क्या बताते हैं कॉकरोच प्रदर्शन में पत्रकारों पर हमले ?अराजकता?
CJP प्रोटेस्ट कवर करते हुए महिला रिपोर्टर के रूप में मेरे साथ क्या हुआ
लोकतंत्र की जान है लोगों का प्रोटेस्ट. लेकिन महिलाओं की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है. जंतर-मंतर पर मेरे अनुभव से साफ है कि विषय भले ही सबके फोकस का हकदार हो, लेकिन बेहतर भीड़ प्रबंधन, ट्रेंड वॉलंटियर और मजबूत सुरक्षा प्रबंध भी उतने ही जरूरी हैं.
विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की ताकत है,लेकिन महिलाओं की सुरक्षा भी लोकतंत्र का उतना ही मौलिक आधार है
CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी के ‘चलो संसद मार्च’ कवर करने के अगले दिन मेरे मन में नारे, भाषण या राजनीतिक बहस नहीं थे. एक सवाल बार-बार मुझे परेशान कर रहा था… बड़े-बड़े पब्लिक प्रोटेस्ट में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं?
आगे जो लिख रही हूं वह किसी राजनीतिक पार्टी, संगठन या आंदोलन के समर्थन या विरोध में नहीं है. न ही मैं उन छात्रों के इरादों पर सवाल उठा रही हूं जो अपनी आवाज उठाने आए थे. यह सिर्फ 21 जुलाई को जो मैंने देखा, उस में मेरा निजी अनुभव और राय है.
शांतिपूर्ण शुरुआत
जब मैं नोएडा के अपने ऑफिस से जंतर-मंतर पहुंची तो दोपहर में तेज धूप थी.गर्मी के बावजूद सैकड़ों लोग मार्च को जमा हो चुके थे.जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया,भीड़ बढ़ती गई. फिर बारिश आई,लेकिन लोग बिखरे नहीं,बल्कि टिके रहे.
छात्र प्लेकार्ड लेकर शैक्षिक विषयों पर चर्चा कर रहे थे, वॉलंटियर लोगों को गाइड कर रहे थे. सबके चेहरे पर एक उद्देश्य साफ दिख रहा था. एक बात जो मैं कभी नहीं भूलूंगी, वो था राजस्थान से अपनी आंटी के साथ आया 13 साल का एक लड़का, जो सिर्फ इस मीटिंग में शामिल होने आया था.
शाम तक जंतर-मंतर पूरी तरह भर चुका था. भीड़ जितनी बड़ी होती गई, ये समझना उतना ही मुश्किल होता गया कि असल में कौन प्रदर्शन का हिस्सा है, कौन नही. क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता.
भीड़ लगातार बढ़ती गई
जैसे-जैसे घंटे गुजरते गए, और ज्यादा लोग जुड़ते गए. जहां मैं खड़ी थी, वहां से छात्रों और बाकी लोगों में फर्क करना मुश्किल हो गया. अलग-अलग आयु वर्ग, अलग-अलग ग्रुप अलग-अलग नारे लगा रहे थे. कई चेहरे ऐसे थे जिनके बारे में कुछ भी राय बनाना मुश्किल था.
भीड़ जितनी बढ़ी, ये समझना उतना ही कठिन होता गया कि मूल रूप से मार्च के लिए कौन आया था और बाद में कौन शामिल हुआ. इसी से भीड़ प्रबंधन इतना महत्वपूर्ण हो जाता है.
वो पल जिसने मेरा दिन बदल दिया
भीड़ में कहीं, मुझे छेड़ा गया. वो मुझ पर हमले जैसा था. अनुचित तरीके से छुआ जाना मेरे लिए बेहद कटु अनुभव था. मैं नहीं बता सकती कि वो कौन था, न ही ये कि वो छात्र था,समर्थक था या बस भीड़ में घुस आया कोई गुंडा . दुखद ये है कि वह कटु अनुभव पूरे दिन मेरे साथ किसी भी नारे से ज्यादा लंबे समय तक रहा.
मैं अकेली नहीं थी. उस दिन जंतर-मंतर से कई महिलाएं ऐसे भयानक अनुभव लेकर लौटीं. मेरी एक सहयोगी, जो प्रोटेस्ट कवर कर रही थी, का भी अपना बुरा अनुभव था.
