पूर्व विधायक सुरेश राठौर को चारों मुकदमों में हाको से गिरफ्तारी से बचाव
अंकिता हत्याकांड: उर्मिला सनावर वीडियो में फंसे पूर्व विधायक सुरेश राठौर को हाई कोर्ट से मिली राहत, सभी चारों मुकदमों में गिरफ्तारी पर लगी रोक
देहरादून/नैनीताल 07/ 06 संवाददाता 2026।अंकिता भंडारी हत्याकांड में उर्मिला सनावर के वीडियो के बाद पूर्व विधायक सुरेश राठौर की मुश्किलें बढ़ गई हैं. सुरेश राठौर पर देहरादून और हरिद्वार में चार मुकदमे दर्ज हुई थे. इन सभी मुकदमों में गिरफ्तारी से बचने के लिए सुरेश राठौर ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सुरेश राठौर को राहत देते हुए चारों मुकदमों में गिरफ्तार पर रोक लगा दी है.
भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर के खिलाफ हरिद्वार के बहादराबाद और झबरेड़ा के अलावा देहरादून के नेहरू कॉलोनी और डालनवाला कोतवाली में मुकदमा हुए थे, जिनके खिलाफ सुरेश राठौर ने उत्तराखंड हाईकोर्ट ने याचिका दायर की थी. मंगलवार 6 जनवरी को हुई सुनवाई में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बहादराबाद और डालनवाला थाने में दर्ज मुकदमों में सुरेश राठौर को तात्कालिक राहत दी थी. वहीं आज सात जनवरी को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने सुरेश राठौर के खिलाफ सभी मुकदमों में गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ में हुई.
मामले के अनुसार, भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर व उर्मिला सनावर पर हरिद्वार और देहरादून के अलग-अलग थानों में मुकदमे दर्ज हुए थे. दोनों पर आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर ऑडियो और वीडियो जारी कर भाजपा नेता की छवि खराब की है. बीजेपी नेता की छवि धूमिल करने के मामले में दोनों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और शिकायतकर्ता ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की थी.
इसी को लेकर सुरेश राठौर उत्तराखंड हाईकोर्ट गए थे. उन्होंने हाईकोर्ट से सभी मुकदमों में अपनी गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी और उन्हें निरस्त करने को कहा था. हाईकोर्ट ने सभी मुकदमों में उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. हालांकि मुकदमे निरस्त नहीं हुए.
दरअसल, दिसंबर के आखिर में उर्मिला सनावर ने जो खुद को पूर्व विधायक सुरेश राठौर की पत्नी भी कहती है, उसने एक वीडियो पोस्ट किया था. उस वीडियो में उर्मिला सनावर ने अपनी और सुरेश राठौर के बीच मोबाइल पर हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सुनाई थी. उस ऑडियो रिकॉर्डिंग में अंकिता भंडारी हत्याकांड का जिक्र हुआ था. इसके बाद ही उत्तराखंड में अचानक से तीन साल पुराना अंकिता भंडारी हत्याकांड चर्चाओं में आ गया. इस मामले में जहां सुरेश राठौर पर मुकदमे हुए थे, तो वहीं उर्मिला सनावर पर भी कई केस हुए है. दोनों के खिलाफ पुलिस ने नोटिस भी जारी किए हैं।
पूर्व विधायक सुरेश राठौर के विरुद्ध बहादराबाद, झबरेड़ा, देहरादून की नेहरू कॉलोनी और डालनवाला में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मंगलवार को न्यायाधीश न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ज्वालापुर के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की याचिका पर सुनवाई हुई। जिसमें खुद पर लगे आरोपों को निराधार बताया गया है।
धर्मंद्र ने हरिद्वार जिले के बहादरा बाद थाने में प्राथमिकी में राठौर व उर्मिला पर भाजपा प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम की छवि धूमिल करने के मकसद से फेसबुक सहित अन्य इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म में वीडियेा-आडियो जारी करने का आरोप लगाया जबकि देहरादून के नेहरू कालोनी में पूर्व जिला पंचायत सदस्य आरती गौड़ तथा हरिद्वार में धर्मेंद्र कुमार के अलावा अब भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम ने पूर्व विधायक सुरेश राठौर व उनकी तथाकथित पत्नी उर्मिला सनावर के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की है।
