350 वर्ष बाद मिले दुबे के वंशज,नौशाद निकले शैलेन्द्र शुक्ला के फुफेरे चाचा, विवेक मिश्रा के मामा

Brahmin Family Scattered Aurangzeb’s Time Dubey Surname Muslim Wedding Card Reunites
औरंगजेब के समय बिखर गया था यूपी का ब्राह्मण परिवार, अब मुस्लिम शादी के कार्ड में ‘दुबे’ सरनेम से खुला राज
यूपी के आजमगढ़ का एक ब्राह्मण परिवार करीब 350 साल पहले औरंगजेब के समय बिखर गया था। अब नौशाद अहमद की बेटी की शादी के निमंत्रण कार्ड में ‘दुबे’ सरनेम के इस्तेमाल के चलते पूरा परिवार वापस से इकट्ठा हो गया।
जौनपुर 04 अक्टूबर 2026 : जौनपुर के देहरी गांव में शनिवार को एक ऐसे परिवार के वंशज इकट्ठा हुए, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे मुगल बादशाह के दौर में अलग हो गए थे। ‘ब्राह्मण कुल मिलन’  कार्यक्रम में नौशाद अहमद दुबे के घर पर काशी और जौनपुर के ब्राह्मण एक साथ जमा हुए।
Brahmin family reunites after 350 years
350 साल बाद वापस इकट्ठा हुआ ब्राह्मण परिवार (फोटो-टीओआई)

परिवार की जानकारी के अनुसार, नौशाद के पूर्वज लाल बहादुर दुबे आठ पीढ़ी पहले आजमगढ़ के रानी की सराय में रहते थे। कहा जाता है कि औरंगजेब के शासनकाल में उन्होंने इस्लाम अपना लिया था और बाद में जौनपुर के देहरी गांव में बस गए थे। उन्होंने वहां एक पुराने जमींदार से जमीन खरीदकर जमींदारी शुरू की थी।

आजमगढ़ से दूसरी जगहों पर बस गए थे रिश्तेदार
बताया जाता है कि लाल बहादुर के परिवार के बाकी सदस्य और उनके रिश्तेदार आजमगढ़ के रानी की सराय से निकलकर जौनपुर और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के दूसरे इलाकों में बस गए थे। पीढ़ियां जैसे-जैसे गुजरती गईं इन परिवारों का आपस में संपर्क घटता चला गया। अब उनके वंशजों के लिए शनिवार का कार्यक्रम सिर्फ एक मिलन समारोह नहीं था। यह पीढ़ियों के सफर जैसा था, जिसमें पुरानी यादें, पूर्वजों की कहानियां और बरसों से टूटे पारिवारिक रिश्तों को फिर से खोजने का अनुभव था।

शादी के निमंत्रण कार्ड से खुला राज
इन सभी लोगों का पारिवारिक रिश्ता धुंधला पड़ गया था। लेकिन जब नौशाद अहमद ने अपनी बेटी की शादी के निमंत्रण कार्ड पर ‘दुबे’ उपनाम लिखा , तो कई लोगों का ध्यान इस तरफ गया। कार्ड में लाल बहादुर का जिक्र होने पर परिवार के कई बिखरे हुए रिश्तेदारों ने अपनी जड़ों का पता लगाने की कोशिश की। इन कोशिशों से नौशाद के परिवार और कई हिंदू ब्राह्मण परिवारों के बीच पहले से अनजान रिश्तों का पता चला। उदाहरण के तौर पर जौनपुर के शैलेंद्र शुक्ला को पता चला कि नौशाद उनकी बुआ के जरिए उनके रिश्तेदार हैं। वहीं, वाराणसी के विवेक मिश्रा के लिए नौशाद आखिरकार उनके मामा निकले।

चार साल  चली पड़ताल
विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष और इतिहासकार राजीव श्रीगुरुजी ने इस पुनर्मिलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी रिसर्च टीम ने पूरे इलाके में नौशाद के पूर्वजों और रिश्तेदारों की पहचान करने में चार साल लगाए। इस पुनर्मिलन के हिस्से के तौर पर नौशाद अहमद ने पारंपरिक ‘भोज-भात’ दावत का आयोजन किया, जो पूर्वांचल में रिश्तेदारों को एक साथ लाने से जुड़ी एक परंपरा है। रिश्तेदार एक कतार में बैठे और नौशाद के परिवार ने उन्हें खाना परोसा। इस आयोजन को हिंदू और मुस्लिम पहचान के आधार पर बंटवारे के खिलाफ एकता का संदेश बताया गया। दावत के बाद सभी ने एक-दूसरे को गले लगाया और दोबारा कभी अलग न होने का संकल्प लिया।

‘देश का सामाजिक ताना-बाना होता है मजबूत’
नौशाद ने इस कार्यक्रम में सीनियर आरएसएस प्रचारक और केंद्रीय पदाधिकारी विजय शर्मा को आमंत्रित किया था। उन्होंने नौशाद के अपने गोत्र (वंश) के नाम पर बनाई गई गौशाला का उद्घाटन किया और लाल बहादुर दुबे मार्ग का दौरा किया, जो उनके पूर्वज के नाम पर बनी गांव की एक सड़क है। विशाल भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीगुरुजी ने अपनी जड़ों से फिर से जुड़ने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इससे लोगों को बिछड़े हुए रिश्तेदारों को फिर से खोजने में मदद मिलती है और देश का सामाजिक ताना-बाना मजबूत होता है। उन्होंने घोषणा की कि उनका संगठन ऐसे परिवारों को खोजने और उन्हें फिर से मिलाने की कोशिशें जारी रखेगा।

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