सौ साल पहले, कैसी थी मसूरी और उसकी तलहटी
एक सदी पहले की मसूरी और उसकी तलहटी का नजारा आज से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। उस दौर में दून घाटी के निचले हिस्सों में पाए जाने वाले साल के जंगलों का पहाड़ों पर नामोनिशान तक नहीं था इसके बजाय जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती थी पेड़ों की किस्में उनकी खुशबू और रंग भी पूरी तरह बदल जाते थे। राजपुर से लेकर पुराना मसूरी रोड किमड़ी और सैंजी जैसी निचली ढलानों पर शीशम खैर जामुन सेमल और बाँस के घने झुरमुट हुआ करते थे गर्मियों के मौसम में जब अंग्रेज पहाड़ों का रुख करते थे तो सबसे पहले उनका सामना इसी हरियाली से होता था जैसे-जैसे घोड़ा या डंडी ऊपर की ओर बढ़ती हवा में ठंडक घुलने लगती और बाँस की जगह बाँज यानी ओक के खूबसूरत जंगल शुरू हो जाते थे समुद्र तल से 5500 से 6000 फीट की ऊँचाई पर बसा मसूरी शहर चारों तरफ से बाँज के इतने घने पेड़ों से घिरा था कि अंग्रेजों ने इसे यहाँ की सबसे खूबसूरत खूबी माना था ऐतिहासिक रूप से देखें तो बाँज के ये जंगल पहाड़ी ढलानों को मजबूती से थामे रखते थे और पानी के प्राकृतिक स्रोतों को जिंदा रखने का काम करते थे 6000 फीट की ऊँचाई पार करते ही देवदार के ऊँचे और भव्य पेड़ दिखाई देने लगते थे लंढौर कैंटोनमेंट लाइब्रेरी कैमल बैक रोड और चार्लविले के आसपास देवदार के शुद्ध पैच थे यह वही मजबूत और बेशकीमती लकड़ी थी जिससे विंडमियर सवॉय हैक्मैन और चार्लविले जैसे आलीशान होटलों और बंगलों की छतें दरवाजे और खिड़कियाँ बनाई गईं लेकिन इस विकास की एक भारी कीमत भी चुकानी पड़ी गैजेटियर के अनुसार साल 1860 से 1880 के बीच अंधाधुंध कटाई के कारण मसूरी के लगभग 40 प्रतिशत देवदार और बाँज के जंगल साफ हो गए थे हालात बिगड़ते देख ब्रिटिश सरकार ने 1894 में पूरे मसूरी रिज को आरक्षित वन घोषित कर दिया और पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगा दी इसके बावजूद जंगलों से लकड़ी की चोरी नहीं रुकी होटलों के नौकर कुली और स्थानीय निवासी ईंधन के लिए रात के अंधेरे में सूखी टहनियाँ और कभी-कभी हरे पेड़ तक काट लाते थे जिसके कारण 1905 से 1910 के बीच हर साल करीब 150 से 200 चोरी के मुकदमे दर्ज होते थे इस वन संपदा में बुराँश यानी रोडोडेंड्रोन का एक खास स्थान था मार्च और अप्रैल के महीनों में जब बुराँश के फूल खिलते तो पूरी पहाड़ी चटख लाल रंग में रंग जाती थी अंग्रेज अफसरों को इसका स्वाद इतना भाया कि उन्होंने अपने बंगलों के बगीचों में विशेष रूप से बुराँश के पौधे लगवाए इसके अलावा ऊपरी हिस्सों जैसे जॉर्ज एवरेस्ट और हैथी पाँव की तरफ कैल यानी नीले पाइन के पेड़ मिलते थे दिलचस्प बात यह है कि जिस चीड़ के पेड़ आज हमें मसूरी में हर तरफ दिखाई देते हैं वे उस समय नगण्य थे चीड़ का असली फैलाव 1930 के दशक के बाद तब शुरू हुआ जब बार-बार लगने वाली आग और अत्यधिक कटाई के कारण बाँज के जंगल खत्म होने लगे और उनकी जगह चीड़ ने ले ली क्योंकि चीड़ विपरीत हालातों में भी तेजी से पनप जाता है 1910 के रिकॉर्ड बताते हैं कि तब मसूरी के जंगलों को योजनाबद्ध तरीके से बांटा गया था इनमें लगभग 6500 एकड़ में फैला मसूरी रिजर्व्ड फॉरेस्ट लंढौर कैंटोनमेंट फॉरेस्ट कैम्पटी फॉल बार्लोगंज और बेनोग जॉर्ज एवरेस्ट ब्लॉक शामिल थे जिनकी सीमाओं को पक्के पत्थरों और खाइयों से तय किया गया था वहीं निचली तलहटी के कोल्टी किमड़ी जैसे संरक्षित वनों में ग्रामीणों को मवेशी चराने और सूखी लकड़ी इकट्ठा करने की थोड़ी छूट थी लेकिन मुख्य आरक्षित वनों में इंसानी दखल पूरी तरह बंद था एक सदी पहले की मसूरी आज की तुलना में कहीं अधिक घनी ठंडी और जैव विविधता से भरपूर थी उस दौर में हर मौसम पहाड़ी का एक नया रूप लेकर आता था गर्मियों में गहरी हरियाली बसंत में बुराँश की लाली और सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर इतिहास का यह पन्ना हमें याद दिलाता है कि जिसे आज हम अनजाने में चीड़ या पाइन की नगरी समझ बैठते हैं वह असल में कभी बाँज और देवदार के घने साए में बसी पहाड़ों की रानी हुआ करती थी जब मैं अपनी पुरानी स्मृतियों को खंगालता हूँ और नब्बे के दशक के उन दिनों को याद करता हूँ जब हम सब मिलकर मसूरी की इस पुरानी सड़क पर पैदल यात्रा किया करते थे तो मन एक अजीब से रोमांच से भर जाता है उस दौर में राजपुर से ऊपर चढ़ते हुए रास्ते में जो सुकून और ठंडी हवा का झोंका मिलता था वह आज के समय में कहीं खो गया है इतने सालों के लंबे अंतराल के बाद जब आज मैं दोबारा उसी रास्ते पर पैदल यात्रा कर रहा हूँ तो पग-पग पर भारी विषमताएं और बदलाव साफ नजर आते हैं नब्बे के दशक में जिन रास्तों पर सिर्फ चिड़ियों की चहचहाहट और पत्तों की सरसराहट सुनाई देती थी वहाँ अब गाड़ियों का शोर और कंक्रीट के ढांचे खड़े हो चुके हैं उस समय जो बाँज और देवदार के पेड़ पूरी घाटी को एक ठंडी छतरी की तरह ढक कर रखते थे आज उनकी जगह चीड़ के सूखे पेड़ों और कंक्रीट के होटलों ने ले ली है पहले पहाड़ों की ढलानें पानी से लबालब भरे प्राकृतिक स्रोतों और झरणों से जीवंत रहती थीं लेकिन आज वे सब सूख चुके हैं और उनकी जगह प्लास्टिक के कचरे ने ले ली है मौसम का वह मिजाज जो नब्बे के दशक में जरा सी चढ़ाई चढ़ते ही एकदम सर्द हो जाता था अब वैसा महसूस नहीं होता बल्कि नीचे की गर्मी अब ऊपर पहाड़ों तक खिसक आई है एक जमाने में पैदल चलने का जो आनंद प्रकृति के साथ सीधे संवाद जैसा होता था वह आज भीड़ और आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं गुम हो चुका है।

