विवेचन: महा.निकाय चुनाव में ठाकरे-पवार परिवारों की एकता क्यों हुई फेल?

Maharashtra Nikay Chunav Results 2026: ठाकरे परिवार की ‘मुंबई रणनीति’ और पवार फैमिली का ‘पुणे समझौता’ अपने गढ़ों में क्यों हो गया फेल?

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजों के बाद से विपक्षी खेमे में सन्नाटा पसरा है. न तो ठाकरे ब्रदर्स का करिश्मा चला और ही पवार फैमिली की ‘दादागिरी’. आखिर क्या कारण रहा कि प्रदेश के लोगों ने अपने इन चहेते परिवारों से मुंह मोड़ लिया.

Has charisma of Thackeray and Pawar families ended?: महाराष्ट्र की राजनीति में ठाकरे और पवार परिवारों की दशकों से तूती बोलती रही है. मुंबई और पुणे जैसे शहर इन दोनों परिवारों के अभेद्य गढ़ रहे हैं. हालांकि अब लगता है कि दोनों परिवारों के ये दुर्ग इतिहास की बात बन चुके. महाराष्ट्र निकाय चुनावों के नतीजों का गंभीर विश्लेषण बदले राजनीतिक समय को आसानी से समझा सकता हैं. यह हाल तब है. जब अपने पुराने सुनहरे दिन वापस पाने को उद्धव और राज ठाकरे ने एक बार फिर गलबहियां की थी. वहीं अजित पवार और चचा शरद पवार ने कार्यकर्ताओं को एकजुटता संदेश दिया था. ऐसे में सवाल  है कि जनता ने इन दोनों परिवारों से मुंह क्यों मोड़ लिया और अब उनकी राजनीति का क्या होगा.

मुंबई में फीकी पड़ी ‘ठाकरे ब्रांड’ की चमक

सबसे पहले ठाकरे परिवार के गढ़ मुंबई की बात. प्रदेश की राजधानी मुंबई में शिवसेना की राजनीति लंबे समय तक बालासाहेब ठाकरे के चमत्कार पर चली. साथ ही मराठी अस्मिता और मुंबई की भावनात्मक राजनीति भी इस पॉलिटिक्स में तड़का लगाती रही. लेकिन उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे में विरासत को लेकर वर्षों चले युद्ध ने पार्टी का कोर वोट बैंक कमजोर कर दिया.

चुनाव पूर्व हाथ मिलाया लेकिन…

अपनी राजनीतिक नींव ढहते देख दोनों ने कई सालों के बाद पहली बार हाथ मिला साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया. दोनों नेताओं ने एका भावनात्मक एकता बताई जिससे पुराना शिवसेना वोट बैंक फिर से एकजुट हो सके. लेकिन इसमें काफी देर हो चुकी थी.  स्थानीय निकाय के चुनावी नतीजों ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि मुंबई का मतदाता अब केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रदर्शन, विकास, शहरी सुविधाओं और स्थिर नेतृत्व के आधार पर निर्णय ले रहा है. शिवसेना विभाजन, लगातार बदलते गठबंधन और स्पष्ट वैचारिक दिशा की कमी ने ठाकरे ब्रांड की विश्वसनीयता कमजोर की.

काम नहीं आ पाई परिवार की एकता

परिणाम यह कि मुंबई जैसे गढ़ में भी ठाकरे परिवार की एकजुटता तक लोगों को अपने पीछे लामबंद नहीं कर सकी. इसके चलते देश का सबसे बड़ा नगर निगम मुंबई शिवसेना के हाथ से निकल गया और भाजपा को पहली बार मुंबई में अपना मेयर बिठाने का अवसर मिल गया.

पुणे में पवार परिवार की राजनीतिक परीक्षा

पुणे को शरद पवार की राजनीतिक प्रयोगशाला कहा जाता रहा है. सहकार, शिक्षा और ग्रामीण-शहरी संतुलन से पवार परिवार ने यहां गहरी पकड़ बनाई. अजित पवार के अलग होने के बाद दोनों धड़ों में रणनीतिक समझौते यानी पुणे पैक्ट की बातें सामने आईं, तो माना गया कि इससे पारंपरिक एनसीपी वोट बैंक सुरक्षित रहेगा. लेकिन सच्चाई ये है कि पुणे के शहरी मतदाताओं ने भी इस बार परिवार के ऊपर ‘स्पष्ट नेतृत्व’ और ‘स्थिर सरकार’ को प्राथमिकता दी. पवार परिवार के अंदरूनी मतभेद, अवसरवादी राजनीति और बार-बार पक्ष परिवर्तन छवि ने मतदाताओं का भरोसा कमजोर किया. इसी से चुनाव के आखिरी दिनों में दोनों पवारों की एकजुटता भी निगम चुनावों में उन्हें निर्णायक बढ़त नहीं दिला सकी.

