फिर जला पेरिस:बहु-संस्कृतिवाद में मार्क्स को समझना आवश्यक क्यों?
बहु-संस्कृतिवाद में मार्क्स को समझना क्यों आवश्यक है?
पेरिस फिर जल रहा है। एक फुटबॉल मैच खत्म होता है। लाखों लोग अपनी टीम की जीत का जश्न मनाने सड़कों पर निकलते हैं। लेकिन कुछ ही घंटों बाद वही सड़कें पुलिस की गाड़ियों, जलती हुई कारों, टूटे हुए शीशों और आँसू गैस से भर जाती हैं। PSG की जीत के बाद फ्रांस में सैकड़ों गिरफ्तारियाँ हुईं, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचा।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि फुटबॉल के बाद दंगे क्यों हुए। सवाल यह है कि आखिर ऐसा बार-बार फ्रांस में ही क्यों होता है? क्यों हर कुछ महीनों में कोई न कोई बहाना; फुटबॉल, पुलिस कार्रवाई, नस्लीय तनाव, आप्रवासन विवाद या राजनीतिक प्रदर्शन, फ्रांस की सड़कों को युद्धक्षेत्र में बदल देता है?
इसका उत्तर केवल कानून-व्यवस्था में नहीं छिपा है। यह उत्तर आधुनिक यूरोप की उस विचारधारा में छिपा है जिसने समाज को ‘राष्ट्र’ से ज्यादा ‘समुदायों’ का जोड़ मान लिया।
जब राष्ट्र की जगह पहचानें ले लेती हैं तो क्या परिणाम होते हैं? पिछले कई दशकों से यूरोप ने मल्टीकल्चरलिज़्म को एक नैतिक आदर्श की तरह पेश किया।
सिद्धांत सुंदर था। दुनिया भर से लोग आएँगे। अपनी-अपनी पहचान बचाकर रखेंगे। और फिर सब मिलकर एक आधुनिक, उदार और लोकतांत्रिक समाज बनाएँगे।
लेकिन व्यवहार में हुआ कुछ और। एक साझा राष्ट्रीय पहचान बनाने के बजाय अलग-अलग सांस्कृतिक द्वीप बन गए। कुछ इलाकों में राज्य की मौजूदगी केवल पुलिस की गाड़ियों तक सीमित रह गई।
जब लोगों की प्राथमिक निष्ठा राष्ट्र के बजाय जातीय, धार्मिक, नस्लीय या स्थानीय समूहों की ओर चली जाती है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे नागरिक समाज से भीड़ समाज में बदलने लगता है। और भीड़ कभी स्थायी राजनीतिक व्यवस्था नहीं बना सकती।
मार्क्स सही थे, लेकिन उनके उत्तर अधूरे थे, और कार्ल मार्क्स ने एक महत्वपूर्ण बात समझी थी। कि समाज में असमानता वास्तविक है। सत्ता, धन और संसाधनों का केंद्रीकरण भी वास्तविक है।
लेकिन मार्क्स के बाद जो राजनीतिक प्रयोग हुए, उन्होंने एक दूसरी गलती कर दी। उन्होंने यह मान लिया कि राज्य को तोड़कर या सड़क की शक्ति के भरोसे नया समाज बनाया जा सकता है।
इतिहास ने बार-बार साबित किया कि ऐसा नहीं होता। रूस में क्रांति आई, लेकिन स्टालिनवाद पैदा हुआ। चीन में क्रांति आई, लेकिन सांस्कृतिक क्रांति ने लाखों लोगों को निगल लिया। कंबोडिया में क्रांति आई, लेकिन पोल पॉट ने नरसंहार कर दिया।
यानी समस्या केवल सत्ता में नहीं होती। समस्या मनुष्य के भीतर भी होती है। और उसकी थियोलॉजी में इसके उत्तर निहित होते हैं.. सड़क की ताकत और लोकतंत्र की ताकत में अंतर है, आज सोशल मीडिया ने एक खतरनाक भ्रम पैदा कर दिया है।
लोग समझने लगे हैं कि सड़क पर उतर जाना ही लोकतंत्र है। नहीं। लोकतंत्र का अर्थ भीड़ नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ संस्थाएँ हैं। न्यायपालिका है। चुनाव हैं। स्थानीय प्रशासन है। जवाबदेही है।
अगर हर समूह अपनी-अपनी ‘स्ट्रीट पावर’ के आधार पर फैसले लेने लगे तो वह लोकतंत्र नहीं, बल्कि आधुनिक जनजातीय व्यवस्था बन जाएगी।
फ्रांस की सड़कों पर जो दिखाई देता है, वह इसी संकट की झलक है.. कोविड ने क्या सिखाया था? कोविड के समय दुनिया ने एक अजीब सत्य देखा।
महंगे ब्रांड, लक्ज़री उत्पाद और उपभोक्तावाद अचानक महत्वहीन हो गए। रोटी, दवा, स्थानीय समुदाय, परिवार और आवश्यक सेवाएँ सबसे महत्वपूर्ण बन गईं।
इसने हमें याद दिलाया कि समाज केवल बाज़ार से नहीं चलता। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि समाज केवल भीड़ से चल सकता है। राज्य और समाज दोनों की आवश्यकता होती है।
एक के बिना दूसरा अधूरा है। फ्रांस का असली संकट आर्थिक नहीं, सभ्यतागत है.. यूरोप की सबसे बड़ी समस्या बेरोज़गारी नहीं है। उसकी सबसे बड़ी समस्या पहचान का संकट है।
जब राष्ट्र अपने नागरिकों को यह बताना बंद कर देता है कि वे कौन हैं, तब लोग छोटी-छोटी पहचानों में शरण लेने लगते हैं। फिर फुटबॉल क्लब केवल खेल क्लब नहीं रहते। वे पहचान के झंडे बन जाते हैं। फिर मोहल्ले केवल मोहल्ले नहीं रहते। वे सांस्कृतिक किले बन जाते हैं। और फिर एक मैच की जीत भी दंगे में बदल सकती है।
लोकतांत्रिक समाजवाद बनाम अराजकता की बहस को ही देख लें तो समाधान न तो तानाशाही है। न ही एनार्की, स्ट्रीट पावर और अराजकता। समाधान लोकतांत्रिक समाजवाद के उस विचार में छिपा है जहाँ राज्य जनता के प्रति जवाबदेह हो, आर्थिक अवसर अधिक न्यायपूर्ण हों, लेकिन कानून और संस्थाओं की सर्वोच्चता भी बनी रहे।
क्योंकि जब राज्य कमजोर पड़ता है, तब सड़क मजबूत होती है। और जब सड़क कानून से ऊपर उठ जाती है, तब सभ्यता पीछे हटने लगती है। फ्रांस आज उसी चौराहे पर खड़ा दिखाई देता है। जहाँ एक तरफ स्वतंत्रता का आदर्श है। और दूसरी तरफ वही स्वतंत्रता, जब साझा राष्ट्रीय चेतना से कट जाती है, तो भीड़तंत्र में बदलने लगती है।
शायद इसी कारण पेरिस की जलती हुई सड़कें केवल फ्रांस की कहानी नहीं हैं। वे पूरे पश्चिमी विश्व के भविष्य की एक चेतावनी भी हैं।
