मत:भारत के कभी क्यों नही हुए तैमूरवंशी

समरकंद सिंड्रोम: बाबर और उसका परिवार कभी ‘हमारे’ क्यों नहीं बन पाए?
तैमूरियों यानी हिंदुस्तान के मुगलों के लिए समरकंद ही उनका असली घर बना रहा, जिसे उन्होंने खो दिया और फिर कभी वापस न पा सके. भारत वह मंच बना जहां उनकी शान-शौकत का प्रदर्शन हुआ, जबकि उनकी कल्पना बार-बार हिंदू कुश के पार, मध्य एशिया में स्थित उनके वतन के बागों, कब्रों और यादों की ओर भटकती रही.

मुगलों के लिए ‘वतन’ हिंदुस्तान था या मध्य एशिया? (Photo- Khalili Collections)

नई दिल्ली, 01 जून 2026, पानीपत की पहली लड़ाई को 500 साल हो चुके, लेकिन भारत आज भी उस तैमूरी गुरखानी साम्राज्य की शुरुआत को याद करता है. भले ही हम इसे ‘मुग़ल’ साम्राज्य का गलत नाम देकर याद करें, इस जंग का जिक्र आते ही दिमाग में बारूद, तोपें और युद्ध का बदला हुआ पूरा तरीका घूमने लगता है. लेकिन इस इतिहास का एक पक्ष ऐसा भी है जिस पर बात करने से लोग कतराते हैं. उदाहरण को अपनी जीत को बाबर ने पानीपत के आस-पास के गांवों के भोले-भाले लोगों को सुरक्षा कवच बनाया था, ताकि अपना बचाव कर सके. यह एक ऐसा कड़वा सच है जो सामान्य जन की यादों से गायब हो चुका . खैर, यहां मेरा इरादा इस विषय को तूल देने का नहीं है.

इसके बजाय मेरी चिंता एक बड़े ऐतिहासिक अनुमान को लेकर है, जो धीरे-धीरे हमारी आम धारणा या सोच में बदल चुका है, वह यह कि तैमूरी आखिरकार भारतीय बन गए थे, और मध्य एशिया से आया यह राजवंश हिंदुस्तान की मिट्टी में पूरी तरह घुलमिल गया था और भारत को ही  मातृभूमि मानने लगा था, समय बीतने के साथ यह विचार अपने आप में बिल्कुल सच और स्पष्ट लगने लगा है.

यह निबंध इसी स्थापित कहानी पर सवाल उठाता है, क्योंकि आगरा के संगमरमर के वैभव और दिल्ली की शाही शानो-शौकत के नीचे एक और विरासत छिपी थी, जो लगातार हिंदूकुश पर्वत के पार उत्तर की ओर समरकंद, बल्ख और तैमूरी यादों के उस पैतृक परिदृश्य की तरफ देखती रही. तैमूरी सचमुच हमारे बन गए थे या नहीं, इसे समझने के लिए शायद इस राजवंश के संस्थापक के खुद के शब्दों से शुरुआत करना सबसे बेहतर होगा.

तो, मैं हिंदुस्तान के बारे में बाबर के शुरुआती विचारों से शुरुआत करता हूं.

”हिंदुस्तान कम आकर्षणों वाला देश है, यहां के लोग दिखने में अच्छे नहीं हैं. यहां मेल-जोल, उठने-बैठने या एक-दूसरे के यहां आने-जाने का कोई रिवाज नहीं है, यहां के लोगों में न तो कोई प्रतिभा या क्षमता है, और न ही कोई तहज़ीब, यहां के हस्तशिल्प और कारीगरी में कोई आकार, समरूपता, सलीका या गुणवत्ता नहीं है, यहां न तो अच्छे घोड़े हैं, न अच्छे कुत्ते, न अंगूर, न खरबूजे या कोई बेहतरीन फल, न बर्फ है, न ठंडा पानी और न ही बाज़ारों में अच्छी रोटी या पका हुआ भोजन मिलता है. यहां न तो गर्म स्नानघर हैं, न मदरसे और न ही मोमबत्तियां, मशालें या शमादान हैं.”

एक तरफ जहां वे भारत की कमियां गिनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ समरकंद के बारे में वे लिखते हैं.

समरकंद, लगभग 140 वर्षों तक, हमारे राजवंश की राजधानी रहा था. एक पराया व्यक्ति और वह भी कैसा! एक उज़्बेग शत्रु ने उस पर कब्ज़ा कर लिया था. वह हमारे हाथों से निकल गया था, ईश्वर ने उसे पुनः हमें लौटा दिया, लूटा-खसोटा और तबाह किया हुआ, हमारा अपना हमें वापस मिल गया.

वाकई, हिंदुस्तान समरकंद के मुकाबले एक सांत्वना पुरस्कार जैसा भी नहीं दिख,ता था, वह धरती जिसे बाबर अपना असली घर मानता था बाबर ने खुद ‘बाबरनामा’ में बेहद स्पष्टता से उन कारणों का उल्लेख किया है कि आखिर उन्होंने हिंदुस्तान का रुख क्यों किया.

1- अपने पूर्वज तैमूर से जुड़ी महत्वाकांक्षा को पूरा करना और एक इस्लामिक राजनीतिक व्यवस्था के तहत हिंदुस्तान में तैमूरी सत्ता स्थापित करना.

