मुख्यमंत्री पहुंचे हनुमान मंदिर,किया बजरंग बली का जय-जयकार

कोटद्वार में एक मुस्लिम व्यापारी के दुकान का नाम ‘बाबा’ रखे जाने को लेकर शुरू हुए विवाद में राजनीतिक मोर्चाबंदी भी तेज हो गई है। इस प्रकरण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री के बाद भाजपा भी पलटवार के मूड में है। कौन सही है और कौन गलत की बहस के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आज अचानक देहरादून स्थित हनुमान मंदिर पहुंचे। जहां उन्होंने पंचमुखी हनुमान के दर्शन और पूजा के बाद ‘जय बजरंग बली’ और ‘जय श्रीराम’ के जयकारे लगाए।

कोटद्वार के पटेल मार्ग स्थित एक दुकान का नाम ‘बाबा’ रखे जाने को लेकर 28 जनवरी को बजरंग दल के कार्यकर्ताओं व दुकान स्वामी वकील अहमद के बीच विवाद हो गया था। इसी दौरान वकील अहमद ने अपने परिचित जिम संचालक दीपक कुमार को बुला लिया। दीपक कुमार ने खुद का नाम मोहम्मद दीपक बताकर विवाद में खुलकर दखल की। दोनों पक्षों में तीखी बहस भी हुई और हाथापाई तक की नौबत आ गई थी। हालांकि, बाद में मामला शांत हो गया। बाद में दुकान स्वामी वकील अहमद और बजरंग दल की ओर से कमलपाल की शिकायत पर पुलिस थाने में क्रास रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। इसी बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दीपक कुमार के समर्थन में सोशल मीडिया में एक पोस्ट लिखकर राजनीति को गर्म कर दिया। उन्होंने अपनी पोस्ट में दीपक को मोहब्बत का प्रतीक बताते हुए लिखा कि हम तुम्हारे साथ हैं भाई, डरो मत, तुम बब्बर शेर हो। इतना ही नहीं AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी मैदान में कूद गए और उन्होंने बीजेपी आरएसएस पर जमकर निशाना साधा। इस दौरान उनके निशाने पर बजरंग दल भी रहा। उन्होंने कहा कि अगर दीपक कुमार जैसे नौजवान देश में आगे आएंगे तो बीजेपी और आरएसएस की हुकूमत खत्म हो जाएगी। उनके इस वीडियो को मुस्लिम वर्ग का व्यापक समर्थन हासिल हुआ। देखते ही देखते वीडियो को लाखों व्यूज और शेयर मिल गए। यह प्रकरण सोशल मीडिया के साथ ही नेशनल चैनल्स की सुर्खियों में भी है।

इधर, मंगलवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अचानक धर्मपुर स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर पहुंचे। उनका पंचमुखी हनुमान मंदिर में दर्शन और “जय बजरंग बली” का उद्घोष केवल एक धार्मिक आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस वैचारिक बहस में एक स्पष्ट हस्तक्षेप भी था, जो इन दिनों देश की राजनीति में सनातन बनाम सेक्युलर विमर्श के रूप में तेज़ी से उभर रही है। कोटद्वार प्रकरण की पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री की यह उपस्थिति राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संदेश स्पष्ट था—धामी न केवल प्रशासनिक निर्णयों में, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी अपने पक्ष को खुलकर रखने से पीछे नहीं हटते।

मुख्यमंत्री का यह कथन कि “सनातन संस्कृति को किसी टैग की ज़रूरत नहीं” अपने आप में एक सशक्त वैचारिक वक्तव्य है। बीते वर्षों में ‘सनातन’ को कभी बहुसंख्यकवाद के फ्रेम में, तो कभी सेक्युलर मूल्यों के प्रतिपक्ष में खड़ा कर देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। धामी का बयान इसी दृष्टिकोण को चुनौती देता है और यह रेखांकित करता है कि सनातन परंपरा किसी राजनीतिक लेबल की मोहताज नहीं है। भारतीय सभ्यता में सनातन केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहा है। यह सामाजिक आचरण, सह-अस्तित्व, कर्तव्यबोध और मानवता के संरक्षण का आधार रहा है। धामी द्वारा सनातन परंपरा के मानवीय और समरसतावादी पक्ष पर दिया गया ज़ोर इतिहास और दर्शन—दोनों की ओर संकेत करता है।

स्वाभाविक है कि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण के चश्मे से देखें। लेकिन समर्थकों के लिए यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैचारिक स्पष्टता की अभिव्यक्ति है। प्रश्न यह नहीं है कि कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि मंदिर जाता है या नहीं, बल्कि यह है कि वह सार्वजनिक जीवन में अपनी सांस्कृतिक पहचान को किस प्रकार प्रस्तुत करता है। आज की राजनीति में शब्द, प्रतीक और उद्घोष साधारण नहीं रह गए हैं। “जय बजरंग बली” अब केवल श्रद्धा का वाक्य नहीं, बल्कि वैचारिक पक्षधरता का संकेत भी बन चुका है। ऐसे समय में धामी का यह कदम यह दर्शाता है कि वे इस बहस में तटस्थ रहने के बजाय अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखना चाहते हैं।

अंततः, सनातन बनाम सेक्युलर की बहस से आगे बढ़कर असली सवाल यह है कि क्या हम विविधताओं के साथ सह-अस्तित्व की उस भावना को जीवित रख पा रहे हैं, जिसकी बात सनातन परंपरा स्वयं करती है। यदि राजनीति इस मूल भावना को समझ सके, तो संभव है कि ‘टैग’ अपने आप ही अप्रासंगिक हो जाएं।

दीपक फरस्वाण फेसबुक पर

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