निवेदिता मेनन और आरफा खानम शेरवानी लस्ट जिहाद वार्ता

सुनो आरफा, हैंडसम नहीं होते तुम्हारे मुस्लिम मर्द, नीच-गलीच होते हैं: वामपंथन निवेदिता मेनन नहीं बताएगी लव जिहादियों की जो मक्कारी, वो हमसे सुनो ।
2 June, 2026
पूजा राणा
आरफा बीबी-निवेदिता दीदी… हैंडसम नहीं होते तुम्हारे लव जिहादी, झूठे और मक्कार होते हैं (फोटो साभार: Youtube-Arfakhanumsherwani)

एक किस्सा सुनाती हूँ। एक गाँव में अलग-अलग मोहल्ले की दो सहेलियाँ मिलती हैं। एक आरफा खानुम शेरवानी और दूसरी निवेदिता मेनन। दोनों कैमरे के सामने बैठकर चुगली करने लगती हैं। इनमें से एक आरफा, अपनी दोस्त निवेदिता मेनन से बातें उगलवा रही है, जबकि दूसरी निवेदिता ठीक वही बातें उगल रही हैं जो आरफा सुनना और कहलवाना चाहती हैं। चुगली करने का यही सही तरीका भी है। उन्हें यह भी मालूम है कि उनकी यह चुगली गाँव भर तक पहुँच जाएगी। और हुआ भी कुछ ऐसा ही, क्योंकि चुगली का टॉपिक ही ऐसा चुना गया था- लव जिहाद और हिंदू-विरोधी बातें।

दोनों सखियों की यह चुगली तीन महीने बाद सोशल मीडिया पर वायरल कंटेन्ट बनी। ‘एक्स’ से लेकर फेसबुक और यूट्यूब के कानों तक इनकी बातें पहुँची। और हर जगह इनकी चुगली करने की आदत पर भद्द पिटी। तो वो चुगली है कुछ ऐसी ही कि सुनना भी जरूरी है। तो चुगली के 2.50 मिनट में हुई तीखी बातें आप भी सुनिए:

शुरुआत आरफा करती हैं क्योंकि अपने नैरेटिव की बातें उगलवानी उन्हीं को हैं। आरफा पूछती हैं- लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?

बस… यही सवाल चुगलीखोर दोस्त निवेदिता पुछवाने का इंतजार भी कर रही थी। उसने अपना जवाब एक सुर में खिलखिलाते हुए दिया, “पता नहीं… इनको (हिंदुओं) कहते शर्म नहीं आती। हिंदू मर्द जाकर ले आएँ मुस्लिम औरतों को हमारे समुदाय में। ले आए बहू बनाकर, क्यों नहीं होता है आपसे? ये कहने में उन्हें शम महसूस नहीं होती? कि हमसे नहीं होता वो करते हैं, वो हमारी लड़कियों को छीनते हैं। हमेशा लगता है कि ‘लव जिहाद’ एक बेबसी प्रकट करने जैसा है कि हमसे नहीं होता और ये लोग कर रहे हैं। होंगे फिर मुस्लिम मर्द इतने हसीन।”

इतने में आरफा उत्सुकता से पूछती हैं, “क्या मुस्लिम मर्द इतने आकर्षक होते हैं, क्या इतने हैंडसम होते हैं?”

अब निवेदिता बिल्कुल ‘नंगी मानसिकता’ के साथ बोलती हैं, “हाँ, होंगे। ‘हिंदू राष्ट्र’ तो हिंदुओं में डर पैदा करता है, तब जाकर हिंदू खतरे में है वाला नारा उठता है।”

हर जगह मोदी सरकार को घसीटने वाली आरफा फिर बोल पड़ती हैं, “फिर ये लोग(हिंदू) मोदी जी को वोट करते हैं?”

