साल 2026 फिर बदलेगा मुस्लिम समाज? , सुप्रीम कोर्ट में है तलाक-ए-हसन

What Will Change For Muslims On November 26 Supreme Court Cji Surya Kant Bench Hearing On Talaq e hasan And Other Islamic Malpractices

26 को मुसलमानों के लिए क्या बदलने वाला है…इस्लामी कुप्रथा का अंत या साफ होगा ‘जाला’
CJI Suryakant Bench: मुस्लिम महिलाओं की गरिमा के खिलाफ एक और इस्लामी कुप्रथा के दिन लदने वाले हैं।

नई दिल्ली 24 नवंबर 2025 : भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ उस इस्लामी प्रथा की जांच कर रही है, जिसमें तलाक-ए-हसन में कोई मुसलमान पति पत्नी को तीन महीने में तीन बार तलाक कहकर शादी भंग कर देता है। जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने सवाल उठाए कि सुप्रीम कोर्ट मामला संविधान पीठ को सौंपने की जरूरत पर विचार करेगा। जस्टिस सूर्यकांत के समक्ष ये बड़ा मामला है, जिन्होंने सोमवार यानी 24 नवंबर को देश के नए सीजेआई पद की शपथ ली है। जानते हैं कि मुस्लिम समाज में तलाक की ऐसी और कौन सी प्रथाएं हैं, जो मुस्लिम औरतों की गरिमा का हनन करती हैं।
Talaq-E-Hasan Supreme Court

क्या कहा था जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने
19 नवंबर को सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने पूछा था कि महिलाओं की गरिमा प्रभावित करने वाली ऐसी प्रथा सभ्य समाज में कैसे जारी रहने दी जा सकती है?जस्टिस सूर्यकांत ने मौखिक  टिप्पणी की थी कि यह कैसी बात है? आप 2025 में इसे कैसे चला रहे हैं? क्या इसी तरह एक महिला की गरिमा बनाए रखी जा सकती है? क्या सभ्य समाज को ऐसी प्रथा की अनुमति देनी चाहिए? अदालत पत्रकार बेनजीर हीना की याचिका सुन रही है, जिन्होंने तलाक-ए-हसन मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 के उल्लंघन का तर्कदेते हुएइसे असंवैधानिकघोषितकरने की मांग की है ।  अगली सुनवाई 26 नवंबर निर्धारित है।

इस्लामी प्रथाओं में तलाक के कई रूप
दिल्ली में सीनियर एडवोकेट शिवाजी शुक्ला के अनुसार, मुस्लिमों में तलाक के कई प्रकार हैं। मुस्लिम पति अपनी पत्नी को कभी भी तलाक दे सकता है। इसको पति को तलाक के वक्त हर शर्त पूरी करनी होगी। इसे भी दो हिस्से में बांटा जाता है।

तलाक-ए-सुन्नत
तलाक-ए-सुन्नत को तलाक-उल-राजे भी कहा जाता है। ऐसे तलाक में हमेशा सुलह-समझौते की गुंजाइश होती है। शिया और सुन्नी दोनों  इसे मानते हें। वो इसे तलाक का वैध जरिया भी मानते हैं। यह तरीका भी दो हिस्सों में बंटा है।

तलाक-ए-अहसान
एडवोकेट शिवाजी शुक्ला के अनुसार तलाक-ए-अहसान में पति एक वाक्य में तलाक कहकर संबंध विच्छेद कर सकता है। यह तलाक तभी मान्य है, जब पत्नी को पीरियड्स नहीं आ रहे हों। इसे तुहर पीरियड कहा जाता है। यह ऐलान बस एक बार ही होता है।

तलाक-ए-इद्दत
तलाक-ए-इद्दत में तलाक बाद महिलाओं का ख्याल रखा गया है। तलाक-ए-इद्दत का समय तीन महीने का होता है। इसे पत्नी की तीन मेंस्ट्रुअल साइकिल ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। पत्नी गर्भवती है तो इद्दत पीरियड बच्चे के जन्म तक बढ़ाया जा सकता है। इद्दत पीरियड में पति पत्नी से संबंध नहीं बना सकता। अगर वह संबंध बनाता है तो तलाक नही होगा।

