“धुरंधर” पर भारत से पाकिस्तान तक माथापच्ची

धुरंधर’ को टारगेट करने वाले पहले आईना देखें-

जब एक सीनियर फिल्मकार ने भारत की दुखती रग को दबाने वाले आतंकी वारदात पर पाकिस्तान के नजरिए से वेबसीरीज बनाया तो लेफ्टविंग विद्वानों और मुख्यधारा के समीक्षकों ने उसकी जमकर तारीफ की। अब जब उसी आतंकी वारदात पर भारतीय या भारत के नजरिए से फिल्म बनायी गयी है तो वही वर्ग फिल्म की चीख-चीख कर निंदा कर रहे हैं।

मेरे ख्याल से धुरंधर की नींव उसी दिन पड़ गयी थी जिस दिन IC814 रिलीज हुई थी। IC814 में अजित डोभाल का रोल ऐसे एक्टर को दिया गया जो मसखरे रोल करते हैं। डोभाल के विरोधी का रोल उसे दिया गया जिसकी छवि बड़े एक्टर की है। नसीरुद्दीन साह और जसवंत सिंह दोनों राजस्थानी हैं और उनका लुक भी मिलता-जुलता है मगर शाह को सिंह की भूमिका नहीं दी गयी क्योंकि इससे डायरेक्टर की जसवंत सिंह को कमतर दिखाने की मंशा पूरी नहीं होती।

पात्र चयन में अनुभव सिन्हा की चतुराई तक बात रहती तो कोई बात नहीं थी, मगर फिल्म का पूरा नरेटिव ही पूरी घटना को पाकिस्तानी सेना के नजरिए से दुनिया के सामने लाता है। फिल्म में अजित डोभाल को जैसे टारगेट किया गया वह बैड टेस्ट में था। अजित डोभाल को मोटा थुलथुल खबोच और मसखरा दिखाया । असल लाइफ में डोभाल के आलोचक भी उन्हें काबिल खुफिया अफसर मानते हैं, काबिल एनएसए भले न मानते हों।

190 व्यक्तियों की जान बचाने को तीन आतंकी छोड़ना एक जटिल कठिन निर्णय है जो किसी के प्राण निचोड़ सकता है। मगर उस निर्णय को जैसे अनुभव सिन्हा ने अजित डोभाल को घेरने को किया वह उनकी संकीर्ण सोच दिखाता है। हिन्दी फिल्म जगत में किसी आतंकी घटना को पाकिस्तानी दृष्टि से पेश करने का शायद यह पहला मामला रहा होगा।

धुरंधर का एक हिस्सा IC814 अपहरण मामले में अजित डोभाल का दृष्टिकोण पेश करता है। मेरे ख्याल से डोभाल वाला हिस्सा फिल्म में मौजूदा लंबाई से आधा या चौथाई होता तो बेहतर होता क्योंकि फिल्म का मुख्य प्लॉट कराची गैंगवार है और उसी से इसे तारीफ मिल रही है। भारत में घटी घटनाएँ अगर किसी खुफिया मिशन का टेक-ऑफ प्वाइंट थीं तो उसका रनवे इतना लम्बा न होता तो बेहतर होता। मगर IC814 के चाहने वालों का गैंग जैसे इस फिल्म पर टूट पड़ा है, वह हैरान करता है।

फिल्म स्कूल के विद्यार्थियों को दोनों फिल्मों की समीक्षा करने वालों के रिव्यू निकालकर उसकी तुलना करनी चाहिए। फिल्म का प्वाइंट ऑफ व्यू बदलते ही नामी समीक्षकों के रिव्यू के पैरामीटर कैसे बदलते हैं इसे शोधार्थियों को दुनिया के सामने लाना चाहिए।

फिल्म समीक्षकों की दिक्कत ये है कि वो किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप नहीं करा सकते। बडे़ मीडिया संस्थानों में बैठे समीक्षक एकजुट होकर किसी फिल्म के कारोबार को कुछ प्रतिशत घटा- बढ़ा सकते हैं मगर वे किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप होने से नहीं रोक सकते।