क्या यह वंशवादी राजनीति के अंत का संकेत है?

राजनीतिक एक्सपर्ट कहते हैं कि किसी भी दल को मतदाता एक बार में ही मौका नहीं देते. वह लंबे समय तक उसकी नीतियां परखकर उससे जुड़ने का फैसला करते हैं. बाला साहेब ठाकरे और शरद पवार ने अपनी खास विचारधारा से प्रदेश में स्पेशल वोट बैंक बनाया था. बाला साहेब ठाकरे ने जहां उग्र हिंदुत्व और मराठी अस्मिता का नारा दिया. वहीं शरद पवार किसानों और मराठा परिवारों की बात करके राजनीति में आगे बढ़े. हालांकि बाला साहेब ठाकरे के देहांत और उद्धव-राज ठाकरे की ओर से अलग पार्टी बनाने के बाद पार्टी का कोर वोट बैंक विभाजित हो गया. यह पार्टी पर पड़ी पहली बड़ी चोट थी, जिसके बाद से वह कभी उभर नहीं पाई. इसके बाद उद्धव ठाकरे की ओर से हिंदुत्व की राजनीति को तिलांजलि देकर तुष्टिकरण पॉलिटिक्स करना कोढ़ में खाज थी. इसके विरोध में पार्टी का बड़ा वर्ग एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बाहर निकल गया और शिवसेना (शिंदे) नाम से नई पार्टी शुरू की.

जिन कारणों से बिदके मतदाता

जैसे केवल इतना ही काफी नहीं था. उद्धव के साथ हाथ मिलाने वाले राज ठाकरे ने फिर से पुराने तेवर दिखा मुंबई में रहते परप्रांतों के खिलाफ धमकी और मारामारी शुरू कर दी. इन धमकियों का भाजपा को छोड़कर किसी भी दल ने विरोध नहीं किया. ऐसे में प्रवासियों के पास भाजपा छोड़कर दूसरी जगह वोट देने का विकल्प खत्म हो गया. राज ठाकरे की इन हरकतों ने ठाकरे परिवार की राजनीति में आखिरी कील ठोक दी. यही हाल पवार परिवार का भी हुआ है. शरद पवार की पार्टी को प्रदेश के 2858 वार्डों में 100 सीटें भी नहीं मिल पाई हैं. उनके भतीजे और प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री भी करीब सवा सौ पर ही ठिठक गए. ये दोनों उदाहरण साफ दर्शा रहे हैं कि वंशवादी राजनीति से लोग बुरी तरह ऊब चुके. उन्हे अब बदलाव चाहिये. खासकर युवा और शहरी मतदाता अब किसी पार्टी से परमानेंट जुड़ने के बजाय विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक क्षमता को प्राथमिकता दे रहा है.

क्या खत्म हो गया ठाकरे-पवार परिवार का समाप्त?

इन सबके बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि ठाकरे या पवार परिवार की राजनीति पूरी तरह समाप्त हो गई है. इनके पास अब भी संगठन, अनुभव और सामाजिक आधार मौजूद है. वे चुनाव परिणामों का निष्पक्ष आकलन कर कमियां दूर कर लें तो उनके लिए भविष्य में सफलता के दरवाजे फिर से खुल सकते हैं. वरना केवल पारिवारिक विरासत के सहारे चुनाव जीतना अब संभव नहीं है. यह बात सभी राजनीतिक दलों को जितनी जल्दी हो सके, समझ लेनी चाहिए वरना जनता तो अपना निर्णय सुना ही चुकी।

ये रहा परिणाम 

29 महानगरपालिका चुनाव में टीम भाजपा (BJP) की सूनामी में सब उड़ गए. BMC समेत 25 महानगरपालिकाओं में भाजपा नेतृत्व वाली महायुति जीत गई . इसमें संघ, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का ‘घर’ नागपुर भी है. जिस मुंबई पर सबकी नजरें लगी हुई थीं, वहां भाजपा-शिंदे की जोड़ी ने प्रचंड बहुमत पाया।

BMC के चुनाव नतीजों का फाइनल निचोड़

टीम BJP को 118 सीटें: ठाकरे परिवार के गढ़ में सेंध लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के गठबंधन ने बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) चुनावों में 227 में से 118 सीट जीतकर शुक्रवार को बहुमत हासिल कर लिया.

