ज्ञान:भारत पर टैरिफ से अमेरिकी अर्थव्यवस्था की खुदेगी कब्र! 95 वर्ष पूर्व की गलती से नहीं ली सीख
अमेरिका का भारत पर टैरिफ लगाने का कदम 1930 के स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट की याद दिलाता है, जिसने महामंदी को और गहरा कर दिया था. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह टैरिफ अमेरिका में महंगाई बढ़ाएगा और जवाबी कार्रवाई को जन्म देगा, जिससे अंत में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही नुकसान पहुंचेगा.
नई दिल्ली 31 जुलाई 2025। कहते हैं कि वर्तमान में आप जो भी फैसला करें, उसमें इतिहास में हुई गलतियों से ली गई सीख जरूर होनी चाहिए. लेकिन शायद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात को भूल गए हैं. यही वजह है कि उन्होंने भारत पर 25 फीसदी के टैरिफ का ऐलान कर दिया, बिना ये सोचे कि उनका ये फैसला अमेरिका पर खुद कितना भारी पड़ेगा.
पहली नजर में आपको यह अमेरिका को मजबूत बनाने वाला कदम लग सकता है, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो एक डरावनी तस्वीर सामने आती है. ऐसा लगता है कि अमेरिका अपनी 95 साल पुरानी एक भयंकर गलती से कोई सबक नहीं ले रहा है, एक ऐसी गलती जिसने उसकी अर्थव्यवस्था को डुबो दिया था और दुनिया को महामंदी की आग में और झोंक दिया था.
क्या है 95 साल पुरानी वो ऐतिहासिक गलती?
यह बात है साल 1930 की, जब अमेरिका ने स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट (Smoot-Hawley Tariff Act) लागू किया था. इस कानून का मकसद भी यही था, अमेरिकी किसानों और कंपनियों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना. इसके लिए 20,000 से ज्यादा विदेशी उत्पादों पर टैरिफ को बढ़ा दिया गया था. अमेरिका को लगा कि इससे लोग विदेशी सामान खरीदना बंद कर देंगे और अमेरिकी सामान खरीदेंगे, जिससे देश की इकोनॉमी मजबूत होगी. लेकिन हुआ ठीक इसका उलटा.
अमेरिका के इस कदम से दुनियाभर के देश भड़क गए. उन्होंने भी बदले में अमेरिकी सामानों पर भारी टैरिफ लगा दिए. नतीजा यह हुआ कि ग्लोबल ट्रेड यानी दुनियाभर का व्यापार ठप हो गया. अमेरिकी सामानों की मांग विदेशों में लगभग खत्म हो गई और अमेरिकी कंपनियों का एक्सपोर्ट 60% से ज्यादा गिर गया. इस ट्रेड वॉर ने 1929 में शुरू हुई महामंदी (Great Depression) को और ज्यादा भयानक बना दिया.
कैसे इतिहास खुद को दोहरा सकता है?
अब 95 साल बाद, अमेरिका फिर से वही संरक्षणवादी (Protectionist) नीति अपना रहा है. भारत जैसे देशों से आने वाले सामान पर 25% तक टैरिफ लगाने का फैसला लेकर. तर्क वही पुराना है, अमेरिकी इंडस्ट्री को बचाना. लेकिन इसके नतीजे भी पुराने जैसे ही हो सकते हैं, जिसका सबसे बड़ा खामियाजा खुद अमेरिका को भुगतना पड़ सकता है.
अमेरिका अपनी ही कब्र कैसे खोद रहा है?
भारत से अमेरिका को टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, दवाईयां, मसाले और कई इंजीनियरिंग सामान सप्लाई होते हैं. इन पर टैरिफ लगने का मतलब है कि अमेरिका में इन सभी चीजों की कीमत बढ़ जाएगी. यह बोझ सीधा अमेरिकी नागरिकों और कंपनियों की जेब पर पड़ेगा, जिससे वहां महंगाई बढ़ेगी.
इसके अलावा, अमेरिका के इस टैरिफ ऐलान के बाद, भारत चुप नहीं बैठेगा. अगर अमेरिका टैरिफ लगाता है, तो भारत भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी टैरिफ लगा सकता है. इससे अमेरिकी किसानों और कंपनियों को बड़ा नुकसान होगा जो भारत को अपना सामान बेचते हैं.
इसके अलावा, कई अमेरिकी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स बनाने के लिए भारत से सस्ते कच्चे माल और पार्ट्स मंगाती हैं. टैरिफ के बाद ये पार्ट्स महंगे हो जाएंगे, जिससे अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ेगी और उनका मुनाफा कम होगा.
