मत: धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र से मोदी सरकार को क्या मिला,विपक्ष से क्या छिना?
मत: धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र लेकर मोदी सरकार ने क्या पाया, विपक्ष से तो बहुत कुछ छीन लिया
धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के हाथों से वह अवसर छीन लिया है, जिससे वे राजनीतिक जमीन मजबूत कर सकते थे.
डॉक्टर सूर्यप्रकाश
नई दिल्ली: 25 जुलाई 2026 । जंतर-मंतर पर 36 दिन का आंदोलन. संसद से प्रधानमंत्री आवास तक प्रदर्शन. मीडिया में नैरेटिव की जंग तो पक्ष और विपक्ष में जुबानी संघर्ष. विषय सिर्फ एक था कि नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र हो. इस सबका अंत आज धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के साथ ही हो गया है. अनुमान बहुत से थे, लेकिन इसकी चर्चा कम ही थी कि धर्मेंद्र प्रधान का इतनी आसानी से त्यागपत्र होगा. कारण यह कि लगातार खबरें आ रही थीं कि सरकार धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र लेने पर विचार तक नहीं कर रही है. इसके बाद भी यदि प्रधान का त्यागपत्र हुआ है तो यह महत्वपूर्ण है और प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ही अंदाज में एक बार फिर सभी अनुमानों से उलट चौंकाने की कोशिश की है.
इस कोशिश के साथ ही उन्होंने विपक्ष के हाथों से एक अवसर भी छीन लिया है. वह अवसर जो समूचे विपक्ष को एकजुट कर रहा था. बीते 12 सालों से चुनाव दर चुनाव हार झेलने वाली कांग्रेस और उसके चेहरे राहुल गांधी को मजबूत कर सकता था. यह आंदोलन पटना, लखनऊ, प्रयागराज, बेंगलुरु, कोलकाता समेत देश के तमाम हिस्सों में विस्तार ले रहा था. ऐसे में भाजपा के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विपक्षी दल इस सेंटिमेंट का फायदा उठाकर अपनी जमीन मजबूत कर सकते थे. धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र लेकर भाजपा ने यह अवसर विपक्ष से छीन लिया है. 20 जुलाई को आंदोलन के चरम का दिन था. उस दिन जिस तरह राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दे दिया था, उससे वह चर्चा में आ गए थे. पुलिस से खींचतान वाली उनकी तस्वीरें वायरल थीं और बीते एक दशक से ज्यादा समय में पहला ऐसा अवसर था, जब वह सड़क पर नेता बन रहे थे.
क्या आंदोलन बन रहा था विपक्षी दलों के लिए खाद-पानी?
ऐसा मौका उन्हें चेहरा बनाने को काफी था. ऐसे में आंदोलन के खाद-पानी को ही सरकार ने समाप्त करने की कोशिश की है, जो राहुल गांधी, अखिलेश यादव विपक्ष के कई नेताओं की राजनीति को पोषण दे सकता था. आज फिर से सीजेपी के लोगों से सरकार बात करने वाली थी. आकलन हो रहा था कि क्या विपक्ष इस बहाने मजबूत हो रहा है. सोमवार से फिर मॉनसून सेशन हो रहा है और सरकार नहीं चाहती कि फिर से यह विषय तेज हो. ऐसे में सोमवार से पहले ही त्यागपत्र ले लिया गया. यूं भी विपक्षी दल अपने स्तर पर इस विषय को लेकर इतना बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा कर पाए थे.
कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस बहाने मजबूत कर सकते थे जमीन
सरकार को सुविधा यह है कि कॉकरोच पार्टी के बैनर आंदोलन करने वालों का राजनीतिक संगठन नहीं है और विपक्षी दलों ने अपने बूते यह आंदोलन खड़ा नहीं किया था. लेकिन छात्र आंदोलन की आड़ में कांग्रेस समेत कई दलों में नई जान आ सकती थी. उसी मौके को सरकार ने धीरे से खिसकाने की कोशिश की है. किसान आंदोलन में भी एक साल बीतने के बाद एक चरम बिंदु तक पहुंचे आंदोलन को प्रधानमंत्री मोदी ने फैसला वापस लेकर अचानक ही खत्म कराया था. प्रधानमंत्री मोदी ने फिर उसी शैली में विपक्ष से लेकर आंदोलनकारियों तक सबको चौंकाया है. अब इस आंदोलन के बाद जमीनी हालात कितने बदले, यह जानने को उत्तर प्रदेश , पंजाब समेत 5 राज्यों के चुनाव तक प्रतीक्षा करनी होगी.
(डिस्क्लेमर- इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे हमारा सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है)
धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र से कुछ नहीं बदलेगा: जस्टिस मार्कंडेय काटजू
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मार्कंडेय काटजू ने आंदोलन और पेपर लीक विषय पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिस पर अब नई चर्चा शुरू हो गई है.
नीट पेपर लीक को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन लगातार चर्चा में रहा. इस आंदोलन में CJP की भूमिका प्रमुख रही और प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में से एक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र था. अब धर्मेंद्र प्रधान के प्रधानमंत्री को त्यागपत्र सौंपे जाने के बाद आंदोलन और उसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. इसी क्रम में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी.
जस्टिस काटजू ने अपने पोस्ट में लिखा,
“धर्मेंद्र प्रधान ने बेशक इस्तीफा दे दिया है, और जंतर-मंतर पर ये जोकर जश्न मना रहे हैं. लेकिन क्या इससे कुछ बदलेगा? मेरी राय में कुछ नहीं बदलेगा. पेपर लीक भ्रष्टाचार की वजह से होते हैं, और भारत में हर लेवल पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है, सिर्फ पेपर लीक में ही नहीं. 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को बहुत सपोर्ट मिला, लेकिन आखिरकार वह खत्म हो गया, और कुछ हासिल नहीं हुआ (सिवाय अरविंद केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने के, जो खुद भ्रष्ट निकले). इसलिए पेपर लीक होते रहेंगे, और इसके खिलाफ बने कानून पुलिस को पैसे ऐंठने का एक और मौका देंगे. जहां तक कॉकरोच की बात है, ये जोकर, बेवकूफ और बेवकूफ जंतर-मंतर पर जमा हुए हैं, वे अब अपनी पिकनिक, मौज-मस्ती और मौज-मस्ती के बाद घर जा सकते हैं. जैसा कि उर्दू कवि आतिश ने कहा है: ‘बस हो चुकी नमाज़, मुसल्ला उठाइए’ “

कौन हैं जस्टिस मार्कंडेय काटजू?
मार्कंडेय काटजू भारत के पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज हैं. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई के बाद 1991 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज बने. फिर मद्रास हाई कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे. वर्ष 2006 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. सेवानिवृत्ति के बाद वे 2011 से 2014 तक भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष भी रहे.