धुरंधर के आलोचकों में एक और बात साझा दिखती है कि उनमें से ज्यादातर की नजर में पाकिस्तान की आलोचना का मतलब है ‘मुसलमान’ या इस्लाम की आलोचना। कुछ समीक्षक चाहते हैं कि आतंकी हमले के बाद ‘अल्लाहो अकबर’ का नारा लगाया गया तो उसे न दिखाए! उन्हीं समीक्षकों ने “राम के नाम” डाक्यूमेंट्री की जमकर तारीफ की क्योंकि भगवान राम का नाम लेकर एक ऐसी मस्जिद गिरा दी गयी जो मन्दिर तोड़कर बनायी गयी थी ताकि हिन्दुओं को अपमानित और दमित किया जा सके मगर वही फिल्ममेकर हजारों बर्बर घटनाओं के बाद भी ‘अल्लाह के नाम’ बनाने का साहस नहीं कर पाते।

धुरंधर में मुसलमानों के बारे में कोई जेनेरिक स्वीपिंग कमेंट नहीं है, इस्लाम के बारे में भी कोई जेनेरिक स्वीपिंग कमेंट नहीं है। फिल्म पाकिस्तान को भारतीय नजरिये से देखती है और इसे अपराध नहीं कहा जा सकता। भारतीय होते हुए पाकिस्तान के नजरिये से देखना समस्याप्रद दृष्टिकोण है न कि किसी आतंकवादी वारदात को भारतीय नजरिए से देखना।

धुरंधर के प्रशंसकों ने एक बात रेखांकित की है कि जो लोग कहते थे कि किताब का जवाब किताब से दो, सिनेमा का जवाब सिनेमा से दो, वही अब इस फिल्म को लेकर जनता को गैसलाइट करने का प्रयास कर रहे हैं कि यह प्रोपगैंडा है, मत देखो! मुझे समझ नहीं आता कि ऐस कौन सी फिल्म दुनिया में बनी है जो किसी खास नजरिए का प्रोपगैण्डा नहीं करती है! मेरी राय में तत्वतः ‘सत्यमेव जयते’ भी एक प्रोपगैण्डा है और “ईश्वर एक है” भी एक प्रोपगैण्डा ही है।

‘कश्मीर फाइल्स’ के समय भी मैंने लिखा था कि फिल्म की समस्या ये नहीं है कि वह गलत विषय उठा रही है जिससे ज्यादातर लेफ्टविंग आलोचक बिफरे थे। फिल्म की समस्या थी कि वह बुरी फिल्म थी। धुरंधर फिल्ममेकिंग के हिसाब से अच्छी फिल्म है। मुख्यधारा के समीक्षकों को उसी आधार पर उसका मूल्यांकन करना चाहिए न कि आइडियोलॉजिकल नरेटिव के चश्मे से। यह काम विद्वानों का है, न कि अखबारी समीक्षा करने वालों का।

ऐसा भी नहीं है कि धुरंधर फ्री-स्पीच की संवैधानिक सीमा का अतिक्रमण करती है। फिल्म किसी भी जाति, रिलीजन या देश  धरती से मिटा देने की बात नहीं करती। फिल्म आतंकवाद विषय भारतीय या फिर अजित डोभाल के दृष्टिकोण से पेश करती है और यह किसी तरह का कसूर नहीं है।

आज इतना ही। शेष, फिर कभी।

क्या ‘धुरंधर’ प्रोपेगेंडा फिल्म है ? रणवीर सिंह की फिल्म में पॉलिटिक्स को लेकर छिड़ रहा संग्राम

