‘संस्थायें बदनाम करने का अधिकार नहीं’: 42 पूर्व जजों का EC के समर्थन में खुला पत्र
‘संस्थायें बदनाम करने का अधिकार किसी को नहीं’: SIR पर 42 पूर्व जजों ने EC के समर्थन में लिखा खुला पत्र
पूर्व जजों ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के समर्थन में लिखा कि जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ जहरीला माहौल बनाया जा रहा है, ऐसे दौर में खामोश बैठना तटस्थता नहीं बल्कि व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना होगा. पत्र में आगाह किया गया कि जनता का भरोसा ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है.
नई दिल्ली 08 अक्टूबर 2026 . देश के 42 पूर्व जजों ने एक संयुक्त खुला पत्र जारी कर निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और अन्य शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार हो रहे हमलों को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है. पूर्व जजों ने दो-टूक शब्दों में कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के ‘वोट चोरी’ जैसे संगीन आरोप लगाना और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को ‘चोर’ या ‘बिकाऊ’ ठहराना एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा लगता है।
उन्होंने चेताया है कि राजनीतिक लाभ या हताशा में लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर इस तरह लगातार कीचड़ उछालना बेहद खतरनाक चलन है. इससे जनता का अपनी ही लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं से भरोसा उठने का गंभीर जोखिम पैदा हो रहा है, जो सीधे तौर पर संविधान की बुनियाद को चोट पहुंचाता है.
खत में चेतावनी दी गई है, ‘भरोसा लोकतंत्र की करेंसी है.’ और कहा गया है कि चुनावों को गलत साबित करने की कोशिशों से अशांति फैल सकती है और अराजक तत्व हिम्मत बढ़ा सकते हैं. साइन करने वालों ने राजनीतिक पार्टियों से शिकायतों को ई-मेल के जरिए आगे बढ़ाने की अपील की है.
पत्र में लिखा था, “हम इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि ऐसे समय में चुप रहना अब कोई तटस्थ विकल्प नहीं है. हमें गहरी चिंता है। भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं.” इसमें आगे कहा गया, “भारत का चुनाव आयोग इन हमलों के केंद्र में है. यहां तक कि उच्च न्यायपालिका, जिसका हम बहुत सम्मान करते हैं, और वैधानिक एजेंसियों को भी नहीं बख्शा गया है.”
जजों ने इस बात पर जोर दिया कि ये हमले सोच-समझकर की गई आलोचना नहीं हैं. उन्होंने लिखा, “यह राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित एक सुनियोजित अभियान लगता है, जिसमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अस्थिर करने के संभावित विनाशकारी परिणामों की कोई परवाह नहीं की गई है.” वोटर लिस्ट के SIR का बचाव करते हुए, हस्ताक्षर करने वाले पूर्व जजों ने ज़ोर दिया कि यह कानूनी रूप से स्थापित एक प्रक्रिया है, जिसका मकसद साफ-सुथरी और सटीक वोटर लिस्ट सुनिश्चित करना है.
पत्र में चेतावनी दी गई है कि “भरोसा ही लोकतंत्र की असली पूंजी है” और चुनावों की वैधता पर सवाल उठाने की कोशिशों से अशांति फैल सकती है और अराजक तत्वों को बढ़ावा मिल सकता है. 

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और अन्य लोग शामिल हैं. हस्ताक्षर करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस पंकज मित्तल भी शामिल हैं.
खुले पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में तीन पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं. इनमें जम्मू-कश्मीर और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.सी. पटेल, कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुभ्रो कमल मुखर्जी और सिक्किम हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश परमोद कोहली शामिल हैं. यह पत्र ऐसे समय सामने आया है, जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन को लेकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष में साहस है तो उसे उन सीटों से इस्तीफा दे देना चाहिए, जिन पर वह भारत निर्वाचन आयोग द्वारा कराए गए चुनावों के जरिए जीता है.
राहुल गांधी ने 7 अक्टूबर को एक बार फिर जंतर-मंतर की ओर मार्च का नेतृत्व किया था. राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और विपक्ष के अन्य सांसदों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था. इंडिया ब्लॉक के सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए जा रहे थे, तभी जनपथ के पास उन्हें ले जा रही बस को रोक दिया गया. नितिन नबीन ने पत्रकारों से कहा कि ये ऐसे लोग हैं, जो समाज में जहर फैलाना जानते हैं. उन्होंने कहा कि इसी चुनाव आयोग ने केरल में चुनाव कराया और तमिलनाडु में भी चुनाव कराया, जहां विपक्षी दल सत्ता में आए.
