एपस्टीन फ़ाइल्स से कांग्रेस को मिलेगा कुछ?लगता तो नही
जेफ़री एपस्टीन से जुड़े अदालती प्रपत्रों (जिन्हें अक्सर ‘एपस्टीन फ़ाइल्स’ कहा जाता है) को लेकर सोशल मीडिया और खबरों में काफी चर्चा रही है। जब जनवरी 2024 में इन प्रपत्रों के पन्ने सार्वजनिक किए गए, तो कई लोग भारतीय नामों की तलाश कर रहे थे।
यहाँ इस विषय से जुड़ी सटीक और स्पष्ट जानकारी दी गई है:
क्या किसी भारतीय का नाम शामिल है?
प्रपत्रों में मुख्य रूप से एक प्रमुख नाम सामने आया है: नकुल सेठी (Nakul Sethi)।
वह कौन हैं? नकुल सेठी एक बैंकर थे, जो उस समय ‘ड्यूश बैंक’ (Deutsche Bank) में कार्यरत थे।
संदर्भ: उनका नाम किसी अपराध या यौन शोषण के आरोप में नहीं, बल्कि व्यावसायिक संदर्भ में आया है। फाइल्स में मौजूद ईमेल से पता चलता है कि वे एपस्टीन के वित्तीय खातों और बैंकिंग लेन-देन के प्रबंधन से जुड़े थे।
कुछ महत्वपूर्ण बातें जो आपको जाननी चाहिए:
नाम होने का मतलब अपराधी होना नहीं है: सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों में सैकड़ों नाम शामिल हैं। इनमें से कई लोग केवल एपस्टीन के कर्मचारी, उसके विमान में यात्रा करने वाले यात्री, या उसके व्यावसायिक सहयोगी थे। जब तक किसी के खिलाफ विशिष्ट आरोप न हो, केवल नाम होने से कोई दोषी सिद्ध नहीं होता।
गलत जानकारी (Misinformation): फाइल्स जारी होने के समय सोशल मीडिया पर कई फर्जी लिस्ट वायरल हुई थीं, जिनमें बॉलीवुड सितारों या भारतीय राजनेताओं के नाम होने का दावा किया गया था। जांच में ये सभी दावे झूठे पाए गए हैं। आधिकारिक अदालती प्रपत्रों में ऐसी किसी भी बड़ी भारतीय हस्ती का नाम शामिल नहीं है।
अभी तक सार्वजनिक की गई आधिकारिक ‘एपस्टीन फाइल्स’ (अदालती दस्तावेजों) में विशेष रूप से किसी कांग्रेस नेता का नाम ‘अपराध’ या ‘यौन शोषण’ के संदर्भ में सामने नहीं आया है।
हालाँकि, सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक चर्चाओं में इसे लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। यहाँ इसकी पूरी सच्चाई और संदर्भ दिया गया है:
1. सोशल मीडिया पर वायरल दावे:
जब जनवरी 2024 में दस्तावेजों की पहली खेप सार्वजनिक हुई थी, तब व्हाट्सएप और एक्स (Twitter) पर कई फर्जी सूचियाँ (Fake Lists) वायरल हुई थीं। इनमें गांधी परिवार और कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं के नाम होने का दावा किया गया था। तथ्य जांच (Fact Check) में ये सूचियाँ पूरी तरह से फर्जी पाई गईं। मूल अदालती दस्तावेजों में इनमें से किसी भी नेता का नाम शामिल नहीं था।
2. ‘इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट’ (IPI) का संबंध:
जैसा कि मैंने पहले बताया, हरदीप सिंह पुरी (जो अब भाजपा में हैं) का नाम उस समय के संदर्भ में आया जब वे न्यूयॉर्क में एक थिंक टैंक (IPI) में कार्यरत थे। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस विषय को उठाकर भाजपा सरकार पर हमलावर हैं। जवाब में, भाजपा समर्थकों और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह तर्क दिया गया है कि जिस समय ये मुलाकातें हुईं (2014-2017), उस समय के कई भारतीय राजनयिकों और अधिकारियों के तार भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से एपस्टीन के नेटवर्क के आसपास रहे होंगे। लेकिन प्रपत्रों में किसी भी सक्रिय कांग्रेस नेता का सीधा नाम या ईमेल अभी तक नहीं मिला है।
3. वर्तमान राजनीतिक स्थिति:
भारत में इस समय ‘एपस्टीन फाइल्स’ का इस्तेमाल एक-दूसरे पर राजनीतिक कीचड़ उछालने के लिए किया जा रहा है:
विपक्ष (कांग्रेस) हरदीप सिंह पुरी और प्रधानमंत्री मोदी के ‘रेफरेंस’ को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांग रहा है।
सत्ता पक्ष (भाजपा) इसे विदेशी षड्यंत्र और सनसनीखेज रिपोर्टिंग बताकर निरस्त कर रहा है।
निष्कर्ष:
अब तक जारी लाखों पन्नों के अदालती प्रपत्रों में किसी भी प्रमुख कांग्रेस नेता का नाम नहीं है। भविष्य में यदि अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और अधिक दस्तावेज जारी करता है, तो स्थिति बदल सकती है, लेकिन फिलहाल कांग्रेस नेताओं का नाम केवल सोशल मीडिया की अफवाहों और राजनीतिक बहस तक ही सीमित है।
सोनिया गांधी के नाम को लेकर चल रही चर्चाओं की सच्चाई को समझना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इस मामले में तथ्यों और अफवाहों के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
1. आधिकारिक प्रपत्रों में स्थिति:
जेफ़री एपस्टीन से जुड़े जो भी अदालती प्रपत्र (Court Documents) अब तक सार्वजनिक हुए हैं, उनमें सोनिया गांधी का नाम कहीं भी शामिल नहीं है। अमेरिकी कोर्ट की आधिकारिक लिस्ट या ईमेल्स में उनका कोई ज़िक्र नहीं मिलता।
2. ये चर्चा शुरू कैसे हुई? (सोशल मीडिया और अफवाहें):
जनवरी 2024 में जब ‘एपस्टीन फाइल्स’ का पहला सेट अनसील (Unseal) हुआ था, तब सोशल मीडिया (जैसे X, Facebook और WhatsApp) पर कई फर्जी लिस्ट (Fake Lists) वायरल हो गई थीं।
- इन सूचियों में दुनिया भर के कई बड़े नेताओं, जिनमें सोनिया गांधी और कुछ अन्य भारतीय राजनेताओं के नाम जोड़ दिए गए थे।
- कई स्वतंत्र और कांग्रेस के सहयोगी फैक्ट-चेकर्स (जैसे Alt News, Boom Live और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां) ने इन लिस्ट की जाँच की और इन्हें पूरी तरह से फर्जी पाया। शरारती तत्वों ने असली दस्तावेज़ों के फॉर्मेट में छेड़छाड़ करके ये नाम जोड़ दिए थे।
3. राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप:
