राजस्थान की उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी के नाना के नाम पर है देहरादून के ‘राजेंद्र नगर’ का नाम

◆ क्या आप जानते हैं? राजस्थान की उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी के नाना के नाम पर रखा गया है देहरादून के ‘राजेंद्र नगर’ का नाम

शीशपाल गुसाईं
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तारीख़ के सफ़ों से जब ख़ामोश सदाएँ आती हैं,
माज़ी की महक हवाओं में एक याद पुरानी लाती है।
बदल जाते हैं मंज़र वक्त की रफ़्तार के साथ,
पर ज़मीन अपने अतीत की विरासत का फ़साना सुनाती है।

सिरमौर की विरासत से राजेन्द्र नगर की स्मृति तक: देहरादून का राजेंद्र नगर आज भले ही आधुनिकता, चहल-पहल और बहुमंजिला इमारतों की पहचान बन चुका हो, लेकिन इसकी नींव के नीचे सिरमौर रियासत की शाही विरासत और चाय बागानों का एक समृद्ध इतिहास छिपा है। यह क्षेत्र सिरमौर रियासत के अंतिम शासक राजा राजेंद्र प्रकाश की स्मृति को संजोए हुए है। इस भूभाग की कहानी केवल शहरी विकास का विवरण नहीं है, बल्कि यह उस संक्रमणकालीन दौर की साक्षी है जब भारत औपनिवेशिक दासता से मुक्त होकर आधुनिकता की ओर कदम बढ़ा रहा था।

सिरमौर, हिमाचल प्रदेश की एक ऐतिहासिक रियासत थी जिसकी स्थापना 10वीं शताब्दी में मानी जाती है। यह रियासत अपने स्वाभिमानी, दूरदर्शी और प्रगतिशील शासकों के लिए जानी जाती थी। 19वीं सदी के मध्य में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपने पैर पसार रही थी, तब राजा शमशेर प्रकाश (1856-1898) ने सिरमौर की बागडोर संभाली और रियासत को आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में मोड़ा। वर्ष 1857 के आसपास एन्नफील्ड ग्रांट के तहत बैतवाला और गंगभेवा जैसे गांव शामिल थे। इस क्षेत्र की 692 एकड़ भूमि जनरल आर. मैक्फरसन ने 1,40,000 रुपये में एन्नफील्ड टी कंपनी से खरीदी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यवस्था में बदलाव आया, तब राजा शमशेर प्रकाश ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। उन्होंने 1867 में कौलागढ़ चाय बागान को 2,000 पाउंड स्टर्लिंग में सरकार से खरीद लिया। यह सौदा केवल एक व्यावसायिक निर्णय नहीं था, बल्कि सिरमौर रियासत की आर्थिक स्वायत्तता और संप्रभुता का प्रतीक भी था।

राजा शमशेर प्रकाश के बाद उनके पुत्र राजा अमर प्रकाश तथा तत्पश्चात उनके पौत्र महाराजा राजेंद्र प्रकाश ने सिरमौर रियासत की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया। महाराजा राजेंद्र प्रकाश का राजतिलक वर्ष 1934 में हुआ और वे सिरमौर रियासत के अंतिम शासनरत महाराजा सिद्ध हुए। वर्ष 1964 में उनके निधन के बाद उनकी एकमात्र पुत्री राजकुमारी पद्मिनी देवी सिरमौर राजपरिवार की उत्तराधिकारी बनीं। राजकुमारी पद्मिनी देवी का विवाह 10 मार्च 1966 को जयपुर के महाराजा ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह से हुआ। उनकी एकमात्र पुत्री दीया कुमारी वर्तमान में राजस्थान की उपमुख्यमंत्री हैं तथा विद्याधर नगर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे जयपुर राजघराने की विरासत, सिटी पैलेस, जयगढ़ किला, महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय ट्रस्ट और अनेक शैक्षणिक एवं सामाजिक संस्थानों के संरक्षण एवं प्रबंधन से भी जुड़ी हैं। दीया कुमारी के बड़े पुत्र सवाई पद्मनाभ सिंह जयपुर राजपरिवार के वर्तमान औपचारिक प्रमुख माने जाते हैं, जबकि छोटे पुत्र लक्षराज (लक्ष्यराज) प्रकाश सिरमौर राजपरिवार के औपचारिक प्रमुख के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार सिरमौर और जयपुर—दोनों ऐतिहासिक राजवंशों की विरासत आज भी इस परिवार के माध्यम से आगे बढ़ रही है।