2- भले ही काबुल वह पहली जगह थी जहां उन्होंने ‘पादशाह’ की उपाधि धारण की थी, लेकिन वहां से राजस्व बहुत सीमित थी, जबकि हिंदुस्तान, उनके अपने विवरण के अनुसार, प्रचुर धन-दौलत, भरपूर श्रम और सोने-चांदी से समृद्ध भूमि का वादा करता था.

3- वे व्यावहारिक रूप से अपनी मध्य एशियाई मातृभूमि से बाहर धकेले जा चुके थे, क्योंकि उनके सबसे बड़े दुश्मन शैबानी खान ने उनके वापस लौटने के सारे रास्ते लगातार बंद कर दिए थे. इसलिए, समरकंद के लिए उनके मन में हमेशा तड़प तो रही, लेकिन वतन लौटने की सड़क धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो चुकी थी.

बाबर के लिए हिंदुस्तान कोई पुरानी यादों या लगाव की जगह नहीं था, बल्कि यह मजबूरी, महत्वाकांक्षा और सुनहरे मौके का ठिकाना था. समरकंद उनकी यादों के क्षितिज पर हमेशा बना रहा, जबकि हिंदुस्तान उनके लिए वजूद बचाने और साम्राज्य खड़ा करने की जमीन बन गया.

पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस पुरानी तड़प के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल भी इशारा करते हैं कि मध्य एशिया के प्रति यह गहरा लगाव तैमूरवंशियों के खून में दौड़ता था. उनके शब्दों में, खुद तैमूर भी भारत को तहस-नहस करने के बाद “अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम से प्रेरित” होकर वापस लौट गया था. यह केवल किसी एक शासक तक सीमित भावना नहीं थी. यह एक ऐसी विरासत बन चुकी थी जो एक के बाद एक आने वाले तैमूरी सम्राटों के दिलों में गूंजती रही.

चूंकि मध्य एशिया का यह सपना उसके व्यावहारिक फायदों से कहीं ज्यादा चमकदार लगता था, इसलिए हिंदुस्तान और उत्तर-पश्चिम के बीच का यह रास्ता हमेशा एक जीवंत कड़ी बना रहा. यह एक ऐसा रणनीतिक मार्ग था, जिसे तैमूरी शासक हमेशा अपने प्रभाव और नियंत्रण में रखना चाहते थे. बाबर और अबुल फजल दोनों ने ही अपने-अपने लेखों में इस हकीकत को रेखांकित किया है और इसे एक ऐसे रास्ते के रूप में दिखाया है, जो उन्हें उनकी पुरानी यादों, उनकी वैधता और उनके मूल वतन के भूगोल की तरफ ले जाता था.

क्या तैमूरी वाकई भारतीय बन गए थे?

यह तर्क तब और ज्यादा साफ हो जाता है, जब हम बाबर के बाद लिखे गए तैमूरी दस्तावेजों को देखते हैं. उनके अपने शब्द बार-बार यह जाहिर करते हैं कि तैमूरी सोच में मध्य एशिया ही हमेशा “घर” की जगह पर बना रहा. वे बार-बार ‘विलायत’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जिससे बल्ख और ट्रांसऑक्सियाना के प्रति उनके जुड़ाव का गहरा एहसास झलकता है. इस भाषा से ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान भले ही उनकी शाही ताकत का केंद्र बन गया था, लेकिन वे इसे अपनी पुरानी दुनिया के विकल्प के रूप में देखने के बजाय, उसी दुनिया का विस्तार देखते थे.

‘मआसिर-उल-उमरा’ (Maasir al-Umara) जो कि साल 1500 से 1780 के आस-आस तक भारत में तैमूरी शासकों की सेवा करने वाले मुस्लिम और हिंदू अधिकारियों की एक जीवनी है उसमें समरकंद के ख्वाजा अब्दुल्ला अहरारी को ‘विलायत’ का निवासी बताया गया है. इस बात पर गौर करने की जरूरत है. इस किताब के लेखक शाहनवाज खान, हैदराबाद के पहले निजाम आसिफ जाह प्रथम (कमर-उद-दिन खान) के दरबारी थे. अगर 18वीं सदी तक हिंदुस्तान को पूरी तरह से एकमात्र वतन मान लिया गया होता, तो दक्कन में बैठकर लिख रहे एक दरबारी के लिए समरकंद को ‘विलायत’ कहना समझ से परे होता. इस तरह के शब्दों का लगातार इस्तेमाल दिखाता है कि वतन से जुड़ी वह पुरानी भौगोलिक भावना अभी पूरी तरह धुंधली नहीं पड़ी थी.

‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ (Maasir-i-Alamgiri) में ऐसे कई और रिकॉर्ड मिलते हैं. औरंगजेब के एक दरबारी मीर शिहाब-उद-दिन सिद्दीकी, जिनका जन्म बुखारा में हुआ था, उन्हें ‘विलायत से आया हुआ’ बताया गया है. इसी तरह, इसी किताब में लिखा है कि बल्ख के सुभान कुली के परपोते ख्वाजा बहा-अल-दिन ‘अपने वतन से आए थे’ .

