AtoZ: वंदे मातरम का स्वरूप और इतिहास, वास्तव में क्या यह मुसलिम विरोधी है?

अब शेष डॉक्टर संदीप कोहली के ब्लॉग ‘की बोर्ड’ से
वन्दे मातरम्… माँ तुझे सलाम
Posted on August 13, 2014
भारत का राष्ट्रगीत वन्दे मातरम्… वन्दे मातरम् की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी… इन्होंने 7 नवम्बर, 1875 ई. में बंगाल के कांतल पाडा नामक गाँव में इस गीत की रचना की थी… वंदे मातरम् गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में तथा शेष पद बंगाली भाषा में थे…

राष्ट्रीय गीत के ऐतिहासिक तथ्य
1870- दौरान अंग्रेज़ हुक्मरानों ने ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेज़ों के इस आदेश से बंकिमचंद्र चटर्जी को, जो तब एक सरकारी अधिकारी थे, बहुत ठेस पहुँची और उन्होंने 7 नवंबर 1875 में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नए गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया “वंदे मातरम्”।
1882- इस गीत का प्रकाशन सन् 1882 में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआ था। इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के सन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी।
1896- राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया। ‘वंदे मातरम्’ का स्था न राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। यह गीत स्वातंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था।
1905- दिसम्बर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में गीत को राष्ट्रगीत का दर्ज़ा प्रदान किया गया, बंग-भंग आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय नारा बना। मूलरूप से ‘वंदे मातरम’ के प्रारंभिक दो पद संस्कृत में थे, जबकि शेष गीत बांग्ला भाषा में। वंदे मातरम् का अंग्रेज़ी अनुवाद सबसे पहले अरविंद घोष ने किया
1906- ‘वंदे मातरम’ देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया, कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया।
1906 में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय ने भी वन्दे मातरम् नाम से एक उर्दू पत्रिका का प्रकाशन शुरु किया था।
1908 में लोकमान्य तिलक को गिरफ्तार करके पुलिस ने जब उन्हें अदालत में हाजिर किया तो वहां उपस्थित हजारों लोगों ने वन्दे मातरम् के गगनभेदी नारे लगाए।
1923- कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम् के विरोध में स्वर उठे… 1923 में आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में कांग्रेस का अधिवेशन था। पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा वन्दे मातरम् के गायन के साथ अधिवेशन का शुभारंभ होने वाला था। पलुस्कर जी वन्देमातरम् गाने के लिए ज्यों ही मंच पर आये, अधिवेशन के अध्यक्ष सैयद मुहम्मद अली जौहर ने वन्देमातरम् गायन का प्रतिवाद किया। किन्तु पलुस्कर जी गायन के लिए अड़े रहे। इस पर जौहर विरोधस्वरूप मंच से उतर गये।
1937- पं. जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव की समिति ने 28 अक्तूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में इस राष्ट्रगीत के गायन को अनिवार्य बाध्यता से मुक्त रखते हुए कहा था कि इस गीत के शुरुआती दो पद ही प्रासंगिक है, इस समिति का मार्गदर्शन रवीन्द्र नाथ टैगोर ने किया।
14 अगस्त 1947- रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ ‘वंदे मातरम’ के साथ और समापन ‘जन गण मन…’ के साथ हुआ।
15 अगस्त, 1947- प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध ‘वन्देमातरम’ के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था।
24 जनवरी 1950- ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत और ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान बना।
15 सितंबर 1959- को जब दूरदर्शन शुरू हुआ तो सुबह-सुबह शुरुआत ‘वंदे मातरम’ से ही होती।
2002- बी.बी.सी. के एक सर्वेक्षण में ‘वंदे मातरम्’ विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत निकला।
2003- में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने को दुनिया भर से लगभग 7000 गीत चुने गये थे और बी०बी०सी० के अनुसार 155 देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था।
2005- इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में एक साल के समारोह का आयोजन किया गया
7 सितंबर, 2006- इस समारोह समापन अवसर पर ‘मानव संसाधन मंत्रालय’ ने इस गीत को स्कूलों में गाए जाने पर बल दिया। हालांकि इसका विरोध होने पर उस समय के ‘मानव संसाधन विकास मंत्री’ अर्जुन सिंह ने संसद में कहा कि- “गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है,यह स्वेच्छा पर निर्भर है।”
The song has five stanzas. Of these only the first two are the “approved ones”. Congress Working Committee in 1937 was ‘opposed to the last two stanzas’. The approved stanzas read:
वंदे मातरम
सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम
शस्‍य श्‍यामलम मातरम
शुभ्र ज्‍योत्‍स्‍ना पुलकित यामिनीम
फुल्‍ल कुसमित द्रुमदल शोभिनीम
सुहासिनीम सुमधुर भाषिणीम
सुखदाम वरदाम मातरम
वंदे मातरम
https://www.youtube.com/watch?v=KkhaN0O9aHc