निवेदिता भी चुगली को एक कदम आगे ले जाते हुए कहती हैं, “मैं नहीं मानती कि वोट से कोई सरकार टिकी हुई है, और कई सालों से नहीं टिकी है।”

आगे आरफा अपनी खयाली दुनिया में पकाए गए पुलाव को परोसते हुए पूछती हैं, “मुस्लिम लड़के सुरमा लगाकर बाइक पर आता है और हिंदू लड़कियों का दिल चुराके ले जाता है। लेकिन हिंदू लड़के ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं… क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम लड़के धर्म परिवर्तन का एक नेटवर्क चलाते है, जो हिंदू लड़के नहीं कर रहे हैं।”

इस बार निवेदिता ने आरफा की मानसिकता को भी भाँप लिया है और उसी हिसाब से अपना ‘फेमिनिस्ट कार्ड’ बीच में घुसाकर पूरा जवाब देती हैं, “ये लोग सिर्फ मुस्लिमों से नफरत नहीं करते बल्कि महिलाओं से भी नफरत करते हैं, जो पितृसत्तात्मक समाज की माँ, बहने औऱ बीवियाँ नहीं बनना चाहतीं। आजाद खयाल वाली महिलाएँ। तो उनको लगता है कि जो औरतें इस लव जिहाद में फँसती हैं उनका कोई दिमाग नहीं है, वो बिल्कुल मुर्गी बनकर किसी के पीछे चली जाती हैं… मतलब कोई भी सुरमा लगाकर आया और आप उनके पीछे चली गईं..”

आगे कहती हैं, “मान लेते हैं कि लव जिहाद साजिश है धर्म परिवर्तन के लिए और मुस्लिम की तादाद बढ़ाने के लिए। लव जिहाद बोलने वालों की नजर में हिंदू महिलाएँ बुद्धु हैं जो वो ये कर रही हैं। तो आपके घर में ही कुछ समस्या है न। लव जिहाद से औरतों पर काबू रख रहे हैं।”

अब इस चुगली के पीछे का पूरा एजेंडा भी समझ लीजिए। यहाँ दोनों सहेलियाँ निवेदिता और आरफा खानुम ‘लव जिहाद’ पर चुगली कर रही हैं। यहाँ निवेदिता ‘लव जिहाद’ को हिंदुओं की बेबसी बताकर मुस्लिमों को हरी झंडी दे रही हैं और आरफा खानुम इस हरी झंडी का जश्न मनाते हुए अपने मुस्लिम भाई-बहनों की तारीफ में मग्न नजर आती हैं।

यह भी जान लेना चाहिए कि पहली सहेली आरफा खानुम शेरवानी, खुद को एक लिबरल-प्रोग्रेसिव महिला के तौर पर पेश करते हुए ‘एकतरफा’ मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ती है। और दूसरी सहेली निवेदिता की पहचान ‘लाल सलाम’ वाली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की प्रोफेसर के तौर पर है और उसके देश-विरोधी किस्से इतने मशहूर हैं कि इन्हें फिल्मों में जगह देनी पड़ गई।

यहाँ बार-बार आरफा खानम का यह पूछना कि ‘लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’ कोई साधारण सवाल नहीं है। इस सवाल से वे हिंदुओं को गलत ठहराने के लिए यह बताने की कोशिश कर रही हैं कि लव जिहाद की पीड़ित हिंदू महिलाएँ खुद मुस्लिम लड़कों की खूबसूरती देखकर उनके पास आती हैं। वहीं फेमिनिज्म के राग अलापने के लिए वह निवेदिता के मुँह से ‘आजाद खयाल’ वाली महिलाओं को हिंदुओं का विरोधी बताने वाली बात सुनना चाहती हैं।

लेकिन आरफा सिर्फ तब तक इन बेतुकी बातों पर टिकी रहती हैं जब तक इनकी हकीकत सामने नहीं आ जाती है। जब TCS नासिक में धर्मांतरण कांड जैसे मामले सामने आते हैं तो आरफा इन्हें मुस्लिमों के प्रति हमला बताती हैं और कहती हैं कि अब पढ़े-लिखे मुस्लिमों को ‘बहुसंख्यकों के सिस्टम’ ने निशाना बना लिया है। भूल जाती हैं वो अपने उन ‘आकर्षक’ और ‘हैंडसम’ भाइजानों की हिंसा, जो हर त्यौहार पर बन-ठनकर निकलते और हिंदुओं को चाकूबाजी और पत्थरबाजी का शिकार बनाते हैं।

