खामेनेई की मौत पर भारत की कूटनीति के पीछे का रहस्य है राष्ट्रहित

Diplomatic Secrets Why India Didnt Condemn Ayatollah Ali Khamenei Killing
आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत की भारत ने क्यों नहीं की निंदा? जानिए कूटनीतिक रहस्य
ईरान और इजरायल युद्ध पर भारत के स्टैंड पर सवाल उठ रहे हैं। खासकर खामेनेई की मौत पर चुप्पी पर उंगलियां उठाई गई हैं। लेकिन,भारत का यह स्टैंड सोची-समझी रणनीति  है, जिसके पीछे राष्ट्रहित है।

नई दिल्ली 03 मार्च 2026 : ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले के शुरुआती शिकारों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और उनका परिवार है। भारत में कश्मीर से लेकर लखनऊ तक इसके विरोध में आक्रामक प्रदर्शन हो रहे हैं। एनडीए-विरोधी विपक्षी पार्टियां बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप की निंदा कह रही हैं। लेकिन, आधिकारिक रूप से भारत ने अब तक खामेनेई के खात्मे की निंदा नहीं की। भारत बार-बार सिर्फ पश्चिम एशिया में बातचीत, शांति और स्थिरता की अपील कर रहा है।

खामेनेई की मौत और भारत की कूटनीति!

प्रश्न है कि भारत का आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर चुप्पी के स्टैंड के पीछे कारण क्या है? कूटनीतिक तौर पर देखें तो भारत इस पर यूं ही शांत नहीं है, बल्कि इसके पीछे कारणों  की एक पूरी श्रृंखला है, जिनके कारण भारत यह राजनयिक स्टैंड ले रहा है।

खामेनेई की मौत की निंदा क्यों नहीं
ईरान को भारत का ऐतिहासिक मित्र माना जाता है और कई बार अंतरराष्ट्रीय विषयों पर उसने भारत के स्टैंड का समर्थन भी किया है। लेकिन, ईरान या खामेनेई ने भारत के साथ मित्रता का अटूट रिश्ता निभाया हो,ऐसा भी नही है। कई अवसरों पर वह शत्रु भूमिका में भी रहा।

ईरान ने दिया पाकिस्तान का साथ
केंद्र में सत्ताधारी भाजपा सांसद निशिकांत दुबे, जो महत्वपूर्ण विषयों पर सत्तापक्ष की ओर से तर्क देते रहते हैं,उन्होंने दो प्रपत्रों के आधार पर दावा किया है कि 1965 और 1971 दोनों युद्धों में ईरान ने पाकिस्तान को भारत से लड़ने को पैसे हथियार और विमान दिए थे।

खामेनेई का भारत-विरोधी चार स्टैंड
यही नहीं, सरकारी सूत्रों के अनुसार खुद आयतुल्लाह अली खामेनेई का भारत के प्रति रिकॉर्ड पूरी तरह से पाक-साफ नहीं रहा। 2017 से 2024 तक कम से कम चार ऐसे मौके आए , जब उन्होंने हमारे आंतरिक मामलों में इस्लाम के नाम पर दखल की कोशिश कर अपनी सीमाएं लांघीं। 2017 में उन्होंने कश्मीरी मुसलमानों पर पाकिस्तानी जुबान में बात की थी।

2019 में कश्मीर से 370 हटाए जाने पर भी उन्होंने तिलमिलाहट दिखाई। ईरानी संसद तक में सीएए विरोधी प्रस्ताव पारित किया । 2020 के दिल्ली दंगों में भी खामेनेई ने ट्वीट करके इसे चरमपंथी हिंदुओं का ‘मुसलमानों का नरसंहार’ बताया। 2024 में भारत की तुलना गाजा और म्यांमार से करने की गुस्ताखी की।

खामेनेई की मौत पर चुप रहने वाले देश
ईरान-इजरायल युद्ध और खामेनेई की मौत पर वैश्विक प्रतिक्रियायें देखें तो भारत का रूख ग्लोबल पैटर्न से अलग नहीं है। किसी भी जी7 देश ने उनकी मौत पर श्रद्धांजलि नहीं दी।

इरजायल-अमेरिका के समर्थन में खड़े देश
अर्जेंटीना, यूक्रेन, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूरोपियन यूनियन ने इस विषय पर खुलकर अमेरिका- इजरायल के स्टैंड का समर्थन किया है।

यहां तक कि खाड़ी के देश भी या तो इससे नाराज हैं या फिर चुप्पी साधे हैं। सऊदी अरब भी चुप है और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) तो ईरानी मिसाइलों के हमले झेल रहा है। उल्लेखनीय ये है कि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) में भी 10 से कम सदस्यों ने ही इसकी निंदा की या खामेनेई को श्रद्धांजलि दी।

भारत की तरह और किस देश ने लिया स्टैंड
जापान और जर्मनी का स्टैंड भारत जैसा है, जिन्होंने स्थिरता की तो बात की, लेकिन श्रद्धांजलि के बयान नहीं दिए।