चूंकि हरदीप सिंह पुरी और प्रधानमंत्री मोदी के ‘रेफरेंस’ को लेकर विपक्ष (कांग्रेस) सरकार पर सवाल उठा रहा है, इसलिए सोशल मीडिया पर इसके जवाब में कांग्रेस नेताओं के नाम घसीटे जाने लगे। यह एक तरह का राजनीतिक नैरेटिव है, जिसका फिलहाल किसी भी कानूनी प्रपत्र से कोई लेना-देना नहीं है।
4. संदर्भ और वास्तविकता:
एपस्टीन मुख्य रूप से न्यूयॉर्क, लंदन और इज़राइल के रसूखदार गलियारों में सक्रिय था। अभी तक के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि उसका संपर्क उन लोगों से ज़्यादा था जो उस समय (2000-2017) न्यूयॉर्क की बैंकिंग और थिंक-टैंक वाली दुनिया का हिस्सा थे। सोनिया गांधी या कांग्रेस के किसी शीर्ष नेता का इस नेटवर्क से सीधा संबंध होने का कोई भी सबूत सामने नहीं आया है।
निष्कर्ष:
सोनिया गांधी का नाम केवल सोशल मीडिया की वायरल पोस्ट्स और राजनीतिक बहस में लिया जा रहा है। आधिकारिक ‘एपस्टीन फाइल्स’ में उनका नाम नहीं है।
प्रपत्रों की प्रकृति: ये फाइलें मुख्य रूप से वर्जीनिया जफ्रे (Virginia Giuffre) के घिसलेन मैक्सवेल के खिलाफ किए गए 2015 के दीवानी मुकदमे से संबंधित हैं।
निष्कर्ष: वर्तमान में उपलब्ध आधिकारिक फाइल्स में किसी भी भारतीय सेलिब्रिटी या प्रभावशाली नेता का नाम यौन अपराधों के संबंध में नहीं है। नकुल सेठी का नाम केवल बैंक से जुड़े पेशेवर कार्यों के कारण शामिल है।
अगर हम कानूनी पहलुओं और नेटवर्क की कार्यप्रणाली को देखें, तो यह मामला केवल कुछ नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जटिल सिस्टम की ओर इशारा करता है।
यहाँ कुछ मुख्य बिंदु दिए गए हैं जो इस पूरे मामले की गंभीरता को समझाते हैं:
1. कानूनी पहलू: ‘सील्ड’ बनाम ‘अनसील्ड’ दस्तावेज़
जनवरी 2024 में जो दस्तावेज़ जारी हुए, वे ‘Unsealed’ (सार्वजनिक) किए गए थे। इसका मतलब यह है कि अदालत ने माना कि अब इन नामों को छुपाए रखने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है।
महत्व: इनमें उन लोगों के नाम भी शामिल हैं जो पीड़ित थे, गवाह थे, या जिन्होंने केवल एपस्टीन के साथ काम किया था। कानून की नज़र में, जब तक किसी पर ठोस आरोप (Indictment) न हो, उसे अपराधी नहीं माना जा सकता।
2. एपस्टीन का ‘नेटवर्क’ कैसे काम करता था?
एपस्टीन ने खुद को एक बेहद अमीर और प्रभावशाली ‘मनी मैनेजर’ के रूप में पेश किया था। उसका नेटवर्क तीन मुख्य स्तंभों पर टिका था:
राजनीतिक प्रभाव: वह बड़े राजनेताओं को अपने निजी द्वीप और पार्टियों में आमंत्रित करता था ताकि उसे ‘सुरक्षा’ और ‘सम्मान’ मिल सके।
वैज्ञानिक और शैक्षणिक संपर्क: उसने कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ (जैसे MIT और Harvard) को बड़े डोनेशन दिये थे, जिससे उसकी छवि एक विद्वान और दानी व्यक्ति की बनी।
वित्तीय विशेषज्ञता: बैंकिंग सेक्टर (जैसे ड्यूश बैंक और जेपी मॉर्गन) के साथ उसके गहरे संबंध थे, जिससे वह बड़े ट्रांजेक्शन आसानी से कर पाता था।
