आईएसआई के निशाने पर भी आरएसएस ही है, फिरोजपुर में नवीन अरोड़ा की हत्या

भाईचारे पर हमला

देहरादून 17 नवंबर 2025। पंजाब, जो कभी सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक था, आज फिर उग्रवाद की आग में झुलस रहा है। 1980-90 के दशक की खूनी यादें—जब आतंकवाद ने हजारों जिंदगियां लील लीं—फिर से ताजा हो रही हैं। कल शाम करीब 6-7 बजे फिरोजपुर शहर में हुई सनसनीखेज हत्या ने न केवल स्थानीय स्तर पर भय फैला दिया है बल्कि पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े नवीन अरोड़ा की दो अज्ञात बाइक सवार हमलावरों ने करीब से गोली मारकर हत्या कर दी।  फिरोजपुर के मोची बाजार के पास नवीन अपनी दुपट्टा/मनियारी की दुकान बंद करके पैदल घर लौट रहे थे,  तभी हमलावरों ने बिना किसी बातचीत के सिर पर पॉइंट-ब्लैंक रेंज से ताबड़तोड़ गोलीबारी की, जिसमें 3-4 गोलियां लगीं। नवीन मौके पर ही गिर पड़े और उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। नवीन के पिता बलदेव राज अरोड़ा ने किसी व्यक्तिगत दुश्मनी से इंकार किया – उसका किसी से कोई झगड़ा नहीं था। हमलावर बिना कुछ कहे गोली चला भागे हैं।

नवीन का परिवार आरएसएस से तीन पीढ़ियों से जुड़ा है। उनके दादा दीनानाथ अरोड़ा फिरोजपुर में आरएसएस के पुराने प्रमुख रहे । पिता बलदेव राज भी वरिष्ठ आरएसएस स्वयंसेवक हैं और नवीन स्वयं भी संघ के कार्यक्रमों में भाग लेते थे। आतंकी गुट ‘शेर-ए-पंजाब ब्रिगेड’ ने एक्स पर वायरल स्टेटमेंट जारी कर इसे आरएसएस की कथित ‘सिखों को हिंदूकरण’ नीति का बदला बताया। फिरोजपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) भूपिंदर सिंह ने बताया कि 8-9 टीमें गठित की गई हैं। सभी संभावित कोणों पर जाँच चल रही है, जिसमें तकनीकी सुराग, सीसीटीवी फुटेज और गुप्तचरों की जानकारी शामिल है।

यह घटना तब हुई जब दिल्ली में आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी शिक्षाविद डॉक्टर कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री की पुस्तक “हिन्द की चादर नवम गुरु तेग बहादुर” का लोकार्पण कर रहे थे—एक ऐसी किताब जो सिख गुरु के हिंदू-रक्षा के योगदान को उजागर करती है, यह संयोग भाईचारे पर हमले की विडंबना को दर्शाता है।

2016 से 2025 तक के घटनाक्रम करीब से देखें तो बाहरी ताकतों का हाथ इसमें ख़ास तौर पर नजर आता हैं । जनवरी 2016 में लुधियाना में किदवई नगर स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा पर अज्ञात हमलावरों ने फायरिंग की जिसमें शाखा प्रमुख को निशाना बनाया गया लेकिन वे बच गए , अप्रैल 2016 में खन्ना के दुर्गा प्रसाद गुप्ता जो पंजाब शिवसेना नेता और आरएसएस स्वयंसेवक की बाइक सवारों ने गोली मारकर हत्या कर दी। अगस्त 2016 में जालंधर में संघ के वरिष्ठ ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा पर गोलीबारी हुई, वे गंभीर रूप से घायल हुए। पीएमओ ने पंजाब अधिकारियों पर दबाव डाला, एसआईटी गठित की गई और आरएसएस कार्यालयों पर सुरक्षा बढ़ाई गई। जनवरी 2017 में लुधियाना के नरेश कुमार पर फायरिंग हुई पर ईश्वर की अनुकम्पा से वे बच गए । उसी वर्ष अक्टूबर में लुधियाना में कैलाश नगर में आरएसएस कार्यकर्ता रवींद्र गोसाईं की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जो शाखा से लौट रहे थे। अक्टूबर 2017 में ही अमृतसर में एक और स्वयंसेवक विपिन शर्मा की हत्या कर दी गयी । गैंगस्टर सारज सिंह मिंटू ने बाद में अपनी फेसबुक पर इस कत्ल की जिम्मेदारी अपने सिर पर ली । साथ ही उसने कारण बताया कि विपिन ने कथित तौर पर बलविंदर सिंह कालू की हत्या करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी वर्ष सतपाल कुमार (शिवसेना नेता ) की लुधियाना में गोलीबारी में हत्या कर दी गयी । यह सब 9 धार्मिक नेताओं की हत्याओं की श्रृंखला का हिस्सा थे , जहां बाद में एनआईए ने आईएसआई-फंडेड खालिस्तानी तत्वों का हाथ पाया। आरएसएस ने उस वक़्त केंद्र से हस्तक्षेप की मांग की और कार्यकर्ताओं से प्रतिशोध की बजाय शांति की अपील की क्योंकि प्रत्युत्तर से बाहरी ताकतों का प्लान सफल हो जाता। खैर उसके बाद कुछ शान्ति रही । 2024-25 में यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया । जुलाई 2024 में भटिंडा के स्वयंसेवक जसपाल सिंह पर 2-3 गुंडों ने चाकू से हमला किया; वे अस्पताल में भर्ती हुए, लेकिन गिरफ्तारियां नहीं हुईं। जुलाई 2024 में पंजाब के शिवसेना नेता संदीप थापर, जो भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और शहीद सुखदेव के वंशज भी हैं, उन पर पंजाब के लुधियाना सिविल अस्पताल के बाहर कट्टरवादियों के एक समूह ने तलवारों से हमला किया गया जिसमे वे बच गये । रोपड़ के नंगल शहर में विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष विकास प्रभाकर विकास बग्गा की अप्रैल 2024 में स्कूटर सवार अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी।

