सहारनपुर में बने सात करोड़ के नकली सिक्के बाज़ार में
असली जैसी चमक, नकली थी खनक! 25 वर्ष से बन रहे थे नकली सिक्के, गैंग की सफलता से सबका घूमा सिर
सहारनपुर में पकड़ी गई नकली सिक्कों के गिरोह की फैक्ट्री ने सबको चौका दिया है. यहां सिर्फ सिक्के नही ढलते थे। बल्कि उन्हें असली जैसा दिखाने को मशीन, डाई और फिनिशिंग तक की व्यवस्था थी. पुलिस के अनुसार यहां 20 रुपये के सिक्के तैयार करने की क्षमता 12 हजार प्रतिदिन थी। अब सात रजिस्टर और आठ मोबाइल इस नेटवर्क के बाजार कनेक्शन खोलेंगे.
सहारनपुर पुलिस ने नकली सिक्का बनाने वाले गैंग का अनावरण किया है
सहारनपुर,14 सितंबर 2026, सहारनपुर में नकली सिक्के निर्माता गिरोह के भंडाफोड़ के बाद अब पुलिस जांच का फोकस पूरे नेटवर्क पर है.25 साल से नकली सिक्के बना रहे मास्टरमाइंड उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह के पुराने संपर्कों और कारोबार की कड़ियां ढूंढी जा रही हैं.पुलिस को मिले सात हिसाब-किताब के रजिस्टर और आठ मोबाइल फोन अब इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां हैं.इनसे पता लगाने की कोशिश है कि नकली सिक्के कहां बनते थे,किन लोगों तक पहुंचते थे और बाजार में इन्हें खपाने का नेटवर्क क्या था.पुलिस ने मामले में पांच आरोपित पकड़े है.जांच में आठ लोगों के गिरोह की जानकारी मिली है.बाकी तीन आरोपितों की तलाश हो रही है.
25 साल पुराने नेटवर्क की खुल रही कुंडली
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण नाम मोहाली,पंजाब निवासी उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह है. पुलिस के अनुसार वह वर्ष 2001 से नकली सिक्के बनाने के धंधे में है.पुलिस के अनुसार दिल्ली पुलिस उसे पहले पकड़ चुकी है और एक समय उस पर एक लाख रुपये का इनाम भी घोषित था.अब सहारनपुर पुलिस उसके पुराने मामलों और संपर्क खंगाल रही है.जांच अधिकारी जानने की कोशिश में हैं कि इतने लंबे समय उसके साथ कौन-कौन लोग जुड़े और क्या पुराना नेटवर्क ही अलग-अलग जगहों पर नए ठिकानों के साथ सक्रिय है?जांच यह भी बताएगी कि सहारनपुर में नया बेस बनाने में कौन लोग थे.
सात रजिस्टरों में छिपा है हिसाब
नकली सिक्कों के साथ मिले सात रजिस्टर महत्वपूर्ण प्रमाण हैं. इन रजिस्टरों की जानकारी से गिरोह के लेनदेन और सप्लाई नेटवर्क की तस्वीर मिल सकती है. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि रजिस्टर में लिखे नाम और नंबर किससे जुड़े हैं. यदि इनमें सिक्कों की सप्लाई, रकम या खरीदारों से जुड़ी जानकारी मिली तो जांच सीधे उन लोगों तक पहुंच सकती है, जो गिरोह को बाजार तैयार करते थे. यानी पुलिस ने सिक्का फैक्ट्री तो ढूंढ ली है, अब उसकी कोशिश वें रास्ते ढूंढने की है जिनसे ये सिक्के बाजार पहुंचते थे. रजिस्टर के साथ मिले आठ मोबाइल फोन भी जांच का बड़ा आधार हैं. पुलिस इनसे आरोपितों के संपर्कों और उनकी गतिविधियों की जानकारी जुटा रही है. किससे लगातार बातचीत थी? किन राज्यों में संपर्क था? सहारनपुर के पहले आरोपित कहां सक्रिय थे? सिक्का सप्लाई को किन लोगों से संपर्क था? पुलिस सभी सवालों के जवाब ढूंढ रही है. जांच में सामने आये नंबरों और संपर्कों को आरोपितों के पुराने नेटवर्क से भी मिलाया जायेगा. इससे गिरोह में शामिल अन्य लोगों की भूमिका स्पष्ट होगी.