3. कानूनी जवाबदेही और बैंक
इस मामले में केवल व्यक्तियों पर ही नहीं, बल्कि संस्थानों पर भी गाज गिरी है। उदाहरण के तौर पर: JP Morgan Chase और Deutsche Bank को भारी जुर्माना भरना पड़ा। उन पर आरोप था कि उन्होंने एपस्टीन की संदिग्ध गतिविधियों और ट्रांसेक्शन्स को नज़रअंदाज़ किया।
4. पीड़ितों की लड़ाई
यह पूरी कानूनी प्रक्रिया वर्जीनिया जफ्रे (Virginia Giuffre) के साहस का परिणाम है। उनके मुकदमों ने ही घिसलेन मैक्सवेल (Ghislaine Maxwell) को सजा दिलाने और इन फाइलों को सार्वजनिक करने का रास्ता साफ किया।
एक ज़रूरी बात: अक्सर ऐसी ‘लीक’ हुई फाइलों के नाम पर इंटरनेट पर क्लिकबेट और सनसनीखेज खबरें फैलाई जाती हैं। हमेशा विश्वसनीय समाचार स्रोतों या सीधे अदालती रिपोर्टों पर भरोसा करना बेहतर होता है।
नरेंद्र मोदी और हरदीप सिंह पुरी के नामों की चर्चा हाल ही में (फरवरी 2026) अमेरिकी न्याय विभाग के जारी किए गए प्रपत्रों के नए सेट के बाद शुरू हुई है। यह विषय भारत में काफी राजनीतिक विवाद का केंद्र बना हुआ है।
यहाँ इस मामले की तथ्यात्मक स्थिति यह है:
1. हरदीप सिंह पुरी (Hardeep Singh Puri)
विपक्ष और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, हरदीप सिंह पुरी का नाम दस्तावेज़ों में कई बार आया है।
दावा: आरोप है कि 2014 से 2017 के बीच उनके और एपस्टीन के बीच कई ईमेल साझा हुए और कुछ बैठकें भी हुईं।
पुरी का स्पष्टीकरण: उन्होंने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि वे एपस्टीन से मिले थे, लेकिन उन्होंने इसे “पूरी तरह व्यावसायिक और औपचारिक” बताया। उनका कहना है कि वे उस समय एक थिंक टैंक (International Peace Institute) के साथ जुड़े थे और उनके बॉस ने ही एपस्टीन से उनका परिचय कराया था। उन्होंने इन बैठकों का किसी भी आपराधिक गतिविधि से संबंध सिरे से निरस्त किया है।
2. नरेंद्र मोदी (Narendra Modi)
प्रधानमंत्री मोदी का नाम प्रपत्रों में सीधे नहीं, बल्कि एपस्टीन के लिखे गए कुछ ईमेल्स में ‘रेफरेंस’ में आया है।
संदर्भ: एपस्टीन ने किसी अन्य व्यक्ति को ईमेल लिखते हुए प्रधानमंत्री मोदी की 2017 की इज़राइल यात्रा का ज़िक्र किया था।
MEA (विदेश मंत्रालय) का रुख: भारत सरकार ने इन संदर्भों को “एक अपराधी की बकवास” (Trashy ruminations by a convicted criminal) कहकर निरस्त कर दिया है। सरकार का कहना है कि एपस्टीन केवल प्रभावशाली लोगों के नाम लेकर अपना महत्व दिखाना चाहता था, और प्रधानमंत्री मोदी का उससे कोई सीधा संपर्क कभी नहीं रहा।
3. अन्य भारतीय नाम
प्रपत्रों में उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम भी चर्चा में है। दावा हो रहा है कि उनके और एपस्टीन के बीच कुछ संदेशों का आदान-प्रदान हुआ, जिसमें व्यापारिक नेटवर्किंग की बात कही गई है।
इस विवाद को कैसे समझें?
