देहरादून का नहर तंत्र

देहरादून घाटी में सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में गढ़वाल राज्य की राजमाता महारानी कर्णावती और उनके सहयोगी कुंवर अजब सिंह द्वारा रखी गई थी। उन्होंने पहाड़ों से निकलने वाली रिस्पना नदी के पानी को व्यवस्थित तरीके से मोड़ने के लिए इस ऐतिहासिक नहर का निर्माण करवाया था, ताकि तत्कालीन डेहरा शहर के रिहायशी इलाकों को पीने का पानी और कृषि भूमि को सिंचाई मिल सके। महारानी कर्णावती द्वारा निर्मित इसी अकेली मुख्य नहर की देखरेख आगे चलकर कई दशकों तक गुरु राम राय दरबार साहब के महंतों द्वारा की गई। इसके बहुत बाद, ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1841 से 1844 के बीच प्रसिद्ध ब्रिटिश सिविल इंजीनियर कैप्टन प्रोबी टी. कॉटले ने इस राजपुर कैनाल को पुनर्जीवित किया, इसकी वैज्ञानिक मरम्मत की और इसे पूरी तरह पक्का बनाकर नया रूप दिया। कैप्टन कॉटले ने ही इस नहर के पानी को दून के मुख्य केंद्र तक पहुंचाने के लिए उप-शाखाओं का एक सुनियोजित जाल तैयार किया था, जो पानी को डिस्पेंसरी रोड, पलटन बाजार और दरबार साहब के पवित्र तालाबों तक ले जाता था। यही जलधारा आगे चलकर वर्ष 1948 से 1953 के बीच निर्मित हुए घंटाघर के विशिष्ट वास्तुशिल्प और उसके छह-कोणीय अंडाकार घेरे के साथ मुड़कर बहती थी, जिसे पुराने दूनवासी ‘घड़ी के अंडाकार वाली नहर’ के रूप में याद करते हैं।
वर्ष 1839 से 1841 के बीच बनी बीजापुर नहर टोंस नदी से निकलकर गढ़ी कैंट और डाकरा से होते हुए कौलागढ़ से कांवली गाँव की तरफ बहती थी। इसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी दून के इन मैदानी इलाकों में कृषि भूमि और चाय बागानों की सिंचाई करना था।

राजपुर नहर के निर्माण के लगभग दो सौ साल बाद पूर्वी दून के विकास के लिए खालंगा कैनाल की रूपरेखा तैयार की गई थी। ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार, 1845 में कैप्टन कॉटले ने सॉन्ग नदी से एक नई नहर निकालने का प्रस्ताव दिया था, जिससे पहले तत्कालीन ब्रिटिश सुपरिटेंडेंट मिस्टर वैनसिटार्ट ने सॉन्ग नदी से रायपुर गांव तक एक कच्चा चैनल बनाया था। इसी व्यवस्था को सुदृढ़ करते हुए और क्षेत्र के जंगलों को कृषि भूमि में बदलने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार द्वारा खालंगा कैनाल का वास्तविक निर्माण कार्य वर्ष 1855 में शुरू किया गया और यह नहर 1859-60 में पूरी तरह बनकर चालू हुई। शुरुआत में इसका हेडवर्क रायपुर के समीप सॉन्ग नदी के किनारे था, जिसे बाद में 1861 में सहस्रधारा और सॉन्ग नदी के संगम के पास चाँदुवाला नामक स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया और बाद के वर्षों में इसमें बंदल व सहस्रधारा के फीडर चैनल जोड़े गए। यह पूरी कैनाल लगभग 8.4 किलोमीटर तक मुख्य धारा के रूप में बहने के बाद नथूआवाला, मियांवाला और बद्रीपुर जैसी विभिन्न शाखाओं में विभाजित होकर लगभग 101 किलोमीटर का एक विशाल और अद्भुत नेटवर्क बनाती थी।
इन नहरों की सबसे बड़ी उपयोगिता यह थी कि इन्होंने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर काम करते हुए पूरी दून घाटी के भूगोल को हरा-भरा बना दिया था। इसी पानी की बदौलत देहरादून की विश्वप्रसिद्ध टाइप-3 बासमती और रसीली लीची के बाग लहलहाए, स्थानीय स्तर पर गेहूं पीसने वाले पारंपरिक घरातों यानि जल चक्कियों को निरंतर ऊर्जा मिली और शहर के बीचों-बीच से बहती ये खुली जलधाराएं दून के वातावरण को मैदानी इलाकों की तुलना में हमेशा तीन से चार डिग्री ठंडा और सुखद बनाए रखती थीं। 1990 के दशक तक यह जल संस्कृति इतनी जीवंत थी कि राजपुर रोड, कनाल रोड और डालनवाला जैसे रिहायशी इलाकों में घरों के आगे से साफ पानी बहता था। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में परिस्थितियां तेजी से बदलीं। समय के साथ जैसे-जैसे शहर की जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई, वैसे-वैसे शहरीकरण का दायरा बढ़ा और जमीन की मांग के कारण सड़कों के चौड़ीकरण की आवश्यकता महसूस होने लगी। इसी दौरान नागरिकों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता की कमी और नहरों में सीधे कूड़ा-कचरा व प्लास्टिक फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ने के कारण ये ऐतिहासिक जलधाराएं तेजी से प्रदूषित होने लगीं। इस बढ़ते प्रदूषण, मलबे और सुरक्षा कारणों से प्रशासन द्वारा इन खुली नहरों को कंक्रीट के स्लैब से ढंकने या बड़े-बड़े भूमिगत पाइपों में समेटने का काम शुरू हुआ। इस क्रमिक बदलाव का सीधा असर यह हुआ कि बासमती के खेत और लीची के बाग आवासीय कॉलोनियों में तब्दील हो गए, शहर का भूजल स्तर तेजी से नीचे चला गया और दून की पारंपरिक गार्डन सिटी वाली पहचान कंक्रीट के जंगल में बदल गई। आज मालदेवता क्षेत्र में खुली बहती खालंगा कैनाल और राजपुर व कनाल रोड क्षेत्र के भूमिगत अवशेष इसी महान इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक भूगोल के आखिरी गवाह के रूप में बचे हैं, जिन्हें भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित रखना बेहद जरूरी है।

पुराना मानचित्र नीचे दे रहा हूं इसमें गहरी नीली जो लकीरें हैं वही देहरादून की नहरे है देखिए जूम करके कही आपका मकान भी इसी कैनाल के आसपास या उसके ऊपर तो नहीं।

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