खामेनेई की मौत की निंदा करने वाले देश
जिन देशों ने खामेनेई की मौत की खुलकर निंदा की, उनमें रूस, चीन, उत्तर कोरिया, इराक, तुर्की, पाकिस्तान और मलेशिया शामिल हैं।

भारत की प्रतिक्रिया में राष्ट्रहित प्रथम
कुल मिलाकर ज्यादातर देशों ने राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी है। इसी कड़ी में भारत की सोची-समझी रणनीतिक चुप्पी में हमला झेल रहे खाड़ी के सहयोगियों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी गई है और वैश्विक लोकतांत्रिक देशों के अपनाए गए स्टैंड के अनुसार है।

Bet On Iran Chabahar Port Fail If Us israel Missiles Are Dropped Will The Money Invested Be Wasted China And Pakistan Benefit
India bet on Chabahar: भारत का दांव फेल? मिसाइलें गिरीं तो चाबहार पोर्ट पर लगा पैसा पानी में डूबेगा, फायदे में चीन-पाकिस्तान!
Iran Chabahar Port: भारत ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ईरान के चाबहार पोर्ट में अरबों डॉलर निवेश किया है। अमेरिका-इजरायल के मौजूदा ईरान पर मिसाइल हमलों से चाबहार पोर्ट पर खतरा मंडरा रहा है।
अमेरिका-इजरायल  ईरान पर मिसाइल हमला कर रहे हैं। ये मिसाइलें गोल्डन गेट कहे जाने वाले चाबहार पोर्ट के आसपास भी गिर रही हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग में चाबहार पोर्ट पर भी खतरा मंडरा रहा है। आशंका है कि युद्ध लंबा खिंचा तो चाबहार पोर्ट को भी नुकसान पहुंच सकता है, जिसमें भारत का अरबों डॉलर निवेश है।
फिलहाल, मैरीटाइम गेटवे की खबर के अनुसार, ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत का रणनीतिक निवेश सुरक्षित है। हाल ही में क्षेत्र में मिसाइल हमलों के बावजूद, भारतीय स्वामित्व वाले शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। परिचालन निर्बाध जारी है, जिससे मध्य एशियाई व्यापार मार्गों को महत्वपूर्ण संपर्क सुनिश्चित होता है।

भारत का मध्य एशिया का गोल्डन गेट है चाबहार
चाहबर ईरान का भारत के सबसे निकटस्थ समुद्री बंदरगाह है। यह ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत में मकरान तट पर  ओमान की खाड़ी में पड़ता है।
चाहबर बंदरगाह परियोजना में दो मुख्य बंदरगाह शाहिद कलंतरी  और शाहिद बेहेश्ती शामिल हैं। भारत बेहेश्ती को ही डेवलप कर रहा है।
ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत को मध्य एशिया के ‘स्वर्ण द्वार’ खोलता है। चाबहार बंदरगाह का वाणिज्यिक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टि से विशेष महत्व है।
पूरी तरह से चालू होने पर चाबहार बंदरगाह भारत को संसाधन संपन्न मध्य एशियाई तक पहुंच देगा और इस क्षेत्र में उसकी उपस्थिति मजबूत करेगा।
भारत ने अमेरिका के संभावित प्रतिबंधों की चिंता न करके अपनी विदेश नीति संबंधी निर्णय लेने में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का  प्रदर्शन किया है।

भारत का ईरान से 10 वर्षीय समझौता
भारत से वित्तपोषित और 10 वर्षीय समझौते में विकसित चाबहार पोर्ट के बेहेश्ती टर्मिनल ने 2018 से अब तक 100,000 से अधिक टीईयू (पारित यूरोपीय ईंधन) संचालित किया है। यह टर्मिनल INSTC कॉरिडोर से अफगानिस्तान और पड़ोसी देशों तक पाकिस्तान से प्रतिबंधित पहुंच को एक बाईपास का काम करता है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, चाबहार की मजबूती भारत की समुद्री पहुंच को इसके भू-राजनीतिक महत्व को रेखांकित करती है, जहां से गेहूं, दालों और मशीनरी का निर्यात होता है।

चाबहार में रणनीतिक स्वायत्तता सुरक्षित रखेगा भारत
भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह का इंटरव्यू है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाये रखेगा और चाबहार पोर्ट में वार्ता से अपनी रणनीतिक हित सुरक्षा करेगा। हम यह निश्चित करना चाहते हैं कि चाबहार में हमारे निवेश का हमें फायदा मिले, जिसकी हमें आवश्यकता है।
डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, भारत का चाबहार पोर्ट रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत का पूरे क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने को भी यह पोर्ट बेहद जरूरी है। अगर अमेरिका-इजरायल के हमले में इस पोर्ट को नुकसान पहुंचता है तो यह भारत का रणनीतिक संतुलन गड़बड़ा देगा। साथ ही भारत का अरबों डॉलर का निवेश भी डूब जाएगा।
Defence Analyst JS Sodhi
रक्षा विशेषज्ञ जेएस सोढ़ी