नाम बनाम अपराध: एपस्टीन एक “नेटवर्कर” था जो दुनिया भर के रसूखदार लोगों (नेताओं, वैज्ञानिकों, अरबपतियों) के साथ संबंध बनाने की कोशिश करता था। फाइल्स में नाम होने का मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति एपस्टीन के अपराधों में शामिल था।
राजनीतिक मोड़: भारत में विपक्ष इन ईमेल्स और मुलाकातों के समय (2014-2017) को लेकर सरकार से पारदर्शिता की मांग कर रहा है, जबकि सरकार इसे पूरी तरह निराधार और सनसनीखेज बता रही है।
महत्वपूर्ण तथ्य: अब तक जारी किसी भी आधिकारिक प्रपत्र में इन भारतीय नेताओं पर किसी भी प्रकार के ‘यौन शोषण’ या ‘अनैतिक गतिविधि’ का कोई आरोप नहीं लगा है। सारा विवाद केवल मुलाकातों और ईमेल्स के रिकॉर्ड को लेकर है।
इस विवाद की टाइमलाइन और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को समझने को हमें वे मुख्य कड़ियां जोड़नी होंगी जो इन ईमेल्स और मुलाकातों से जुड़ी हैं।
यह है वर्तमान स्थिति का विस्तृत विवरण :
1. मुख्य टाइमलाइन (2014 – 2017)
प्रपत्रों के अनुसार, यह वह समय था जब जेफ़री एपस्टीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पैठ बनाने की कोशिश में था:
2014-2015: हरदीप सिंह पुरी तब न्यूयॉर्क में एक थिंक टैंक, ‘इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट’ (IPI) के उपाध्यक्ष थे। तभी उनकी मुलाकात एपस्टीन से हुई। पुरी के अनुसार उनके बॉस (टेजे रॉड-लार्सन) ने उन्हें एपस्टीन से मिलवाया था।
2016: ईमेल्स से पता चलता है कि एपस्टीन और पुरी में बैठकों और चर्चाओं का दौर चला। विपक्ष का दावा है कि इन ईमेल्स में कुछ “व्यावसायिक सौदों” का भी ज़िक्र है।
जुलाई 2017: प्रधानमंत्री मोदी की ऐतिहासिक इजराइल यात्रा हुई। एपस्टीन के एक ईमेल में इस यात्रा का संदर्भ देते हुए कुछ “रणनीतिक चर्चाओं” की बात कही गई है। भारत सरकार का कहना है कि यह केवल एपस्टीन की अपनी कल्पना थी, जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।
2. राजनीतिक प्रतिक्रियाएं (भारत में)
इन प्रपत्रों के सामने आने के बाद भारत का राजनीतिक वातावरण काफी गर्म है:
विपक्ष का हमला (Congress & Others):
विपक्ष सवाल उठा रहा है कि एक घोषित अपराधी (एपस्टीन को 2008 में ही सजा हो चुकी थी) के साथ भारतीय अधिकारी और नेता संपर्क में क्यों थे?
उन्होंने मांग की है कि इन ईमेल्स की पूरी जांच हो ताकि साफ हो सके कि क्या कोई ‘हितों का टकराव’ (Conflict of Interest) था।
सरकार और भाजपा का बचाव:
सरकार का स्पष्ट तर्क है कि एपस्टीन एक ‘सोशल क्लाइंबर’ था, जो बड़े नामों का इस्तेमाल कर खुद को प्रभावशाली दिखाता था।
हरदीप सिंह पुरी ने साफ किया है कि उनकी मुलाकातें केवल पेशेवर थीं और उस समय वे सरकार का हिस्सा नहीं थे। उन्होंने इसे अपनी छवि बिगाड़ने का षड्यंत्र बताया है।
भाजपा ने भी लगाये कांग्रेस पर आरोप


3. विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी और कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि एपस्टीन जैसे लोग अक्सर “Name-dropping” (बड़े लोगों का नाम लेकर रौब झाड़ना) का सहारा लेते थे।
उनके ईमेल्स में किसी का नाम होने का मतलब यह नहीं है कि उस व्यक्ति ने एपस्टीन के साथ कोई गुप्त समझौता किया था।
चूंकि एपस्टीन दुनिया के सबसे बड़े बैंकों और थिंक टैंक्स से जुड़ा था, इसलिए कई अनजाने लोग भी उसके संपर्क में आ जाते थे।
निष्कर्ष और वर्तमान स्थिति
फिलहाल, यह मामला भारत में ‘नैतिकता बनाम राजनीति’ की लड़ाई बन गया है। कानूनी रूप से अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो किसी भारतीय नेता को एपस्टीन के यौन अपराधों से जोड़ता हो। विवाद केवल इस बात पर है कि “उससे मुलाकात क्यों की गई?”