यह भी याद नहीं रखती कि आतंकी हमले में इन ‘पढ़े-लिखे और खूबसूरत’ भाईजान के जब नाम सामने आते हैं, तो इनकी जिहादी मानसिकता भी सबके सामने आ जाती है। तब साफ हो जाता है कि कैसे मजहब के नाम पर ये आतंकी बने। तब आप आरफा ही हैं, जो आज ‘लव जिहाद’ को बेबसी बताने पर खिलखिला रही हैं, तब आपके भाईजानों पर सवाल किए जाते हैं तो आपके कान खराब हो जाते हैं।

बात अगर दूसरी सहेली निवेदिता की करें तो देश-विरोधी किस्सों के अलावा ‘प्रोफेसर’ के तौर पर उनके पास कोई अन्य उपलब्धियाँ नजर नहीं आती हैं। चाहे भारतीय सेना को बदनाम करने की बात हो तो निवेदिता आगे रहेंगी, जिनके लिए निवेदिता का कहना है कि ये सिर्फ ‘रोटी’ के लिए काम करते हैं और देश सेवा से इनका कोई मतलब नहीं है। जब अप्रैल 2010 में कम्युनिस्टों द्वारा 76 CRPF जवानों के बलिदान का जश्न JNU में मनाया गया था तब भी निवेदिता का नाम सबसे ऊपर था।

चलिए ‘देश सेवा’ में दिए निवेदिता के योगदान को भी जान लेते हैं। इन्होंने पाकिस्तान की राह पर चलते हुए मार्च 2016 में कहा कि भारत गैर-कानूनी ढंग से कश्मीर पर कब्जा कर रहा है और यह कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। ‘देशप्रेम’ इतना भरा है कि निवेदिता भारत के नक्शे को ही नहीं मानती हैं, इसीलिए वह अपने आसपास उल्टा नक्शा देखना पसंद करती हैं। उनका तर्क यह है कि उन्हें इस नक्शे में भारत माता नहीं दिखता।

और JNU के छात्र-छात्राओं के आए दिन देश-विरोधी गतिविधियाँ सामने आने में भी इनकी भूमिका है। ये ‘द कश्मीर फाइल्स’ में राधिका मेनन के किरदार के रूप में दिखाई गईं निवेदिता मेनन को देखकर सभी जान गए हैं। यह भी किसी से नहीं छिपा कि JNU में निवेदिता जैसे प्रोफेसर ही यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को शराब और पार्टियों का लालच देकर देश-विरोधी प्रोपेगेंडा आगे बढ़ाने का काम सौंपते हैं।

‘हैंडसम’ लव जिहादियों की मक्कारी
तो अब यह तो सामने आ ही गया है कि इन दो सहेलियों की चुगली करने के पीछे क्या मंशा है और कैसे यह पूरे गाँव में फैलाने के एजेंडे से की गई है? लेकिन जो यह कह रही हैं कि ‘हिंदुओं से नहीं होता है।’ यह बात सही है, हिंदू नहीं कर सकते जो मुस्लिम संगठित गिरोह बनाकर ‘लव जिहाद‘ में हिंदू लड़कियों को फँसाते हैं, हिंदू किसी भी अपना धर्म नहीं थोप सकते, न ही जबरन गोमांस खिला सकते और न खाओ तो रेप और शारीरिक शोषण जैसी हैवानियत नहीं कर सकते।

और जहाँ तक बात है कि हिंदू महिलाओं के ‘बुद्धु’ कहने और समाज में उन पर काबू करने की है तो यह कोई ‘फेमिनिज्म’ विचार नहीं है। किसी के भावनाओं से खेलने वाले आपके (मुस्लिम) मर्द इस गेम को ज्यादा सही तरीके से खेल पाते हैं, क्योंकि धर्म पर वार झूठ और मक्कारी से किसी की भावनाओं के साथ खेलना हिंदुओं से नहीं हो पाता है। तुम्हारे (मुस्लिम) ‘मर्द’ ‘हैंडसम’ और ‘खूबसूरती’ नहीं है आरफा और निवेदिता, वे महिलाओं को सुरमा लगाकर नहीं फँसाते बल्कि माथे पर टीका और हाथ में कलावा पहनकर आते हैं। नाम भी हिंदू रखते हैं।

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