इतना ही नहीं, इस किताब में खुद सुभान कुली को बल्ख का ‘वली’ कहा गया है. असल बात यह है कि यह भाषा उनकी राजनीतिक सोच के बारे में बहुत कुछ बयां करती है. भले ही व्यावहारिक तौर पर सुभान कुली बल्ख के स्वतंत्र राजा थे, लेकिन औरंगजेब के दरबार में इस्तेमाल होने वाली भाषा उन्हें एक आजाद राजा के बजाय महज एक गवर्नर के रूप में पेश करती थी. ऐसा लगता है कि यह शब्दावली उस पुरानी तैमूरी सोच को जिंदा रखे हुए थी, जिसमें बल्ख और ट्रांसऑक्सियाना जैसे इलाके उनके पैतृक राजनीतिक और भावनात्मक संसार का हिस्सा बने हुए थे.

तलवार की पहुंच भले ही खत्म हो चुकी थी, लेकिन यादों ने अपने इलाके पर से दावा नहीं छोड़ा था. जहांगीर की आत्मकथा ‘तुज़ुक’ में वली मुहम्मद को ‘वली-ए-तूरान’ कहा गया है, वहीं ‘पादशाहनामा’ में भी उज्बेक शासक इमाम कुली को ‘वली-ए-तूरान’ यानी “तूरान का गवर्नर” बताया गया है. यह भाषा एक गहरी राजनीतिक सोच और सहेज कर रखे गए उस शाही भ्रम को दिखाती है, जिसके तहत उज्बेकों के कब्जे वाले इलाके भी, कम से कम कागजों या प्रतीकों में, तैमूरी शानो-शौकत और उनके पुश्तैनी दावों के दायरे में ही गिने जाते थे.

जब 1526 में पानीपत की जंग की धूल अभी ठीक से बैठी भी नहीं थी, बाबर ने अपनी इस जीत के फल सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि अपनी यादों के वतन तक बांटे. मध्य एशिया में रहने वाले अपने रिश्तेदारों, ईरान, और समरकंद, खुरासान और हिजाज़ के पवित्र संतों के पास उत्तर की ओर उपहार भेजे गए. रूसी विद्वान ए. ए. सेमेनोव इन कदमों में एक ऐसे दिल को देखते हैं, जो अब भी अपनी मातृभूमि से बंधा हुआ था. एक ऐसा शासक जो अपने पूर्वजों की जमीन को वापस हासिल करने से पहले भारत को अपना घर कहने में हिचकिचा रहा था. बाद में लिखे गए एक पत्र में, बाबर ने हुमायूं को निर्देश दिया था कि हिंदुस्तान में उसकी सभी प्रजा को मातृभूमि की पुनर्विजय के प्रयासों में मदद करनी चाहिए.

पुश्तैनी रियासत की ओर वापसी का मंसूबा

जब सफाविदों ने उज्बेकों से खुरासान छीना, तो बाबर को इसमें अपनी वतन वापसी का एक सुनहरा रास्ता नजर आया. उसने हुमायूं का रुख फौरन बल्ख, हिसार, समरकंद और हेरात की तरफ मोड़ दिया, यह सोचकर कि ‘जिस तरफ भी तकदीर साथ दे, कदम बढ़ा दिए जाएं’. इस मंसूबे के मुताबिक, हिसार हुमायूं के हिस्से आना था, बल्ख कामरान के खाते में और समरकंद को दोबारा तैमूरवंश की केंद्रीय राजधानी के रूप में खड़ा किया जाना था. 1528 में जब हुमायूं चालीस हजार सैनिकों का लश्कर लेकर समरकंद फतह करने की राह पर था, तब बाबर ने उसे थोड़ा ठहरने का मशविरा दिया. बाबर ने उसे भरोसा दिलाया कि एक बार हिंदुस्तान में जड़ें पूरी तरह मजबूत हो जाएं, तो उनका अंतिम गंतव्य उनके अपने ‘पुश्तैनी राज्य’ ही होंगे.”

हुमायूं मध्य एशिया को वापस पाने में नाकाम रहा और जल्द ही उसने भारत को भी खो दिया. कोई भी यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अगर किस्मत ने उसका साथ दिया होता, तो क्या उसकी नज़र पूरब की ओर भारत पर होती या उत्तर की ओर अपनी पुश्तैनी ज़मीनों पर? ईरान में अपने निर्वासन के दौरान भी, उसके विचार बार-बार जीत और सत्ता की बहाली की ओर लौटते थे. शाह तहमास्प का समर्थन हासिल करने के लिए, तैमूरियों ने कंधार को सफ़वियों के हवाले कर दिया. फिर भी, 1549 में सफ़वियों की मदद से काबुल पहुंचने के बाद, हुमायूं ने भारत के बजाय अप्रत्याशित रूप से बल्ख की ओर रुख किया. शायद मध्य एशिया का खिंचाव हिंदुस्तान पर कब्ज़े की चाहत से कहीं ज़्यादा मज़बूत था, हालांकि कामरान के विश्वासघात ने उस सपने को साकार होने से पहले ही खत्म कर दिया.