उसने मुझे बताया कि जब एक आदमी ने भीड़ में अनुचित तरीके से छुआ, तो उसने हिम्मत दिखा तभी उसे ललकारा. थोड़ी देर को ध्यान जरूर गया, लेकिन ये घटना वही चिंता दोहराती है जिसके साथ मैं वहां से आई थी. भारी भीड़ में महिलाओं को अक्सर खुद का बचाव खुद करना पड़ता है.
कोई भी महिला पब्लिक प्रोटेस्ट में छेड़छाड़ का शिकार नहीं होनी चाहिए, चाहे वो उसमें भाग ले रही हो, वॉलंटियर कर रही हो, रिपोर्टिंग कर रही हो या बस गुजर रही हो.
मैंने जिन छात्रों से बात की, वे सम्मानजनक और शिक्षा से जुड़े विषयों पर फोकस्ड थे. कई वाकई अपने भविष्य के बारे में बात करना चाहते थे. मेरा अनुभव पूरे प्रदर्शन या हर छात्र के खिलाफ नहीं है.
लेकिन जब कोई पब्लिक प्रोटेस्ट इतना बड़ा हो जाता है, तो उसमें ऐसे लोग भी आ जाते हैं जिनका इरादा मूल विषय से बिल्कुल अलग होता है. इसलिए मेरा मानना है कि आयोजकों और अधिकारियों को मिलकर ये सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी सभाएं सबके लिए सुरक्षित रहें.
महिलाओं की सुरक्षा और मॉब मैनेजमेंट
शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन किसी भी सार्वजनिक जमावड़े में सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए. भीड़ बढ़ने पर सही प्रबंधन उतना ही जरूरी है जितना खुद विषय.
महिलाओं को बिना किसी डर के भाग लेना, वॉलंटियर करना या बस मौजूद रहना चाहिए. बेहतर प्लानिंग, ट्रेंड वॉलंटियर, साफ रास्ते और पर्याप्त सुरक्षा से प्रदर्शन सबको सुरक्षित और समावेशी बने रह सकते हैं.
प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग की जांच जरूरी है. साथ ही, छेड़छाड़ और लोगों की सुरक्षा विषय भी नजरअंदाज नहीं होना चाहिए. महिला सुरक्षा की मांग किसी आंदोलन को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और मजबूत बनाती है. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सुरक्षित पब्लिक स्पेस साथ-साथ चलनी चाहिए. वरना महिलायें किसी भी रुप में आने से कतरायेंगीं ।
जंतर-मंतर से मैं सिर्फ प्रदर्शन के नोट्स लेकर नहीं लौटी. मेरी कहानी हर प्रदर्शनकारी या आयोजक को डिफाइन नहीं करती. ये मेरा निजी अनुभव है. लेकिन ये एक सवाल जरूर छोड़ता है कि हम पब्लिक प्रोटेस्ट महिलाओं के लिए और सुरक्षित कैसे बना सकते हैं?
कपड़े फाड़े, मारा-पीटा, महिला रिपोर्टरों से दुर्व्यवहार: CJP के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन में हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को चुन-चुनकर बनाया निशाना, हमले की दर्जनभर घटनाएँ
जयन्ती मिश्रा
सीजेपी प्रदर्शन में पत्रकारों पर हुए हमले
जंतर-मंतर पर पिछले डेढ़ महीने से ‘छात्र हित’ नाम पर धरना दिये ‘कॉकरोचों’ का असली चेहरा 20 जुलाई 2026 के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन में सामने आ गया। इस दौरान उपद्रवियों ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि ग्राउंड जीरों पर सच दिखाने पहुँचे पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना भी बनाया।
‘प्रदर्शनकारियों’ में शायद इस बात का डर था कि जमीन पर मौजूद मीडियाकर्मी उनकी हकीकत देश के सामने ले आएँगे, इसलिए अपनी विचारधारा से अलग सवाल पूछने या तथ्यों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया।
20 और 21 जुलाई से सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो CJP के प्रदर्शन में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए पत्रकारों के साथ हुई बर्बरता को उजागर करते हैं। कहीं रिपोर्टरों को उग्र भीड़ बीच सड़क पर घेरकर धक्के दे रही है, तो कहीं उनके साथ मारपीट की जा रही है।