इस पूरे मामले की गहराई में जाने को इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (IPI) और इजरायल कनेक्शन समझना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि यही वो दो कड़ियाँ हैं जहाँ भारतीय नामों का ज़िक्र आता है।
1. इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (IPI) की भूमिका
यह न्यूयॉर्क स्थित एक बहुत प्रभावशाली ‘थिंक टैंक’ है जो संयुक्त राष्ट्र (UN) के साथ मिलकर काम करता है।
टेजे रॉड-लार्सन (Terje Rød-Larsen): ये IPI के अध्यक्ष और एक प्रसिद्ध राजनयिक थे। उन्होंने ही हरदीप सिंह पुरी को एपस्टीन से मिलवाया था।
एपस्टीन का पैसा: बाद में पता चला कि एपस्टीन ने IPI को 6,50,000 डॉलर का दान दिया था। जब यह बात सामने आई, तो रॉड-लार्सन को पद छोड़ना पड़ा।
विवाद: आरोप है कि एपस्टीन इस थिंक टैंक का इस्तेमाल बड़े देशों के राजनयिकों और नेताओं तक पहुँचने को एक ‘कवर’ के रूप में कर रहा था। हरदीप सिंह पुरी तब इसी संस्थान में कार्यरत थे, इसलिए उनका नाम इन बैठकों के रिकॉर्ड में आया।
2. एपस्टीन का ‘इजरायल कनेक्शन’ और प्रधानमंत्री मोदी का ज़िक्र
एपस्टीन के इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ बहुत गहरे संबंध थे। दस्तावेज़ों के अनुसार:
ईमेल का संदर्भ: एपस्टीन ने अपने ईमेल्स में एहुद बराक और अन्य इज़रायली अधिकारियों से मुलाकातों का ज़िक्र किया था।
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा (2017) : एपस्टीन ने एक ईमेल में लिखा कि वह “भारतीय प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा” में कुछ महत्वपूर्ण लोगों से मिल रहा है।
वो जो सच है: सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एपस्टीन अक्सर ऐसी हाई-प्रोफाइल यात्राओं का ज़िक्र अपने ईमेल्स में इसलिए करता था ताकि वह अपने क्लाइंट्स को दिखा सके कि उसे दुनिया की हर बड़ी हलचल की ‘अंदरूनी जानकारी’ है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री की आधिकारिक यात्रा का एपस्टीन से कोई लेना-देना नहीं था।
3. ‘ब्लैकमेल’ और ‘हनी ट्रैप’ के आरोप
एपस्टीन मामले में एक बड़ा कानूनी पक्ष यह भी रहा है कि वह प्रभावशाली लोगों की जासूसी करता था:
कुछ रिपोर्टों में दावा है कि वह अपने द्वीप (Little St. James) पर आने वाले मेहमानों की गुप्त रिकॉर्डिंग करता था ताकि बाद में उन्हें ब्लैकमेल कर सके या अपना काम निकलवा सके।
हालांकि, अभी तक जारी फाइल्स में किसी भी भारतीय नेता या अधिकारी की ऐसी किसी रिकॉर्डिंग या अनैतिक गतिविधि का कोई प्रमाण नहीं मिला है।
वर्तमान स्थिति:
अमेरिका में न्याय विभाग (DOJ) अभी भी लाखों ईमेल्स की जाँच कर रहा है। भविष्य में अगर और प्रपत्र सार्वजनिक होते हैं, तो शायद कुछ और कड़ियाँ साफ हों।
निष्कर्ष के तौर पर: फिलहाल यह मामला “अपराध” से ज़्यादा “गलत लोगों से मेल-जोल” (Bad Association) का है।
Epstein File Us President Donald Trump Client List Lolita Express Girl Trafficking Lawsuit Wall Street Journal
द्वीप, लोलिता और गंदी बात, एपस्टीन की क्लाइंट लिस्ट से ट्रंप का बुढ़ापा खराब?