जब 1556 में अकबर ने सिंहासन संभाला, तो उसके शुरुआती साल भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करने और वजूद बचाने के संघर्ष में ही बीत गए. चारों तरफ से विद्रोहों और अस्थिरता से घिरे होने के कारण, उसके पास तूरान को लेकर अपने सपनों को खुलकर पूरा करने की गुंजाइश बहुत कम थी. वक़्त के साथ यह संभावना और भी कम हो गई, क्योंकि शक्तिशाली उज्बेक शासक अब्दुल्ला खान ने पूरे मध्य एशिया को एकजुट कर लिया, जिससे तैमूरवंशियों की वह पुश्तैनी जमीन अकबर की पहुंच से बहुत दूर चली गई.

इसके बावजूद, अबुल फज़ल का मानना था कि अकबर की ये महत्वाकांक्षाएं पूरी तरह ख़त्म नहीं हुई थीं, बल्कि सिर्फ कुछ समय के लिए सो गई थीं. उसने टिप्पणी करते हुए लिखा है कि “इन योजनाओं के धरातल पर उतरने का सही समय अभी भविष्य के गर्भ में था.

जब बदख्शां के तैमूरी शहज़ादों सुलेमान और इब्राहिम ने बल्ख पर कब्जा करने की कोशिश की, तो अबुल फजल ने उनकी इस कोशिश को ‘जल्दबाज़ी’ कहकर खारिज कर दिया. उनका इशारा साफ था कि इस जीत का फल चखने का हक सिर्फ और सिर्फ अकबर को है. एक और मौका ऐसा भी आया जब अकबर ने उज्बेक शासक अब्दुल्ला खान के दूतों से मिलने तक से मना कर दिया, क्योंकि उनके दिमाग में अब भी अपने पुश्तैनी इलाकों को वापस पाने का ख्याल चल रहा था.

अबुल फजल अकबर की इस सोच को बाबर की ही पुरानी रणनीति के हिस्से के रूप में दिखाते हैं, यानी पहले हिंदुस्तान पर अपनी पकड़ पूरी तरह मजबूत करो, और उसके बाद ही तैमूरी झंडे को तूरान की तरफ आगे बढ़ाओ. जैसा कि वे लिखते हैं, “अगर वफ़ादार सूबेदारों की मदद से हिंदुस्तान के इस विशाल देश को सभ्य बना लिया गया, तो तूरान की तरफ कूच करेंगे..”

यहां एक बात पर गौर करना ज़रूरी है, भले ही यह इस निबंध के दायरे से थोड़ी बाहर की बात हो. ऐसा लगता है कि अकबर भी खुद को एक ‘सभ्य बनाने वाले मिशन’ के रूप में देख रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे बाद के दौर में यूरोपीय साम्राज्यवादी सोच में देखा गया. अबुल फज़ल की भाषा से साफ झलकता है कि हिंदुस्तान उनके लिए कभी एक ‘मातृभूमि’ नहीं था, बल्कि एक ऐसा विशाल इलाका था जिसे अनुशासित करना था, एक व्यवस्था में ढालना था और तैमूरी राजकाज के सांचे में लाना था, जिसका हेडक्वार्टर कहीं और यानी समरकंद में होना तय था.

अकबर और जहांगीर के मन में सुलगती तड़प

अकबर के अपने शब्द भी गवाही देते हैं कि ये विचार कभी धुंधले नहीं पड़े थे. साल 1577 में, जब उज्बेकों ने सफाविद ‘बाहरी लोगों’ के हाथों कंधार के छिन जाने पर अकबर का मज़ाक उड़ाया, तो अकबर ने तीखा जवाब देते हुए कहा कि उज्बेक नियंत्रण में भी तैमूरी ज़मीनों का कोई बेहतर भला नहीं हुआ है. एक दशक बाद, 1587 में, अबुल फज़ल ने बुखारा में मौजूद तैमूरी राजदूत को लिखा कि “जहांपनाह ने अब अपना पूरा ध्यान तूरान की फतह पर लगा दिया है.” हालांकि, अकबर अब्दुल्ला खान के साथ शांति समझौता होने की सूरत में अपनी इन बड़ी महत्वाकांक्षाओं को कुछ समय के लिए छोड़ने को भी तैयार थे.

जहांगीर ने भी अपनी यादों में इस पुश्तैनी खिंचाव को बयां किया है. अपनी आत्मकथा में वह कबूल करता है कि उसके पिता अकबर ने ट्रांसऑक्सियाना के सपने को कभी हाथ से जाने नहीं दिया, और वह खुद भी दो इरादे पाले हुए था.

पहला यह कि ट्रांसऑक्सियाना की फतह हमेशा मेरे श्रद्धेय पिता के पवित्र मन में थी, लेकिन जब भी उन्होंने इसका इरादा किया, कुछ न कुछ ऐसी रुकावटें आईं कि काम रुक गया. अगर यह काम सुलझ जाए और मैं इस चिंता से मुक्त हो जाऊं, तो मैं परवेज़ को हिंदुस्तान में छोड़ दूंगा और अल्लाह के भरोसे खुद अपने पुश्तैनी इलाकों की तरफ कूच कर जाऊंगा.”

अपनी आत्मकथा के बुलंद लहजे में वह पूरी शाही शान के साथ घोषणा करता है.