रणवीर सिंह की फिल्म ‘धुरंधर’ थिएटर्स में जमकर भीड़ जुटा रही है. फिल्म  ताबड़तोड़ कमा रही है और एक्टर्स की खूब तारीफ भी हो रही है. पर फिल्म की पॉलिटिक्स को लेकर बहस भी छिड़ी है. कोई ‘धुरंधर’ को प्रोपेगेंडा बता रहा है. कोई इसका बचाव कर रहा है. पर इसके नैरेटिव का एक्स-रे क्या कहता है?
रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ का क्रेज जनता के सिर चढ़कर बोल रहा है. थिएटर्स से बाहर निकल रहे दर्शक फिल्म के हैंगओवर में हैं. ‘धुरंधर’ में रणवीर और अक्षय खन्ना समेत सभी एक्टर्स के काम पर लोग रीझ रहे हैं. फिल्म के म्यूजिक, एक्शन, सीन्स पर जमकर चर्चाएं चल रही हैं. और इन चर्चाओं के बीच लोग फिल्म की पॉलिटिक्स का भी एक्स-रे कर रहे हैं. जहां कईयों को फिल्म की राइटिंग और सेटिंग में देशभक्ति का अनोखा फ्लेवर फील हो रहा है. वहीं कईयों को ‘धुरंधर’ एक पार्टी विशेष के विचारों को आगे बढ़ाने वाली लग रही है. ये मसला असल में फिल्म के कुछ सीन्स और डायलॉग में छुपा है.

क्या है ‘धुरंधर’ की पॉलिटिक्स?
‘धुरंधर’ का प्लॉट एक लाइन में समझ जा सकता है— ये भारत के खिलाफ, पाकिस्तान से चलने वाले आतंकी नेटवर्कों में घुसकर, उन्हें अंदर से कमजोर करने वाले जासूसी मिशन की कहानी है. ‘धुरंधर’ रणवीर सिंह के किरदार को नहीं, इंडिया के मिशन का नाम है.

फिल्म की शुरुआत 1999 के कंधार प्लेन हाइजैक से होती है. भारत सरकार, अपने नागरिकों के बदले तीन दुर्दांत आतंकयों को छोड़ने पर राजी हो गई है. सरकार के एक मंत्री के साथ, आईबी चीफ अजय सान्याल (आर माधवन) हाइजैक हुए प्लेन के अंदर हैं. वो यात्रियों को भरोसा दिला रहे हैं कि मामला सुलझ चुका है. यात्रियों से बात करने के बाद वो आतंकियों के सामने ही तीन बार जोर से बोलते हैं— भारत माता की… मगर एक भी बार प्लेन में बैठे यात्री डर के मारे ‘जय’ नहीं बोलते. एक आतंकी हंसता हुआ सान्याल से कहता है— ‘हिंदू बहुत डरपोक कौम है”।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि उस फ्लाइट में 179 यात्री थे. उनमें अलग-अलग धर्मों के अलावा कुछ विदेशी नागरिक भी थे. आतंकियों से नेगोशिएट करने वाली सरकार भारत की थी. इसलिए डायलॉग में आतंकी अगर सान्याल को ‘हिन्दुस्तानी बहुत डरपोक होते हैं’ कहकर उकसाता, तो भी फिल्म के नैरेटिव में सही फिट होता. लेकिन आतंकी के डायलॉग में एक धर्म विशेष को ‘डरपोक’ बताना, बड़े सॉफ्ट तरीके से आतंकवाद के सामने केवल उस धर्म को खड़ा कर देता है. जबकि आतंकवाद तो पूरे भारत के लिए खतरा रहा है.

कंधार हाइजैक और संसद हमले का दौर 1999-2001 वाला था. इसके बाद ही सान्याल को ‘मिशन धुरंधर’ के लिए हरी झंडी मिली थी. रियल टाइमलाइन में तब देश में एनडीए सरकार थी और प्रधानमंत्री थे स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी. सान्याल अपने प्लान में दो साल की देरी के लिए सरकार और मंत्री को दोष भी देता दिखता है. यानी फिल्म तबकी सरकार को मिशन के लिए हरी झंडी दिखाने का क्रेडिट तो दे रही है. पर इस काम में देरी के लिए खिंचाई भी कर रही है.

इसी तरह ‘धुरंधर’ के एक सीन में, अजय सान्याल अपने एक साथी के साथ, इस सवाल पर माथापच्ची कर रहा है कि भारतीय नोटों के डिजाइन वाली प्लेटें, पाकिस्तान में कैसे पहुंचीं? उसका साथी बाद में बताता है कि इस स्कैन्डल में सरकार के एक मंत्री और कई बड़े सरकारी अधिकारियों का हाथ है. वो बताता है कि कैसे नकली नोट नेपाल के रास्ते उत्तर प्रदेश होते हुए भारत की असली करंसी में मिक्स होते हैं. लेकिन सान्याल इस पूरे मामले पर कोई एक्शन नहीं लेता.

