मोदी क्यों एक साल सोना खरीद टालने को कह रहे?
पीएम मोदी क्यों चाहते हैं कि लोग एक साल तक गोल्ड ना ख़रीदें?
गहनों में महिला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को तेलंगाना के दौरे पर थे. सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने देश के लोगों से कई अपीलें कीं. इनमें से एक अपील एक साल तक सोना ख़रीदने से बचने की थी.
पीएम मोदी की यह अपील पहली नज़र में असामान्य लग सकती है- खासकर ऐसे देश में जहां सोना परंपरा, बचत और पारिवारिक समारोहों से गहराई से जुड़ा हुआ है.
लेकिन आर्थिक जानकारों का कहना है कि इस बयान के पीछे एक बड़ी आर्थिक चिंता छिपी है, वो है ईरान युद्ध के कारण लगातार बढ़ता वैश्विक ऊर्जा संकट. इस संकट का बड़ा असर भारत पर भी पड़ रहा है. भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर लगातार दबाव बढ़ रहा है और डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कमज़ोरी बढ़ रही है.
प्रधानमंत्री मोदी ने सप्लाई चेन का हवाला देते हुए कहा, “सप्लाई चेन पर लगातार संकट बना रहे तो हम कितने भी उपाय कर लें, मुश्किलें बढ़ती ही जाती हैं. इसलिए अब देश को सबसे पहले रखते हुए, हमें एकजुट होकर लड़ना होगा. देश के लिए मरना ही देशभक्ति नहीं होती है, देश के लिए जीना और देश के लिए अपने कर्तव्यों को निभाना, वो भी देशभक्ति होती है.”
उन्होंने कहा, “सोने की ख़रीद एक और पहलू है जिसमें विदेशी मुद्रा बहुत खर्च होती है. एक समय था जब संकट आता था तब लोग देशहित में सोना दान दे देते थे. आज दान की ज़रूरत नहीं है लेकिन देशहित में हमें यह तय करना होगा कि सालभर तक घर में कोई कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं ख़रीदेंगे.”
“सोना नहीं ख़रीदेंगे. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें यह स्वीकार करके विदेशी मुद्रा बचानी होगी.”
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सोना इतना अहम क्यों है?
ज्वैलरी
भारत में सोना घरेलू बचत और खर्च का अहम हिस्सा है, इसलिए यह दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट अहमदाबाद के इंडिया गोल्ड पॉलिसी सेंटर की प्रमुख प्रोफे़सर सुंदरावल्ली ने बीबीसी को बताया था, “हर साल 600 से 700 टन सोना आयात होता है और निर्यात बहुत कम है, इसलिए यह सोना घरों में जमा हो गया है.”
उन्होंने कहा, “भारतीय घरों में बहुत सारा सोना है. घरों में मौजूद सोने को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं, लेकिन आमतौर पर इसे 25 हज़ार से 27 हज़ार टन माना जाता है.”,
सुंदरावल्ली कहती हैं, “देश हर साल लगभग 700–800 टन सोने की खपत करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन केवल 1–2 टन के आसपास ही है. यानी भारत अपनी जरूरत का 90 फ़ीसदी से अधिक सोना आयात करता है.”
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, फ़रवरी 2026 तक भारत के पास करीब 880 टन आधिकारिक सोना था. इस मामले में भारत दुनिया में नौवें स्थान पर है. अमेरिका, जर्मनी, आईएमएफ, इटली, फ्रांस, रूस, चीन और स्विट्ज़रलैंड भारत से आगे हैं.
कई दूसरी चीज़ों के विपरीत, सोने का आयात बड़े स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में सीधे योगदान नहीं देता. इसके बावजूद, इसके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है.
यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची होती हैं, क्योंकि भारत अपनी लगभग 80 से 85 फ़ीसद तेल ज़रूरतों के लिए भी आयात पर निर्भर है. यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है और प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम 75 डॉलर से बढ़कर 110 डॉलर तक पहुँच गए हैं.
मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण ऊर्जा और उर्वरक की लागत बढ़ने के बीच, नीति निर्माता ऐसे गैर-ज़रूरी आयातों को नियंत्रित करने पर ध्यान दे रहे हैं जो आयात बिल बढ़ाते हैं. भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी लगभग 9% है. आयात होने वाली चीज़ों में कच्चे तेल के बाद गोल्ड दूसरे स्थान पर है।
सप्लाई संकट
सोना
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, फ़रवरी 2026 तक भारत के पास करीब 880 टन आधिकारिक सोना है (प्रतीकात्मक तस्वीर)
प्रधानमंत्री की अपील ऐसे समय में आई है जब भारत का सोना बाज़ार पहले से ही सप्लाई संकट का सामना कर रहा है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के 31 मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी-मार्च (2026) तिमाही में भारत में ज्वैलरी डिमांड पिछले साल की इसी तिमाही के दौरान से 19 फ़ीसदी कम है.
2025 की पहली तिमाही में जहां यह 82 टन थी, वहीं इस साल की पहली तिमाही में यह घटकर करीब 66 टन रह गई.
इस गिरावट की वजह सिर्फ़ ऊंची कीमतों के कारण मांग में कमी नहीं मानी जा रही, बल्कि आयात प्रक्रिया में प्रशासनिक और परिचालन संबंधी कुछ बाधाओं को भी इसके लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है.
तेल संकट के दौरान सोना क्यों बन जाता है समस्या
सोना
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना बाज़ारों में से एक है (प्रतीकात्मक तस्वीर)
आर्थिक नज़रिये से देखें तो भारत के लिए सोना और कच्चे तेल में एक बड़ी समानता है, दोनों का अधिकांश हिस्सा आयात किया जाता है और भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना होता है.
इसका मतलब यह है कि जब कच्चे तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ती हैं और सोने का आयात ऊंचा बना रहता है तो भारत को इस आयात का भुगतान करने के लिए बहुत ज़्यादा डॉलर की ज़रूरत पड़ती है.
इससे मुद्रा बाज़ार में डॉलर की माँग बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव पड़ता है. यही वजह है कि इस साल रुपया डॉलर के मुक़ाबले अब तक 5 फ़ीसदी तक टूट गया है और अपने सबसे निचले स्तर के करीब है.
सोने की खरीदारी रुपये पर कैसे असर डालती है?
सोने की बिस्किट
एसोचैम के मुताबिक भारतीय घरों में करीब 24 हज़ार टन सोना है (फ़ाइल फोटो)
अर्थशास्त्री गोल्ड को सामान्य उपभोक्ता वस्तु की तरह नहीं देखते. क्योंकि तेल यानी ईंधन जहां परिवहन, बिजली और औद्योगिक गतिविधियों के लिए ज़रूरी है, वहीं गोल्ड के इंपोर्ट को डिस्क्रेशनरी स्पेंडिंग (वैकल्पिक खर्च) या निवेश का विकल्प मानते हैं.
जब परिवार बड़ी मात्रा में सोना या ज्वैलरी ख़रीदते हैं तो गोल्ड के इंपोर्ट के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इससे चालू खाता घाटा यानी करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ जाता है. करंट अकाउंट डेफिसिट आयात और निर्यात के बीच अंतर को दिखाता है.
बढ़ता चालू खाता घाटा अक्सर रुपये को कमज़ोर करता है, क्योंकि देश जितनी विदेशी मुद्रा कमा रहा होता है, उससे ज्यादा खर्च कर रहा होता है. यही वजह है कि सरकारें अक्सर इन परिस्थितियों में सोने के आयात को लेकर सतर्क हो जाती हैं.
आर्थिक दबाव के दौर में भारत पहले भी अत्यधिक सोना आयात को हतोत्साहित करने के कदम उठा चुका है.
अतीत में सरकारों ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया है और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ़) जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया है. इन सभी कदमों का मक़सद विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करना और रुपये को स्थिर रखना था.
क्या एक परिवार के सोना खरीदने से सचमुच फर्क पड़ता है?