“चूंकि मैंने ट्रांसऑक्सियाना को फतह करने का पक्का मन बना लिया है, जो मेरे पूर्वजों का पुश्तैनी राज्य था, इसलिए मेरी ख्वाहिश है कि हिंदुस्तान के चेहरे को बागियों और विद्रोहियों के कचरे से साफ कर दूं. फिर अपने एक बेटे को इस देश में छोड़कर, मैं खुद एक बहादुर और सजी-धजी फौज, पहाड़ों जैसे ऊंचे और बिजली की रफ्तार वाले हाथियों और अकूत खजाने को साथ लेकर अपने पुरखों की रियासत को फतह करने निकलूंगा.”

शाही महत्वाकांक्षा के इस संक्षिप्त ज़िक्र के बाद, जहांगीर की किताब ‘तुज़ुक’ रहस्यमयी रूप से खामोश हो जाती है, मध्य एशिया का विषय फिर शायद ही कभी लौटता है. इतिहासकार आर. सी. वर्मा का तर्क है कि 1621 तक की यह राजनयिक खामोशी वास्तव में अपनी पुश्तैनी ज़मीन को वापस पाने की जहांगीर की इसी सुलगती इच्छा को दर्शाती है. भले ही उसका सिंहासन लाहौर में था, लेकिन उसकी निगाहें हमेशा समरकंद पर टिकी रहीं. हालांकि, यह खामोशी एकतरफा नहीं थी, क्योंकि बुखारा के इमाम कुली खान ने एक कथित अपमान के बाद खुद ही रिश्ते तोड़ लिए थे.

नूरजहां की मध्यस्थता और बदलती कूटनीति

वक़्त के साथ यह कड़वाहट कम हुई और मुमकिन है कि इसमें नूरजहां का बड़ा हाथ था. इतिहासकार एम. अतहर अली का सुझाव है कि 1621 में इमाम कुली की मां ने तैमूरी दरबार के साथ दोबारा रिश्ते सुधारने की पहल की थी. सफाविदों के बढ़ते खतरे ने शायद बुखारा और हिंदुस्तान दोनों को हाथ मिलाने पर मजबूर कर दिया, जिससे राजनीतिक ज़रूरत के आगे ज़ख्मी मान-सम्मान पीछे छूट गया.

अपने शासनकाल के आखिरी सालों में भी मध्य एशिया में जहांगीर की दिलचस्पी ज़िंदा थी. मुतरीबी समरकंदी के साथ बातचीत में उसने इस क्षेत्र के मामलों को लेकर गहरी उत्सुकता दिखाई. यह दिलचस्पी सिर्फ भावनात्मक नहीं थी. नूरजहां के कहने पर, तैमूरी सेवा में मौजूद बुखारा के मीर बरका को इमाम कुली के साथ रिश्ते बहाल करने और जुयबारी शेखों के प्रति शाही सम्मान प्रकट करने के लिए भेजा गया था. बरका 1627 तक मध्य एशिया में रहे और वहां से अब्द अल-रहीम ख्वाजा को अपने साथ लेकर लौटे, जिनके आगमन को जहांगीर ने इतना महत्व दिया कि उनके स्वागत के लिए अपनी कश्मीर यात्रा तक टाल दी.

जहांगीर की इसके तुरंत बाद मृत्यु हो गई, लेकिन यादों का यह धागा टूटा नहीं. शाहजहां ने गद्दी संभालते ही हकीम हाज़िक को शेखों के लिए उपहार लेकर बुखारा भेजा. इस तरह उस सिलसिले को ज़िंदा रखा गया जो ऊपर से तो राजनीतिक था, लेकिन जिसके भीतर अपनी पुश्तैनी दुनिया के प्रति तैमूरवंशियों के पुराने लगाव की गूंज साफ़ सुनाई दे रही थी.

तूरान की पुश्तैनी दुनिया के लिए शाहजहां की तड़प भी बेहद गहरी थी. शाही दस्तावेज कूटनीति की भाषा में उसके शासनकाल के पहले दशक के दौरान उज्बेकों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों का वर्णन करते हैं. लेकिन इस शांत सतह के नीचे एक अनसुलझा गुस्सा दबा हुआ था. साल 1629 में उत्तराधिकार के संघर्ष के दौरान बल्ख और बदख्शां के शासक नज़र मुहम्मद द्वारा काबुल की घेराबंदी करने की कोशिश को शाहजहां भूला नहीं था. शाहजहां ने हालात बदलने का सब्र से इंतज़ार किया, और इस बीच वह मावरान्नहर में अपने सहयोगियों को भारी रक़म और मदद भेजकर हिंदूकुश के पार गुपचुप तरीके से अपना प्रभाव बढ़ाता रहा.

उसके इरादों का पहला साफ संकेत 1640 में हेरात के सफाविद गवर्नर हसन खान शामलू के एक खत से मिलता है. तैमूरी दरबार से मिले एक संदेश का जवाब देते हुए, उसने ‘मुल्क-ए-मवरूथी’ और ‘गुरखाना-ए-अजदाद-ए-इज़ाम’ को वापस पाने के गुप्त इशारों का ज़िक्र किया था. हसन ने दर्ज किया कि शाहजहां का इरादा उसी साल काबुल लौटने का था और वह बल्ख व बदख्शां को सुरक्षित करने के लिए अपने एक बेटे को आगे भेजने वाला था.