रोज 12 हजार सिक्का निर्माण क्षमता
पुलिस के अनुसार गिरोह का नकली सिक्के बनाने को इंडस्ट्रियल लेवल का सेटअप था. यहां प्रतिदिन 20 रुपये के 12 हजार नकली सिक्के बनाने की क्षमता थी. कार्रवाई में छह मशीनें,लोहे की डाई,बिना मोहर और मोहर वाली डाई, पॉलिशिंग मशीन और दूसरे उपकरण मिले हैं. बड़ी संख्या में अधबने सिक्के भी मिले हैं. पुलिस के अनुसार यह सेटअप किसी छोटे स्तर का नहीं था. इससे बड़े पैमाने पर सिक्के तैयार किए जा सकते थे. हालांकि पुलिस अभी यह मानकर नहीं चल रही कि वर्ष 2001 से हर दिन इतने सिक्के बन रहे थे. इसी से बाजार में खपाए गए सिक्कों की वास्तविक संख्या और रकम का आंकड़ा जांच पूरी होने से ही साफ होगा.
70 करोड़ से ज्यादा का अनुमान, लेकिन सटीक रकम बाकी
पूछताछ में नकली सिक्के बड़े पैमाने पर बाजार में चलाने का पता चला है. प्रारंभिक पुलिस जांच में 70 करोड़ रुपये से अधिक कीमत के नकली सिक्के बाजार में खपाया जाना अनुमानित है. हालांकि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिनंदन के अनुसार आरोपितों ने अभी तक कोई सटीक रकम नहीं बताई है. इसलिए 70 करोड़ रुपये का आंकड़ा फिलहाल अनुमान है, अंतिम आंकड़ा नहीं.रजिस्टर, मोबाइल फोन, पुराने रिकॉर्ड और आर्थिक लेनदेन की जांच से वास्तविक रकम का पता लगाने की कोशिश है.जांच में पुराने लेनदेन और सप्लाई के रिकॉर्ड मिलते हैं तो यह भी पता चलेगा है कि नकली सिक्कों का कारोबार किन-किन राज्यों तक फैला था.
छोटे लेनदेन में खपते थे सिक्के
पुलिस के अनुसार गिरोह नकली सिक्के शराब के ठेके, टोल टैक्स और छोटे कारोबार में खपाता था जहां छोटा लेन-देन होता है. ऐसे स्थानों पर बड़ी संख्या में सिक्कों का लेनदेन होने से हर सिक्के की बारीकी से जांच नहीं हो पाती. पुलिस का कहना है कि गिरोह इसी का फायदा उठाता था. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिनंदन के अनुसार नकली सिक्के देखने में काफी कुछ असली सिक्कों जैसे हैं. सामान्य जन दोनों में अंतर नहीं कर पाता. पुलिस के अनुसार आरोपित यहां अपना बेस बनाने की तैयारी में थे, लेकिन उससे पहले ही संयुक्त टीम ने उन्हें पकड़ लिया. अब यह पता लगाया जा रहा है कि सहारनपुर में उन्हें किसकी मदद मिल रही थी और क्या यहां पहले से कोई नेटवर्क था.
मशीन से तैयार होता था सिक्का
पुलिस को यहां से छह मशीनें मिली हैं. वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिनंदन के अनुसार पूरा सेटअप इंडस्ट्रियल लेवल का था जिसमें बड़ी संख्या में सिक्के तैयार करने की व्यवस्था थी. पुलिस के अनुसार इस सेटअप से 20 रुपये के 12 हजार सिक्के प्रतिदिन तैयार हो सकते हैं. पुलिस को यहां डाई पॉलिश मशीन, घिसाई पत्थर, ब्रश और दूसरे यंत्र भी मिले हैं. इससे संकेत मिलता है कि सिक्कों की फिनिशिंग भी उसी सेटअप में होती थी. रेती, हथौड़े, आरी, रिंच, शिकंजा, प्लास और पेचकश जैसे उपकरण भी मिले हैं. इनका इस्तेमाल पूरा सेटअप संचालन और डाई, मशीनों में होता था.