सोने की ज्वैलरी
ये सही है कि किसी एक परिवार के गहनों की खरीद टाल देने से रुपये की कीमत पर सीधा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन करोड़ों परिवारों की कुल मांग और हर साल सैकड़ों टन सोने के आयात को देखते हुए ये असर बड़ा दिख सकता है.
शादी के मौसम और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में सोने की मांग अक्सर और बढ़ जाती है, क्योंकि भारतीय परिवारों में आज भी सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है.
सोना किसी देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है और इसका सीधा असर उसकी मुद्रा पर पड़ता है.
सोने पर बढ़े टैरिफ़ का फ़ायदा क्या यूएई को मिलेगा, भारतीय वाक़ई कम कर देंगे ख़रीदारी?
गोल्ड
दुबई को भारत के साथ हुए समझौते का फ़ायदा मिल सकता है
भारत ने सोने और चांदी पर इम्पोर्ट टैरिफ़ यानी आयात शुल्क में बड़ी बढ़ोतरी करते हुए इसे छह प्रतिशत से बढ़ाकर 15% कर दिया है.
तीन फ़ीसदी जीएसटी को शामिल करने पर कुल आयात शुल्क 9.18% से बढ़कर 18.45% हो जाएगा.
यानी पहले 100 रुपए का आयातित सोना क़रीब 9.18 रुपये के टैक्स के साथ भारत आता था. अब उसी आयात पर लगभग 18.45 रुपये का टैक्स लगेगा. यानी प्रभावी आयात शुल्क का बोझ 100% से अधिक बढ़ गया है.
यह क़दम ऐसे समय में उठाया गया है, जब क़ीमती धातुओं का आयात तेज़ी से बढ़ा है. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 25% अधिक था. वहीं चांदी का आयात 12 अरब डॉलर से अधिक का रहा था, जिसमें सालाना 150% की असाधारण वृद्धि दर्ज की गई.
दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) का मानना है कि यह वृद्धि भारत-यूएई कॉम्परहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (सीइपीए) के तहत वहाँ से आने वाले कीमती धातु आयात के गणित को भी काफ़ी बदल देगी.
सीइपीए के तहत भारत ने मई 2022 से शुरू होकर 10 सालों में चांदी पर आयात शुल्क को 10% से घटाकर शून्य करने पर सहमति दी थी. वर्तमान में यूएई से आने वाली चांदी पर रियायती शुल्क सात फ़ीसदी है.
अब भारत ने सामान्य आयात शुल्क को 15% कर दिया है, ऐसे में शुल्क का अंतर आठ प्रतिशत तक बढ़ गया है. इससे दुबई के ज़रिए आयात करना सस्ता हो गया है.
जीटीआरआई के निदेशक अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि यह अंतर हर साल और बढ़ेगा क्योंकि सीईपीए के तहत टैरिफ़ 2031 तक घटकर शून्य हो जाएगा.
यूएई को फ़ायदा
सोना
आयात शुल्क के बढ़ते अंतर से वैश्विक बुलियन व्यापार का बड़ा हिस्सा दुबई के ज़रिए आने की संभावना बढ़ सकती है
श्रीवास्तव कहते हैं, ”यूएई से सोने के आयात को भी समझौते के तहत ख़ास रियायत हासिल है. भारत ने टैरिफ रेट कोटा प्रणाली के तहत दुबई से सोने के आयात पर मोस्ट-फेवर्ड-नेशन की दर से एक प्रतिशत कम शुल्क की अनुमति दी थी. यह कोटा 2022 में 120 टन प्रतिवर्ष से शुरू हुआ था और 2027 तक बढ़कर 200 टन हो जाएगा, जो भारत के वार्षिक सोना आयात का लगभग एक-चौथाई है. नई एमएफएन शुल्क व्यवस्था के तहत जहां सामान्य प्रभावी शुल्क 15% हो गया है, वहीं यूएई कोटा के तहत आने वाला सोना 14% शुल्क पर आएगा.”
अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”आयात शुल्क के बढ़ते अंतर से वैश्विक बुलियन व्यापार का बड़ा हिस्सा दुबई के ज़रिए आने की संभावना बढ़ सकती है जबकि यूएई ख़ुद सोना या चांदी का खनन करने वाला देश नहीं है.”
“यूएई के साथ जो समझौता हुआ है, उसमें लिखा है कि जो भी भारत का टैरिफ़ होगा, उससे एक प्रतिशत कम में दुबई से सोना आएगा. यानी बाक़ी देशों से सोना लाने पर 15 फ़ीसदी का टैरिफ़ लगेगा लेकिन दुबई से लाने पर 14 प्रतिशत का ही टैरिफ़ लगेगा. सोना इतना महंगा हो गया है कि एक फ़ीसदी टैरिफ़ कम होना भी बड़ी रियायत होगी. ऐसे में दुबई से सोना लेने की होड़ लग सकती है.”
चाँदी के मामले में अजय श्रीवास्तव कहते हैं, ”सिल्वर में तो और ज़्यादा क़ीमतों में फ़र्क़ होगा. सरकार ने 15 फ़ीसदी टैरिफ़ सिल्वर के ऊपर लगाया है. लेकिन दुबई से सिल्वर के लिए कहा है कि 2031 तक ज़ीरो पर्सेंट टैरिफ़ होगा. टैरिफ़ कम होते-होते आज की तारीख़ में सात फ़ीसदी रह गया है. यानी 15 प्रतिशत बाक़ी देशों से टैरिफ़ और दुबई से केवल सात प्रतिशत. यानी आठ प्रतिशत टैरिफ़ की छूट मिलेगी. यानी भारतीय दुबई से सिल्वर ख़रीदना पसंद करेंगे. भारत यूएई से किसी एग्रीमेंट से अचानक बाहर नहीं सकता है.”
मोदी सरकार ने आयात शुल्क में बढ़ोतरी दुनिया के दूसरे सबसे बड़े बुलियन बाज़ार भारत में मांग कम करने के उद्देश्य से की है.
यह क़दम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील के बाद आया है, जिसमें उन्होंने नागरिकों से सोना ख़रीदने और ग़ैर-ज़रूरी विदेशी यात्राओं से बचने को कहा था ताकि रुपये को सहारा दिया जा सके.
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक भारत, पर्सियन गल्फ़ में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने से महंगाई की चपेट में है. सोना भारतीय संस्कृति में गहराई से जुड़ा हुआ है. बचत, विवाह और धार्मिक त्योहारों में इसकी अहम भूमिका है. भारत सोने की मांग आयात से पूरी करता है और पिछले साल 710 टन सोने का आयात हुआ था.
सोने से फॉरेक्स पर दबाव
दुबई
15 प्रतिशत बाक़ी देशों से टैरिफ़ और दुबई से केवल सात प्रतिशत रहेगा
भारत आबादी के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा मुल्क है, जबकि विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में अभी पाँचवें नंबर पर है.
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास अभी 690 अरब डॉलर का फॉरेक्स है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने कच्चे तेल के आयात के लिए 174 अरब डॉलर ख़र्च किए थे. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक गुड्स पर 116 अरब डॉलर. तीसरे नंबर पर सोने का आयात था और जिसकी क़ीमत 72 अरब डॉलर थी.
पिछले कुछ सालों में सोने की क़ीमत दोगुने से अधिक बढ़ चुकी है. हालांकि ईरान पर हमले के बाद महंगाई संबंधी चिंताओं के कारण इसमें कुछ गिरावट आई थी.
बढ़ते आयात बिलों के कारण विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ा है. इससे रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और भारतीय रिज़र्व बैंक को हस्तक्षेप करना पड़ा.
सोना
कंसल्टेंसी फर्म मेटल्स फोकस के प्रमुख सलाहकार चिराग शेठ ने अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से कहा, ”टैरिफ़ बढ़ोतरी से घरेलू बाज़ार में सोने और चांदी की क़ीमतें बढ़ेंगी. हालांकि शादियों के लिए सोना ख़रीदना सरकारी फ़ैसले के बावजूद जारी रहेगा. इस अवधि में लोग क़ीमतें स्थिर होने का इंतज़ार करते हुए सोना ख़रीदना रोक सकते हैं.”