कौलागढ़ चाय बागान स्वतंत्रता के बाद भी राजा राजेंद्र प्रकाश की निजी संपत्ति बना रहा। हालांकि, रियासतों के विलय और शहरीकरण की तीव्र बयार के बीच, राजा की सहमति से इस बागान की भूमि का विक्रय किया गया। धीरे-धीरे चाय की झाड़ियों की जगह रिहाइशी बस्तियों ने ले ली और यह क्षेत्र राजा के सम्मान में ‘राजेंद्र नगर’ के नाम से जाना जाने लगा।

‘सिरमौर’ (प्राचीन नाम नाहन) का शाब्दिक अर्थ ‘शेरों का शीर्ष’ या ‘शेरों की भूमि’ माना जाता है। सूरजवंशी राजपूत परंपरा से जुड़े इस राजवंश की प्रारंभिक राजधानी सिरमौर शहर थी, जिसे बाद में नाहन स्थानांतरित कर दिया गया। यमुना और गंगा की सहायक नदियों के बीच स्थित यह क्षेत्र रणनीतिक और प्राकृतिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण था। मध्यकाल में सिरमौर ने मुगलों के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा। 18वीं-19वीं सदी में इसे सिखों और गोरखाओं के आक्रमण झेलने पड़े। 1804 में गोरखा सेना ने सिरमौर पर अधिकार कर लिया और तत्कालीन राजा कर्म प्रकाश को नाहन छोड़ना पड़ा।
अंततः 1815 में ब्रिटिश सेना की सहायता से गोरखाओं को निष्कासित किया गया और सिरमौर को ‘संरक्षित रियासत’ का दर्जा प्राप्त हुआ।

जिस धरा पर कभी कौलागढ़ के हरे-भरे चाय बागानों से चाय की पत्तियाँ चुनी जाती थीं और हवाओं में एक खास महक तैरती थी, आज वह भारत के औद्योगिक वैभव का केंद्र है। 14 अगस्त 1956 को स्थापित ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) का मुख्यालय इसी ऐतिहासिक परिधि में स्थित है। ओएनजीसी का प्रमुख कार्यालय ‘तेल भवन’ उसी ऐतिहासिक परिसर में निर्मित है, जिसे कभी ‘पटियाला हाउस’ के नाम से जाना जाता था। राजेंद्र नगर में ओएनजीसी की यह विशाल और भव्य उपस्थिति इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे सिरमौर की ऐतिहासिक विरासत, आधुनिक भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के सपनों के साथ तालमेल बिठाकर खड़ी है।

संदर्भ:
1. ‘देहरादून: अ गजेटियर’ (एच. जी. वॉल्टन, 1911): औपनिवेशिक चाय बागानों और कौलागढ़ भूमि हस्तांतरण के आधिकारिक आंकड़े।
2. ‘पंजाब स्टेट्स गजेटियर्स: सिरमौर’ (1904/1934): सिरमौर के शासकों के प्रशासनिक सुधारों और संपत्ति का ब्योरा।
3. ‘तारीख़-ए-रियासत सिरमौर’ (कुंवर रणजौर सिंह, 1912): राजा शमशेर प्रकाश की आर्थिक नीतियों और आंतरिक इतिहास का प्राथमिक स्रोत।
4. ‘हिस्ट्री ऑफ द पंजाब हिल स्टेट्स’ (जे. हचिसन व वोगेल, 1933): सिरमौर की 10वीं सदी से गोरखा युद्ध तक का प्रामाणिक इतिहास।
5. ‘मेमॉयर ऑफ देहरा दून’ (जी. आर. सी. विलियम्स, 1874): दून घाटी के शुरुआती चाय बागानों और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विवरण।
6. उत्तराखंड राज्य अभिलेखागार (देहरादून): कौलागढ़ चाय बागान के 1867 के मूल विक्रय-पत्र (Sale Deed) का राजस्व रिकॉर्ड।
7. नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली): 1815 में सिरमौर को ब्रिटिश ‘संरक्षित रियासत’ (Sanad) बनाने के कूटनीतिक दस्तावेज।
8. डॉ. विलियम जेमिसन की टी-रिपोर्ट (1857/1860): कौलागढ़ क्षेत्र में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा चाय खेती के शुरुआती परीक्षण का विवरण।
9. ‘सागर ऑफ ओएनजीसी’ (कॉर्पोरेट प्रकाशन): 1956 में पटियाला हाउस को ‘तेल भवन’ में तब्दील करने का औद्योगिक इतिहास।
10.सिरमौर रियासत का इतिहास — अमर नाथ वालिया
11. चाय: द एक्सपीरियंस ऑफ इंडियन टी — रेखा सरिन एवं राजन कपूर
12. राजस्थान सरकार के प्रमाणित अभिलेख।
13. अमर उजाला (दून कथा, 3 अगस्त 2020) — शीशपाल गुसाईं
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