Vande Mataram!
Sujalam, suphalam, malayaja shitalam,
Shasyashyamalam, Mataram!
Vande Mataram!
Shubhrajyotsna pulakitayaminim,
Phullakusumita drumadala shobhinim,
Suhasinim sumadhura bhashinim,
Sukhadam varadam, Mataram!
Vande Mataram, Vande Mataram!
अंग्रेजी में अनुवाद अरविंदो घोष ने किया था…
I bow to thee, Mother,
richly-watered, richly-fruited,
cool with the winds of the south,
dark with the crops of the harvests,
The Mother!
Her nights rejoicing in the glory of the moonlight,
her lands clothed beautifully with her trees in flowering bloom,
sweet of laughter, sweet of speech,
The Mother, giver of boons, giver of bliss.
आनन्द मठ/बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय… पढ़ने के लिए क्लिक करें…
2014 – 1

http://www.hindisamay.com/e-content/Bankim-Chandra-Anandmath.pdf

5आनन्द मठ बांग्ला भाषा का एक उपन्यास है जिसकी रचना बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में की थी। इस कृति का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और स्वतन्त्रता के क्रान्तिकारियों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। भारत का राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् इसी उपन्यास से लिया गया है।

आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के सन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है।

आनंदमठ के प्रथम खण्ड में कथा बंगाल के दुर्भिक्ष काल से प्रारम्भ होती है जब लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे थे। सब गाँव छोड़कर यहाँ-वहाँ भाग रहे थे – एक तो खाने के लाले थे दूसरे किसान के पास खेती में अन्न उत्पन्न न होने पर भी अंग्रेजों द्वारा लगान का दबाव उन्हें पीड़ित कर रहा था।

कथा पदचिन्ह गाँव की है। महेन्द्र और कल्याणी अपने अबोध शिशु को लेकर गाँव से दूर जाना चाहते हैं। यहाँ लूट-पाट-डकैती आदि की घटनाएँ हैं। डकैतों ने कल्याणी को पकड़ लिया था पर वह जान बचाती दूर जंगल में भटक जाती है। महेन्द्र को सिपाही पकड़ लेते हैं – जहाँ हाथापाई होती है और भवानन्द नामक संन्यासी उसकी रक्षा करता है। भवानन्द आत्मरक्षा में अंग्रेज साहब को मार देता है – लूट का सामान व्यवस्था में लगाता है। वहाँ दूसरा संन्यासी जीवानन्द पहुँचता है। भवानन्द और जीवानन्द दोनों सन्यासी, प्रधान सत्यानन्द के शिष्य हैं – जो ’आनन्दमठ‘ में रहकर देश सेवा के लिए कर्म करते हैं। महेन्द्र भवानन्द का परिचय जानना चाहता है, क्योंकि यदि भवानन्द न मिलता तो उसकी जान जा सकती थी। भवानन्द ने जवाब दिया- मेरा परिचय जानकर क्या करोगे? महेन्द्र ने कहा – मैं जानना चाहता हूँ, आज आपने मेरा बहुत उपकार किया है। महेन्द्र समझ नहीं पाता कि सन्यासी डकैतों की तरह भी हो सकता है। इतने पर भी भवानन्द महेन्द्र की पत्नी और पुत्री से मिलाने का भी आश्वासन देता है। भवानन्द की मुद्रा सहसा बदल गयी थी। वह अब धीर स्थिर प्रकृति का सन्यासी नहीं लग रहा था। उसके चेहरे पर मुस्कराहट तैर रही थी। मौन भंग करने के लिए वह व्यग्र हो रहा था, परन्तु महेन्द्र गंभीर था। तब भवानन्द ने गीत गाना शुरू किया-

वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां
मलयज शीतलां
शस्य श्यामलां
मातरम्!