अमेरिका में इन दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एपस्टीन फाइल बड़ा सिरदर्द है।
22 साल पहले का गुनाह आज पूरे अमेरिका पर भारी पड़ रहा है। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बौखलाए हैं। अमेरिका को फिर से महान बनाने की कोशिश में लगे ट्रंप को जवाब तक नहीं सूझ रहा। अब एक-से-बढ़कर एक अजीबोगरीब फैसले लेने वाले ट्रंप खुद घिरते जा रहे हैं। ट्रंप ने इस पर रिपोर्ट छापने वाले वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) पर मानहानि का केस कर 10 अरब डॉलर (लगभग ₹86,188 करोड़ भारतीय करेंसी) क्षतिपूर्ति मांगी है। यह सब एक फाइल के चलते हो रहा है। यह फाइल है एपस्टीन फाइल।
क्या है एपस्टीन फाइल, जो ट्रंप की बनी फांस
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, जिस एपस्टीन फाइल के चलते पूरे अमेरिका में बवाल मचा है, वह यौन अपराधी अरबपति जेफ्री एपस्टीन से जुडा है। बताया जाता है कि कथित तौर पर उसने एक ‘क्लाइंट फाइल’ बना रखी थी, जिसमें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, ब्रिटेन के प्रिंस एंड्र्यू, डोनाल्ड ट्रंप, पॉप सिंगर माइकल जैक्सन समेत दुनियाभर के ताकतवर नेताओं, बिजनेस टायकून और हस्तियों के नाम दर्ज हैं। ट्रंप पर इन्हीं फाइलों को सार्वजनिक करने का दबाव है। आरोप है कि वो अमेरिकी संघीय जांच एजेंसी FBI और जस्टिस डिपार्टमेंट जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल इस फाइल को दबाने में कर रहे हैं। इन एजेंसियों ने 7 जुलाई को कहा था कि एपस्टीन की हत्या नहीं की गई थी और न ही उसने किसी को ब्लैकमेल किया था। उसकी फाइल में कोई क्लाइंट लिस्ट नहीं थी।
कौन था एपस्टीन, जो अमेरिका में बना बादशाह
जेफ्री एपस्टीन कभी अमेरिका में एक मामूली टीचर था। इसी बीच उसकी दोस्ती वॉल स्ट्रीट इन्वेस्टर से हुई थी। 1982 में उसने अपनी फर्म ‘एपस्टीन एंड कंपनी’ खोल ली, जो अरबपतियों को फाइनेंशियल एडवाइज देती थी। यहीं से उसने उड़ान भरनी शुरू की और कुछ ही सालों में वह अमेरिका के अमीरों में सम्मिलित हो गया। उसने न्यू मेक्सिको में फार्महाउस, न्यूयॉर्क में सबसे बड़ा प्राइवेट घर और फ्लोरिडा में एक हवेली खरीद ली।
ट्रंप ने कहा था, हमें कम उम्र की लड़कियां पसंद हैं
एपस्टीन शानदार पार्टियां करता था जिसमें बिल क्लिंटन, मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग, और पॉपस्टार माइकल जैक्सन जैसे चर्चित लोग होते थे। ट्रंप और एपस्टीन की मुलाकात भी ऐसी ही पार्टी में ही हुई थी। 2002 में ट्रंप ने एक मैगजीन को इंटरव्यू में कहा था कि मैं जेफ को 15 साल से जानता हूं। वह कमाल का आदमी है। हम दोनों को कम उम्र की खूबसूरत लड़कियां पसंद हैं। बयान बाद में ट्रंप के लिए बवाल बन गया। 22 साल बाद ट्रंप का यही बयान अब उनके हर दावे को झूठा बता रहा है।
क्या थी लोलिता एक्सप्रेस , जो बन गई बवाल
