दक्षिण पक्ष कमज़ोर क्यों पड़ा?
पांच बातें सीधी और साफ कहना चाहूंगा।
2014 की विजय में मोदी जी का प्रभाव तो था ही, लेकिन एक महत्वपूर्ण फैक्टर था, सोशल मीडिया में राइट विंग की बढ़त या उनका एकछत्र राज। लेकिन 12 साल बाद स्थिति उल्टी हो गई है, साफ तौर पर दिख रहा है कि राइट विंग की पकड़ कमजोर हो चुकी है।
कारण क्या है?
पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण, जिन लोगों ने सोशल मीडिया पर 2014 में पकड़ मजबूत करने में सबसे ज्यादा काम किया था उनको शायद ही रिवॉर्ड मिला। ज्यादातर जीत के बाद साइड लाइन कर दिए गए। आज स्थिति यह है कि वे विरोधी हो गए हैं और नए समर्थकों के निशाने पर रहते हैं। लेकिन उनमें आज भी क्षमता है और वे लोगों को प्रभावित भी करते है, पर उल्टे तौर पर।
दूसरा, राइट विंग के पास इंटेलेक्चुअल्स की गंभीर कमी है। बौद्धिक व्यक्ति के लिए उनके एनवायरमेंट में सरवाइव करना मुश्किल होता है। लेकिन नई पीढ़ी के सामने अपनी बात तर्क के साथ रखने की क्षमता बहुत जरूरी है, वे रिलिजन और हिस्ट्री से ज्यादा लॉजिक से कनविंस होते हैं। आपको आज भी लेफ्ट में ज्यादा इंटलेक्चुअल्स मिलेंगे, क्योंकि वहां उनकी कद्र होती है, सुना जाता है।
तीसरी बात है, कि पहले यहां लोग राइट विंग के पक्ष में मोर्चा लेते थे तो उसे अपनी लड़ाई समझते थे। लेकिन बीते दशक में जो कोर समर्थन वर्ग है उसकी पर्याप्त उपेक्षा हुई है। अभी भी राष्ट्र के प्रति भावना के चलते वह समर्थन करता है लेकिन उसमें पहले जैसी धार नहीं है। नए के चक्कर में पुराने को नहीं बिसराना चाहिए। आप लाख दोस्त बना लें, लेकिन भाई-भाई होता है।
चौथी है, बौद्धिक नवोन्मेष का अभाव, लगातार वही कंटेंट, वही घिसी पिटी बातें। हर बात के लिए गांधी नेहरू को जिम्मेदार ठहराना। लगातार डर दिखाना थका देता है। बातें सही हो सकती हैं, लेकिन हजार बार कहने पर उकताहट होना स्वाभाविक है, धीरे धीरे लोग दूरी भी बना लेते हैं।
पांचवी और सबसे खतरनाक चीज है, आईटी सेल की ट्रोलिंग, जिसने मित्र से ज्यादा शत्रु खड़े किए हैं। थोड़ी भी उदार बात करने वाले की बेइज्जती करना, स्ट्रेटजी बनाकर हमले करना, असहमति पर गालियां और कड़वी बातें करना। इस तरह आपने लोगों को चुप तो कर दिया लेकिन उनके अंदर रोष बना रहा जो मौका मिलने पर सामने आया। अब इसमें वास्तविक आईटी सेल कितना कर रही है, कितना छद्म लोग आईटी सेल की आड़ लेकर छवि खराब कर रहे हैं वह खोज का विषय है।
मैं बहुत राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन इंसानों को समझता हूं, भावनाएं और रुझान पहचान लेता हूं। इसीलिए कहना चाहूंगा कि प्लेटफार्म बदलने से बात नहीं बनेगी, कंटेंट और तरीका बदलना पड़ेगा। अपने लोगों की कदर करनी पड़ेगी, बौद्धिक वर्ग को उसकी जगह देनी पड़ेगी, शेष आप सब समझदार है 🙏
_अभिषेक चौरे
(दूसरे बिंदु से सीधी असहमति है)