गीत सुनकर महेंद्र को आश्चर्य हुआ,कुछ समझ नहीं सके। सुजला, सुफला, मलयज शीतला शस्य श्यामला माता कौन? पूछा, माता कौन। और कोई जवाब न देकर भवानंद गाने लगे-

शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित-यामिनीम्
फुल्लकुसुमित-द्रुमदल शोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्।

महेंद्र ने पूछा- “यह छवि तो देश की है,यह मां कहां है?”

भवानंद ने कहा- “हम किसी और को मां नहीं मानते-जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। हम मानते हैं जन्मभूमि ही जननी है। हमें मां नहीं,पिता नहीं,भाई नहीं,बंधु नहीं,पत्नी-पुत्र नहीं,घर-द्वार नहीं,हमारे लिए बस वही मां है- सुजला,सुफला,मलयजशीतला-शस्यश्यामला।”

महेंद्र ने अब समझा तथा कहा- “तो फिर गाइए।”

भवानंद फिर गीत गाने लगे-

महेन्द्र ने देखा, लुटेरा (भवानंद) गाते-गाते रोने लगा। आश्चर्य से पूछा- “तुम लोग हो कौन?”

भवानंद ने बताया – “हम संतान हैं।”

महेन्द्र – “संतान? किसकी संतान?”

भवानंद – “माता की संतान।”

महेंद्र – “माना, लेकिन संतान क्या चोरी, डकैती करके मां की पूजा करते हैं? यह किस तरह की मातृभक्ति है?”

भवानंद- “हम चोरी-डकैती नहीं करते।”

महेंद्र – “अभी-अभी तो तुमने बैलगाड़ी लूटी।”

भवानंद- “लूट? हमने किसके रुपए लूटे?”

महेंद्र – “क्यों, राजा के।”

भवानंद- “राजा के? इन रुपयों को लेने का उसका क्या हक है?”

महेंद्र – “राजा अंश।”

भवानंद- “जो राज्य का पालन नहीं करता, वह राजा किस काम का?”…

संस्कृत में मूल गीत

बांग्ला में मूल गीत
সুজলাং সুফলাং মলয়জশীতলাম্
শস্যশ্যামলাং মাতরম্॥
শুভ্রজ্যোত্স্না পুলকিতযামিনীম্
পুল্লকুসুমিত দ্রুমদলশোভিনীম্
সুহাসিনীং সুমধুর ভাষিণীম্
সুখদাং বরদাং মাতরম্॥

কোটি কোটি কণ্ঠ কলকলনিনাদ করালে
কোটি কোটি ভুজৈর্ধৃতখরকরবালে
কে বলে মা তুমি অবলে
বহুবলধারিণীং নমামি তারিণীম্
রিপুদলবারিণীং মাতরম্॥

তুমি বিদ্যা তুমি ধর্ম, তুমি হৃদি তুমি মর্ম
ত্বং হি প্রাণ শরীরে
বাহুতে তুমি মা শক্তি
হৃদয়ে তুমি মা ভক্তি
তোমারৈ প্রতিমা গড়ি মন্দিরে মন্দিরে॥

ত্বং হি দুর্গা দশপ্রহরণধারিণী
কমলা কমলদল বিহারিণী
বাণী বিদ্যাদায়িনী ত্বাম্
নমামি কমলাং অমলাং অতুলাম্
সুজলাং সুফলাং মাতরম্॥

শ্যামলাং সরলাং সুস্মিতাং ভূষিতাম্
ধরণীং ভরণীং মাতরম্॥

हिन्दी अनुवाद

`वन्दे मातरम्’ यह गीत रविवार, कार्तिक शुद्ध नवमी, शके 1779 (7 नोव्हेंबर 1875) इस दिन पूरा हुआ.

हे माते, मैं तुम्हें वंदन करता हूं ।

जलसमृध्द तथा धनधान्यसमृध्द दक्षिणके मलय पर्वतके ऊपरसे आनेवाली वायुलहरोंसे शीतल होनेवाली तथा विपुल खेतीके कारण श्यामलवर्ण बनी हुई, हे माता !

चमकती चांदनियों के कारण यहांञपर रातें उत्साहभरी होती हैं, फूलों से भरे हुए पौधों के कारण यह भूमि वस्त्र परिधान किए समान शोभनीय प्रतित होती है । हे माता, आप निरंतर प्रसन्न रहने वाली तथा मधुर बोलने वाली, वरदायिनी, सुखप्रदायिनी हैं !