भारतीय विदेश मंत्रालय ने चाबहार पर दिया था जवाब
28 नवंबर, 2024 को संजय कुमार झा के सवालों के जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने बताया था कि मई 2015 में, भारत और ईरान ने ‘चाबहार बंदरगाह विकास योजना में भारत की भागीदारी’  समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। मई 2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय परिवहन और पारगमन गलियारे (चाबहार समझौता) की स्थापना को एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए। भारत, ईरान सरकार के सहयोग से चाबहार बंदरगाह के ‘शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल’ के पहले चरण के विकास में भागीदार है।

पोर्ट के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को 10 साल का करार
24 दिसंबर 2018 को एक भारतीय कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री जोन (IPGCFZ) से चाबहार बंदरगाह का संचालन अपने हाथ में ले लिया।
13 मई 2024 को, IPGL ने चाबहार बंदरगाह के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल सुसज्जित करने और संचालन को ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन (PMO) से दस साल की संधि की।

भारत कर चुका है 120 मिलियन डॉलर का निवेश
मंत्रालय ने बताया कि पोर्ट में उपकरण आपूर्ति को अनुदान सहायता बढ़ाकर 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की गई है। भारत ने चाबहार बंदरगाह विकास को 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर ऋण प्रतिबद्धता भी जताई है।
2018 से अब तक इस बंदरगाह से 450 से अधिक जहाज 1,34,082 टीईयू (ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट) कंटेनरीकृत माल और 87 लाख टन से अधिक थोक एवं सामान्य माल संचालित हो चुका है।

चाबहार: 24 मिलियन डॉलर के उपकरण दे चुका है भारत
भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास को 24 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के बंदरगाह उपकरण पहले ही दे दिए हैं। शेष उपकरणों की खरीद प्रक्रिया जारी है।

पाकिस्तान के ग्वादर का मुकाबला करेगा चाबहार
डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी के अनुसार, तेजी से बदलते भू-राजनीतिक, भू-रणनीतिक और भू-आर्थिक स्थितियों में कुछ समुद्री बंदरगाहों का महत्व अचानक बढ़ा है। नए लॉजिस्टिक हब की आवश्यकता और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह और ईरान के चाबहार बंदरगाह को प्रमुखता दिलाई है।
अपनी खास भू-रणनीतिक स्थिति से, दोनों बंदरगाहों को कई बार प्रतिद्वंद्वी बंदरगाह भी कहा जाता है। चीन ने अरबों डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) में ग्वादर बंदरगाह के विकास में भारी निवेश किया है, जो बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) की प्रमुख परियोजना है।

चाबहार बंदरगाह में भारत ने क्यों लगाया दांव
(ICPS) पर छपे एक लेख के अनुसार, चाबहार बंदरगाह स्वर्ण द्वार भी कहा जाता है क्योंकि इसकी क्षमता अफगानिस्तान और अन्य मध्य एशियाई देशों को समुद्र तक पहुंच देती है।
इससे भारत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से पैदा रणनीतिक असंतुलन दूर करने में मदद मिलती है।
चाबहार से व्यापार को अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर निर्भरता घट सकती है।
भारत का भी अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचना संभव नहीं रहता क्योंकि जमीनी पारगमन मार्ग पाकिस्तान से जाता है।
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की ओर से क्षेत्र में माल की मुक्त आवाजाही को क्षेत्रीय मोटर वाहन समझौते  का पाकिसतान विरोध करता रहा है।

ईरान के जारंज से डेलाराम तक सड़क बनाने के दिए पैसे
2002 से ही भारत ने चाबहार में रुचि दिखाई है और पाकिस्तान को किनारे कर इसे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में उपयोग करने की उम्मीद जताई है।
इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने ईरान के जारंज से डेलाराम तक 218 किलोमीटर लंबी संपर्क सड़क निर्माण को भी धन दिया था, जो अफगानिस्तान में गार्लैंड राजमार्ग जोड़ती है और 2010 में पूरी हुई थी। इस मार्ग की पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो सका है।

चीन का मुकाबला करने में मददगार होगा चाबहार
कुछ पर्यवेक्षक और विश्लेषक मानते हैं कि पूरी तरह से विकसित चाबहार बंदरगाह का उपयोग ओमान सागर और ग्वादर बंदरगाह में चीनी मौजूदगी का मुकाबला करने को भी हो सकता है।
ऐसी भी खबरें हैं कि चीन भी चाबहार बंदरगाह में रुचि दिखाता है। साथ ही वह ग्वादर को चाबहार से जोड़ने की योजना भी बना रहा है। खास यह कि चीन पहले से ही बंदरगाह क्षेत्र में मौजूद है और उसकी कंपनियों ने बंदरगाह के आसपास के विशेष आर्थिक क्षेत्र में अपने प्रतिष्ठान लगा लिए हैं।
अप्रैल 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ईरान यात्रा में तेहरान घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसमें अन्य बातों के अलावा, व्यापार, उद्योग, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, परिवहन और कृषि सहित राजनीतिक, रणनीतिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की विशाल क्षमता को साकार करने की इच्छा जताई गई थी।

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