इस चिट्ठी में कांग्रेस और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ पर तीखे हमले किए गए, जो इस विरोध-प्रदर्शन में सबसे आगे हैं. चिट्ठी में लिखा है, ” ‘वोट चोरी’ के आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाते हैं, न कि कोर्ट में. जब कमीशन शपथ-पत्र मांगता है, तो कोई भी इसे जमा नहीं करता. हारने के बाद ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को दोष दिया जाता है. उन्हीं मशीनों से मिली जीत पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता. जो पार्टी पांच दशकों से ज़्यादा समय तक देश पर राज करती रही, वही अब दावा कर रही है कि जिस सिस्टम ने उसे चुना, उसी में धांधली हुई है.”
इसमें आगे कहा गया है, “यह पार्टी अकेले ऐसा नहीं करती. एक्टिविस्ट संगठन, जिनका चुनिंदा मामलों में केस करने का लंबा रिकॉर्ड रहा है, इन दावों को कानूनी रूप देने की कोशिश करते हैं. वे एक के बाद एक याचिकाएं दायर करते हैं. वे शायद ही कभी सबूत पेश करते हैं. कोर्टरूम एक मंच बन जाता है, और जब फैसला आता है, तो अगर वह उनके फायदे का नहीं होता, तो उसकी आलोचना की जाती है. इसके बाद जहरीले बयानों को बड़े पैमाने पर फैलाया जाता है, जिसका मकसद जानबूझकर एक स्थापित और भरोसेमंद न्यायिक व्यवस्था से लोगों का भरोसा कम करना होता है.”
क्विक आंसर्स
चुनाव आयोग के समर्थन में कितने पूर्व जजों ने खुला पत्र जारी किया है?
देश के 42 पूर्व जजों ने एक संयुक्त खुला पत्र जारी कर चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हो रहे लगातार हमलों पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
पूर्व जजों ने वोटर लिस्ट के एसआईआर (SIR) का समर्थन क्यों किया है?
पूर्व जजों ने वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का बचाव करते हुए कहा कि यह एक कानूनी रूप से स्थापित प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य एक स्वच्छ और सटीक मतदाता सूची सुनिश्चित करना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किसने किया?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान 7 अक्टूबर को राहुल गांधी ने जंतर-मंतर की ओर एक मार्च का नेतृत्व किया, जिसके बाद उन्हें और अन्य विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया गया.
इसके पहले भी मई 2024 में लोकसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग (ECI) पर विपक्ष और कुछ समूहों द्वारा उठाए जा रहे सवालों के जवाब में 42 पूर्व न्यायाधीशों, वरिष्ठ नौकरशाहों और सशस्त्र बलों के दिग्गजों सहित कुल 271 प्रबुद्ध नागरिकों ने एक खुला पत्र लिखा था। इस पत्र में विशेष रूप से 42 पूर्व न्यायाधीश शामिल थे, जिन्होंने संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने के प्रयासों की निंदा की थी।
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख पूर्व न्यायाधीशों में निम्नलिखित नाम शामिल थे:
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) पी. एन. रवींद्रन (पूर्व न्यायाधीश, केरल उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एस. एन. धींगरा (पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजीव लोचन मेहरोत्रा (पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) करम चंद पुरी (पूर्व न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राकेश सक्सेना (पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एस. के. सक्सेना (पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजेश कुमार (पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अनिल कुमार शर्मा (पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी. एस. रेड्डी
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अंबादास जोशी (पूर्व न्यायाधीश, बॉम्बे उच्च न्यायालय)
इस समूह में विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीश और पूर्व जिला न्यायाधीश भी शामिल थे।
न्यायाधीशों के अलावा, इसी खुले पत्र पर 115 सेवानिवृत्त नौकरशाहों (जैसे पूर्व विदेश सचिव शशांक, पूर्व गृह सचिव एल. सी. गोयल) और 114 सशस्त्र बलों के पूर्व अधिकारियों (पूर्व उप-सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़ आदि) ने भी हस्ताक्षर किए थे। पत्र का मुख्य उद्देश्य चुनाव आयोग की स्वायत्तता और विश्वसनीयता पर अनुचित हमलों को रोकना था।