आसान भाषा में समझें तो, जो टैरिफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए लगाया जा रहा है, वही महंगाई, जवाबी कार्रवाई और घटते मुनाफे के जरिए उसी के लिए एक कब्र खोद सकता है. इतिहास गवाह है कि ट्रेड वॉर से शायद ही किसी का भला होता है और जो इसे शुरू करता है, अक्सर उसे भी भारी कीमत चुकानी पड़ती है.
US टैरिफ के ऐतिहासिक खतरे पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सवाल 1: खबर में किस 95 साल पुरानी गलती का जिक्र है?
जवाब: यह गलती 1930 का ‘स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट’ है. यह अमेरिका द्वारा लगाया गया एक कानून था जिसने विदेशी सामानों पर टैक्स बहुत बढ़ा दिया था. इसका नतीजा एक वैश्विक ट्रेड वॉर के रूप में निकला, जिसने महामंदी को और बदतर बना दिया.
1930 का स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट, अमेरिकी इतिहास का एक विवादास्पद कानून था, जिसे महामंदी में लागू किया गया था। इस अधिनियम ने विदेशी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ाकर अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने का प्रयास किया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप वैश्विक व्यापार युद्ध छिड़ गया और महामंदी और गहरी हो गई।
स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट (Smoot-Hawley Tariff Act):
पृष्ठभूमि:
1929 में शुरू हुई महामंदी के दौरान, अमेरिकी किसानों और व्यवसायों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा था। इस अधिनियम को अमेरिकी उद्योगों को बचाने के लिए पेश किया गया था।
मुख्य प्रावधान:
इसने लगभग 20,000 आयातित वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा दिया, जिससे कई देशों ने जवाबी कार्रवाई की।
प्रभाव:
वैश्विक व्यापार युद्ध: अन्य देशों ने भी अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाकर जवाबी कार्रवाई की, जिससे वैश्विक व्यापार में भारी गिरावट आई।
महामंदी गहराई: अर्थशास्त्रियों का मानना है कि स्मूट-हॉले टैरिफ ने महामंदी को और बदतर बना दिया, क्योंकि इससे वैश्विक व्यापार बाधित हुआ और आर्थिक मंदी और बढ़ गई।
ऐतिहासिक महत्व:
यह अधिनियम एक चेतावनी के रूप में देखा जाता है कि संरक्षणवादी व्यापार नीतियां, जो घरेलू उद्योगों को बचाने के उद्देश्य से हैं, अनपेक्षित परिणाम दे सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
संक्षेप में, स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट एक ऐसा कानून था जिसका उद्देश्य अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाना था, लेकिन इसके विपरीत, इसने महामंदी को और गहरा कर दिया।

सवाल 2: भारत पर टैरिफ लगाने से अमेरिका को कैसे नुकसान हो सकता है?
जवाब: इससे तीन बड़े नुकसान हो सकते हैं- पहला, भारत से आने वाला सामान महंगा होने से अमेरिका में महंगाई बढ़ेगी. दूसरा, भारत जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सामानों पर टैक्स लगा सकता है. तीसरा, जिन अमेरिकी कंपनियों का कच्चा माल भारत से आता है, उनकी लागत बढ़ जाएगी.
सवाल 3: ‘ट्रेड वॉर’ या ‘व्यापार युद्ध’ का क्या मतलब है?
जवाब: ट्रेड वॉर एक ऐसी स्थिति है जब एक देश दूसरे देश से आने वाले सामान पर टैक्स (टैरिफ) बढ़ाता है, और फिर दूसरा देश भी बदले में पहले देश के सामान पर टैक्स बढ़ा देता है. इससे दोनों देशों के बीच व्यापार बुरी तरह प्रभावित होता है.
सवाल 4: तो क्या स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट पूरी तरह से फेल हो गया था?
जवाब: हां, अर्थशास्त्री मोटे तौर पर इस बात से सहमत हैं कि यह एक्ट अपने मकसद में पूरी तरह फेल हुआ था. इसने अमेरिकी नौकरियों या उद्योगों को बचाने के बजाय वैश्विक व्यापार को सिकोड़ दिया और महामंदी को और गहरा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई.
सवाल 5: क्या अमेरिका का यह कदम भारत को ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा या खुद अमेरिका को?
जवाब: शॉर्ट टर्म में देखा जाए तो यह भारत के एक्सपोर्टर्स को प्रभावित करेगा, लेकिन लंबी अवधि में यह कदम अमेरिका को भी भारी पड़ सकता है. महंगाई बढ़ने और जवाबी कार्रवाई से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ना लगभग तय है.