हसन इस बात का भरोसा चाहता था कि यह सैन्य अभियान तूरान की तरफ है, खुरासान की तरफ नहीं. सफाविदों के लिए उज्बेक एक परमानेंट सिरदर्द थे, इसलिए इस जंग में तैमूरवंशियों के कूदने का मतलब कूटनीति से कहीं बढ़कर था. एक अन्य पत्र में, हसन ने आसिफ खान से तुर्किस्तान की ओर बढ़ने की तारीख बताने का आग्रह किया, ताकि सफाविद और तैमूरी सेनाएं मिलकर उज्बेक ताकत पर सीधा हमला कर सकें.

हालांकि, इतिहास ने दूसरा करवट लिया. यह सैन्य अभियान पांच साल बाद शुरू हुआ, और वह भी सफाविदों की भागीदारी के बिना. शाहजहां के बल्ख अभियान के शाही रिकॉर्ड इसके मकसद को लेकर कोई भ्रम नहीं छोड़ते. वे इसे किसी आम सैन्य चढ़ाई या ज़मीन हड़पने की कोशिश के रूप में पेश नहीं करते. इसके बजाय, वे इसे सीधे शाहजहां की उस इच्छा से जोड़ते हैं, जिसे बार-बार उसके ‘पुश्तैनी इलाकों’ को वापस पाने की चाह बताया गया. इस महत्वाकांक्षा की जड़ें जहांगीर की मौत के बाद के दौर से जुड़ी थीं, जब काबुल में नज़र मुहम्मद की हरकतों ने शाहजहां के भीतर बल्ख और बदख्शां को दोबारा पाने की तड़प जगा दी थी सिर्फ रणनीतिक इलाकों के रूप में नहीं, बल्कि यादों, पुरखों और वंशानुगत विरासत से जुड़ी ज़मीन के रूप में.

तैमूरी इतिहास ग्रंथ ‘शाहजहां-नामा’ में दर्ज है

पिछले सम्राट जहांगीर की मृत्यु के समय से ही, जब नज़र मुहम्मद खान ने काबुल पर कब्ज़ा करने की नाकाम कोशिश की थी, इस विश्व-विजेता सम्राट की शक्तिशाली आत्मा बल्ख और बदख्शां के देशों पर टिकी हुई थी, जो वास्तव में उनके पुश्तैनी राज्य थे.

इतिहासकार इस 15 साल की देरी का कारण साम्राज्य की मजबूरियों और बाधाओं को बताते हैं, जो वास्तव में शासन के भारी और अंतहीन बोझ को छिपाने का एक तरीका है. इसमें सबसे बड़ी चुनौती दक्कन का थका देने वाला संघर्ष था, जहां शिया सल्तनतें और उभरती हुई मराठा शक्ति लगातार शाही संसाधनों को निचोड़ रही थी, जो चुनौती शाहजहां के समय शुरू हुई थी, वह आगे चलकर तैमूरी राज्य के गले का फंदा बन गई और उसने औरंगज़ेब के शासनकाल के आखिरी सालों को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया.

ए. अंसारी के अनुसार, शाहजहां कंधार को अपनी राजनीति की धुरी मानता था, उसे सफाविदों से वापस छीनना उस्मानी ( और उज्बेक साम्राज्यों को यह संदेश देना था कि तैमूरी महत्वाकांक्षाएं सिर्फ फारस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हिंदूकुश के पार अपनी पुश्तैनी जमीनों पर टिकी हैं. इसके बाद ही बल्ख की तरफ बढ़ने की रणनीति को गंभीरता से लिया जा सकता था. आर. सी. वर्मा का तर्क है कि हालांकि नज़र मुहम्मद और इमाम कुली के बीच के आपसी तनाव ने मुगलों को दखल देने का मौका दिया, लेकिन व्यापक भू-राजनीतिक स्थिति, खासकर कंधार को लेकर सफाविदों के साथ तनाव ने इस बड़े आक्रमण को बेहद मुश्किल बना दिया था.

फिर भी, हसन खान के पत्रों से पता चलता है कि 1640 में सफाविदों ने खुद सहयोग की पेशकश की थी, जो उसकी मौत और शाह सफी द्वारा कंधार पर दोबारा ध्यान केंद्रित करने के साथ ही खत्म हो गई. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि महज़ दो साल के भीतर बल्ख को बेहद अपमानजनक ढंग से छोड़ने की मजबूरी भी तैमूरवंशियों की इस चाहत को बुझा नहीं सकी. औरंगज़ेब ने खुद वहां शाही सेना की कमान संभाली थी और इन सुनहरे सपनों की हकीकत को दूसरों से कहीं ज़्यादा नज़दीक से और साफ तौर पर टूटते देखा था. फिर भी, स्वभाव से बेहद कड़क और युद्धों की भट्टी में तपे होने के बावजूद, वह खुद भी अपने पुरखों के इस क्षितिज के खिंचाव से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया. अपने बेटे, क्राउन प्रिंस मुअज़्ज़म को लिखे एक पत्र में, उसने इस सुलगती चिंगारी को अगली पीढ़ी को सौंपते हुए लिखा था-

“अगर एक पिता किसी काम को पूरा करने में असमर्थ रहता है, तो बेटे का यह फर्ज है कि वह उसे मुकाम तक पहुंचाए इस फानी जीव के दिल में एक अधूरी हसरत दबी है. यह शाहजहां की ख्वाहिश थी कि मैं उनके पोतों में से किसी एक को एक विशाल सेना और युद्ध के साजो-सामान के साथ उन देशों की तरफ रवाना करूं.”

