संस्कारों का रत्न मिटाता है जीवन की विकृति: आचार्य श्री सौरभ सागर महामुनिराज
देहरादून 27 जुलाई 2025। परम पूज्य संस्कार प्रणेता ज्ञानयोगी प्रेरणा स्रोत उत्तराखंड के राजकीय अतिथि आचार्य श्री 108 सौरभ सागर महामुनिराज के मंगल सानिध्य में संगीतमय कल्याण मंदिर विधान का आयोजन किया जा रहा है जिसमें नित्य प्रति दिन जिनालय में मंदिरों की घंटियों की गूंज के साथ- साथ, श्री जी की प्रक्षाल, मंत्रोच्चार के साथ विधि विधान से पूजन , विधानाचार्य संदीप सजल जैन शास्त्री इंदौर बड़े हर्षोल्लास के साथ विधान कर रहे हैं।
आज के विधान के पुण्यार्जक पुष्प वर्षायोग समिति एवं दिगंबर जैन महासमिति रहे।
पूज्य आचार्य श्री के पास बाहर से पधारे गुरुभक्तो का पुष्प वर्षायोग समिति ने स्वागत अभिनन्दन किया ।
पूज्य आचार्य श्री ने सभी धर्म प्रेमी बंधु श्रद्धालुओं से कहा कि जिस प्रकार समुद्र में लहरें उठती हैं ज्वार आता है तो पानी की तरंगें बाहर आ जाती हैं। लेकिन जब पूरा पानी वापस लौटता है तो उसकी एक विशेषता होती है कि पानी तो वापस लौट जाता है परन्तु उसके साथ जो रत्न आते हैं वो वही जमीन पर रह जाते हैं। हे प्रभु, इसी प्रकार हमारा जीवन हो कि जैसे समुद्र का पानी वापस आकर चला जाता है और रत्न जमीन पर बिखर जाते हैं उसी प्रकार कभी धर्म का अवसर आये तो हम सभी बाहर निकल जाए और हमारे संस्कारों के रत्न हमारे समाज में हमारी जमीन पर बिखर जाए। जब संस्कारों के रत्न हमारे जीवन की जमीन पर बिखर जाते हैं तो भगवान महावीर कहते हैं कि वही चमक, वो रत्न किनारे रहने वाले लोगों की दरिद्रता मिटाता है। उसी प्रकार संस्कारों का रत्न हमारे भीतर पड जाता है तो स्वाभाविक रूप से हमारे जीवन की विकृति मिटाता है।