गिरफ्तारी पर रोक और जमानत में अंतर
भारतीय आपराधिक कानून (दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 या अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों के तहत) में गिरफ्तारी पर रोक (Stay on Arrest या Interim Protection from Arrest) और जमानत (Bail) दोनों आरोपी की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, लेकिन इनमें मौलिक अंतर हैं। ये दोनों अलग-अलग स्थितियों में लागू होते हैं और इनका उद्देश्य भी भिन्न है।मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं:बिंदु
गिरफ्तारी पर रोक (Stay on Arrest/Interim Stay)
जमानत (Bail)
कब लागू होती है
मुख्य रूप से गिरफ्तारी से पहले (pre-arrest)। जब व्यक्ति को गिरफ्तारी की आशंका होती है, लेकिन अभी गिरफ्तार नहीं हुआ। यह अक्सर अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) की याचिका लंबित होने पर अंतरिम राहत के रूप में दी जाती है।
गिरफ्तारी के बाद (post-arrest)। व्यक्ति पुलिस हिरासत या न्यायिक हिरासत में होता है, तब रिहाई के लिए। (साधारण/रेगुलर जमानत) या गिरफ्तारी की आशंका पर पहले से (अग्रिम जमानत)।
उद्देश्य
गिरफ्तारी को पूरी तरह रोकना या टालना। व्यक्ति को हिरासत में जाने से बचाना।
हिरासत से रिहा करना (या गिरफ्तारी होने पर तुरंत रिहा करने का निर्देश)। जांच/मुकदमे के दौरान स्वतंत्रता देना।
प्रकृति
अस्थायी (interim) राहत। आमतौर पर मुख्य याचिका (जैसे अग्रिम जमानत) के अंतिम निर्णय तक के लिए। यह कोर्ट की विवेकाधीन शक्ति से दी जाती है।
स्थायी राहत (मुकदमा समाप्त होने तक)। बॉन्ड/जमानत राशि के साथ शर्तें लगती हैं।
कानूनी आधार
CrPC की धारा 438 (अग्रिम जमानत) के तहत अंतरिम आदेश, या हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट की निहित शक्तियों (Section 482 CrPC) से। अक्सर “interim stay on arrest” कहा जाता है।
साधारण जमानत: धारा 437, 439 CrPC
अग्रिम जमानत: धारा 438 CrPC (जो गिरफ्तारी होने पर रिहाई का निर्देश देती है)।
प्रभाव
पुलिस व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती (आदेश की अवधि तक)। यदि गिरफ्तार किया तो अवमानना हो सकती है।
यदि अग्रिम जमानत: गिरफ्तार होने पर तुरंत रिहा।
साधारण जमानत: हिरासत से रिहा, लेकिन शर्तें (जैसे अदालत में हाजिरी)।
अवधि
आमतौर पर छोटी (कुछ हफ्ते या महीने), मुख्य याचिका के निर्णय तक।
लंबी (मुकदमा या अपील तक), लेकिन शर्तों के उल्लंघन पर रद्द हो सकती है।
उदाहरण
सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई तक “गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक” लगा देता है।
गिरफ्तारी के बाद कोर्ट जमानत देती है, या अग्रिम जमानत पहले से मिली हो तो पुलिस रिहा करती है।
महत्वपूर्ण बिंदु:अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) गिरफ्तारी पर रोक से ज्यादा मजबूत होती है, क्योंकि यह गिरफ्तारी होने पर भी तुरंत रिहाई का निर्देश देती है। जबकि “गिरफ्तारी पर रोक” सिर्फ गिरफ्तारी को टालती है।
गिरफ्तारी पर रोक अक्सर अंतरिम (temporary) होती है और मुख्य जमानत याचिका खारिज होने पर समाप्त हो जाती है।
दोनों में कोर्ट शर्तें लगा सकता है, जैसे जांच में सहयोग करना, देश न छोड़ना आदि।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों (जैसे Arnesh Kumar vs State of Bihar) में अनावश्यक गिरफ्तारी पर रोक लगाने के दिशा-निर्देश हैं, जिससे ये राहतें महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