तीस करोड मुखों से निकल रही भयानक गरजनाएं तथा साठ करोड हाथों में चमकदार तलवारें होते हुए, हे माते आपको अबला कहने का धारिष्ट्य कौन करेगा ? वास्तव में माते, आपमें सामर्थ्य हैं । शत्रुसैन्यों के आक्रमणों को मुंह-तोड जवाब देकर हम संतानों का रक्षण करने वाली हे माता, मैं आपको प्रणाम करता हूं ।

आपसे ही हमारा ज्ञान, चरित्र तथा धर्म है । आपही हमारा हृदय तथा चैतन्य हैं । हमारे प्राणों में भी आप ही हैं । हमारी कलाईयों में (मुठ्ठी में) शक्ति तथा अंत:करण में काली माता भी आप ही हैं । मंदिरों में हम जिन मूर्तियों की प्रतिष्ठापना करते हैं, वे सभी आपके ही रूप हैं ।

अपने दस हाथों में दस शस्त्र धारण करने वाली शत्रुसंहारिणी दुर्गा भी आप तथा कमलपुष्पों से भरे सरोवर में विहार करने वाली कमलकोमल लक्ष्मी भी आप ही हैं । विद्यादायिनी सरस्वती भी आप ही हैं । आपको हमारा प्रणाम है । माते, मैं आपको वंदन करता हूं । ऐश्वर्यदायिनी, पुण्यप्रद तथा पावन, पवित्र जलप्रवाहों से तथा अमृतमय फलों से समृद्ध माता आपकी महानता अतुलनीय है, उसे कोई सीमा ही नहीं हैं । हे माते, हे जननी हमारा तुम्हें प्रणाम है ।

माते, आपका वर्ण श्यामल है । आपका चरित्र पावन है । आपका मुख सुंदर हंसी से विलसीत है । सर्वाभरणभूषित होने के कारण आप कितनी सुंदर लगती हैं ! सचमें, हमें धारण करने वाली तथा हमें संभालनेङवाली भी आप ही हैं । हे माते, हमारा आपके चरणोंमें पुन:श्च प्रणिपात ।

English Translation
Here is the translation in prose of the above two stanzas rendered by Aurobindo Ghose. This has also been adopted by the Government of India’s national portal. The original Vande Mataram consists of six stanzas and the translation in prose for the complete poem by Shri Aurobindo appeared in Karmayogin, 20 November 1909.

Mother, I salute thee!
Rich with thy hurrying streams,
bright with orchard gleams,
Cool with thy winds of delight,
Dark fields waving Mother of might,
Mother free.

Glory of moonlight dreams,
Over thy branches and lordly streams,
Clad in thy blossoming trees,
Mother, giver of ease
Laughing low and sweet!
Mother I kiss thy feet,
Speaker sweet and low!
Mother, to thee I salute.

Who hath said thou art weak in thy lands
When the swords flash out in seventy million hands
And seventy million voices roar
Thy dreadful name from shore to shore?
With many strengths who art mighty and stored,
To thee I call Mother and Lord!
Thou who savest, arise and save!
To her I cry who ever her foeman drove
Back from plain and Sea
And shook herself free.

Thou art wisdom, thou art law,
Thou art heart, our soul, our breath
Thou art love divine, the awe
In our hearts that conquers death.
Thine the strength that nerves the arm,
Thine the beauty, thine the charm.
Every image made divine
In our temples is but thine.

Thou art Durga, Lady and Queen,
With her hands that strike and her
swords of sheen,
Thou art Lakshmi lotus-throned,
And the Muse a hundred-toned,
Pure and perfect without peer,
Mother lend thine ear,
Rich with thy hurrying streams,
Bright with thy orchard gleems,
Dark of hue O candid-fair

In thy soul, with bejeweled hair
And thy glorious smile divine,
Loveliest of all earthly lands,
Showering wealth from well-stored hands!
Mother, mother mine!
Mother sweet, I salute thee,
Mother great and free!

Urdu Translation
Tasleemat, maan tasleemat
tu bhari hai meethe pani se
phal phoolon ki shadabi se
dakkin ki thandi hawaon se
faslon ki suhani fizaaon se
tasleemat, maan tasleemat
teri raaten roshan chand se
teri raunaq sabze faam se
teri pyar bhari muskan hai
teri meethi bahut zuban hai
teri banhon mein meri rahat hai
tere qadmon mein meri jannat hai
tasleemat, maan tasleemat –

Arif Mohammad Khan – This is an attempt to translate Vande Mataram in easy spoken language. I wonder if those who declare the song anti-Islamic may have a look at this rendering in urdu and point out the line or portion they find objectionable?