भले ही आगे चलकर औरंगज़ेब का पूरा ध्यान मराठों और दक्कन की सल्तनतों पर टिक गया, लेकिन उसके शब्दों और कदमों से साफ है कि तूरान कभी भी तैमूरी सोच से पूरी तरह ओझल नहीं हुआ था. पुश्तैनी जमीनें साम्राज्य के छोर पर एक दूर की गूंज बनकर बनी रहीं, एक ऐसी याद जिसे उन्होंने कभी पूरी तरह नहीं त्यागा. ‘मुल्क-ए-मवरूथी’ और ‘गुरखाना-ए-अजदाद-ए-इज़ाम’ (महान पूर्वजों की कब्रगाह) के बार-बार आने वाले संदर्भ बताते हैं कि मध्य एशिया का यह प्रतीकात्मक और वंशवादी खिंचाव तब भी कायम था, जब सैन्य हकीकतें इस फतह को पूरी तरह नामुमकिन बना चुकी थीं.

इतालवी यात्री और विद्वान मनूची (Manucci) ने भी गौर किया था कि औरंगज़ेब के दिल में अपने पुरखों की ज़मीन को फतह करने का विचार अब भी ज़िंदा था, और इस बात को दरबार के कुछ बारीक राजनयिक कदमों से भी सहारा मिलता है. ऐसा ही एक उदाहरण था सुभान कुली के दूतों को ‘सपाव’ या सम्मान की पोशाक देना. इस तरह के सम्मान आमतौर पर आश्रितों और अधीन शासकों के लिए आरक्षित होते थे. दरबारी शिष्टाचार की भाषा में लिपटे होने के बावजूद, इस कदम में एक शाही अहंकार छिपा था, जो उज्बेक दुनिया पर अपनी श्रेष्ठता के प्रतीकात्मक दावे और शायद तैमूरी प्रभुत्व की पुरानी सोच को उजागर करता था.

औरंगज़ेब ने मध्य एशिया के धार्मिक और बौद्धिक नेटवर्क के साथ भी अपने संबंध बनाए रखे. उसने बल्ख के विद्वानों और सूफी संतों के साथ रिश्ते सहेजे, जिनमें अब्द अल-गफ्फार दिहबीदी शामिल थे, और समरकंद के शिक्षण संस्थानों में दिलचस्पी दिखाई. फ्रांसीसी चिकित्सक और यात्री बर्नियर के विवरण भी इशारा करते हैं कि मध्य एशिया मुगलों की सोच में सिर्फ ज़मीन के टुकड़े से कहीं बढ़कर था. यह उनके लिए वैधता, यादों, शुद्ध वंश परंपरा और निरंतरता का एक बड़ा स्रोत था.

पुरखों की कब्रों और पत्थरों की रखवाली

हिंदुस्तान के इन तैमूरवंशियों को भले ही कभी अपने दादा-परदादा की ज़मीन वापस न मिली हो, लेकिन उनकी भाषा और उनके कदम बार-बार एक गहरे पछतावे और तड़प को बयां करते हैं. बाबर से उन्हें सिर्फ साम्राज्य की ज़मीन नहीं मिली थी, बल्कि एक भावनात्मक और वैचारिक विरासत भी मिली थी. शाहजहां और औरंगज़ेब जैसे शासकों के लिए मध्य एशिया की कहानी हमेशा एक अधूरा अध्याय रही.

यह लगाव उनके पुरखों की यादों को सहेजने की फिक्र में भी साफ दिखाई देता है. तैमूर के वंशज होने के नाते, हिंदुस्तान के इन सम्राटों ने चाहे सच्चे लगाव के कारण या फिर अपनी वंशवादी मजबूरी के चलते अपने पूर्वजों की इमारतों और स्मारकों को बचाए रखने की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले रखी थी. इनमें सबसे ऊपर समरकंद का ‘गुर-ए-अमीर’ (तैमूर का मकबरा) था. पत्थरों के एक ढांचे से कहीं बढ़कर, यह इमारत उनकी वंशवादी यादों का सबसे बड़ा प्रतीक और उस दुनिया का बचा हुआ टुकड़ा थी जिसे वे अपना असली वतन मानते थे.

इसका एक बड़ा उदाहरण ‘तुज़ुक-ए-जहांगीरी’ में मिलता है. 1621 में जब मीर बरका बुखारा के मिशन पर गए, तो उनका काम सिर्फ इमाम कुली खान के साथ कूटनीति करना नहीं था. जहांगीर ने विशेष रूप से निर्देश दिया था कि तैमूर के उस मकबरे की देखरेख और मरम्मत के लिए भारी मात्रा में सोना भेजा जाए. यह कदम कोई खैरात या दान नहीं था, बल्कि अपनी शुद्ध वंश परंपरा और पुश्तैनी जुड़ाव को सचेत रूप से दोहराने का जरिया था.