तलाक-ए-हसन
तलाक-ए-हसन को इस्लामी प्रथाओं में बहुत कम महत्व है। इस मामले में तीन बार “तलाक” तीन महीने में कहा जाता है। तलाक का ऐलान तभी मान्य होगा, जब बीवी को पीरियड्स नहीं आ रहे हों। पीरियड्स आ रहे हैं तो तलाक की घोषणा अगले 30 दिनों में हर महीने तीन महीने तक करना होगा। इस बीच यौन संबंध नहीं बनाया जा सकते। हसन को अभी तक Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 में अपराध नहीं बनाया गया है।

तलाक-ए-बिद्दत
तलाक-ए-बिद्दत पाप बताया गया है। ऐसा तलाक शादी तोड़ने का मान्य तरीका नहीं माना जाता है। तलाक-ए-बिद्दत तलाक-उल-बैन भी कहा जाता है। इसी को ट्रिपल तलाक कहा गया है, जो सुप्रीम कोर्ट ने ‘शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया(2017)’ मामले में भारत में प्रतिबंधित किया है। इसमें तीन बार तलाक कह देने से तलाक हो जाता था। यह केवल सुन्नी प्रथाओं में ही मान्य था। शिया और मलिक इसे नहीं मानते। यह Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 में अपराध है।

तलाक-ए-इला
इस तलाक में पति पत्नी से यौन संबंध न रखने की शपथ लेता है। यह एक अस्थायी अलगाव है जिसमें पति एक निर्दिष्ट अवधि (जैसे चार महीने) तक पत्नी से यौन संबंध बनाने से परहेज करता है। वह शपथ तोड़ता है, तो विवाह जारी रहता है। अगर वह शपथ पूरा करता है, तो निकाह खुद ही खत्म हो जाता है।

तलाक-ए-जिहार
जिहार भी इला जैसा ही तलाक का रचनात्मक  तरीका है। ऐसे तलाक में पत्नी की तुलना किसी और दूसरी औरत से की जाती है। जैसे पति अपनी मां से पत्नी की तुलना कर दे तो ऐसी स्थिति में संबंध बनाने की मनाही हो जाती है। इस प्रथा के प्रायश्चित को पति या तो पत्नी आजाद करता है या फिर लगातार दो महीने तक यौन उपवास करता है।

तलाक-ए-खुला
तलाक के इस तरीके में पति और पत्नी में आपसी सहमति जरूरी है। इसमें पत्नी पति से विवाह समाप्ति की पहल करती है। इसमें महिला तलाक प्रक्रिया शुरु कर आमतौर पर मुआवजे में पति को मेहर (निकाह के समय मिला उपहार) वापस करती है। यह वैध कारणों जैसे शारीरिक या भावनात्मक नुकसान पर आधारित हो सकता है।

तलाक-ए-मुबारत
मुबारत का मतलब है आपसी मुक्ति। तलाक-ए-मुबारत मुस्लिम तलाक का एक प्रकार है जिसमें पति-पत्नी दोनों आपसी सहमति और इच्छा से शादी खत्म करने को सहमत होते हैं। यह एक सौहार्दपूर्ण प्रक्रिया है, जहां दोनों पक्ष अलग होने को सहमत होते हैं। यह तब होता है जब वे विवाह जारी नहीं रखना चाहते।अलगाव कोई भी पक्ष  प्रस्तावित कर सकता है।

Supreme Court Justice Surya Kant Bench Raises Questions On Talaq e hasan Will This Islamic Practice End Next Hearing On 26th November

जस्टिस सूर्यकांत के 5 चुभने वाले सवाल पर सब खामोश

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह तलाक-ए-हसन प्रथा निरस्त कर सकता है, जिसमें मुस्लिम पुरुष पत्नी को तीन महीने तक महीने में एक बार ‘तलाक’ कहकर तलाक दे सकता है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने संकेत दिया कि वह इस मामले को पांच जज पीठ को सौंपने की वांछनीयता पर विचार कर सकती है। पीठ ने संबंधित पक्षों से विचार को उठने वाले संभावित व्यापक प्रश्नों के साथ नोट्स पेश करने को कहा।  अगली सुनवाई 26 तारीख को होगी, जहां सुप्रीम कोर्ट तलाक प्रथा की वैधता जांचेगा।