सान्याल की बात का निचोड़ कुछ ऐसा है किअभी उत्तर प्रदेश और देश में जो सरकारें हैं, वो इस मामले पर कुछ नहीं करेंगी. इसलिए अभी बस इंतजार किया जाए, ऐसी किसी सरकार के आने का ‘जो सच में देश के लिए कुछ करना चाहती हो!’

फिल्म की टाइमलाइन में ये सीक्वेंस साल 2005-07 के आसपास का है. इसी टाइम लाइन के बीच में मुंबई पर 26/11 हमला भी होता है. इस टाइमलाइन में ‘मिशन धुरंधर’ की सारी ऐक्टिविटी पाकिस्तान में है, मगर इंडिया में उसकी कोई राजनीतिक बैकिंग या हरकत नहीं नजर आती.

जिन सालों में ‘धुरंधर’ में भारत की पॉलिटिकल हरकत मिसिंग है या पॉलिटिक्स का भ्रष्टाचार देश को नुकसान पहुंचाता दिख रहा है, फिल्म में वो साल यूपीए सरकार वाले हैं. तब देश के प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह थे. जबकि ‘धुरंधर 2’ में जब फिल्म का मेजर एक्शन होगा, तो सरकार बदल जाएगी. तब तक देश में मोदी सरकार की एंट्री हो चुकी होगी. इसका हिंट डायरेक्टर आदित्य धर ने ‘भविष्य में आने वाली मजबूत सरकार’ से दे ही दिया है. लोग इस लाइन को बड़ी आसानी से डिकोड कर ले रहे हैं, ये सबूत है कि आदित्य का हिंट काम कर रहा है.

क्या ‘धुरंधर’ का पॉलिटिकल नैरेटिव प्रोपेगेंडा है?
आदित्य धर की ‘धुरंधर’ एक स्पाई-फिल्म है. ऐसी फिल्मों के प्लॉट में पॉलिटिकल एंगल, कहानी को गहराई देते हैं. पॉलिटिकल एंगल सॉलिड है, तो कहानी का दांव बड़ा है, हीरो के एक्शन्स में जिम्मेदारी बढ़ती है. भारत-पाकिस्तान में बैर है, ये सब जानते हैं. इस बैर के रिश्ते को पाकिस्तान ने आतंक की डोर से मजबूती दे रखी है, ये भी अब सामान्य ज्ञान है. लेकिन अगर कहानी में पॉलिटिक्स मजबूत नहीं है, तो मामला सिर्फ हीरो के एक्शन सीन्स देखने का रह जाता है. हीरो आएगा, एक्शन करेगा, भारत को पाकिस्तानी खतरे से बचा लेगा… बात खत्म!

लेकिन अगर सिर्फ हीरोइज़्म से हटकर कहानी में कुछ नया क्रिएट करना है, रियल जैसा… तो पॉलिटिकल पैंतरेबाजी दिखाए बिना काम चलेगा नहीं. और पॉलिटिकल पैंतरों पर लोगों के निजी ओपिनियन भी होते हैं. वो आपके स्वाद को जमते हों या नहीं. एक आर्टिस्ट का ओपिनियन उसके काम में भी नजर आता है. और उसे अपने क्रिएटिव माध्यम से अपने ओपिनियन एक्सप्रेस करने का अधिकार भी है. आदित्य धर खुद एक कश्मीरी पंडित परिवार से आते हैं. बहुत संभव है कि उन्होंने अपने परिवार, अपने आसपास कश्मीर सिचुएशन के सांप्रदायिक नैरेटिव भी सुने होंगे.