महिला पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी और खींचतान की तस्वीरें सामने आई हैं। जो भी पत्रकार अपनी ड्यूटी निभाने वहाँ पहुँचा, उसे ‘गोदी मीडिया’ का टैग देकर डराने, रोकने और हाथापाई करने की कोशिश की गई- यहाँ तक कि उनके कपड़े फाड़े गए और चश्मे-कैमरे तक तोड़ दिए गए।
आइए आपको कम से कम ऐसी 10 घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिनसे पता चले कि CJP प्रदर्शन के दौरान कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ कैसे बर्बरता हुई।
ऑपइंडिया के अनुराग मिश्रा पर बार-बार हमले
ऑपइंडिया के निर्भीक पत्रकार अनुराग मिश्रा को इस प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान बार-बार निशाना बनाया गया। 18 जुलाई को जब अनुराग जंतर-मंतर पर सामान्य सवाल पूछ रहे थे, तब भीड़ ने उन्हें घेरकर हाथापाई की। इसके बाद जब 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने उन्हें दोबारा निशाना बनाया और ‘गोदी मीडिया’ का कहकर, उन पर दोबारा हिंसक हमला किया।
Times Now के देव कोटक की शर्ट फाड़ी, चश्मा तोड़कर चेहरे पर मारा
टाइम्स नाऊ के रिपोर्टर देव कोटक पर हुआ हमला इस हिंसक भीड़ की क्रूरता को बयाँ करता है। अभिजीत दीपके का इंटरव्यू लेने जंतर-मंतर पहुँचे देव पर ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारों के बीच अचानक चारों तरफ से लात-घूँसे, मुक्के और बोतलें बरसाई गईं। धक्का देकर उन्हें जमीन पर गिरा दिया गया, उनकी शर्ट फाड़ दी गई और घड़ी व मोबाइल छीन लिया गया। जब देव ने चिल्लाकर कहा कि चश्मे को न छुआ जाए, उन्हें उसके बिना धुंधला दिखता है, तो उपद्रवियों ने उनका चश्मा छीनकर तोड़ दिया और उसी टूटे चश्मे से उनके मुँह पर वार किया।
एबीपी न्यूज के वरुण भसीन और मीडिया गाड़ियों पर पथराव
अनुराग और देव की तरह ही एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन के साथ भी बदसलूकी हुई। रिपोर्टिंग के दौरान प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेरकर नारेबाजी की। वरुण ने अपनी आपबीती में बताया कि आंदोलन में शामिल युवा पूरी तरह हिंसक हो चुके थे। वे न केवल पत्रकारों को डरा रहे थे, बल्कि मीडिया की गाड़ियों पर पथराव कर रहे थे और कैमरे तोड़ने की फिराक में थे। सामने आई वीडियो में भीड़ को उनका पीछा करते हुए, उनपर स्प्रे मारते हुए देखा जा सकता है।
ऑपइंडिया की रितिका चंडोला को निशाना बनाया
महिला पत्रकारों के साथ इस भीड़ का रवैया बेहद शर्मनाक रहा। ऑपइंडिया की महिला पत्रकार रितिका चंडोला ने जब ग्राउंड पर जाकर शिक्षा के नाम पर शुरू हुए इस प्रदर्शन में छिपी गंदी राजनीति और ‘ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ लग रहे नारों पर सहजता से सवाल पूछे, तो जय भीम का नारेबाजी करने वाले आंदोलनकारी बौखला गए। तर्क का जवाब तर्क से देने के बजाय रितिका पर ‘गोदी मीडिया’ का टैग लगाकर उन्हें चुप कराने और डराने का प्रयास किया गया।
बैंक में छिपकर ज्योति मिश्रा ने बचाई जान, शेफाली निगम से भी बदसलूकी
टाइम्स नाऊ की ज्योति मिश्रा जब जनता की बात दिखाने पहुँचीं, तो उग्र भीड़ उनके पीछे पड़ गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने भांप लिया कि अगर ज्योति का सिर दिखा तो भीड़ पत्थर मारकर उनकी जान ले सकती है।ज्योति को अपनी जान बचाने के लिए एक पास के बैंक में शरण लेनी पड़ी। बैंक कर्मी के अनुसार, हमलावरों की संख्या एक हजार से अधिक थी, जिन्होंने बैंक के अंदर घुसकर हमला करने की कोशिश की।
इसी तरह शेफाली निगम को भी प्रदर्शनकारियों द्वारा बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि भीड़ पीछे से आकर शेफाली को घेरती है और फिर पीछे से मारा जाता है।
2 महिला पत्रकारों के साथ खींचतान और छेड़छाड़
सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक और वीडियो में दो महिला पत्रकारों को भीड़ द्वारा घेरकर उनके साथ बदसलूकी हो रही है। दोनों पत्रकार भड़की हुई हैं। वह भीड़ से सवाल करती हैं, लेकिन उग्र भीड़ उन पर शारीरिक रूप से हावी होने लगती है और लोग उन्हें ज़बरदस्ती घसीटने लगते हैं। घटना की वीडियो हर जगह वायरल है।
NDTV पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोका
प्रदर्शन के दौरान भीड़ इस कदर पत्रकारों पर हावी थी कि उन्होंने एनडीटीवी की महिला पत्रकार को भी बख्शा नहीं। लाइव कवरेज के दौरान भीड़ उनके पीछे खड़े होकर ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाती रही और उन्हें बोलने तक नहीं दिया। सोशल मीडिया पर इस हरकत को यह कहकर जायज ठहराया गया कि ‘एनडीटीवी को अडानी ने खरीद लिया है’।
NDTV के रवीश रंजन शुक्ला के साथ भी बदसलूकी
वरिष्ठ पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला को भी इस उग्र भीड़ ने बख्शा नहीं। सोशल मीडिया पर आए वीडियो में दिखा कि रवीश सड़क पर बैठे हुए थे और चारों तरफ से भीड़ उन पर चीखते हुए ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही थी तथा उनसे तेज आवाज में ये पूछा जा रहा था कि इतने दिन से वो लोग प्रोटेस्ट कवर करने क्यों नहीं आ रहे थे।
सोशल मीडिया पर रवीश रंजन की वीडियो देख लोगों ने कहा कि ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उनके हाथ में एनडीटीवी का माइक था, जिसे अडाणी ग्रुप खरीद चुका है।
न्यूज 24 के राजीव रंजन की रिपोर्टिंग में अड़ंगा
न्यूज 24 के जाने-माने रिपोर्टर राजीव रंजन को छात्रों ने घेरकर ‘गोदी मीडिया वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनका मज़ाक उड़ाया। हालाँकि, राजीव पीछे नहीं हटे, उन्होंने अपने कैमरामैन के साथ डटकर खड़े रहकर पूरी घटना और भीड़ की गुंडागर्दी को कैमरे में कैद किया।
गौरतलब हो कि 10+ घटनाएँ केवल चंद मामले हैं जिनकी वीडियोज वायरल हुईं, वरना जैसा पैटर्न इन पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के वक्त दिख रहा है, उससे साफ है कि वहाँ सवाल पूछने वाले हर पत्रकार से भीड़ ने ऐसा ही बर्ताव किया होगा।
खबर है कि बिहार के पटना में भी छात्रों के नाम पर प्रदर्शन करने उतरी हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाया है।
पत्रकारों पर हमले की घटना पर एडिटर्स गिल्ड की चुप्पी
दुखद और शर्मनाक बात यह है कि इन घटनाओं को लेकर वो ‘एडिटर्स गिल्ड’ और वामपंथी धड़ा दिन-रात एकदम मौन है, जो समय-समय पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर ढोल पीटता है, लेकिन इन घटनाओं पर उससे कुछ नहीं बोला जा रहा- शायद इनके लिए पत्रकारों का अर्थ सिर्फ वामपंथी ईकोसिस्टम है। (खबर लिखने तक एडिटर गिल्ड की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।)
आरफा खानुम शेरवानी जैसी तथाकथित पत्रकार इन हमलों की निंदा करने के बजाय पत्रकारों की ही निंदा पर उतर आई हैं और पत्रकारों के साथ हुई मारपीट को जायज ठहरा रही हैं। वहीं, द हिंदू की विजेता सिंह जैसे लोग नफरत का बचाव करते हुए उलटे पत्रकारों पर ही ‘घृणा फैलाने’ का आरोप मढ़ रहे हैं।
वामपंथियों की ये समस्या पुरानी है कि जब उनके अनुकूल बात नहीं होती तो वो ऐसा ही रवैया अपनाते हैं। इस बार सीजेपी प्रदर्शन में यही देखने को मिला। उन पत्रकारों को जमकर एंट्री दी गई जो सीजेपी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले लग रहे थे। वहीं राष्ट्रवादी मुद्दों की बात करने वाले पत्रकार, इन्फ्लुएंसर को भगाने का, धमकाने का खूब काम हुआ। 20-21 जुलाई के बाद सामने आई आंदोलन की तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि यह विरोध प्रदर्शन किसी हक की लड़ाई नहीं, बल्कि वामपंथी नफरत और अराजकता का प्रायोजित खेल है।
Topics:lead story Media कॉकरोच जनता पार्टी पत्रकार पत्रकारिता का समुदाय विशेष मीडिया हमला
जयन्ती मिश्रा