BJP बिग ब्रदर: BJP के 89 सीट जीतने और शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीट मिलने के साथ ही गठबंधन ने देश के सबसे अमीर नगर निकाय पर नियंत्रण पाने के लिए आवश्यक 114 सीट का आंकड़ा पार कर लिया.

ठाकरे राज खत्म: शिवसेना (UBT),महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) गठबंधन 72 सीट जीतने में कामयाब रहा. अविभाजित शिवसेना ने 1997 से 25 वर्षों तक नगर निकाय पर शासन किया था.

उद्धव ने खेली अच्छी पारी: उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) ने 65 सीट जीतीं जबकि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने छह सीट जीतीं और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) को केवल एक सीट मिली.

कांग्रेस को 24 सीटें: अन्य दलों में, कांग्रेस ने 24 सीटें, एआईएमआईएम ने आठ, अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा ने तीन और समाजवादी पार्टी ने दो सीटें जीतीं. नौ साल के अंतराल के बाद हुए इन बहुचर्चित चुनावों में दो निर्दलीय उम्मीदवार भी जीते .

चार पूर्व महापौर जीते: बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव में पूर्व महापौर किशोरी पेडनेकर, श्रद्धा जाधव, विशाखा राउत और मिलिंद वैद्य के साथ-साथ तीन पूर्व उपमहापौर भी विजयी हुए. वार्ड 192 से पेडनेकर, वार्ड 202 से जाधव, वार्ड 191 से राउत और वार्ड 182 से वैद्य ने जीत हासिल की।.​​ये चारों उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उबाठा) से हैं. वार्ड 41 से पूर्व उपमहापौर सुहास वाडकर, वार्ड 193 से हेमांगी वारलिकर और वार्ड 98 से अलका केरकर की जीत हुई. वाडकर और वारलिकर शिवसेना (उबाठा) से हैं, जबकि केरकर भाजपा से हैं. पूर्व महापौर और कांग्रेस नेता चंद्रकांत हंडोरे की बेटी प्रज्योति हंडोरे चेंबूर-गोवंडी क्षेत्र के वार्ड 140 से चुनाव हार गईं. हालांकि, शिवसेना (उबाठा) विधायक और पूर्व महापौर सुनील प्रभु के बेटे अंकित प्रभु ने गोरेगांव पूर्व के वार्ड 54 से जीत हासिल की. पूर्व महापौर विश्वनाथ महादेश्वर की पत्नी पूजा महादेश्वर ने सांताक्रूज पूर्व के वार्ड 87 से जीत दर्ज की।

पूर्व गैंगस्टर अरुण गावली की दोनों बेटियां हारीं :1 सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद अरुण गावली नागपुर केंद्रीय जेल से रिहा हुए थे. पूर्व गैंगस्टर और पूर्व विधायक अरुण गावली की दोनों बेटियां बीएमसी चुनाव हार गईं. गीता गावली और योगिता ने अरुण गावली की अखिल भारतीय सेना (एबीएचएस) के टिकट पर मुंबई के बायकुला क्षेत्र से चुनाव लड़ा था. बीएमसी की तीन बार पार्षद रह चुकीं गीता वार्ड संख्या 212 से चुनाव हार गईं, जबकि उनकी बहन योगिता वार्ड संख्या 207 से हारीं. गीता समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अमरीन शहजाद अब्राहनी से हारीं. पहली बार चुनाव लड़ रही योगिता भाजपा उम्मीदवार रोहिदास लोखंडे से पराजित हुईं.