दशकों बाद, औरंगज़ेब ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया. हालांकि उसका बल्ख अभियान पूरी तरह नाकाम हो चुका था और उसका पूरा ध्यान दक्कन पर था, लेकिन मध्य एशिया से आए सैयद ओघलान की रिपोर्टों ने उसे अंदर तक झकझोर दिया. यह जानकर कि समरकंद में तैमूर का मकबरा ‘गुर-ए-अमीर’ बदहाली का शिकार हो रहा है, उसने उसकी मरम्मत के लिए बारह रुपये प्रतिदिन का अनुदान देने का आदेश जारी किया और स्पष्ट रूप से कहा कि यह मदद “हमारे पूर्वजों की आत्माओं की खातिर” दी जा रही है. हिंदुस्तान में मंदिरों को गिराने के लिए आक्रामक अभियान चलाने वाले एक शासक का अपने पुश्तैनी वंश के मकबरे को बचाने के लिए यह फिक्र दिखाना, मुग़ल चेतना में यादों और प्राथमिकताओं के उस पदानुक्रम को पूरी तरह साफ़ कर देता है.

औरंगज़ेब का मध्य एशिया से जुड़ाव बौद्धिक स्तर पर भी था. उसका दरबार बुखारा और समरकंद की परंपराओं से गहराई से प्रभावित था. उसने मुल्ला औज़ को शाही मुहतसिब के ऊंचे पद पर बैठाया, जबकि उसके समय तैयार किए गए ‘फतावा-ए-आलमगीरी’ में ट्रांसऑक्सियाना के हनफी विद्वानों के ज्ञान का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया गया था. साल 1675 में, उसने विशेष रूप से ‘बहर अल-असरार’ की एक प्रति तैयार करने का आदेश दिया, ताकि वह सिर्फ शासकों का इतिहास ही न पढ़े, बल्कि अपने पूर्वजों की उस पुरानी दुनिया की एक और झलक पा सके.

साम्राज्य की सीमाएं भले ही दक्षिण की ओर खिसक चुकी थीं, लेकिन उनकी यादों ने कभी इस भूगोल का पीछा नहीं किया, पत्थरों, विद्वत्ता, कूटनीति और यादों के सहारे हिंदुस्तान के तैमूरी शासक हमेशा अपने पुश्तैनी वतन की हवाओं से बंधे रहे. भारत की इस विशाल धरती पर शासन करने के बावजूद, उनकी कल्पनाएं हमेशा हिंदूकुश के पार, ट्रांसऑक्सियाना के बगीचों और समरकंद के नीले गुंबदों की तरफ ही भटकती रहीं.

हिंदुस्तान ने तैमूरवंशियों को एक विशाल साम्राज्य दिया, अकूत धन-दौलत दी और बेइंतहा ताकत दी, लेकिन उनका ‘घर’ हमेशा समरकंद ही रहा एक ऐसा खोया हुआ घर जिसे वे कभी वापस नहीं पा सके. भारत महज़ वह रंगमंच बना जिस पर उनकी शाही शानो-शौकत का प्रदर्शन हुआ, जबकि उनका भावनात्मक कंपास बार-बार हिंदूकुश के पार मध्य एशिया के बागों, कब्रों और पुरानी यादों की तरफ ही इशारा करता रहा. उन्होंने हिंदुस्तान से बेहिसाब दौलत निचोड़ी, यहां के मंदिरों को तोड़ा, यहां के लोगों पर असहनीय टैक्स लादे, लेकिन उनकी सोच कभी भी अपने पुश्तैनी वतन की तरफ लौटने का रास्ता खोजना बंद नहीं कर सकी. यह कोई अस्थायी या मामूली लगाव नहीं था. यही दरअसल तैमूरवंशियों का असली सच था, उनके सिर पर हिंदुस्तान का ताज था, और दिल में हमेशा समरकंद धड़कता था.

इस श्रृंखला के अगले लेख में, मैं एक और ऐसी कहानी पर बात करूंगा जिसे बिना किसी जांच-परख के सच मान लिया गया है- ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ और इस लोक-कथा के पीछे छिपी असली ऐतिहासिक हकीकत.

(आभास मालदाहियार ‘बाबर: द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान’ के लेखक हैं)

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं)

 

 भारत पर शासन करने वाले मुग़ल राजवंश के संस्थापक जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर और उनके वंशज (जैसे हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब) सीधे तौर पर मध्य एशियाई विजेता अमीर तैमूर (तैमूर लंग) के वंशज थे।
बाबर का वंश: बाबर तैमूर के वंशज (पिता की ओर से) और चंगेज़ ख़ान के वंशज (माता की ओर से) थे। उनकी मातृभूमि समरकंद और मध्य एशिया थी।
मुग़लों का तैमूरी वंश: मुग़ल शासक स्वयं को ‘मुग़ल’ कहलाने से अधिक ‘तैमूरी’ या ‘गुर्कानी’ कहलाना पसंद करते थे। मुग़ल साम्राज्य का आधिकारिक नाम भी फ़ारसी और अरबी इतिहास में ‘तैमूरी सल्तनत’ ही था।
आक्रमण बनाम स्थायी शासन: 1398 में भारत पर बर्बर आक्रमण करने वाला तैमूर लंग यहाँ लूटपाट करके मध्य एशिया लौट गया था। लेकिन इसके लगभग 128 साल बाद, उसी तैमूर का पाँचवीं पीढ़ी का वंशज बाबर भारत आया था।

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