उल्लेखनीय है कि  पंजाब में शाखाओं की संख्या 500 से अधिक हो गई, जो कट्टरपंथियों को असहज कर रही है । अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के गौरव वीर सोहल ने इस साल सितंबर में पंजाब विश्वविद्यालय का छात्रसंघ चुनाव जीता है। देखा जाय तो यह हमले सिख-हिंदू एकता को कमजोर करने की कोशिश हैं।

RSS Attacks History Decoding Conspiracies Against Sangh RSS Headquarters Targeted History of Attacks

1989 से 2025 तक…  कब-कब आतंकियों के निशाने पर रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के खिलाफ 1989 से 2025 तक कई आतंकी षडयंत्र रचे गये. कई बड़े हमले भी हुए, जिसमें स्वयंसेवकों ने अपनी जानें दी. पंजाब, चेन्नई, केरल,  उत्तर प्रदेश  और मध्य प्रदेश में संघ कार्यालयों को निशाना बनाया गया. इन षड्यंत्रों का उद्देश्य भय पैदा करना और समाज को बांटना रहा है.

1989 से 2025 तक… जानें कब-कब आतंकियों के निशाने पर रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को निशाना बनाने के षडयंत्रों की लंबी लिस्ट है. संघ के खिलाफ ये षडयंत्र लंबे समय से चले आ रहे हैं. 1989 से लेकर 2025 तक एक नहीं, दर्जनों बार संघ के कार्यालयों को निशाना बनाने के षडयंत्र रचे गये. कभी पंजाब में निशाना बनाया गया तो कभी केरल में. हर हमले के पीछे एक ही उद्देश्य रहा- भय पैदा करना और समाज को बांटने का षड्यंत्र. आइए जानते हैं कि संघ के खिलाफ कब-कब खूनी खेल के षडयंत्र रचे गये.

25 जून 1989
पंजाब के मोगा में आरएसएस की शाखा पर हमला हुआ. आतंकियों ने संघ का झंडा झुकाने की मांग की लेकिन स्वयंसेवकों ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया. इसके बाद अंधाधुंध फायरिंग की गई. इसमें 25 लोगों ने अपनी जान दी और 31 से अधिक घायल हुए लेकिन संघ ने हिम्मत नहीं हारी. इस हमले के अगले दिन उसी जगह फिर शाखा लगी. ये वह पल था जिसने आतंक के सामने साहस की मिसाल कायम की और शहीदी पार्क को जन्म दिया.

8 अगस्त 1993
चेन्नई में आरएसएस मुख्यालय पर हमला किया गया. इसमें RDX का इस्तेमाल किया गया. इस हमले में 11 लोगों की जान गई. गुरु पूजा के मौके पर हुआ हमला संघ के खिलाफ आतंकी साजिश का हिस्सा था. जांच में ये बात सामने आई कि इसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों का हाथ था, जो देश में संघ के दफ्तरों को निशाना बना रहे थे.