एपस्टीन का एक विमान था-लोलिता एक्सप्रेस। यह विमान कम उम्र की लड़कियों को लेकर एपस्टीन के प्राइवेट आइलैंड पर लेकर जाता था। जहां बड़े मेहमान इन लड़कियों का यौन शोषण करते थे। द्वीप था-लिटिल सेंट जेम्स। यह यूएस वर्जिन द्वीप समूह में है। इसे पीडोफाइल आइलैंड नाम से भी जाना जाता है।
यूं टूटी ट्रंप-एपस्टीन की दोस्ती
2004 में फ्लोरिडा के पाम बीच पर बनी 6 एकड़ की ‘हाउस ऑफ फ्रेंडशिप’ प्रॉपर्टी से ट्रंप और एपस्टीन की दोस्ती में दरार पड़ गई । ट्रंप इसे खरीदना चाहते थे, मगर एपस्टीन यहां अपना बिजनेस करना चाहता था। 15 नवंबर, 2004 को ट्रंप ने 356 करोड़ की बोली से यह प्रॉपर्टी खरीद ली। तभी से दोनों के संबंधों में खटास आ गई।
14 साल की लड़की को संबंध बनाने को दिए पैसे
The Wall Street Journal की एक रिपोर्ट के अनुसार, एपस्टीन को 2005 में फ्लोरिडा में बने पाम बीच से पकड़ा गया था। तब उस पर 14 साल की लड़की को संबंध बनाने को पैसे देने का आरोप लगा था। लड़की की मां ने पुलिस को शिकायत में कहा कि एपस्टीन के आलीशान घर में उसकी बेटी को ‘मसाज’ के बहाने बुलाया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उस पर संबंध बनाने का दबाव डाला गया। इसके बाद ऐसी ही 50 लड़कियों ने ऐसे आरोप लगाए थे।
ट्रंप ने एपस्टीन के प्राइवेट जेट से ट्रैवल किया था
मीडिया रिपोर्ट्स में दावा था कि ट्रंप ने सात बार एपस्टीन के प्राइवेट जेट से ट्रैवल किया था। न्यूयार्क टाइम्स के मुताबिक ट्रंप ने ये सफर 1993 से 1997 के बीच किया था। हालांकि, ट्रंप ने कभी यह बात नहीं मामानी 2008 में एपस्टीन का रंगीन साम्राज्य तब ढहना शुरू हुआ जब उसने फ्लोरिडा में चाइल्ड प्रॉस्टिट्यूशन के आरोप स्वीकार कर लिये । उसे 13 महीने की सजा मिली।
ट्रंप के क्लब की लड़की ने प्रिंस एंड्रयू पर लगाए थे आरोप
एपस्टीन पर आरोप लगाने वाली एक युवती वर्जीनिया गिफ्रे भी थी। उसने आरोप लगाया था कि वह सिर्फ 16 साल की थी जब वह डोनाल्ड ट्रंप के क्लब मार-ए-लागो में काम कर रही थी। उसे भी बड़ी हस्तियों से संबंध बनाने को मजबूर किया गया था। उसने ब्रिटेन के रॉयल फैमिली के प्रिंस एंड्रयू पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उसके साथ जबरदस्ती की। यह मामला ब्रिटिश मीडिया काफी सुर्खियां बना। 2005 में गिफ्रे की संदिग्ध रूप से मौत हो गई।
जेल में मरा मिला एपस्टीन, क्या की गई थी हत्या
6 जुलाई, 2019 को न्यूयॉर्क में एपस्टीन फिर से सेक्स ट्रैफिकिंग के गंभीर आरोपों में पकड़ गया। 23 जुलाई को उसे सेल में बेहोश पाया गया। उसके गले पर निशान थे। 10 अगस्त, 2019 को एपस्टीन जेल में ही मरा मिला। सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि उसने फांसी लगाकर आत्महत्या की, मगर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में आया कि एपस्टीन की गर्दन की कुछ हड्डियां टूटी थीं। इसके अलावा, जेल में लगे कैमरों से कई फुटेज गायब मिले। सवाल आज तक अनसुलझा ही रह गया कि एपस्टीन की मौत कैसे हुई?

