विभाजन

 

Pakistan Allowed Hindus Only Clothes And Bedding In Partitions Patel Wanted Greece Turkey Like Population Exchange On 25 August Order
हिंदू सिर्फ कपड़े-बिस्तर ले जा सकते हैं… पाकिस्तान ने रखी थी ऐसी शर्त, ग्रीस-तुर्की जैसा बंटवारा चाहते थे पटेल
भारत और पाकिस्तान के विभाजन की रेखा सर सिरिल रेडक्लिफ की रिपोर्ट से तय हुई, जिसमें रियासतों को भारत-पाकिस्तान में से किसी एक को चुनने की आजादी मिली। विभाजन को लेकर जनसंख्या का बंटवारा कैसे हो, इस बात को लेकर नेताओं में मतभेद था।
नई दिल्ली: 78 साल पहले ब्रिटिश भारत के भीतर भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा का निर्धारण लंदन के बैरिस्टर सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में तैयार की गई ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित एक रिपोर्ट द्वारा किया गया था। पाकिस्तान दो अलग-अलग क्षेत्रों, पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान को मिलाकर अस्तित्व में आया। ये इलाकं भौगोलिक रूप से भारत से अलग किए गए थे। भारत का निर्माण ब्रिटिश भारत के बहुसंख्यक हिंदू क्षेत्रों से और पाकिस्तान का निर्माण बहुसंख्यक मुस्लिम क्षेत्रों से हुआ था। मगर, इस बंटवारे में एक दुखदायी पहलू यह भी था कि पाकिस्तान से जो हिंदू भगाए गए, उनको केवल कपड़े और बिस्तर ही ले जाने की इजाजत थी। वहीं, भारत ने पाकिस्तान जाने वालों को लेकर ऐसी कोई शर्त नहीं रखी थी। ये बातें उस वक्त महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने भी नहीं समझीं थीं।
Partitions

ऐसे हुआ था बंटवारा, रियासतों की किस्मत हुई तय
18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया जिसने विभाजन की व्यवस्था को अंतिम रूप दिया और रियासतों पर ब्रिटिश आधिपत्य को त्याग दिया। इन रियासतों में से कइयों को यह चुनने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया कि वे नए बने भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल हों या दोनों के बाहर स्वतंत्र रहें। भारत सरकार अधिनियम 1935 को नए प्रभुत्व वाले देशों के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करने के लिए अनुकूलित किया गया था। अगस्त 1947 में एक नए देश के रूप में बने पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए आवेदन किया और 30 सितंबर 1947 को महासभा द्वारा इसे स्वीकार कर लिया गया। भारत डोमिनियन के पास मौजूदा सीट बनी रही क्योंकि भारत 1945 से संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य था।

यह था जिन्ना के प्रशासन का सरकारी आदेश
एक जज जस्टिस जीडी खोसला की किताब-‘देश विभाजन का खूनी इतिहास’ में जिक्र किया गया है कि 25 अगस्त 1947 को जिन्ना के पाकिस्तान का एक सरकारी आदेश था- हिंदू सिर्फ कपड़े और बिस्तर ले जा सकते हैं। इसमें झांग जिले के जिला मजिस्ट्रेट का बयान वायरल हो रहा है, जिसमें यह कहा गया है कि हिंदू अपने साथ सिर्फ कपड़े और बिछावन ही ले जा सकते हैं। इसका उल्लंघन करने पर सजा दी जाएगी। इसमें किसी को भी गहने या और जरूरी सामान अपने साथ ले जाने की इजाजत नहीं थी। वैसे भी बंटवारे के दौरान सबकी खेती-जमीन ओर घर जैसी अचल संपत्तियां छोड़कर जाना पडा।

बंटवारे के वक्त कितनी थी भारत की आबादी
1947 में अविभाजित भारत की जनसंख्या लगभग 39 करोड़ थी। विभाजन के बाद भारत में संभवतः 33 करोड़ लोग थे। वहीं, पश्चिमी पाकिस्तान में 3 करोड़ और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में 3 करोड़ लोग थे। सीमाएं निर्धारित होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोग अपनी धार्मिक बहुसंख्यक आबादी की सापेक्षिक सुरक्षा की आशा में सीमा पार कर भारत आए। 1951 की पाकिस्तान की जनगणना के अनुसार, पाकिस्तान में विस्थापितों की संख्या 7,226,600 थी, जिनमें संभवतः वे सभी मुसलमान थे जो भारत से पाकिस्तान आए थे। 1951 की भारत की जनगणना में 7,295,870 विस्थापित व्यक्ति गिने गए थे, जिनमें स्पष्ट रूप से सभी हिंदू और सिख थे जो विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान से भारत आ गए थे।

आंबेडकर-पटेल चाहते थे पूरी तरह हो आबादी का विनिमय
विभाजन के दौरान पूर्ण जनसंख्या विनिमय एक विवादास्पद मुद्दा था जिस पर भारतीय नेताओं के बीच अलग-अलग राय थी। बीआर आंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल ने भारत और पाकिस्तान के बीच पूर्ण जनसंख्या विनिमय के विचार का समर्थन किया। इसका मतलब था कि भारत के सभी 4.2 करोड़ मुसलमान पाकिस्तान चले जाएंगे। वहीं, पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान के सभी 1.9 करोड़ हिंदू, सिख और अन्य अल्पसंख्यक भारत आ जाएंगे। उनका तर्क भविष्य में अंतर-धार्मिक संघर्षों की संभावना को समाप्त करके और बड़े पैमाने पर हिंसा के जोखिम को कम करके स्थायी सांप्रदायिक शांति सुनिश्चित करने में निहित था।

पटेल ने ग्रीस और तुर्की में बंटवारे को मिसाल बताया
आंबेडकर ने तर्क दिया था कि इस तरह का जनसंख्या विनिमय हालांकि कठोर था, मगर सांप्रदायिक समस्या का एक व्यावहारिक समाधान था जिसने विभाजन को जन्म दिया था। वहीं, भारत के लौह पुरुष पटेल का मानना था लॉजेन की संधि (1923) के बाद ग्रीस और तुर्की के बीच पहले की जनसंख्या विनिमय की सफलता को एक मिसाल के रूप में देखा।

नेहरू-गांधी ने मुसलमानों को जबरन पाक जाने से रोका था
हालांकि, इस प्रस्ताव को जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी ने खारिज कर दिया, जिन्होंने अनिवार्य जनसंख्या विनिमय के विचार का कड़ा विरोध किया। नेहरू और गांधी ने एक धर्मनिरपेक्ष भारत के दृष्टिकोण को बरकरार रखा जहां समुदाय धर्म की परवाह किए बिना शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकते हैं। उनका मानना था कि जबरन जनसंख्या स्थानांतरण से भारी पीड़ा होगी और सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ देगा।

बंटवारे में कितनों ने गंवाई जान
कई अनुमानों के अनुसार, मौतों की संख्या का सटीक आकलन नहीं हो पाया है। 200,000 से 2,000,000 तक अधिकांश विद्वान स्वीकार करते हैं कि विभाजन की हिंसा में लगभग 10 लाख लोग मारे गए थे। सभी क्षेत्रों में हिंसा का स

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