सबसे रोचक: कल्याण-डोंबिवली में शिंदे ने BJP को पछाड़ा  कल्याण-डोम्बिवली महानगरपालिका (केडीएमसी) के चुनावों में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के बीच कांटे की टक्कर हुई, जिसमें शिवसेना ने महायुति के अपने सहयोगी दल को एक सीट से हरा दिया. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 122 सदस्यीय महानगरपालिका में 52 सीट जीतीं, जबकि भाजपा 51 सीटों से दूसरे स्थान पर रही. केडीएमसी के चुनाव विभाग के आंकड़ों के अनुसार शिवसेना (उबाठा) 11 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही, जबकि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) को पांच सीटें, कांग्रेस को दो सीट और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) को एक सीट मिली. किसी भी एक पार्टी के अकेले दम पर स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा पार करने में सफल न होने के कारण ये परिणाम आने वाले दिनों में गहन बातचीत और रणनीतिक चर्चाओं की संभावना दर्शाते हैं.

ठाणे में शून्य पर आउट हुई कांग्रेस :नवी मुंबई, ठाणे और नाशिक के नतीजे

मुंबई से सटे ठाणे में कांग्रेस शून्य पर आउट हो गई जिससे जिलाध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया. ठाणे महानगरपालिका में कांग्रेस की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए ठाणे शहर के कांग्रेस अध्यक्ष विक्रांत चव्हाण ने महाराष्ट्र कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल को अपना इस्तीफा भेज दिया. छत्रपति संभाजीनगर में 115 सदस्यीय नगर निकाय में भाजपा 58 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. एआईएमआईएम 33 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 12 सीटें जीतीं, जबकि शिवसेना (यूबीटी) और बहुजन विकास अघाड़ी ने छह और चार सीटें पाई. नवी मुंबई में भाजपा ने 111 सदस्यीय नगर निगम में 66 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया. शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना 42 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी. शिवसेना (यूबीटी) ने दो सीटें और एमएनएस ने एक सीट जीती. वसई-विरार में बहुजन विकास अघाड़ी ने 115 सीटों में से 71 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की. भाजपा ने शेष 44 सीटें जीतीं.

ओवैसी ने जीत लीं 126 सीटें, महाराष्ट्र में AIMIM की बढ़ती ताकत किसके लिए खतरे की घंटी?

मुंबई के ‘बॉस’ पर जनवरी के अंत में हटेगा सस्पेंस, आरक्षण वाली लॉटरी और फिर समीकरण का पूरा खेल समझिए ओवैसी की AIMIM ने 114 सीटें जीतीं

ओवैसी का ग्राफ बढ़ा

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने राज्य भर के नगर निकायों में कुल 114 सीटें जीती है. एआईएमआईएम ने छत्रपति संभाजीनगर में 33 सीटें, मालेगांव में 21, अमरावती में 15, नांदेड़ में 13, धुले में 10, सोलापुर में 8, मुंबई में 6, ठाणे में 5, जलगांव में 2 और चंद्रपुर में 1 सीट जीती. पिछले नगर निकाय चुनावों में पार्टी ने 80 सीटें जीती थीं.

कांग्रेस-सपा को खतरा बने ओवैसी

महाराष्ट्र में असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने 2026 के नगर निगम चुनावों में जबरदस्त प्रदर्शन किया. पार्टी ने राज्य की 13 नगरपालिकाओं में शानदार प्रदर्शन किया. यह महाराष्ट्र की स्थानीय स्वशासी संस्थाओं में एआईएमआईएम की अब तक की सबसे मजबूत उपस्थिति है. असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों में मजबूत जीत हासिल करके समाजवादी पार्टी (सपा) और अन्य दलों को बड़ी चुनौती दी है. पार्टी की कोशिश है कि 2029 के विधानसभा चुनाव से पहले पूरे राज्य में अपनी मौजूदगी और बढ़ाए. इस जीत के बाद कांग्रेस को भी मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के बीच तेजी से घटती लोकप्रियता सुधारने को प्रयास तेज करने होंगे, क्योंकि एआईएमआईएम ने इन वर्गों में अपना आधार मजबूत कर लिया है. एआईएमआईएम ने अपने पारंपरिक गढ़ों से बाहर भी अपनी पकड़ मजबूत कर कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राजनीतिक दलों को चुनौती दी है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, एआईएमआईएम ने खासकर मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र में अपना वोट शेयर मजबूत किया है. छत्रपति संभाजीनगर एआईएमआईएम का मजबूत गढ़ माना जाता है और यहां उसके सबसे ज्यादा पार्षद जीते .एआईएमआईएम ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) और ठाणे नगर निगम (टीएमसी) में भी अपनी पकड़ बनाई है. खासतौर पर उन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की है जो अल्पसंख्यक बहुल हैं. एआईएमआईएम ने पारंपरिक कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) के उम्मीदवार पीछे छोड़े.