2006 नागपुर अटैक
2006 में नागपुर में आरएसएस मुख्यालय को निशाना की साजिश रची गई. ये साजिश लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने रची थी, जिसे नाकाम कर दिया गया था.
20172022: केरल के कन्नूर जिले में 2017 से 2022 के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यालयों पर बमबारी और आगजनी की घटनाएं बढ़ीं.
2017 में कोठूपरम्बा में बम फेंके गए. फिर पेरुंबा में दफ्तर जलाया गया. 2022 में पय्यान्नूर में ब्लास्ट हुआ. इन घटनाओं के पीछे राजनीतिक हिंसा के साथ ही विचारधारा का टकराव भी अहम वजह रहा. जिसने कई निर्दोष जिंदगियां निगल लीं.
2023-2024: उत्तर भारत में षड्यंत्र
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में आरएसएस दफ्तर फिर आतंकवाद और अराजकता के निशाने पर आए.अगस्त 2023 में,उत्तर प्रदेश के मेरठ और रायबरेली में हमले हुए.दिसंबर 2023 में मध्य प्रदेश के सीहोर में पथराव और तोड़फोड़ हुई.फरवरी 2024 में भिंड में आरएसएस के दफ्तर में ग्रेनेड मिला.

2025: बड़ा आतंकी षड्यन्त्र विफ़ल
नवंबर 2025: गुजरात एटीएस ने लखनऊ और दिल्ली के आज़ादपुर मंडी स्थित आरएसएस कार्यालय पर हमले की ISIS का षड्यंत्र फोडा. तीन आतंकवादियों डॉक्‍टर अहमद मोहिउद्दीन सईद, आज़ाद सुलेमान शेख और मोहम्मद सुहैल को पकड़ा. इन्होंने सुनियोजित आतंकवादी हमले को लखनऊ आरएसएस कार्यालय की रेकी की थी.

Rahul Gandhi Attackes Rss In Usa, How Much Truth Is There In His Claims About The Sangh
राहुल का अमेरिका में भी आरएसएस पर हमला
राहुल गांधी ने अमेरिकी दौरे पर भी आरएसएस पर हमला किया। उन्होंने कहा कि आरएसएस पूरे देश को एक नजरिए से देखता है। राहुल ने आरएसएस पर आरोप लगाया कि वो महिालओं को प्रतिबंधित रखना चाहता है और उन्हें घरों से बाहर निकलते देखना नहीं चाहता।

अमेरिका में भी आरएसएस पर हमला, आखिर राहुल के निशाने पर क्यों रहता है संघ?
राहुल गांधी ने कहा कि आरएसएस भारत को एक विचार मानता है जबकि ऐसा नहीं है
राहुल ने आरएसएस पर महिलाओं के लिए संकुचित विचार रखने का भी आरोप लगाया
Rahul Gandhi
राहुल गांधी को आरएसएस से ही दिक्कत क्यों है?

राहुल गांधी ने अमेरिका में आरएसएस ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) पर हमला किया। उन्होंने आरएसएस की विचाराधारा को संकुचित और एकपक्षीय बताया। उन्होंने  आलोचना की कि आरएसएस भारत को ‘एक’ विचार मानता है। राहुल कहते हैं कि भारत एक विचार नहीं बल्कि कई विचारों का सम्मिलन है। उन्होंने कहा, ‘आरएसएस का मानना है कि भारत एक विचार है। हमारा मानना है कि भारत बहुत सारे विचारों से बना है। हमारा मानना है कि हर किसी को सपने देखने की इजाजत मिले, बिना किसी की परवाह के। बिना उसका धर्म-रंग देखे मौके मिलें।’

आखिर कौन सा पैमाना रखते हैं राहुल गांधी?
लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि दोनों संविधान को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं जिसे इस बार के लोकसभा चुनावों के वक्त लोगों ने भांप लिया।  मैं जो बाते कर रहा हूं वह संविधान में है। राज्यों का संघ, भाषा का सम्मान, धर्म का सम्मान।’ सवाल है कि क्या आरएसएस, भाजपा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये नहीं मानते हैं कि भारत में कई राज्य हैं? क्या वो राज्यों को संविधान में मिले अधिकारों से वंचित कर रहे हैं? क्या आरएसएस-भाजपा और मोदी भाषा का सम्मान, धर्म का सम्मान नहीं करते? अगर राहुल गांधी का जवाब हां में है तो वो किन पैमानों पर परखकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं? फिर सवाल यह भी कि क्या राहुल अपने तय पैमानों पर ही खुद को, कांग्रेस पार्टी को, उनके सहयोगी दलों को परखेंगे?

आरएसएस पर इंदिरा गांधी गलत थीं?
आरएसएस स्वयं को सामाजिक संस्था बताता है। आरएसएस के स्वयंसेवक भयंकर आपदा में प्रभावित इलाकों में सबसे पहले पहुंचकर बिना भेदभाव राहत के लिए जाने जाते हैं। आरएसएस के विभिन्न प्रभाग शिक्षा, समाज सेवा जैसे मानवतावादी कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इतना ही नहीं, युद्ध के वक्त भी आरएसएस भारत और भारतीयों की सेवा में अपनी भूमिका ढूंढ कर उसे निभाता है। कई महापुरुषों ने आरएसएस की देशभक्ति की प्रशंसा की है। इंदिरा गांधी ने तो स्वतंत्रता दिवस के परेड में आरएसएस को अपनी झांकी शामिल करने की अनुमति दी थी।