उनकी फिल्म ‘धुरंधर’ में जो भी राजनीतिक झुकाव दिखता है, वो उनका अपना ओपिनियन ज्यादा महसूस होता है, ना कि प्रोपेगेंडा. उनकी फिल्म कहीं भी ठहरकर ऐसा मैसेज देने की कोशिश नहीं करती जो आज की सरकार की किसी पॉलिसी या राजनीतिक मंशा का प्रचार जैसा लगे. केवल एक लाइन सरकारी नैरेटिव से प्रेरित है— ‘ये नया भारत है जो घर में घुसेगा भी, और मारेगा भी.’ मगर ये लाइन तो हर तरह से पाकिस्तान को जवाब देने की हमारी मौजूद पॉलिसी से आती है. इसमें तो कभी कोई प्रोपेगेंडा था ही नहीं. ना ही ये किसी को अपमानित करने वाली बात है.

‘धुरंधर’ में किसी मंत्री के सरकारी बयान या देश की सत्ता में बैठी भाजपा के किसी नेता का भाषण नहीं है. इसमें किसी भारतीय को, उसकी विचारधारा या सोच की वजह से एंटी-नेशनल का लेबल नहीं दिया गया. ना ही देश के किसी समुदाय, धर्म, जाति की देशभक्ति पर सवाल उठाया गया है. ‘धुरंधर’ इस नैरेटिव को पुश नहीं करती कि मौजूदा सरकार आने के बाद से ही पाकिस्तान को करारा जवाब दिया जा रहा है. ना ही ये घटनाओं के फैक्ट्स को लेकर कोई ऐसा झूठ बोलती है जो पिछली सरकारों या दूसरी पार्टियों को गलत तरीके से पेश करता हो. फिल्म जो कुछ दिखा रही है, उसका अधिकांश हिस्सा डॉक्यूमेंटेड है.

‘धुरंधर’ बस पॉलिटिकल परसेप्शन मेकिंग को, अपनी कहानी बेचने के लिए, बड़ी चालाकी से टूल की तरह इस्तेमाल करती दिखती है. ‘धुरंधर’ इन चीजों को ऑडियंस की एंगेजमेंट खींचने के लिए इस्तेमाल करती है. परसेप्शन गढ़ने, और गढ़े हुए परसेप्शन को अपना माल बेचने के लिए इस्तेमाल कर लेने में थोड़ा फर्क है. लेकिन ये पैंतरेबाजी तब सफल हो जाती है जब फिल्म दमदार हो, उसमें जनता का ध्यान बांधने वाला, एंटरटेन करने वाला माल भरपूर हो. और हर रोज ‘धुरंधर’ के ताबड़तोड़ बिकते टिकट इस बात का सबूत हैं कि जनता को फिल्म पसंद आ रही है. इसे सिर्फ पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा के लेंस से देखना भी एक फिल्ममेकर और उसे मिलने वाली क्रिएटिव लिबर्टी से अन्याय ही है.

Dhurandhar देखने के बाद भी नहीं मिले इन 4 सवालों के जवाब, आदित्य धर से हुई चूक या बना रखा है सस्पेंस ?

फिल्म धुरंधर में छोड़े गए कई अनसुलझे सवाल।
क्या ‘धुरंधर’ उरी सिनेमैटिक यूनिवर्स का हिस्सा है?
दर्शकों को कब मिलेगा इन 4 सवालों का जवाब?
रणवीर सिंह (Ranveer Singh) की फिल्म धुरंधर हर तरफ वाहवाही बटोर रही है। पाकिस्तान और छह गल्फ कंट्रीज में बैन बाद भी ये मूवी बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक रिकॉर्ड बना रही है।  फिल्म में एक्शन भी है और इमोशन भी। वॉयलेंस भी है और सारा अर्जुन और रणवीर का रोमांस भी।

‘धुरंधर’ रियल लाइफ से प्रेरित कहानी है। फिल्म में कांधार अटैक से संसद पर हमले और पाकिस्तान के ल्यारी में रहमान डकैत का दबदबा, वहां के आतंकी नेटवर्क कैसे काम करता है, इसे चैप्टर टू चैप्टर दिखाया है। यहां तक आदित्य धर की दोनों फिल्मों ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘धुरंधर’ के बीच गहरा कनेक्शन भी है। हालांकि, फिल्म देखकर बाहर आए दर्शकों के दिमाग में कई सवाल घूमते हैं, जिसका जवाब उन्हें आदित्य धर नहीं देते। कौन से हैं वह 4 सवाल जो फैंस के मन में उठ रहे हैं?
कौन हैं बड़े साहब?
‘धुरंधर’ में अर्जुन रामपाल का किरदार ‘मेजर इकबाल’ मूवी में अक्सर बड़े साहब का खौफ दिखाता है, जो पूरे खेल का मास्टरमाइंड हैं एसपी असलम चौधरी का किरदार निभाते संजय दत्त भी मूवी में बड़े साहब का जिक्र करते हैं, लेकिन ये बड़े साहब आखिर कौन है, इस पर अभी भी सस्पेंस  है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि फिल्म में ‘बड़े साहब’ कोई और नहीं, बल्कि दाउद इब्राहिम है।

