कुछ दिनों पहले बेटी की किताबें लेने बुक स्टोर पर जाना हुआ । वहां पहले से कुछ लोग किताबें खरीद रहे थे । मैं सीढ़ियों के नीचे सड़क किनारे खड़ा होकर चुपचाप अपनी बारी का इंतजार करने लगा ।
इतने में हरी पगड़ी , कुर्ता पहने और एक हरी चादर फैलाए बकरा दाढ़ी रखे दो हरे टिड्डे मौला–मौला गाते हुए आए । बड़ी उम्मीद से उन्होंने मेरी ओर देखा । मैंने कुछ सेकंड उन्हे घूरकर देखा और बिना कोई प्रतिक्रिया दिए एक ओर मुंह फेर लिया ।
वे समझ गए कि ये हमारे झांसे में आने वाला बंदा नहीं दिखता इससे कुछ नहीं मिलेगा । लिहाजा अब उन्होंने बुक स्टोर का रुख किया ।
बुक स्टोर पंकज जी और उनकी धर्म पत्नी मिलकर चलाते हैं । पंकज जी कहीं गए थे तो उनकी अनुपस्थिति में उनकी मैडम गद्दी पर विराजी हुई थीं ।
दोनों हरे टिड्डों ने अब मिसेज पंकज की ओर हरी चादर फैला दी और काउंटर पर मोर पंख फटफटाने लग गए ।
मिसेज पंकज ने तुरंत गल्ले में से दस रुपए निकाल कर एक हरे टिड्डे को पकड़ा दिए ।
हरे टिड्डे ने कहा– “अल्लाह तुम्हे हिदायत दे” और चल दिया ।
अब यहां से मेरा दिमाग खराब हुआ । मैंने उसे कड़क स्वर में लगभग चिल्लाकर जाते हुए रोका– इधर आ इधर आ ।
(मेरी चढ़ी त्यौरियां देख कर वो कुछ ठिठक सा गया)
क्या हुआ ?
अबे उधर तो आ ?
मगर हुआ क्या ?
आ तो सही बताता हूं ।
वो दोनों वापस दुकान पर आ गए । अब मौजूद सभी लोग आश्चर्य से कभी मेरी ओर तो कभी उन दोनों हरे टिड्डों की ओर देख रहे थे । श्रीमती पंकज और उनकी दुकान का समस्त स्टाफ भी एकटक लगाए मेरी तरफ घूरे जा रहा था । उन सभी के चेहरे पर हैरानी तैर रही थी कि आखिर हुआ क्या ?
मैंने कहा– तूने अभी क्या बोला था इन्हे ?
कुछ नहीं बोला ।
नहीं जो बोला था वो बोल ।
अब वो बोले नहीं ।
मैं उससे– क्या बोला था इस पर अटक गया ।
फिर मैंने ही श्रीमती पंकज और वहां मौजूद लोगों से कहा – इसने यही कहा था न कि अल्लाह तुम्हे हिदायत दे ?
सभी ने एक स्वर में मेरी बात का समर्थन किया । हां यही कहा था ।
क्या मतलब होता है इस बात का किसी को पता है क्या ?
नहीं हम नही जानते । ( सभी ने एक जैसा कहा)
आप जानती हैं क्या मैडम (श्रीमती पंकज) ?
नहीं मैं नहीं जानती ।
इससे सब लोग पूछो कि हिदायत का क्या मतलब होता है ? बता रे ।
अब हरे टिड्डे बोले नहीं ।
फिर मैने ही कहा – मैं बताता हूं ये तो नहीं बोलेंगे । मैडम अगर आप किसी हिंदू साधु या संत को कुछ आटा , दाल, रुपया–पैसा देती हैं तो वह बदले में क्या कहता है ?
यही कि भगवान तुम्हे खुश रखे , तुम प्रसन्न रहो, स्वस्थ रहो । श्रीमती पंकज बोलीं ।
हां मगर ये कह रहा है कि अल्लाह तुम्हे हिदायत दे मतलब तुम्हे सही रास्ता दिखाए । मतलब आप गलत रास्ते पर हो । गलत रास्ता समझती हैं ?