हिन्दी-काव्यानुवाद

इस गीत का हिन्दी-काव्यानुवाद ‘क्रान्त’ कृत संस्कृत/हिन्दी बालोपयोगी संस्कार रचनावली अर्चना में मिलता है। यह पुस्तिका लेखक की स्वयं की हस्तलिपि में किंवा प्रकाशन से प्रथम बार 1992 में प्रकाशित हुई थी। लेखक ने इसे उर्दू के मशहूर शायर मोहम्मद इकबाल के सुप्रसिद्ध कौमी तराने “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” की धुन को ध्यान में रखकर लिखा था। उक्त कृति में सामूहिक राष्ट्रगान शीर्षक से दिया गया गीत यहाँ पर पाठकों की सेवार्थ उद्धृत किया जा रहा है:

तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत! हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!
जलवायु अन्न सुमधुर, फल फूल दायिनी माँ! धन धान्य सम्पदा सुख, गौरव प्रदायिनी माँ!!
शत-शत नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!

अति शुभ्र ज्योत्स्ना से, पुलकित सुयामिनी है। द्रुमदल लतादि कुसुमित, शोभा सुहावनी है।।
यह छवि स्वमन धरें हम, हे मातृभूमि भारत! तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!!
हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!

कसकर कमर खड़े हैं, हम कोटि सुत तिहारे। क्या है मजाल कोई, दुश्मन तुझे निहारे।।
अरि-दल दमन करें हम, हे मातृभूमि भारत! तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!!
हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!

तू ही हमारी विद्या, तू ही परम धरम है। तू ही हमारा मन है, तू ही वचन करम है।।
तेरा भजन करें हम, हे मातृभूमि भारत! तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!!
हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!

तेरा मुकुट हिमालय, उर-माल यमुना-गंगा। तेरे चरण पखारे, उच्छल जलधि तरंगा।।
अर्पित सु-मन करें हम, हे मातृभूमि भारत! तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!!
हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!

बैठा रखी है हमने, तेरी सु-मूर्ति मन में। फैला के हम रहेंगे, तेरा सु-यश भुवन में।।
गुंजित गगन करें हम, हे मातृभूमि भारत! तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!!
हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!

पूजा या पन्थ कुछ हो, मानव हर-एक नर है। हैं भारतीय हम सब, भारत हमारा घर है।।
ऐसा मनन करें हम, हे मातृभूमि भारत! तुझको नमन करें हम, हे मातृभूमि भारत!!
हे मातृभूमि भारत! हे पितृभूमि भारत!!

पंजाबी अनुवाद

स्टार न्यूज़ एजेंसी की संपादक एवं युवा पत्रकार फ़िरदौस ख़ान ने वंदे मातरम का पंजाबी में अनुवाद किया है. फ़िरदौस ख़ान द्वारा किया गया वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद इस प्रकार है:

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद

ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ
ਤੂੰ ਭਰੀ ਹੈ ਮਿੱਠੇ ਪਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਫਲ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਮਹਿਕ ਸੁਹਾਣੀ ਨਾਲ਼
ਦੱਖਣ ਦੀਆਂ ਸਰਦ ਹਵਾਵਾਂ ਨਾਲ਼
ਫ਼ਸਲਾਂ ਦੀਆਂ ਸੋਹਣੀਆਂ ਫ਼ਿਜ਼ਾਵਾਂ ਨਾਲ਼
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ…

ਤੇਰੀਆਂ ਰਾਤਾਂ ਚਾਨਣ ਭਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰੀ ਰੌਣਕ ਪੈਲ਼ੀਆਂ ਹਰੀਆਂ ਨੇ
ਤੇਰਾ ਪਿਆਰ ਭਿੱਜਿਆ ਹਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਬੋਲੀ ਜਿਵੇਂ ਪਤਾਸ਼ਾ ਹੈ
ਤੇਰੀ ਗੋਦ ‘ਚ ਮੇਰਾ ਦਿਲਾਸਾ ਹੈ
ਤੇਰੇ ਪੈਰੀਂ ਸੁਰਗ ਦਾ ਵਾਸਾ ਹੈ
ਮਾਂ ਤੈਨੂੰ ਸਲਾਮ…
-ਫ਼ਿਰਦੌਸ ਖ਼ਾਨ

वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद (देवनागरी में)
मां तैनूं सलाम
तूं भरी है मिठ्ठे पाणी नाल
फल फुल्लां दी महिक सुहाणी नाल
दक्खण दीआं सरद हवावां नाल
फ़सलां दीआं सोहणिआं फ़िज़ावां नाल
मां तैनूं सलाम…

तेरीआं रातां चानण भरीआं ने
तेरी रौणक पैलीआं हरीआं ने
तेरा पिआर भिजिआ हासा है
तेरी बोली जिवें पताशा है
तेरी गोद ’च मेरा दिलासा है
तरी पैरीं सुरग दा वासा है
मां तैनूं सलाम…
-फ़िरदौस ख़ान

पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ कृतक्रान्ति गीतांजलि में वन्दे मातरम् का मूल पाठ मातृ-वन्दना

राष्ट्रीय ध्वज और वंदे मातरम
पहला ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।

1906 में भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज

दूसरा ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

1907 में भीका‍जीकामा द्वारा फहराया गया बर्लिन समिति का ध्‍वज

स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रगीत की भूमिका

राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया। अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेज़ी में और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया। ‘वंदे मातरम्’ का स्था न राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के बराबर है। यह गीत स्वातंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था।
बंगाल में चले आज़ादी के आंदोलन में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में लोकप्रिय हो गया। ब्रिट्रानी हुकूमत इसकी लोकप्रियता से सशंकित हो उठी और उसने इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। 1896 में ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के ‘कलकत्ता अधिवेशन’ में भी गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया। पाँच साल बाद यानी 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में चरन दास ने यह गीत पुनः गाया। 1905 में बनारस में हुए अधिवेशन में इस गीत को सरला देवी ने स्वर दिया।
कांग्रेस के अधिवेशनों के अलावा भी आज़ादी के आंदोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफ़ी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम ‘वंदे मातरम’ रखा। अंग्रेज़ों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली आज़ादी की दीवानी मातंगिनी हज़ारा की जुबान पर आख़िरी शब्द ‘वंदे मातरम’ ही थे। सन 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में ‘वंदे मातरम्’ ही लिखा हुआ था।
सन 1920 तक सुब्रह्मण्यम भारती तथा दूसरों के हाथों विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर यह गीत राष्ट्रगान की हैसियत पा चुका था। बहरहाल, सन 1930 के दशक में वंदे मातरम् की इस हैसियत पर विवाद उठा और लोग इस गीत की मूर्ति-पूजकता को लेकर आपत्ति उठाने लगे। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित एक समिति की सलाह पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सन 1937 में इस गीत के उन अंशों को छाँट दिया, जिनमें बुतपरस्ती के भाव ज़्यादा प्रबल थे और गीत के संपादित अंश को राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया।
वन्देमातरम’ गायन

15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध ‘वन्देमातरम’ के गायन का सजीव प्रसारण हुआ था। आज़ादी की सुहानी सुबह में देशवासियों के कानों में राष्ट्रभक्ति का मंत्र फूँकने में ‘वन्देमातरम’ की भूमिका अविस्मरणीय थी। ओंकारनाथ जी ने पूरा गीत स्टूडियो में खड़े होकर गाया था; अर्थात उन्होंने इसे राष्ट्रगीत के तौर पर पूरा सम्मान दिया। इस प्रसारण का पूरा श्रेय सरदार बल्लभ भाई पटेल को जाता है। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का यह गीत ‘दि ग्रामोफोन कम्पनी ऑफ़ इंडिया’ के रिकॉर्ड संख्या STC 048 7102 में मौजूद है।
राष्ट्रीय गीत की मान्यता

24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि स्वतंत्रता संग्राम में ‘वन्देमातरम’ गीत की उल्लेखनीय भूमिका को देखते हुए इस गीत के प्रथम दो अन्तरों को ‘जन गण मन..’ के समकक्ष मान्यता दी जाय। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा का यह निर्णय सुनाया। “वन्देमातरम’ को राष्ट्रगान के समकक्ष मान्यता मिल जाने पर अनेक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों पर ‘वन्देमातरम’ गीत को स्थान मिला। आज भी ‘आकाशवाणी’ के सभी केन्द्रों का प्रसारण ‘वन्देमातरम’ से ही होता है। आज भी कई सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थाओं में ‘वन्देमातरम’ गीत का पूरा-पूरा गायन किया जाता है।
राष्ट्रगीत का महत्त्व

राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करने में गीत, संगीत और नृत्य की महत्त्व भूमिका होती है। लोगों को एकसूत्र में बांधने के साथ ही संगीत मन को खुशी भी देती है। सर्वप्रथम 1882 में प्रकाशित इस गीत को पहले-पहल 7 सितंबर, 1905 में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्ज़ा दिया गया। इसीलिए 2005 में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में एक साल के समारोह का आयोजन किया गया। 7 सितंबर, 2006 में इस समारोह के समापन के अवसर पर ‘मानव संसाधन मंत्रालय’ ने इस गीत को स्कूलों में गाए जाने पर बल दिया। हालांकि इसका विरोध होने पर उस समय के ‘मानव संसाधन विकास मंत्री’ अर्जुन सिंह ने संसद में कहा कि- “गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, यह स्वेच्छा पर निर्भर करता है।”
क्या इस्लाम विरोधी है वंदे मातरम

1923 में आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में कांग्रेस का अधिवेशन था। पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा वन्दे मातरम् के गायन के साथ अधिवेशन का शुभारंभ होने वाला था। पलुस्कर जी वन्देमातरम् गाने के लिए ज्यों ही मंच पर आये, अधिवेशन के अध्यक्ष सैयद मुहम्मद अली जौहर ने वन्देमातरम् गायन का प्रतिवाद किया। किन्तु पलुस्कर जी गायन के लिए अड़े रहे। इस पर जौहर विरोधस्वरूप मंच से उतर गये।
काकीनाडा अधिवेशन से पहले कई अधिवेशन हुए थे जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मुस्लिम थे… और उनकी अध्यक्षता में वन्देमातरम् गाया गया था… 1887 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे बदरुद्दीन, तब उसके अधिवेशन में वन्देमातरम् गाया गया, 1894 में बंकिम बाबू के निधन के पश्चात् 28 दिसम्बर 1896 को स्वयं रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने कांग्रेस अधिवेशन में वन्देमातरम् गाया था, उस समय कांग्रेस अध्यक्ष थे मो. रहीम सयानी, 1913 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे सैयद मोहम्मद बहादुर, तब अधिवेशन में वन्देमातरम् गाया गया था, 1927 में एम.ए. अंसारी के अध्यक्ष रहते हुए अधिवेशन में गाया गया।
आखिरकार 1937 में पं. जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव की समिति ने 28 अक्तूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में पेश अपनी रिपोर्ट में इस राष्ट्रगीत के गायन को अनिवार्य बाध्यता से मुक्त रखते हुए कहा था कि इस गीत के शुरुआती दो पद ही प्रासंगिक है, इस समिति का मार्गदर्शन रवीन्द्र नाथ टैगोर ने किया।
वंदे मातरम् का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है. बंगाल के महान साहित्यकारों और कवियों में से एक बंकिम चंद्र ने वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में की थी. उन्होंने भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस माँ की संतान बताया. भारत को वो माँ बताया जो अंधकार और पीड़ा से घिरी है. उसके बच्चों से बंकिम आग्रह करते हैं कि वे अपनी माँ की वंदना करें और उसे शोषण से बचाएँ.
भारत को दुर्गा माँ का प्रतीक मानने के कारण आने वाले वर्षों में वंदे मातरम् को मुस्लिम लीग और मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग शक की नज़रों से देखने लगा. इसी विवाद के कारण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वंदे मातरम् को आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहते थे. मुस्लिम लीग और मुसलमानों ने वंदे मातरम् का इस वजह से विरोध किया था कि वो देश को भगवान का रूप देकर उसकी पूजा करने के ख़िलाफ़ थे.
नेहरू ने स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर से वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाए जाने के लिए उनकी राय माँगी थी. रवींद्रनाथ ठाकुर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए.
हालांकि बंकिमचंद्र की राष्ट्रभक्ति पर किसी को शक नहीं था, सवाल यह था कि जब उन्होंने ‘आनंदमठ’ लिखा उसमें उन्होंने बंगाल पर शासन कर रहे मुस्लिम राजाओं और मुसलमानों पर ऐसी कई टिप्पणियाँ की थीं जिससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ. वंदे मातरम् को हालाँकि कई वर्ष पहले एक कविता के रूप में लिखा गया था लेकिन उसे बाद में प्रकाशित हुए आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बनाया गया.
आनंदमठ को ‘मुस्लिम विरोधी नहीं कह सकते’