चंद्रपुर में कांग्रेस ने BJP को दिया बड़ा झटका,

कांग्रेस ने चंद्रपुर में भाजपा को झटका देते हुए सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है और उसे कुल 66 में से 30 सीट पर जीत मिली है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खाते में 23, शिवसेना (UBT) ने छह और जन विकास सेना को तीन, वंचित बहुजन आघाडी (वीबीए) को दो और निर्दलीय उम्मीदवारों को दो सीट गई हैं. एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना,ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन( एआईएमआईएम) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को एक-एक सीट मिली है. चंद्रपुर में 2017 के चुनावों में भाजपा को 66 सीट में से 36 पर जीत मिली थी और सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय वडेट्टीवार ने चंद्रपुर में कहा कि पार्टी महानगपालिका की सत्ता में आएगी और 40 से अधिक पार्षदों के समर्थन से अपना महापौर बनायेगी. जनविकास सेना के तीन पार्षदों ने भी पार्टी को समर्थन दिया है.  टिकट न मिलने के बावजूद चुनाव लड़े दो निर्दलीय पार्षद भी कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं.

परभणी में उद्धव का करिश्मा, NCP-कांग्रेस का वर्चस्व खत्म महाराष्ट्र की परभणी और लातूर महानगर पालिका के नतीजे  भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने कई नगर निगमों में शानदार जीत पाई है, लेकिन पिछड़े मराठवाड़ा क्षेत्र का परभणी जिला इस रुझान से अलग बड़ा अपवाद बना है. सत्तारूढ़ गठबंधन को बड़ा झटका दे उद्धव ठाकरे की शिवसेना परभणी में भाजपा को रोक पाई. यह जीत शिवसेना (यूबीटी) के लिए ऐतिहासिक है. यह पहली बार है जब उद्धव ठाकरे की पार्टी सीधे तौर पर परभणी नगर निगम की सत्ता संभालेगी. इस जीत के साथ ही एनसीपी और कांग्रेस का लगभग दो दशक पुराना वर्चस्व खत्म हुआ है. शिवसेना (यूबीटी) को 25 सीटें, कांग्रेस और भाजपा को 12-12, एनसीपी (अजित पवार) को 11, जन सुराज पार्टी को 3, यशवंत सेना को 1 और एक सीट निर्दलीय को गई. शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस अन्य दलों के समर्थन से मेयर दावे की तैयारी में है. परभणी में आखिरी बार शिवसेना के पास 2007 में मेयर पद था, जब यह नगर परिषद थी. 2011 में नगर निगम बनने पर यहां सत्ता एनसीपी और बाद में कांग्रेस के पास रही. 19 साल बाद शिवसेना (यूबीटी) की वापसी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

लातूर में देशमुख पर वार BJP को भारी पड़ गया

लातूर  महानगरपालिका में कांग्रेस की स्पष्ट जीत ने दर्शाया कि पार्टी के दिवंगत नेता विलासराव देशमुख की विरासत की जड़ें मध्य महाराष्ट्र के इस शहर में आज भी मजबूत हैं । चुनाव प्रचार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रदेश इकाई प्रमुख की विवादास्पद टिप्पणी उलटी पड़ गई. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने चुनाव प्रचार में कहा था कि देशमुख की यादें उनके गृह नगर लातूर से ‘मिटा दी जाएगी. मराठवाड़ा क्षेत्र के लोकप्रिय नेता और दो बार मुख्यमंत्री रहे देशमुख का 2012 में निधन हुआ था. लातूर महानगरपालिका की 70 में से 43 सीट कांग्रेस ने पाई, भाजपा को 22, वंचित बहुजन आघाडी को चार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को एक सीट मिली. यहां 2017 के पिछले चुनावों में भाजपा ने 36 सीट जीती थीं, जबकि कांग्रेस 33 सीट से दूसरे स्थान पर थी. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि चव्हाण की टिप्पणियों ने कांग्रेस के पक्ष में वोट एकजुट किये. उनकी टिप्पणी पर हुई तीव्र प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि मराठवाड़ा में विलासराव देशमुख की स्मृति से कितना भावनात्मक जुड़ाव है।

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