उत्तर भारत की जमींदारी

जाट उत्तर भारत का एक प्रभावशाली समुदाय कैसे बने?

हिमांशु चौहान द्वारा

यह लेख बताता है कि पिछले लगभग 300 वर्षों में जाट समुदाय किस प्रकार पशुपालक और कृषक समूहों से विकसित होकर उत्तर भारत के सबसे प्रभावशाली भूमिधर समुदायों में शामिल हुआ।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं आर्थिक कारक

1. विद्रोह और राजकीय विस्तार — 17वीं सदी के उत्तरार्ध से 18वीं सदी तक

17वीं सदी के उत्तरार्ध में औरंगज़ेब के शासनकाल के दौरान गोकुला जाट ने मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। इसके बाद राजा राम और चूड़ामन जैसे नेताओं ने भी इस संघर्ष को आगे बढ़ाया।

1722 में बदन सिंह ने भरतपुर राज्य की स्थापना की। महाराजा सूरजमल के शासनकाल में भरतपुर का विस्तार हुआ और दिल्ली, आगरा, मथुरा, अलीगढ़ तथा हरियाणा के कुछ हिस्सों तक उसका क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ा।

2. भाईचारा भूमि-व्यवस्था

सामान्य सामंती व्यवस्था के विपरीत, जिसमें किसी मध्यस्थ जमींदार के पास पूरे गांव का स्वामित्व होता था, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के गांवों में भाईचारा व्यवस्था प्रचलित थी।

इस व्यवस्था में गांव की भूमि विभिन्न कुलों और वंश-समूहों के बीच बांटी जाती थी। इस प्रकार ब्रिटिश शासन से काफी पहले ही समुदाय के सदस्य भूमि के प्रत्यक्ष स्वामी और कृषक बने हुए थे।

3. पंजाब में ब्रिटिश नहर कॉलोनियां और कानूनी संरक्षण

19वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिशों ने पंजाब में व्यापक नहर सिंचाई नेटवर्क विकसित किया, जिसमें चेनाब और बारी दोआब क्षेत्र प्रमुख थे।

राजस्व बढ़ाने और सेना के लिए भर्ती सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बड़ी मात्रा में कृषि भूमि का आवंटन किया गया। इनमें जाट सिख और हिंदू जाट किसानों को भी बड़े पैमाने पर भूमि मिली।

पंजाब एलियनेशन ऑफ लैंड एक्ट, 1900 के तहत साहूकारों द्वारा कर्ज के बदले कृषि भूमि जब्त करने पर कानूनी प्रतिबंध लगाए गए, जिससे जाट किसानों की भूमि जोत को संरक्षित करने में मदद मिली।

4. स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार और हरित क्रांति

उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950: चौधरी चरण सिंह के कृषि सुधारों से जुड़े प्रयासों के संदर्भ में, मध्यवर्ती जमींदारी अधिकार समाप्त किए गए और वास्तविक काश्तकारों को सीधे भूमि-अधिकार प्राप्त हुए।

हरित क्रांति — 1960 का दशक: उन्नत किस्म के बीज (HYV), ट्यूबवेल, उर्वरक और ट्रैक्टरों के प्रसार से पहले से भूमि और सिंचाई सुविधाओं वाले किसानों को विशेष लाभ मिला। इससे निर्वाह कृषि धीरे-धीरे अधिक उत्पादक और व्यावसायिक कृषि में बदल गई।

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