार्बल के फर्श वाले घरों को पसन्द नहीं करते।
एक बात और है। हमारे देश का व्यक्ति थोड़ा सा भी सम्पन्न हो जाय तो वह दूसरा घर बनाता है। गाँव में घर है तो एक नजदीकी शहर में भी हो जाय। वहाँ हो गया तो एक दिल्ली में फ्लैट हो जाय, जयपुर में हो जाय… भले उन घरों में बारहों महीने ताले लटके रहें पर घर बनेंगे। इन घरों में नींव से लेकर छत तक तो पत्थर ही लगता है न? न सही अरावली के, झारखंड के ही सही…
घरों ही नहीं, सड़कों के लिए भी पत्थर ही चाहिये। पहले गाँव देहात में मिट्टी की पगडंडियां या ईंट की सड़क होती थी पर अब चार चार फीट की गलियां भी ढलाई वाली हैं। गली में पक्की सड़क न हो तो हम सरकारों, नेताओं को गालियां देते रहते हैं।
अब देखिये न! सोशल मीडिया में जिन लोगों ने सेव अरावली का मूवमेंट चलाया है, उनमें से अधिकांश के घरों में फर्श पर मार्बल लगा होगा। और मजेदार तथ्य यह भी है कि जो पत्थर लगा है वह उसी अरावली के पहाड़ से आया है। भारत में संगमरमर की मकराना, किशनगढ़, उदयपुर, अंबाजी, बड़ोदरा, कटनी, जबलपुर आदि जगहों पर जो खदानें हैं वह सभी अरावली श्रृंखला के ही पहाड़ तो हैं। अब हमीं उन पत्थरों के ग्राहक भी हैं और हमीं अरावली को बचाने की बातें भी कर रहे हैं। दोनों कैसे सम्भव होगा?
जिन वस्तुओं की मांग बढ़ेगी, बाजार उसे किसी भी तरह उपलब्ध कराएगा। सरकारें या कोर्ट रोक लगाए तब भी चोरी छिपे वह वस्तु बाजार में आएगी ही। आज जबतक अपने घरों के फर्श पर, दीवालों पर, किचेन में, दुकानों में मार्बल लगाते रहेंगे, तबतक अरावली की छाती पर क्रशर चलते रहेंगे।
अरावली का बचना जरूरी है, पर उसे मार हम ही रहे हैं। कोर्ट या सरकारों में बैठे लोग पत्थर नहीं खाते, वे पत्थर हमारे ही घरों में या सड़कों में लग रहे हैं। अरावली या हिमालय को बचाना है हो थोड़ा खुद को रोकना होगा। वरना बात फेसबुकिया तमाशे से अधिक तो नहीं ही है।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

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