रहमान डकैत के साथ मिलकर मेजर इकबाल का दूसरा मिशन?
ल्यारी का गैंगस्टर रहमान डकैत, आतंकी संगठन ISI के लिए काम करते मेजर इकबाल से मिलकर हथियार और गोला-बारूद बनाता है, जिसका उपयोग उन्होंने मुंबई 26/11 बम ब्लास्ट में अपने पहले मिशन में किया था। जब रहमान और इकबाल अपने दूसरे मिशन की साजिश रचते होते हैं, तो हमजा पार्टी में दूसरे हमले को 9 अगस्त की डेट देता है, लेकिन रहमान डकैत-मेजर इकबाल का दूसरा मिशन क्या है, इसकी डिटेल्स फिल्म में नहीं हैं।

ल्यारी पर राज के बाद एसपी चौधरी और हमजा का रिश्ता?
हमजा (Ranveer Singh) एसपी चौधरी से मिलकर, रहमान डकैत को मरवा देता है और खुद ल्यारी का नया गैंगस्टर बन जाता है। रहमान की हत्या करवा ल्यारी की गद्दी पर बैठने के बाद वह एसपी चौधरी के साथ टीम अप करके रखता है या फिर उसका इरादा बदल जाता है और एक नई दुश्मनी का आगाज होता है, इसका जवाब भी दर्शकों को नहीं मिला है।

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क्या उरी का सिनेमैटिक यूनिवर्स का हिस्सा है ‘धुरंधर’?
उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक में कीर्ति कुल्हारी बताती हैं कि उनके पति कैप्टन जसकीरत सिंह रंगी थे, जो पंजाब रेजिमेंट के ऑफिसर थे, वह नौशेरा सेक्टर में एक हमले में शहीद हो गए थे। रणवीर सिंह अभिनीत फिल्म ‘धुरंधर’ में ‘हमजा’ बनकर पाकिस्तान आए कैरेक्टर का असली नाम जसकीरत सिंह रंगी है, जिसके बाद फैंस ये अनुमान लगा रहे हैं कि दोनों फिल्मों में कुछ कनेक्शन जरूर है और ‘धुरंधर’ उरी सिनेमैटिक यूनिवर्स का हिस्सा है, लेकिन इसे मेकर्स ने फिल्म में क्लियर नहीं किया ।

कब मिलेंगे दर्शकों को इन सवालों के जवाब?
इन गहरे सवालों का जवाब देने से आदित्य धर से चूक हुई है, या फिर जानबूझकर फैंस की एक्साइटमेंट बनाये रखने को उन्होंने इसे सस्पेंस रखा हुआ है। इन सभी सवालों का जवाब फैंस को 19 मार्च 2026 में मिलेगा।

‘आईएसआई एजेंट बिकिनी में नाची’,ग्रैमी अवॉर्ड विनर संगीतकार रिकी केज ने’धुरंधर’की तारीफ के साथ’पठान’की उधेड़ी बखिया

ग्रैमी अवॉर्ड विनर संगीतकार रिकी केज ने ‘धुरंधर’ में सितारों की एक्टिंग और म्यूजिक की तारीफ की है. साथ ही, शाहरुख खान की ‘पठान’ पर तंज कसते हुए उन लोगों की सोच की बखिया उधेड़ी है जो ‘धुरंधर’ की आलोचना कर रहे हैं. फिल्म ‘पठान’ अपने गाने ‘बेशरम रंग’ की वजह से विवादों से घिर गई थी.