नहीं ।
गलत रास्ता है कि आप बुतों की याने मूर्ति पूजा करती है । कई भगवानों की पूजा करती हैं । ये सब गलत रास्ता है असली रास्ता है अल्लाह को अपना खुदा मानना , मोहम्मद को रसूल समझना , कुरान की बातों को मानना , नमाज पढ़ना , रोज रखना । इनका कमीनापन देखिए कि आपने इसे पैसे दिए तो बदले में इन्होंने आपको कोई आशीर्वाद नहीं दिया क्योंकि इस्लाम में एक काफिर को आशीर्वाद देना , उसकी ब्लेसिंग करना गुनाह है इसलिए उसने आपको गलत रास्ते पर चलने वाला ठहरा दिया और अपने अल्लाह से दुआ कि ये आपको गलत याने कुफ्र के रास्ते से हटा के सही रास्ते माने इस्लाम के रास्ते पर डाल दे । मतलब मैं , आप और आप सब लोग धर्म के गलत रास्ते पर हैं और ये सही रास्ते पर हैं । पूछो इनसे हिदायत का मतलब यही होता है कि नहीं ?
इतना सुनते ही दोनों हरे टिड्डे सर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए ।
मैंने भी उन्हें नहीं रोका । मेरा काम हो चुका था । मुझे लगा कि मैंने दुकान पर मौजूद सभी काफिरों की आंखें खोलने वाली स्पीच दी है । मेरी बातों का बहुत गहरा असर हुआ होगा इन पर । अब ये मेरी बातों पर मनन करते हुए इस बारे में सोचेंगे कि हिंदू साधु संतों के विपरीत देने वाले के कल्याण की बात न कर के उन हरे टिड्डों ने हिदायत देने की बात क्यों की ? काफिर सोचने पर मजबूर होंगे कि इन हरे टिड्डों को पैसा देना बेवकूफी है । इनके लिए कितना भी कर दो लेकिन ये आप की ब्लेसिंग कभी नहीं करेंगे ।
मैं सोच रहा था कि ये सभी काफिर फूल_माला से नहीं तो कम से कम ताली बजा कर तो मेरा अभिनंदन करेंगे
लेकिन हो गया इसका उलट ही । अब श्रीमती पंकज कुछ नाराज हो गई और बड़बड़ाने लगीं–
अरे आपको उनसे ऐसे नहीं बोलना था । हमारी दुकान पर तो कोई भी आए यहां से कभी खाली हाथ नहीं जाता । हम तो ये सब नहीं मानते । हिंदू–मुस्लिम कभी किसी में फर्क नहीं करते। सबका सम्मान करते हैं । इंसान सभी बराबर होते हैं । क्या हिंदू क्या मुसलमान ? अल्लाह हो या भगवान सब एक ही हैं बस उन्हे मानने के तरीके अलग हैं । ब्लाह ब्लाह ब्लाह……..
अब उनके साथ दुकान पर मौजूद तमाम लोग श्रीमती पंकज की हां में हां मिलाने लगे और मुझे बड़ी हिकारत की नजरों से देखने लगे । हां हां गलत है सभी एक होते हैं । क्या अल्लाह क्या भगवान , हिंदू–मुसलमान नहीं करना चाहिए । ये गलत बात है….. (सेक्युलरी प्रवचन्स)
चारों तरफ से मुझ पर लानतें बरसने लगीं । हुंह सांप्रदायिक आदमी कहीं का ।
मैं अजीब स्थिति में फंस गया । चला था काफिरों की आंखें खोलने और काफिरों ने ही मेरी स्पीच की बत्ती बनाकर मेरे भीत्तर दे दी ।
मैंने जल्दी से दूसरे स्टैंडर्ड की किताबें निकलवाई और पेमेंट कर बाइक स्टार्ट कर के भाग खड़ा हुआ ।
रास्ते में खुद को मन ही मन हजार गालियां दी । क्या जरूरत थी ये क्यूटियापंती करने की । जुबान पर काबू नहीं रहता क्या तेरी ? बेवकूफ है तू काफिर कभी सुधरा है जो अब सुधर जाएगा । हजार साल तक ऐसे ही गुलामी थोड़े की है उसने ?
खुद पर कुछ गुस्सा शांत हुआ तो फिर इसी बात पर थोड़ा सब्र कर लिया कि बेशक बीस–पच्चीस लोग मेरी बातों के विरोधी थे लेकिन वहां उनमें मौजूद तीन–चार लोग तो मेरी बातों को बड़े ध्यान से सुन कर चुपचाप कुछ तो मनन कर ही रहे थे ।
इतना ही सही है अपने लिए…………!!
(नोट :– घटना शत–प्रतिशत सत्य है और लेखक की आपबीती है)
श्रीकांत शर्मा