आनंदमठ की कहानी 1772 में पूर्णिया, दानापुर और तिरहुत में अँग्रेज़ और स्थानीय मुस्लिम राजा के ख़िलाफ़ सन्यासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है. आनंदमठ का सार ये है कि किस प्रकार से हिंदू सन्यासियों ने मुसलमान शासकों को हराया.
आनंदमठ में बंकिम चंद्र ने बंगाल के मुस्लिम राजाओं की कड़ी आलोचना की. एक जगह वो लिखते हैं,”हमने अपना धर्म, जाति, इज़्ज़त और परिवार का नाम खो दिया है. हम अब अपनी ज़िंदगी ग़वाँ देंगे. जब तक इन… (को) भगाएँगे नहीं तब तक हिंदू अपने धर्म की रक्षा कैसे करेंगे.”
इतिहासकार तनिका सरकार का कहना है,”बंकिम चंद्र इस बात को मानते थे कि भारत में अंग्रेज़ों के आने से पहले बंगाल की दुर्दशा मुस्लिम राजाओं के कारण थी.” ‘बांग्ला इतिहासेर संबंधे एकटी कोथा’ में बंकिम चंद्र ने लिखा,”मुग़लों की विजय के बाद बंगाल की दौलत बंगाल में न रहकर दिल्ली ले जाई गई.”
लेकिन प्रतिष्ठित इतिहासकार केएन पणिक्कर का मानना है,”बंकिम चंद्र के साहित्य में मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ कुछ टिप्पणियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बंकिम मुस्लिम विरोधी थे. आनंदमठ एक साहित्यिक रचना है.”
उनका कहना है,”बंकिम चंद्र अंग्रेज़ी हुकूमत में एक कर्मचारी थे और उन पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखे गए हिस्से ‘आनंद मठ’ से निकालने का दबाव था. 19वीं शताब्दी के अंत में लिखी इस रचना को उस समय के मौजूदा हालात के संदर्भ में पढ़ना और समझना ज़रूरी है.”
क्या आजादी से पहले इस्लाम विरोधी था ‘वंदे मातरम्’?
सन 1905 में ब्रिटिस वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया गया तो उसके विरोध में ‘ बंग भंग आन्दोलन’ हिन्दुओं और मुसलमानों ने मिल कर किया । इस आन्दोलन का मुख्य नारा ही ‘वन्दे मातरम्’ था । अन्ततः अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन समाप्त करना पडा ।

वन्दे मातरम् गीत में पूजा एवं अर्चना जैसी भावना नहीं है और न ही इसके शब्द किसी की मजहबी – आस्था को आहत करते है तो इस पर विवाद क्यों ! बंकिम चन्द्र चैटर्जी ने देश प्रेम के उदात्त भाव से अभिभूत होकर यह अमर गीत वन्दे मातरम् लिखा था ।

श्री मौलाना सैयद फजलुलरहमान जी के शब्दों में ‘ वन्दे मातरम् गीत में बुतपरस्ती ( मूर्ति – पूजा ) की गन्ध नहीं आती है , वरन् यह मादरे वतन ( मातृभूमि ) के प्रति अनुराग की अभिव्यक्ति है । ‘

‘नमो नमो माता अप श्रीलंका , नमो नमो माता’ ( श्रीलंका का राष्ट्रगीत )
‘इंडोनेशिया तान्हे आयरकू तान्हे पुम्पहा ताराई’ ( इंडोनेशिया का राष्ट्रगीत )

भारत के वंदे मातरम् में ही भारत माता की वंदना नहीं है , श्रीलंका और मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया के राष्ट्रगीत में भी वही सब कुछ है जो वन्दे मातरम् में है। इनके राष्ट्रगीत में भी राष्ट्र को माता की ही संज्ञा दी गई है ।

जिस आजादी की लडाई में वन्दे मातरम् का हिन्दू – मुस्लिम ने मिलकर उद्घोष किया था तो फिर क्यों आजादी के बाद यह इस्लाम विरोधी हो गया । वंदे मातरम् को गाते – गाते तो अशफाक उल्ला खां फाँसी के फंदे पर झूल गए थे । इसी वंदे मातरम् को गाकर न जाने कितने लोगों ने बलिदान दिया । जब देश के स्वतंत्रता संग्राम में यह गीत गैर इस्लामी नहीं था , तो आज कैसे हो गया !

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