पीठ ने क्यों कहा-दखल देना पड़ सकता है
पीठ ने कहा कि  यह प्रथा व्यापक रूप से समाज प्रभावित करती है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने मौखिक रूप से कहा-इसमें व्यापक रूप से समाज शामिल है। कुछ सुधारात्मक उपाय करने होंगे। यदि घोर भेदभावपूर्ण प्रथाएं हैं, तो न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।

इस्लामी कुप्रथा को चोट पहुंचाने वाले ये 5 सवाल
जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा कि महिलाओं की गरिमा प्रभावित करने वाली प्रथा को सभ्य समाज में कैसे जारी रहने दिया जा सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी की-यह कैसी बात है? हम सर्वोत्तम धार्मिक प्रथा अपनाते हैं, क्या आप यही अनुमति देते हैं? क्या ऐसे एक महिला की गरिमा बनाए रखी जा सकती है? क्या एक सभ्य समाज को ऐसी प्रथा की अनुमति देनी चाहिए? दिल्ली के सीनियर एडवोकेट अनिल कुमार सिंह श्रीनेत कहते हैं कि जस्टिस सूर्यकांत के सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं, ऐसे में माना जा रहा है कि तलाक-ए-हसन कुप्रथा खत्म हो सकती है।

किसकी याचिका पर हो रही थी सुनवाई
घटनाक्रम पत्रकार बेनज़ीर हिना की 2022 में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में तलाक को लिंग और धर्म-निरपेक्ष प्रक्रिया और आधार पर दिशानिर्देश देने की भी मांग की गई थी। याचिकाकर्ता के पति ने वकील से तलाक-ए-हसन नोटिस भिजवाकर उसे तलाक दे दिया था, क्योंकि उसके परिवार ने दहेज देने से इनकार कर दिया था, जबकि उसके ससुराल वाले उसे इसके लिए परेशान कर रहे थे।

वकील के जरिए तलाक मान्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पुरुषों में एक वकील को अपनी पत्नी को तीन तलाक के ज़रिए तलाक़ का नोटिस भिजवाने का अधिकार देने की प्रथा की वैधता पर सवाल उठाया और कहा कि इसे शादी को वैध रूप से शून्य नही माना जाएगा क्योंकि नोटिस पर पुरुष के हस्ताक्षर नहीं होते। तलाक-ए-हसन प्रक्रिया में तीन तलाक देने के मुस्लिम पुरुषों के एकतरफा अधिकार पर सवाल उठाने वाली एक टीवी पत्रकार याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए, वरिष्ठ वकील रिजवान अहमद ने कहा-उनकी ज़िंदगी दांव पर है। उन्होंने दलील दी कि अवैध तलाक उन्हें बहुपतित्व जैसी स्थिति में धकेल सकता है। अदालत को बताया गया कि बेनज़ीर के पति पहले ही आगे बढ़ चुके हैं। उन्होंने दूसरी महिला से दूसरी शादी कर ली है और दूसरी शादी से उनका एक बच्चा भी है।

क्या है तलाक-ए-हसन
बार एंड बेंच के अनुसार, तलाक-ए-बिद्दत (तत्काल तीन तलाक) के विपरीत, तलाक-ए-हसन में पति एक बार में तीन बार तलाक नहीं कहता। इसके बजाय, वह लगातार तीन महीनों में एक बार तलाक कहता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में तलाक-ए-बिद्दत प्रथा असंवैधानिक करार दे निरस्त कर चुका।

क्या है तलाक-ए-तफवीज
अनिल कुमार सिंह श्रीनेत बताते हैं कि तलाक-ए-तफवीज मुस्लिम कानून में प्रत्यायोजित तलाक का एक रूप है, जिसमें पति अपनी पत्नी को तलाक का अधिकार सौंपता है, चाहे शादी के समय या बाद में। इससे पत्नी को अदालत जाए बिना, प्रत्यायोजित तलाक की शर्तें पूरी होने पर खुद तलाक लेने का अधिकार मिल जाता है। यह प्रत्यायोजित तलाक पूर्ण या सशर्त हो सकता है, और अगर निर्धारित शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो पत्नी इस अधिकार का इस्तेमाल करके शादी खत्म कर सकती है।

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