आरएसएस के बारे में ये बातें जानते हैं राहुल?
आरएसएस की राजनीतिक शाखा भाजपा की देश में लगातार तीसरी बार सरकार बनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का नारा दिया है। आरएसएस भी सांप्रदायिक, भाषाई, जातीय, इलाकाई समेत तमाम पैमानों पर एकता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास करता रहता है। उसका एक प्रभाग ‘मुस्लिम मंच’ हिंदू-मुस्लिम एकता की दिशा में लंबे समय से कार्यरत है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत वक्त-वक्त पर गैर-हिंदू धर्मगुरुओं से मिलते रहते हैं।

आरएसएस और महिलाओं पर राहुल का दावा कितना सही?
राहुल गांधी कहते हैं कि आरएसएस महिलाओं से उम्मीद करता है कि वो कम बोलें और घर में रहें। कहते हैं ना प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् (प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत क्या)? भारत ही नहीं, दुनिया भर में वो कौन सा समुदाय है जो महिलाओं से कम बोलने और घरों में रखना चाहता है? राहुल अगर अपने चापलूसों के बजाय किसी भी सामान्य बुद्धि के व्यक्ति से पूछ लेते तो संभवतः एक ही जवाब मिलता। देश के कौन से इलाके में आरएसएस ने महिलाओं को बंधनों में जकड़ने की कोशिश की है? आरएसएस ने कब महिलाओं की ‘जीवन की शर्तें’ तय की हैं या कोई ‘ये करो, ये नहीं करो’ का ‘फतवा’ जारी किया है? आरएसए कार्यकर्ताओं को कब महिलाओं पर अत्याचार करते देश ने देखा है? लेकिन जहां ये सब होता है, क्या राहुल कभी बोलने की हिम्मत जुटा पाएंगे? जवाब है- कभी नहीं। जहां महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधे दिमाग का लिखित ऐलान है, राहुल गांधी कभी उधर उंगली उठा पाएंगे? जवाब है नहीं- संभव, कल्पना से परे।

राहुल को आरएसएस से ही दिक्कत क्यों है?
क्या आरएसएस सांप्रदायिक है? हो सकता है। होगा भी। क्या राहुल गांधी को सांप्रदायिकता से दिक्कत है? हो सकता है। होगा भी। लेकिन क्या राहुल गांधी को मुस्लिम सांप्रदायिकता से भी दिक्कत है? बिल्कुल नहीं। अगर ऐसा होता तो वो सबसे पहले अपनी मां सोनिया गांधी से पूछते कि आखिर बटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों के लिए उनके आंसू क्यों निकले थे? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रह चुके सलमान खुर्शीद ने ये दावा किया है, आरएसएस-भाजपा ने आरोप नहीं लगाए। इसलिए उन आतंकियों के लिए सोनिया के रोने से ‘धर्मनिरपेक्ष’ राहुल को पीड़ा तो होनी चाहिए जिन्होंने दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की जान ले ली। क्या राहुल ने कभी सीमी, पीएफआई समेत तमाम मुस्लिम आतंकी संगठनों पर एक शब्द भी बोला है?

राहुल को इनका जवाब तो देना चाहिए
तो क्या राहुल को आरएसएस से इसलिए दिक्कत है कि वो हिंदुओं की भी बात करता है? जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि आरएसएस मुस्लिम मंच से देश के मुसलमानों से संपर्क में रहता है। मुस्लिम मंच है, मुसलमान उससे जुड़े हैं तो स्वाभाविक है कि उनके हित-अहित की चिंता भी आरएसएस कर रहा होगा। भाजपा सरकार के इस दावे को एक भी मुसलमान खारिज नहीं कर पा रहा है कि उन्हें केंद्रीय योजना का लाभ आबादी की हिस्सेदारी से भी ज्यादा मिला है। अगर आरएसएस-भाजपा और मोदी मुस्लिम विरोधी हैं तो ये कैसे हो गया?

अगर ये महिलाओं को घरों की चहारदिवारियों में बंद रखना चाहते हैं तो मोदी सरकार ने कामकाजी महिलाओं के लिए वर्कप्लेस पर ज्यादा सुविधाओं की चिंता क्यों की और उनके लिए मातृत्व अवकाश बढ़ाकर छह हफ्ते क्यों कर दिया? सोचिए, जो महिलाओं को घरों में समेटकर रखना चाहता है, वो घर से निकलने वाली महिलाओं के लिए सुविधाएं बढ़ा रहा है! तमिलनाडु में हिंदी भाषियों, उत्तर भारतीयों के विरोध की राजनीति से ही जो दल सरकार में आता है, उस डीएमके से गठबंधन किसका है?

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