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रणवीर सिंह और अक्षय खन्ना की परफॉर्मेंस के साथ-साथ फिल्ममेकर आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ की कहानी खूब सराहा जा रही है।  रिकी केज ने भी फिल्म की तारीफ कर शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण की ‘पठान’ पर भी कमेंट किया. (फोटो साभार: IMDb)

रिकी केज ने ‘धुरंधर’ को लेकर एक्स पर लिखा ‘मैं लगातार सफर कर रहा था और थोड़ा ब्रेक लेकर ‘धुरंधर’ देखी. वाह! भारतीय सिनेमा अब परिपक्व हो रहा है. 3.5 घंटे की फिल्म कब खत्म हो गई पता ही नहीं चला. एक्टिंग, एडिटिंग और डायलॉग्स सब टॉप क्लास हैं. म्यूजिक शानदार है. एक स्पाई थ्रिलर जो सही तरीके से बनाई गई है. हर डिपार्टमेंट ने कमाल किया है. आदित्य धर को ढेर सारी बधाई. अब उन्होंने साबित कर दिया है कि वे बेस्ट हैं और उनसे कमाल के अलावा कुछ उम्मीद नहीं की जा सकती.’ (फोटो साभार: X@rickykej)

रिकी ने फिल्म ‘पठान’ पर कमेंट करते हुए लिखा, ‘नोट: जो लोग फिल्म की आलोचना कर रहे हैं, शायद उन्होंने फिल्म देखी ही नहीं है. फिल्म जैसी है, वैसी ही दिखाती है. चाहे वह डरावनी हो या कुछ और — बिना किसी मीठेपन के. यह एडल्ट सर्टिफाइड है, तो बच्चों को ले जाना बेवकूफी होगी. जो लोग फिल्म की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें शायद ऐसी फिल्में पसंद हैं जिसमें एक बोल्ड पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट बिकिनी में ‘बेशरम रंग’ पर डांस करती है. उनके लिए वही सिनेमा है.’ (फोटो साभार: IMDb)

रिकी केज ने ‘पठान’ के बारे में बताते हुए कहा कि सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनी पठान एक स्पाई एक्शन थ्रिलर थी, जिसमें शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण और जॉन अब्राहम महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे. इसने दुनियाभर में 1050 करोड़ रुपये कमाए थे. हालांकि, दीपिका के केसरिया रंग की बिकिनी में ‘बेशरम रंग’ गाने में नजर आने पर विवाद भी हुआ था. (फोटो साभार: IMDb)

रिकी केज चार बार ग्रैमी के लिए नॉमिनेट हो चुके हैं और तीन बार ग्रैमी अवॉर्ड जीत चुके हैं. उन्होंने 2015 में ‘विंड्स ऑफ समसारा’ के लिए पहला ग्रैमी जीता था. 2022 में ‘डिवाइन टाइड्स’ के लिए स्टुअर्ट कोपलैंड के साथ दूसरा ग्रैमी मिला. 65वें ग्रैमी अवॉर्ड्स में ‘डिवाइन टाइड्स’ के लिए तीसरा ग्रैमी जीता.

‘धुरंधर’ को आदित्य धर ने लिखा और डायरेक्ट किया है. फिल्म में रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना, अर्जुन रामपाल, संजय दत्त और आर माधवन अहम भूमिकाओं में हैं. इनके अलावा सारा अर्जुन, राकेश बेदी, गौरव गेरा, डेनिश पोंडर और नवीन भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं.(फोटो साभार: IMDb)

‘धुरंधर’ को क्रिटिक्स से मिले-जुले रिएक्शन मिले हैं. लेकिन दर्शकों को फिल्म काफी पसंद आई है. पॉजिटिव वर्ड ऑफ माउथ की वजह से यह 2025 की पांचवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई है, वो भी सिर्फ आठ दिनों में. (फोटो साभार: IMDb)

फिल्म धुरंधर ने अब तक दुनियाभर में 372 करोड़ कमाये है. अब फैंस इसके सीक्वल का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जो 19 मार्च 2026 को रिलीज होगी.<br />(फोटो साभार: IMDb)

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