पंडित श्याम जी कृष्ण वर्मा जिन्होने 1900 में लंदन में बनाया क्रांतिकारियों का ठिकाना इंडिया हाउस
श्यामजी कृष्ण वर्मा : वो ब्राह्मण जिसने लंदन में भारत माता का मंदिर बनाया
सन् 1857 का विद्रोह दब चुका था। अंग्रेजों ने सोचा था कि अब हिन्दुस्तान हमेशा के लिए गुलाम हो गया। लेकिन कच्छ के मांडवी कस्बे में, एक साधारण कठियावाड़ी ब्राह्मण परिवार में 4 अक्टूबर 1857 को जन्मा वह बालक, जिसका नाम रखा गया श्यामजी कृष्ण वर्मा, भारत माता की आज़ादी का पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर बनने वाला था।
जब वह मात्र 11 साल का था, तभी उसके पिता ब्रह्म लीन हो गए। माँ गौरीबाई ने कंद-मूल बेचकर बेटे को पढ़ाया। संस्कृत, वेद, दर्शन और अंग्रेज़ी; छोटा श्यामजी सब कुछ लपक लेता था। मात्र 21 साल की उम्र में उसने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया; वो पहला भारतीय था जिसे ऑक्सफोर्ड ने पूर्ण छात्रवृत्ति दी। बैरिस्टर बनकर लौटा तो भावनगर, जूनागढ़ और रतलाम की दीवानी में जज बना। लेकिन अंदर एक आग सुलग रही थी।
सन् 1900 में, जब पूरी दुनिया में कोई भारतीय क्रांतिकारी सोच भी नहीं सकता था कि लंदन में अंग्रेजों के दिल में खंजर घोंपा जा सकता है, श्यामजी अपना सारा पैसा, अपनी सारी जायदाद बेच लंदन पहुँच गए। उन्होंने हाईगेट में एक बड़ा मकान खरीदा और उसका नाम रखा – इंडिया हाउस।
वहाँ भारत का तिरंगा फहराया। प्रवेश द्वार पर संस्कृत में लिखवाया:
“यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्” (जहाँ सारा विश्व एक घोंसला बन जाता है)।
इंडिया हाउस में रहने वाले युवकों के लिए नियम था:
सुबह 4 बजे उठो
व्यायाम करो, बंदूक चलाना सीखो
शाम को वेद पाठ और क्रांति की योजना
रात को अंग्रेजी अखबार पढ़ो और उनके झूठ को बेनकाब करो
यहाँ रहने आए: विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल धिंगरा, लाला हरदयाल, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, भाई परमानंद… और सैकड़ों नौजवान। श्यामजी उनके पिता, गुरु और सेनापति तीनों थे।
उन्होंने “द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट” नाम का अखबार निकाला। हर अंक में लिखते:
“Political assassination is not murder; it is justice.”
अंग्रेज काँप उठते। ब्रिटिश संसद में हंगामा हुआ कि हिंदुस्तान से एक ब्राह्मण लंदन में बैठकर साम्राज्य की नींव हिला रहा है।
सन् 1909 में मदनलाल धिंगरा ने कर्जन वायली को गोली मारी। फाँसी के तख्ते पर जाते हुए धिंगरा ने कहा: “मेरे गुरु पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा के चरणों में मेरा अंतिम प्रणाम।”
अंग्रेजों ने श्यामजी को पकड़ने के लिए 10,000 पाउंड (उस ज़माने के लाखों रुपये) इनाम घोषित किया। लेकिन वह ब्राह्मण भागा नहीं। वह पेरिस चला गया और वहाँ से भी क्रांति की ज्वाला जलाए रखी।
1930 में, 73 साल की उम्र में, श्यामजी की तबीयत खराब हो गई। डॉक्टरों ने कहा – “अब बस कुछ दिन बाकी हैं।”
उन्होंने अंतिम इच्छा लिखवाई: “मेरा शव जला कर राख भारत मत भेजना। जब तक भारत पूरी तरह आज़ाद न हो जाए, मेरी अस्थियाँ भी गुलाम ज़मीन पर न पड़ें। इसे जिनेवा में ही रखना।
जब स्वराज आए, तभी मेरी राख गंगा में विसर्जित करना।”
30 जून 1930 को जिनेवा में उनका देहांत हुआ। उनकी पत्नी भानुमति बाई ने अस्थिकलश को लोहे की पेटी में बंद कर जिनेवा के एक म्यूज़ियम में रखवा दिया।
फिर 72 साल बीत गए।
15 अगस्त 2003 को, जब भारत आज़ाद हो चुका था, उनकी पौत्र-वधू और गुजरात सरकार के प्रतिनिधि जिनेवा पहुँचे। लोहे की उस पेटी को खोला गया।
अंदर एक छोटा सा कलश था, जिस पर लिखा था:
“श्यामजी कृष्ण वर्मा – भारत माता के सच्चे सपूत।”
जब वह कलश मांडवी लाया गया, लाखों लोग रो रहे थे।
22 अगस्त 2003 को उनकी अस्थियाँ साबरमती में विसर्जित की गईं।
उसी दिन गुजरात सरकार ने घोषणा की:
“मांडवी में श्यामजी का जो घर था, उसे हम क्रांति-तीर्थ बनाएँगे।”
वह ब्राह्मण, जिसने कभी एक इंच भी भारतीय ज़मीन पर अंग्रेजों के सामने सिर नहीं झुकाया,
लेकिन आज बिडम्बना देखिए पंडित श्यामजी वर्मा का नाम लेने वाला कोई नही वही जिन्होंने अंग्रेजो की दलाली की उन्हें चुम्मीदान निर्माता घोसित करके फर्जी तरीके से महिमा मंडित किया जा रहा है।
जिसने लंदन में भारत का तिरंगा फहराया,
जिसने अपनी अस्थियाँ तक गुलाम भारत में आने नहीं दीं…