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं कि आयात शुल्क बढ़ाने से लोग सोना ख़रीदना बंद कर देंगे, ऐसा नहीं होगा.
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ”जब रुपया कमज़ोर रहेगा तो लोग निवेश के लिए सोना ही ख़रीदेंगे. सरकार ने आयात शुल्क राजस्व कमाने के लिए किया है न कि फॉरेक्स पर प्रेशर कम करने के लिए. सरकार की अपील भी लोग तभी सुनते हैं, जब सरकार के स्तर पर ईमानदारी दिखती है. आपके काफ़िले में दर्जनों गाड़ियां रहेंगी और लोगों से अपील करेंगे कि सार्वजनिक वाहन से चलिए तो कोई नहीं मानेगा.”
प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि आयात शुल्क बढ़ाने का सीधा फ़ायदा यूएई को होगा और सोने की तस्करी भी बढ़ेगी.
कितना असर
सोनाइमेज स्रोत,Getty Images
इमेज कैप्शन,तीन फ़ीसदी जीएसटी को शामिल करने पर कुल आयात शुल्क 9.18% से बढ़कर 18.45% हो जाएगा.
ऑल बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश सिंघल का मानना है कि सरकार ने गोल्ड पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी डॉलर बचाने के लिए नहीं बल्कि टैरिफ़ से पैसे कमाने के लिए की है.
सिंघल कहते हैं, ”2023 में भारत ने 743 टन सोने का आयात किया था और तब टैरिफ़ 15 फ़ीसदी ही था. पिछले साल गोल्ड पर टैरिफ़ छह प्रतिशत था और आयात 710 टन था. ऐसे में कोई कैसे मान ले कि आयात शुल्क बढ़ जाने से सोने का आयात कम हो जाएगा. सरकार लोगों से इमोशनल अपील केवल अपनी जेब भरने के लिए कर रही है. इससे गोल्ड की तस्करी बढ़ेगी और सरकार को राजस्व हासिल होगा. जब कुल आयात पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है तो सरकार फॉरेक्स कहाँ से बचा लेगी?”
एक मई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर 690.7 अरब डॉलर रह गया है, जो एक महीने से अधिक समय का सबसे निचला स्तर है. हालांकि यह भंडार अब भी 10 से 11 महीनों के आयात बिल को कवर करने के लिए पर्याप्त माना जाता है.
ब्लूमबर्ग से हॉन्ग कॉन्ग स्थित बीएनवाई के एशिया-पैसिफिक मैक्रो स्ट्रैटिजिस्ट वी चोंग ने कहा, “ये क़दम सीमित स्तर पर मदद कर सकते हैं, लेकिन रुपये पर गिरावट के दबाव को पूरी तरह नहीं बदल पाएंगे. ऊंची तेल क़ीमतें, मज़बूत होता डॉलर और विदेशी पूंजी की निकासी अभी रुपये पर दबाव बनाए रखेंगी.”
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पीएम ने जब सोने की ख़रीद एक साल तक नहीं करने की अपील की उसके बाद पूरे भारत में लोगों ने घबराहट में ख़रीदारी शुरू कर दी.
इकनॉमिक टाइम्स से ऑल इंडिया जेम एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के अध्यक्ष राजेश रोकड़े ने कहा, “पिछले दो दिनों में शादी के गहनों की बिक्री औसत दैनिक बिक्री की तुलना में 15% से 20% बढ़ गई है.”
पांच दक्षिणी राज्यों में 65 स्टोर चलाने वाले जोस अलुक्कास के प्रबंध निदेशक वर्गीज अलुक्कास ने इकनॉमिक टाइम्स से कहा, “कुछ लोग नवंबर-दिसंबर में होने वाली शादियों के लिए भी अभी से सोना ख़रीद रहे हैं, क्योंकि उन्हें भ्रम है कि सरकार कहीं सोने की ख़रीद पर प्रतिबंध न लगा दे.”

