समाज क्या करे? रेप पर आ रही मी लार्ड से नई-नई परिभाषायें
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताते हुए सख्त टिप्पणी की थी।
मामले पर 8 दिसंबर, 2025 को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी।
कोर्ट ने कहा था- हम सभी हाईकोर्ट के लिए विस्तृत गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं। ऐसी टिप्पणियां पीड़ित पर चिलिंग इफेक्ट यानी भयावह प्रभाव डालती हैं और कई बार शिकायत वापस लेने जैसा दबाव भी पैदा करती हैं। अदालतों को, विशेषकर हाईकोर्ट को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों से हर हाल में बचना चाहिए।
कराई थी। आरोप लगाया कि 10 नवंबर, 2021 को वह अपनी 14 साल की बेटी के साथ कासगंज के पटियाली में देवरानी के घर गई थी। उसी दिन शाम को अपने घर लौट रही थी। रास्ते में गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक मिल गए।
पवन ने बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने की बात कही। मां ने उस पर भरोसा करते हुए बाइक पर बैठा दिया, लेकिन रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के प्राइवेट पार्ट को पकड़ लिया। आकाश ने उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी।
लड़की की चीख-पुकार सुनकर ट्रैक्टर से गुजर रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे। इस पर आरोपियों ने देसी तमंचा दिखाकर दोनों को धमकाया और फरार हो गए। पीड़ित की मां की शिकायत पर आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज किया गया।
वहीं आरोपी अशोक पर IPC की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज किया। आरोपियों ने समन आदेश से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दायर की। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी।
तत्कालीन CJI बी. आर. गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इस केस पर सुनवाई की थी। बेंच ने कहा, “हाईकोर्ट के आदेश में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ऐसी भाषा न बोलें, जो पीड़ित को डरा दे
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताते हुए सख्त टिप्पणी की थी।
मामले पर 8 दिसंबर, 2025 को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी।
कोर्ट ने कहा था- हम सभी हाईकोर्ट के लिए विस्तृत गाइडलाइंस जारी कर सकते हैं। ऐसी टिप्पणियां पीड़ित पर चिलिंग इफेक्ट यानी भयावह प्रभाव डालती हैं और कई बार शिकायत वापस लेने जैसा दबाव भी पैदा करती हैं। अदालतों को, विशेषकर हाईकोर्ट को, फैसले लिखते समय और सुनवाई के दौरान ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियों से हर हाल में बचना चाहिए।
‘पेनिट्रेशन जरूरी, बिना प्रवेश इजैक्युलेशन रेप नहीं…’, बलात्कार पर HC का बड़ा फैसला
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निचली अदालत की दी गई बलात्कार की सजा संशोधित कर आरोपित को ‘बलात्कार के प्रयास’ का दोषी ठहराया. कोर्ट ने माना कि आरोपित का उद्देश्य और कृत्य दर्शाते हैं कि उसने बलात्कार का प्रयास किया, लेकिन वह अपने उद्देश्य में पूर्णरूपेण सफल नहीं हो पाया.
रायपुर,18 फरवरी 2026,रेप मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है. अदालत ने कहा है कि महिला जननांग में लिंग प्रवेश (पेनिट्रेशन ) बिना ही अगर वीर्य स्खलन (इजैक्युलेशन ) हो जाए तो ऐसे अपराध को ‘बलात्कार का प्रयास’ माना जाएगा और यह IPC की धारा 376 साथ-साथ धारा 511 में दंडनीय होगा. इसी के साथ अदालत ने एक आदमी की सजा रेप से बदलकर रेप की कोशिश में बदल दी है.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पुरुष जननांग को महिला के निजी अंग पर रखा गया हो और उसके बाद बिना पेनिट्रेशन ही स्खलन हो जाए, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत ‘बलात्कार’ नहीं माना जा सकता है.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक आपराधिक अपील पर सुनवाई में की. ये 20 वर्ष पुराना मामला है. इसमें निचली अदालत ने आरोपित को बलात्कार का दोषी ठहराया था. मामले के तथ्यों और साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पाया कि अभियोजन यह सिद्ध नहीं कर सका कि घटना में वास्तविक रुप से पेनिट्रेशन हुआ था. जो कि बलात्कार की परिभाषा को आवश्यक तत्व है.
बिना पेनिट्रेशन स्खलन रेप नहीं: HC
अदालत ने अपने निर्णय में IPC की धारा 375 की कानूनी व्याख्या की कि बलात्कार अपराध कौ ‘penetration’ यानी लिंग प्रवेश अनिवार्य है. केवल स्त्री जननांग के संपर्क में पुरुष जननांग का आना या बिना पेनिट्रेशन स्खलन हो जाना, कानूनन बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह का कृत्य गंभीर आपराधिक प्रकृति का है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दी गई बलात्कार की सजा संशोधित करते हुए आरोपित को ‘बलात्कार के प्रयास’ का दोषी ठहराया. कोर्ट ने माना कि आरोपित का उद्देश्य और कृत्य दर्शाते हैं कि उसने बलात्कार करने का प्रयास किया, लेकिन वह अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सका.
कानूनी प्रावधानों और अपराध के तत्वों का पालन जरूरी: HC
अदालत ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य अपराध की गंभीरता के अनुरूप सजा सुनिश्चित करना है. ऐसे मामलों में जहां पीड़िता की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता पर हमला हुआ हो, वहां दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड दिया जाना चाहिए, लेकिन सजा तय करते समय कानूनी प्रावधानों और अपराध के तत्वों का पालन भी उतना ही आवश्यक है.
निर्णय आपराधिक कानून की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के बीच कानूनी अंतर स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है.
रेप की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
उल्लेखनीय है कि रेप की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला आया है. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए कहा है कि ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना “रेप की कोशिश” के बराबर है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को बदल दिया है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि एक बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है.