उस महान कठियावाड़ी ब्राह्मण का नाम है –
पंडित श्यामजी कृष्ण वर्मा।
जय हिंद। जय भारत।
और हर उस ब्राह्मण पुत्र का अभिवादन , जिसने वेद की ऋचा और बंदूक की गोली, दोनों को एक साथ उठाया।
श्यामजी कृष्ण वर्मा (जन्म: 4 अक्टूबर 1857 – मृत्यु: 31 मार्च 1930) क्रान्तिकारी गतिविधियों के माध्यम से भारत की आजादी के संकल्प को गतिशील करने वाले अध्यवसायी एवं कई क्रान्तिकारियों के प्रेरणास्रोत थे। वे पहले भारतीय थे, जिन्हें ऑक्सफोर्ड से एम॰ए॰ और बार-ऐट-ला की उपाधियाँ मिलीं थीं। पुणे में दिये गये उनके संस्कृत के भाषण से प्रभावित होकर मोनियर विलियम्स ने वर्माजी को ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर बना दिया था। श्यामजी कृष्ण वर्मा भी अन्य सभी क्रान्तिकारियों की तरह आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती से अत्यधिक प्रभावित थे और बंबई आर्य समाज के पहले अध्यक्ष थे । काले पानी कि सजा पाने वाले क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर भी वर्माजी से प्रेरित होकर क्रांतिकारी कार्यो में सम्मिलित हुए।लन्दन में इण्डिया हाउस की स्थापना की जो इंग्लैण्ड पढ़ने वाले छात्रों के परस्पर मिलन एवं विविध विचार-विमर्श का प्रमुख केन्द्र था।

श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर1857 को गुजरात प्रान्त के माण्डवी कस्बे में श्रीकृष्ण वर्मा के यहाँ हुआ था। यह कस्बा अब मांडवी लोकसभा क्षेत्र है। उन्होंने 1888 में अजमेर में वकालत के समय स्वराज के लिये काम करना शुरू कर दिया था। मध्यप्रदेश के रतलाम और गुजरात के जूनागढ़ में दीवान रहकर उन्होंने जनहित कार्य किये। मात्र बीस वर्ष की आयु से ही वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे। वे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और स्वामी दयानंद सरस्वती से प्रेरित थे। 1918 के बर्लिन और इंग्लैण्ड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।
1897 में वे पुनः इंग्लैण्ड गये। 1905 में लॉर्ड कर्जन की ज्यादतियों के विरुद्ध संघर्षरत रहे। इसी वर्ष इंग्लैण्ड से मासिक समाचार-पत्र “द इण्डियन सोशियोलोजिस्ट” निकाला, जिसे आगे चलकर जिनेवा से भी प्रकाशित किया गया। इंग्लैण्ड में रहकर उन्होंने इंडिया हाउस स्थापित किया। भारत लौट 1905 में उन्होंने क्रान्तिकारी छात्रों को लेकर इण्डियन होम रूल सोसायटी स्थापित की।
उस समय यह संस्था क्रान्तिकारी छात्र समूह की प्रेरणा सिद्ध हुई। क्रान्तिकारी शहीद मदनलाल ढींगरा उनके प्रिय शिष्यों में थे। उनके बलिदान पर उन्होंने छात्रवृत्ति भी शुरू की थी। विनायक दामोदर सावरकर ने वर्माजी का मार्गदर्शन पाकर लन्दन में रहकर लेखन कार्य किया।
31 मार्च 1930 को जिनेवा के एक अस्पताल में वे अपना नश्वर शरीर त्यागकर चले गये। उनका शव अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के कारण भारत नहीं लाया जा सका और वहीं उनकी अन्त्येष्टि कर दी गयी। बाद में गुजरात सरकार ने काफी प्रयत्न करके जिनेवा से उनकी अस्थियाँ भारत मँगवायीं।
अस्थियां भारत में संरक्षित


वर्माजी का दाह संस्कार करके उनकी अस्थियां जिनेवा की सेण्ट जॉर्ज सीमेट्री में सुरक्षित रख दी गयी। बाद में उनकी पत्नी भानुमती कृष्ण वर्मा का निधन हुआ तो उनकी अस्थियाँ भी उसी सीमेट्री में रख दी गयीं।
22 अगस्त 2003 को भारत की स्वतन्त्रता के 55 वर्ष बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्विस सरकार से अनुरोध करके जिनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी भानुमती की अस्थियां भारत मँगायी। बम्बई से माण्डवी तक पूरे राजकीय सम्मान से भव्य जुलूस में उनके अस्थि-कलश गुजरात लाये गये। वर्मा के जन्म स्थान में दर्शनीय क्रान्ति-तीर्थ बनाकर उसके परिसर स्थित श्यामजीकृष्ण वर्मा स्मृतिकक्ष में उनकी अस्थियां संरक्षित की गई ।
उनके जन्म स्थान पर गुजरात सरकार द्वारा विकसित श्रीश्यामजी कृष्ण वर्मा मेमोरियल को गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 13 दिसम्बर 2010 को राष्ट्र को समर्पित किया गया। कच्छ जाने वाले सभी देशी विदेशी पर्यटकों के लिये माण्डवी का क्रान्ति-तीर्थ एक उल्लेखनीय पर्यटन स्थल बन चुका है।
क्रान्ति-तीर्थ के श्यामजीकृष्ण वर्मा स्मृतिकक्ष में पति-पत्नी के अस्थि-कलशों को देखने दूर-दूर से पर्यटक गुजरात आते हैं।
